फर्क है पश्चिम बंगाल और तमिल नाडु में सत्ता परिवर्तन में। एक में हिंदुत्व बदलाव का जरिया बना। दूसरे में नई राजनैतिक दिशा को पंख लगे। आजाद भारत में एक ऐतिहासिक दिशा परिवर्तन जिससे लोकतंत्र और मजबूत हुआ है।
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क्यों और कैसे एक एक्टर से नेता बने विजय ने मचाया सियासी तूफान
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बृज खंडेलवाल द्वारा
12 मई 2026
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एक फिल्म स्टार ने तमिलनाडु की राजनीति का खेल ही बदल दिया
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साठ के दशक में कामराज को मात देने वाले अन्ना दुरई से लेकर टीवीके के नायक विजय तक, तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से फिल्मों जैसी रही है। बड़े बड़े कटआउट। जोशीले नारे। भावुक भाषण। हीरो की पूजा।
लेकिन इस बार विजय का उभार कुछ अलग ही कहानी बन गया है। दो साल पहले तक वह सिर्फ सुपरस्टार अभिनेता थे। फिर अचानक राजनीति में आए और देखते ही देखते मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। डीएमके और एआईएडीएमके जैसी पुरानी ताकतों का किला डोल गया।
शुरू में बहुत लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। कहा, “एक और अभिनेता राजनीति में आ गया।” तमिलनाडु में यह नया नहीं था। पहले भी कई सितारे राजनीति में आए। कुछ बीच रास्ते गायब हो गए। कुछ जनता से जुड़ नहीं पाए। लेकिन विजय ने लोगों का मूड सही समय पर समझ लिया।
तमिलनाडु की जनता पुराने नेताओं और पुरानी राजनीति से थक चुकी थी। डीएमके पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। एआईएडीएमके जयललिता जी के बाद कमजोर हो चुकी थी। लोगों को नया चेहरा चाहिए था। विजय ने खुद को उसी “नई उम्मीद” के रूप में पेश किया।
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा और बोलने का अंदाज बना। बाकी नेताओं की तरह लंबे, भारी भरकम भाषण नहीं। छोटी, सीधी, दिल को छूने वाली बातें। ऐसा लगता था जैसे कोई आम आदमी गुस्सा और उम्मीद दोनों साथ लेकर बोल रहा हो।
उनकी एक लाइन बहुत मशहूर हुई:
“सत्ता किसी परिवार की जागीर नहीं है। सरकार जनता की है।”
यह बात लोगों के दिल में उतर गई। तमिलनाडु में परिवारवादी राजनीति से लोग परेशान थे। विजय ने सीधे उसी नस पर हाथ रखा।
एक और भाषण में उन्होंने कहा:
“मैं कुर्सी के लिए राजनीति में नहीं आया। मैं इसलिए आया हूं क्योंकि अब चुप रहना खतरनाक हो गया है।”
इसमें फिल्मी ड्रामा भी था और सच्चाई का एहसास भी। खासकर युवाओं को यह लाइन बहुत पसंद आई। उन्हें लगा कि विजय सिर्फ नेता बनने नहीं, कुछ बदलने आए हैं।
एक और बयान ने खूब तालियां बटोरीं:
“जनता को नेताओं से डरना नहीं चाहिए। नेताओं को जनता से डरना चाहिए।”
सीधी बात। लेकिन असरदार। विजय खुद को जनता का आदमी दिखाना चाहते थे, ऊपर बैठा शासक नहीं।
युवाओं के लिए उनका संदेश भी बहुत असरदार रहा:
“आपका भविष्य अगली पीढ़ी तक टाला नहीं जा सकता।”
चेन्नई के रिटायर्ड टीचर कृष्णस्वामी बताते हैं, "बेरोजगारी, महंगाई और नौकरी की चिंता में फंसे युवाओं को लगा कि कोई उनकी भाषा बोल रहा है। यही वजह रही कि पहली बार वोट डालने वाले लाखों युवा विजय के पीछे खड़े हो गए।"
उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने फिल्मों को पूरी तरह छोड़ दिया। यह कदम बहुत बड़ा संदेश बन गया। लोगों को लगा कि विजय राजनीति को गंभीरता से ले रहे हैं। सिर्फ टाइमपास नहीं कर रहे।
उनके पुराने फैन क्लब भी बड़ी ताकत बने। सालों से ये लोग रक्तदान शिविर, बाढ़ राहत, गरीबों की मदद और सामाजिक काम करते रहे थे। राजनीति में आने से पहले ही विजय के पास जमीनी नेटवर्क तैयार था। यही उनकी असली ताकत बनी।
अब सवाल उठता है कि रजनीकांत और कमल हासन क्यों सफल नहीं हुए?
कोयंबटूर के एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन कहते हैं, "रजनीकांत के पास जबरदस्त स्टार पावर थी। शायद विजय से भी ज्यादा। लेकिन उन्होंने बहुत देर कर दी। सालों तक राजनीति में आने के संकेत देते रहे, फिर पीछे हटते रहे। जनता कन्फ्यूज हो गई। लोगों को लगा कि वह खुद तय नहीं कर पा रहे कि राजनीति करनी है या नहीं। राजनीति में हिचकिचाहट बहुत महंगी पड़ती है।"
उधर, कमल हासन पढ़े लिखे, समझदार और गंभीर नेता दिखे। लेकिन उनकी राजनीति आम जनता से थोड़ी दूर नजर आई। उनके भाषण कई बार बहुत बौद्धिक और शहरी लगते थे। गांव और छोटे शहरों के वोटरों से भावनात्मक रिश्ता नहीं बन पाया। लोग उनका सम्मान करते थे, लेकिन उनके पीछे जुनून से नहीं जुटे।
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,"विजय ने यही फर्क पैदा किया। वह बड़े विचारक की तरह नहीं, बदलाव लाने वाले आम आदमी की तरह सामने आए। उनकी भाषा आसान थी। अंदाज अपनापन वाला था। और सबसे बड़ी बात, वह सही समय पर मैदान में उतरे।"
तमिल राजनीति के जानकर वेंकट सुब्रमनियन के मुताबिक, "तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारे पहले भी आए हैं। लेकिन विजय ने स्टारडम, युवा ऊर्जा, साफ छवि, मजबूत संगठन और जनता की नाराजगी, सबको जोड़कर एक बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर दिया।"
यह सिर्फ चुनाव जीतने की कहानी नहीं थी। यह उस जनता की कहानी थी जो नए हीरो का इंतजार कर रही थी।
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