मुद्दों के मेले , हम हैं अकेले !!
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बृज खंडेलवाल द्वारा
13 मई 2026
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मेला देखकर लौट रहे हम लोग, एक अजीब चौराहे पर अटके हुए हैं।
जनता पूछ रही है, “रोजगार कहाँ है?”
सत्ता पूछ रही है, “वंदे मातरम् बोला कि नहीं?”
विपक्ष पूछ रहा है, “EVM का प्लग निकाला कि नहीं!”
और मीडिया पूछ रहा है, “आम चूसकर खाना चाहिए या काटकर?”
वाह रे तांत्रिक लोकतंत्र। जिस घर में चूल्हा ठंडा हो, वहां टीवी पर बहस गरम है।
एक तरफ बेरोजगार डिग्रियां लेकर धूप में लाइन लगा रहे हैं। दूसरी तरफ नेता माइक्रोफोन लेकर इतिहास की कब्रें खोद रहे हैं।
किसी को अस्पताल की बदहाली नहीं दिखती। पर कौन किस धर्म का है, यह सबको एक्स-रे मशीन की तरह साफ दिख जाता है।
गरीब आदमी महंगाई से पिस रहा है।
आम जरूरत की चीजों के भाव सुनकर BP की गोलियों की सेल बढ़ती है। गैस सिलेंडर देखकर सांस फूलती है, अस्थमा अटैक हो रहे हैं।
लेकिन टीवी पर अर्बन ज्ञाणी द्वारा राष्ट्रवाद का ऑक्सीजन मुफ्त बांटा जा रहा है।
इसी बीच त्याग और सादगी की नदियों बहने लगी हैं। मितव्ययिता मंत्र दिया गया है। कम खर्च करो।फिजूलखर्ची छोड़ो। सादगी अपनाओ।
पूरा देश ये सुनकर भावुक हो गया है। कइयों ने विदेश यात्रा स्थगित कर दी हैं। सरकारी बाबुओं ने AC की हवा में बैठकर त्याग पर सेमिनार किया। कुछ नेताओं ने पांच सितारा होटल में “सादगी सम्मेलन” रखा। किसी ने कहा, “विदेश यात्रा जरूरी है, आखिर मितव्ययिता का वैश्विक संदेश देना है।”
नई राजनीति का नया योग सूत्र है।जनता कटौती करे। सरकार प्रेरणा दे।
कहा गया, शादी समारोह सादगी से हों। वाह! यह बात उन लोगों ने कही जिनके काफिले निकलते समय ट्रैफिक खुद लोकतंत्र को सलाम करता है।
कहा गया, सरकारी खर्च कम हो।
और उसी शाम नई LED स्क्रीन पर “ऐतिहासिक उपलब्धियों” का विज्ञापन चमक उठा।
कहा गया, अनावश्यक यात्राएं बंद हों।
देश मुस्कुराया। एयरपोर्ट थोड़ा घबराया। त्याग का ऐसा अलौकिक वातावरण बना कि मध्यम वर्ग ने चाय में चीनी आधी कर दी। गरीब ने दाल में पानी बढ़ा दिया। और अमीर ने ट्वीट कर दिया, “Nation First.”
व्यवस्था तंत्र के पास मुद्दों की पूरी जादुई पोटली है। जनता फिर पांच किलो मुफ्त राशन और पंद्रह सेकंड के गुस्से में सब भूल जाती है।
उधर विपक्ष भी कम कलाकार नहीं।
देश जल रहा हो, पर उनकी प्राथमिकता EVM का पोस्टमार्टम है।
हार गए तो मशीन चोर। कुछ नहीं तो इनको हटाओ, उनको हटाओ। जीत गए तो लोकतंत्र जिंदाबाद। हार गए तो लोगों को डेमोक्रेसी खतरे में दिखती है।
इस बीच पूरा देश एक दूसरे की गिनती करने में लगा है। जाति जनगणना से अगले कुंभ तक गरीबी भाग जाएगी।
विपक्ष कहता है इतने खतरे तो पुराने जमाने में डाकुओं से भरे जंगल में भी नहीं थे।
और मीडिया! अरे मीडिया तो इस महान लोकतांत्रिक सर्कस का रिंग मास्टर है। देश में किसान आत्महत्या करे, नदी सूख जाए, बच्चे कुपोषण से मर जाएं, कोई फर्क नहीं। ज्योतिषियों की चांदी कट रही है, सब कुछ सितारों के हवाले। हम क्या साथ लाए थे, क्या ले जाएंगे!
वर्ल्ड बेस्ट टीवी एंकर्स भारत में हैं, उनके रहते सरकारी प्रवक्ताओं की कोई जरूरत ही नहीं। अगर किसी ने कहा कि आम काटकर खाना चाहिए या चूसकर, तो तीन घंटे की “राष्ट्रव्यापी बहस” तय है।
“सीमा हैदर का छठा बच्चा।”
“ जेल में बेटी हुई।”
“फिल्म स्टार ने किस रंग की चप्पल या चड्डी पहनी?”
ब्रेकिंग न्यूज ऐसे दौड़ती है जैसे रॉकेट चांद पर नहीं, पाताल में उतर चुका हो।
पत्रकारिता अब सवाल नहीं पूछती।
TRP की भिक्षा मांगती है।
एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे देश की सारी समस्याएं डेसिबल से हल होंगी।
स्क्रीन पर आठ खिड़कियां खुलती हैं।
आठ लोग एक साथ चीखते हैं।
और दर्शक सोचता है, शायद यही लोकतंत्र का नया राष्ट्रीय गीत है।
शिक्षा?
उसकी हालत उस रिश्तेदार जैसी हो गई है जिसे शादी में कोई पूछता नहीं।
स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में पड़ी है।
रोजगार फाइलों में लटका है।
गरीबी आंकड़ों में छिपी बैठी है।
लेकिन चुनाव आते ही सबको मंदिर, मस्जिद, भाषा, लोकल अस्मिता, पाकिस्तान और जाति याद आ जाती है।
मानो देश नहीं, कोई अनंतकालीन टीवी सीरियल चल रहा हो।
सब अपना अपना धंधा चमका रहे हैं।
जनता सिर्फ ताली बजाने वाली ऑडियंस है।
देश के असली मुद्दे फुटपाथ पर बैठे हैं।
और नकली मुद्दे लाल बत्ती वाली गाड़ियों में घूम रहे हैं।
कभी कभी लगता है भारत समस्याओं से नहीं, “प्रायोजित बहसों” से चल रहा है।
फिर भी उम्मीद जिंदा है।
क्योंकि इस देश का आम आदमी बहुत सहनशील है।
वह हर पांच साल बाद फिर लाइन में खड़ा हो जाता है।
उसे लगता है, शायद इस बार कोई रोटी, रोजगार और राहत की बात करेगा।
लेकिन सिस्टम को पक्ष, विपक्ष के बाजीगर ही चलते हैं। टोपी से कभी धर्म निकालता है। कभी डर। कभी दुश्मन। कभी मितव्ययिता का नया मंत्र। और जनता? वह फिर ताली बजाती है। क्योंकि असली मुद्दों की आवाज अब शोर में दब चुकी है
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