छोटे परिवार, टूटते रिश्ते: क्या परिवार नियोजन ने भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था को कमजोर कर दिया है?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
26 मई 2026
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मदर्स डे पर बेटे ने अपनी ही मां को गोली मार दी।
भाई खेत के टुकड़े के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।
बुजुर्ग मां फ्लैट के एक कोने में पड़ी रही, जैसे घर का कोई बेकार सामान।
एक युवा प्रोफेशनल अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या की कोशिश कर बैठा।
यह किसी अपराध फिल्म की पटकथा नहीं। यह बदलते भारत की भयावह सामाजिक तस्वीर है। वही भारत, जिसने कभी पूरे उत्साह से “हम दो, हमारे दो” का नारा अपनाया था।
देश ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। लेकिन इस सफलता की छाया में रिश्तों की जमीन धीरे-धीरे बंजर होती चली गई। सदियों तक भारतीय समाज को सहारा देने वाली संयुक्त परिवार व्यवस्था अब तेजी से दरक रही है। और इस बदलाव के पीछे परिवार नियोजन कार्यक्रमों की सफलता भी एक महत्वपूर्ण, मगर कम चर्चित कारण बनकर उभरी है।
दशकों तक सरकारों ने छोटे परिवार को आदर्श बताया। तर्क भी मजबूत था; कम बच्चे होंगे तो गरीबी घटेगी, शिक्षा बेहतर होगी, स्वास्थ्य सुधरेगा और आर्थिक विकास तेज होगा। अभियान सफल रहा।
NFHS-5 (2019-21) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 2.0 रह गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से भी नीचे है। 1960 के दशक में यही दर लगभग 5.7 थी। शहरों में एक या दो बच्चों का चलन सामान्य हो चुका है। गांव भी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।
NFHS-5 डेटा बताता है कि देश में 58.2% घरेलू इकाइयां अब न्यूक्लियर फैमिली हैं। औसत परिवार का आकार 1999 के 5.2 से घटकर 2021 में 4.4 रह गया है।
लेकिन हर सफलता की एक सामाजिक कीमत होती है। भारत अब वही कीमत चुका रहा है।
हाल की घटनाएं इस संकट का दर्दनाक चेहरा दिखाती हैं।
उत्तर प्रदेश में पुश्तैनी जमीन के विवाद में एक किसान ने अपनी मां और छोटे भाई की हत्या कर दी।
मध्य प्रदेश में सात एकड़ खेत के बंटवारे को लेकर भाइयों की लड़ाई खून-खराबे में बदल गई।
दिल्ली में पढ़ा-लिखा दंपती तलाक, दहेज और बच्चे की कस्टडी के मुकदमों में वर्षों से उलझा है।
हरियाणा में दहेज के लिए नई बहू को प्रताड़ित किया गया, क्योंकि छोटे परिवार में रोकने-टोकने वाला कोई बुजुर्ग नहीं था।
बेंगलुरु में बुजुर्ग मां बेटे के फ्लैट में उपेक्षा की शिकार हुई।
पंजाब में दो भाई दस वर्षों से अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
चेन्नई में एक युवक पारिवारिक अलगाव और अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या का प्रयास कर बैठा।
ये सिर्फ घटनाएं नहीं हैं। ये बदलते भारत का सामाजिक एक्स-रे हैं।
संयुक्त परिवार कभी आदर्श व्यवस्था नहीं था। उसमें पितृसत्ता भी थी, दबाव भी थे, झगड़े भी होते थे। लेकिन उसके भीतर एक सुरक्षा कवच भी मौजूद था। दादा-दादी बच्चों को संभालते थे। चाचा-ताऊ संकट में साथ खड़े रहते थे। विधवाओं को सहारा मिलता था। घर के बड़े विवाद सुलझा देते थे। अकेलापन इतना गहरा नहीं होता था कि जानलेवा बन जाए।
आज वही ढांचा बिखर रहा है।
शहरीकरण, पलायन, बढ़ती महत्वाकांक्षाएं, उपभोक्तावाद और महिलाओं की शिक्षा-आर्थिक स्वतंत्रता ने इस प्रक्रिया को तेज किया। लेकिन परिवार नियोजन ने रिश्तों की पूरी गणित बदल दी।
पहले बड़े परिवारों में जिम्मेदारियां बंट जाती थीं। चार भाई खेत संभालते थे। कई बच्चे बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनते थे। चचेरे भाई-बहन भी सगे रिश्तों की तरह साथ पलते थे। परिवार सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, सामाजिक बीमा भी था।
अब कई घरों में सिर्फ एक या दो बच्चे हैं। ऐसे में विवाद पैदा हो तो बीच-बचाव कौन करे?
