ये दिवाली खास है! ट्रंप की हेकड़ी निकल चुकी है, पाकिस्तान में सन्नाटा है। पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद ईरान भारत के जहाजों को हॉर्मूज से निकलने की अनुमति दे रहा है; इजरायल दुविधा में है, यूक्रेन चौराहे पर है, लेकिन भारत में गरीबी कम हो रही है, जश्न का माहौल है।
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दिवाली का धमाका!
जब पूरा देश खरीदारी पर निकलता है, अर्थव्यवस्था में जगमगाने लगती हैं लक्ष्मी
सोने से लेकर कारों तक, मिठाइयों से लेकर साड़ियों तक। रोशनी का त्योहार बन गया भारत का सबसे बड़ा बाजार उत्सव।
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बृज खंडेलवाल द्वारा
7 नवंबर 2026
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आखिर क्या होता है, जब करोड़ों भारतीय एक साथ जश्न मनाने निकल पड़ते हैं? बाजार सज जाते हैं, दुकानों पर भीड़ उमड़ती है, सोने के शोरूम चमक उठते हैं, कारों की डिलीवरी तेज हो जाती है और अर्थव्यवस्था में नई जान आ जाती है। दिवाली सिर्फ दीयों, मिठाइयों और आतिशबाजी का त्योहार नहीं है। यह भारत का सबसे बड़ा खरीदारी महोत्सव भी है। इसे देश की अर्थव्यवस्था का सालाना बूस्टर डोज कह सकते हैं। हर चमकते दीये के पीछे कारोबार की एक कहानी है। हर खरीदारी के साथ रोजगार और आमदनी की एक नई कड़ी जुड़ जाती है।
इस साल दिवाली ने भारतीय बाजार की ताकत का शानदार प्रदर्शन किया है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के अनुमान के मुताबिक, नवरात्र से दिवाली तक देश में कारोबार सात लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है। पिछले साल यह कारोबार 6.05 लाख करोड़ रुपये था (माल 5.40 लाख करोड़ और सेवाएं लगभग 65,000 करोड़)। यानी इस बार करीब 15 से 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है। दिल्ली अकेले लगभग एक लाख करोड़ रुपये का त्योहारी कारोबार दर्ज कर सकता है।
धनतेरस के आंकड़ों पर गौर कीजिए। CAIT के अनुसार इस एक दिन में देशभर में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक (बाद के अनुमानों में 1.25 लाख करोड़ तक) की बिक्री हुई। इसमें सोने और चांदी की खरीदारी का हिस्सा 60,000 करोड़ से अधिक (AIJGF अनुमानों में 66,000 करोड़ के आसपास) रहा। ऊंची कीमतों के बावजूद हल्के गहनों, सिल्वर कॉइन्स और पारंपरिक वस्तुओं की मांग बनी रही। कीमतों में मामूली नरमी ने खरीदारों को आकर्षित किया।
खरीदारी का उत्साह केवल गहनों तक सीमित नहीं रहा। घरेलू उपकरणों में अच्छी वृद्धि दर्ज हुई। मारुति सुजुकी ने धनतेरस पर लगभग 30,000 कारें ग्राहकों को सौंपीं। टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स ने भी 12,000 इकाइयों के आसपास रिटेल किया। सड़कों पर नई गाड़ियां दौड़ने लगीं।
दिवाली ऐसा त्योहार है, जिसमें खुशहाली का हिस्सा लगभग हर किसी तक पहुंचता है। किराना, मिठाइयां, नमकीन, सूखे मेवे, कपड़े, जूते-चप्पल, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स और सजावटी सामान खूब बिके। लेकिन असली रौनक छोटे कारोबारियों के चेहरों पर दिखाई देती है—मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार, हस्तशिल्प कारीगर, फूल बेचने वाले, घरों में मिठाइयां बनाने वाली महिलाएं और गली-मोहल्लों के दुकानदार। इनके लिए दिवाली साल का सबसे बड़ा कारोबारी मौका है।
सेवा क्षेत्र में भी जमकर बहार आई। ट्रांसपोर्ट, डिलीवरी, पैकेजिंग, गोदाम, कैटरिंग, होटल, रेस्तरां, टैक्सी और सजावट से जुड़े काम बढ़े। CAIT के अनुमान के अनुसार इस साल त्योहारी सीजन में सेवा क्षेत्र का कारोबार 80,000 करोड़ से एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है—पिछले साल के करीब 65,000 करोड़ से 20-25 प्रतिशत अधिक।
भारत के नौ करोड़ से अधिक व्यापारियों का नेटवर्क इस आर्थिक गतिविधि की रीढ़ है। छोटी दुकानें, पारिवारिक कारोबार, कारीगर और स्थानीय निर्माता इस मौसम में अपनी कमाई बढ़ाने का इंतजार करते हैं। वोकल फॉर लोकल, मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों ने घरेलू उत्पादों की तरफ ध्यान खींचा है। भारतीय दीये, कपड़े, हस्तशिल्प और घरेलू सामान खरीदने से छोटे उद्योगों को सहारा मिलता है।
अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ कहते हैं। एक की खरीदारी दूसरे की कमाई बन जाती है। एक साड़ी बिकती है तो निर्माता, थोक व्यापारी, दुकानदार और परिवहन कर्मचारी तक कमाते हैं। मिठाई का एक डिब्बा कई परिवारों के चूल्हे जलाता है।
इस चमक के बीच कुछ सवाल भी जरूरी हैं। क्या खरीदारी का यह उत्साह छोटे शहरों और गांवों तक समान रूप से पहुंच रहा है? क्या बढ़ती बिक्री के साथ आम परिवारों की आमदनी भी बढ़ रही है? क्या लोग बचत से खरीदारी कर रहे हैं या कर्ज लेकर शौक पूरे कर रहे हैं? अर्थव्यवस्था को केवल खरीददार नहीं, आर्थिक रूप से सुरक्षित परिवार भी चाहिए।
फिर भी दिवाली भारतीय घरेलू बाजार की ताकत का शानदार उदाहरण है। हमारी सांस्कृतिक परंपराएं और व्यापारिक गतिविधियां मिलकर विकास का नया रास्ता खोल सकती हैं। त्योहार बाजार तक ग्राहकों को लाता है, बाजार रोजगार पैदा करता है और रोजगार खुशहाली बढ़ाता है।
आखिरकार, दिवाली केवल घरों में दीये नहीं जलाती। यह लाखों दुकानों, कारखानों, कार्यशालाओं और छोटे कारोबारों में भी उम्मीद की रोशनी भरती है। जब भारत खरीदारी करता है, तो भारत का बाजार चलता है। जब बाजार चलता है, तो करोड़ों घरों में चूल्हे जलते हैं।
लक्ष्मी जी दिवाली पर घरों में जरूर आती हैं, लेकिन लगता है इस बार उन्होंने दुकानों, कारखानों और गोदामों का भी रास्ता पकड़ लिया है!
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