मोदी जी की गांधीवादी अपील, लेकिन सरकारी नीतियां गांधी-विरोधी
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बृज खंडेलवाल द्वारा
17 मई 2026
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लोकतंत्र की सड़क पर दौड़ता नया सामंतवाद
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देश बदलने का दावा था।
लेकिन सड़कों पर अब भी वही पुराना दृश्य है। आगे लाल बत्ती जैसी अकड़। पीछे सायरनों की चीख। आम आदमी ट्रैफिक में पसीना बहाता खड़ा है और नेताओं के काफिले हवा चीरते निकल जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने राजा हाथी पर चलते थे, नए शासक एसयूवी के झुंड में चलते हैं।
यह वीआईपी संस्कृति केवल सुरक्षा का सवाल नहीं रही। यह सत्ता के प्रदर्शन का सार्वजनिक तमाशा बन चुकी है। रोड शो, फूल वर्षा, दर्जनों गाड़ियाँ, बंद सड़कें, विशेष लाउंज, अलग कतारें, सरकारी संसाधनों का खुला दुरुपयोग। लोकतंत्र के नाम पर एक नई वर्ण व्यवस्था खड़ी की जा रही है। ऊपर “विशेष नागरिक” और नीचे धक्के खाती जनता।
विडंबना देखिए। चुनावों में नेता खुद को “जनसेवक” कहते हैं। जीतते ही वे जनता से भौतिक दूरी बना लेते हैं। उनके लिए सड़कें खाली कराई जाती हैं, अस्पतालों में वार्ड रोके जाते हैं, पुलिस सुरक्षा ढाल बन जाती है। जनता टैक्स देती है, फिर उसी पैसे से पैदा हुई असुविधा झेलती है।
यह परिवर्तन नहीं है। यह एलीट सामंतवाद का नया संस्करण है। लोकतंत्र की आत्मा बराबरी में बसती है, विशेषाधिकारों में नहीं। जिस दिन सत्ता का काफिला आम आदमी के ट्रैफिक में फँसने लगेगा, शायद उसी दिन असली लोकतंत्र सड़क पर दिखाई देगा।
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महात्मा गांधी की धरती पर, जहां सादगी, आत्मनिर्भरता और संयम हमेशा से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया ऑस्टेरिटी का आह्वान ज़रूरी तो है, मगर बेहद विडंबनापूर्ण भी है। पश्चिम एशिया के संकट और बढ़ते तेल के दामों के बीच मोदी जी ने लोगों से अपील की कि वर्क-फ्रॉम-होम करें, पेट्रोल-डीज़ल बचाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और इलेक्ट्रिक गाड़ियां इस्तेमाल करें, विदेश यात्राएं और सोने की खरीदारी टालें, खाने के तेल का कम इस्तेमाल करें और लोकल चीज़ें खरीदें।
ये अपील सही है क्योंकि हमारा देश वेस्ट एशिया से आने वाले क्रूड ऑयल पर बहुत निर्भर है। लेकिन ये उपदेश खोखले लगते हैं जब हम देखते हैं कि पिछले दस साल से सरकार ने ठीक उसी हाई-कंज़म्पशन, मशीन-निर्भर और कार-केंद्रित जीवनशैली को बढ़ावा दिया है जिसके खिलाफ गांधी जी ने चेतावनी दी थी।
गांधी जी की ऑस्टेरिटी सिर्फ संकट का हल नहीं थी, बल्कि जीवन की पूरी दर्शनशैली थी। उन्होंने कहा था कि “मैं हर तरह की विनाशकारी मशीनरी का कड़ा विरोधी हूँ”। वे ऐसी मशीनें चाहते थे जो इंसान को गुलाम न बनाएँ, बल्कि मदद करें। गांधी जी शारीरिक मेहनत, गांव की आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर ज़ोर देते थे।
लेकिन मोदी सरकार ने $3 ट्रिलियन इकॉनमी का सपना पूरा करने के चक्कर में बुलेट ट्रेन और विशाल एक्सप्रेसवे जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स पर ज़ोर दिया। ये प्रोजेक्ट्स तेज़ रफ़्तार और अमीरों की कार मोबिलिटी को बढ़ावा देते हैं। लग्ज़री कारों की बिक्री बढ़ रही है, जबकि आम मध्यवर्गी परिवार पेट्रोल-डीज़ल और LPG के महंगे दामों से परेशान हैं। अमीर लोग विदेश घूमते रहते हैं, शादी-ब्याह धूमधाम से करते हैं, सोना खरीदते हैं – उनकी ज़िंदगी पर कोई असर नहीं। सिर्फ आम आदमी को कष्ट झेलना पड़ता है।
सबसे निंदनीय बात ये है कि इंसानी गतिशीलता (human mobility) को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया। हमारे सड़कें अब कमज़ोरों के लिए कत्लगाह बन गई हैं। हर साल 1.75 लाख से ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं, जिनमें ज़्यादातर पैदल चलने वाले, साइकिल वाले और दोपहिया वाहन चलाने वाले होते हैं। फुटपाथ या तो हैं ही नहीं या अतिक्रमण से भरे हैं। साइकिल लेन लगभग नदारद हैं। एक्सप्रेसवे स्पीड के लिए बने हैं, सुरक्षा के लिए नहीं।
गांधी जी जो खुद पैदल चलते थे और शारीरिक श्रम को महत्व देते थे, इस कार-केंद्रित मॉडल को देखकर दुखी होते। सरकार ने गांधीवादी रास्ते से मुड़कर चमक-दमक वाली आधुनिकता को अपनाया है। अब संकट के वक्त सादगी का उपदेश दिया जा रहा है।
ये उपदेश सिर्फ़ शब्दों तक सीमित न रहें। असली बदलाव तब आएगा जब पैदल चलने वालों और साइकिलिस्टों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए जाएंगे, कार मोबिलिटी की जगह इंसानी मोबिलिटी को तरजीह दी जाएगी, तेज़ी और लग्ज़री का राग अलापना कम होगा और लोकल, सादा और आत्मनिर्भर जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा।
इस संकट के वक्त मोदी जी के शब्द गांधी को याद दिलाते हैं, लेकिन नीतियां और इंफ्रास्ट्रक्चर कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। अगर एक्सट्रावगैंजा (फिजूलखर्ची) से इक्विटी (न्याय) की तरफ नहीं बदला गया तो ये उपदेश सिर्फ़ दिखावा बनकर रह जाएंगे।
भारत को गांधी के सिद्धांत को सिर्फ़ तेल के संकट में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना होगा : सादगी, संयम और सबके लिए विकास।
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