एक तलाक पूरे व्यक्ति को अकेला कर देता है।
एक बेटा जिम्मेदारी छोड़ दे तो बुजुर्ग माता-पिता बेसहारा हो जाते हैं।
दो भाइयों का झगड़ा सीधे हत्या तक पहुंच जाता है।
छोटे परिवारों ने संपत्ति विवाद भी अधिक तीखे बना दिए हैं। खेती की जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती गई। शहरों में मकान सोने की खान बन गए। जहां वारिस कम हों, वहां लालच और टकराव ज्यादा विस्फोटक हो जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि भारत में जमीन और संपत्ति विवाद हिंसक अपराधों का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं।
UN Global Study on Homicide जैसे रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में संपत्ति-जमीन विवाद हत्याओं का बड़ा कारण हैं।
आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामले न्याय तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं। केरल जैसे राज्यों में रोज औसतन 75 तलाक के मामले दर्ज होते हैं। पुलिस थाने अब आधे पारिवारिक पंचायत बन चुके हैं।
आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामलों ने न्याय व्यवस्था पर भारी दबाव डाल दिया है। पुलिस थाने धीरे-धीरे पारिवारिक पंचायतों में बदलते जा रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा संकट मानसिक है।
अकेलापन बढ़ रहा है। अवसाद बढ़ रहा है। बुजुर्ग भावनात्मक उपेक्षा झेल रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली कई बार छोटे द्वीपों जैसी बन गई है। एक रिश्ता टूटा नहीं कि पूरा भावनात्मक ढांचा ढह जाता है।
भारत की पारंपरिक सामाजिक समझ कहती थी कि इंसान अकेले नहीं, साथ रहकर बचता है। आधुनिक जीवन ने व्यक्ति को केंद्र में रख दिया और समुदाय को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया।
यह भी सच है कि परिवार नियोजन ने भारत को जनसंख्या विस्फोट से बचाया। मातृ स्वास्थ्य सुधरा। शिक्षा के अवसर बढ़े। गरीबी पर कुछ नियंत्रण हुआ। इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन नीति निर्माताओं ने शायद इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों का पूरा आकलन नहीं किया।
पश्चिमी देशों ने संयुक्त परिवार छोड़े तो बदले में मजबूत सामाजिक सुरक्षा, बुजुर्ग देखभाल और काउंसलिंग सिस्टम विकसित किए। भारत ने पुरानी व्यवस्था को कमजोर तो कर दिया, मगर नई सुरक्षा दीवारें समय पर खड़ी नहीं कर पाया।
नतीजा सामने है:
छोटे घर।
छोटे परिवार।
छोटे रिश्ते।
और बड़ा अकेलापन।
अब चुनौती परिवार नियोजन को उलटने की नहीं है। असली चुनौती टूटते सामाजिक ताने-बाने को फिर से जोड़ने की है। भारत को पारिवारिक मध्यस्थता तंत्र, बुजुर्ग देखभाल योजनाएं, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और सामुदायिक सहयोग मॉडल मजबूत करने होंगे। स्कूलों और समाज को भी रिश्तों की सामूहिक जिम्मेदारी का महत्व फिर सिखाना होगा।
वरना आने वाले समय में भारत के पास मकान तो होंगे, मगर घर नहीं बचेंगे।
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