Sunday, April 5, 2026

 हम तो कठपुतलियां हैं, नचाता तो कोई और ही है!

हर शख्स पूछ रहा है ,  कब अंधेरी रात की सुबह होगी?  

नेता नहीं बता पा रहे, पूछते हैं ज्योतिषियों से।  

क्या सचमुच आसमान युद्ध का फैसला लिख रहा है? या फिर इतिहास अब भी ट्रंप के हाथों में है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

6 अप्रैल 2026

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आसमान अशांत है। आग लगी हुई है। चीन और रूस ऐसे खामोश हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। जबकि ज़मीन पर धुआँ है, बारूद है और बेचैनी है।

बेचारा ट्रंप क्या करे। ग्रह-नक्षत्र उसे चैन से रहने नहीं दे रहे। ज्योतिषियों का दावा है कि ऊपर ग्रहों की चाल ही नीचे युद्ध की दिशा तय कर रही है। अमेरिका और इज़राइल की अगुवाई में ईरान के खिलाफ छिड़ा संघर्ष छह दिनों की जगह अब छठे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। शुरुआत का पलड़ा साफ तौर पर एक तरफ झुका दिखता है। लेकिन अंत अब भी धुंध में लिपटा है ;  लंबा, उलझा हुआ, थकाने वाला।

“इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ पहले आसमान में लड़ी जाती हैं, धरती तो सिर्फ उसका मंच बनती है,” एक पश्चिमी ज्योतिषी की यह टिप्पणी इन दिनों खूब दोहराई जा रही है।

कहानी 28 फरवरी की उस रात अचानक रफ्तार पकड़ती है। मिसाइलें आसमान चीरती हैं। ठिकाने ढहते हैं। और ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत इस संघर्ष को एक नए मोड़ पर ला खड़ा करती है। सैन्य ढांचे को गहरी चोट लगती है। दुनिया सन्न रह जाती है।

ज्योतिषी इसे महज संयोग नहीं मानते। मंगल और यूरेनस का टकराव। राहु और मंगल की युति। यही विस्फोटक संयोजन है जिसे शास्त्रों में उथल-पुथल का संकेत माना गया है।

“जब मंगल उग्र होता है, तो तलवारें खुद रास्ता खोज लेती हैं,” एक वैदिक ज्योतिषी का कहना है।

शुरुआती दौर में यह युद्ध एकतरफा दिखता है। अमेरिकी वायु शक्ति का दबदबा साफ नजर आता है। सटीक हमले। सीमित नुकसान। मजबूत पकड़। लेकिन यही वह क्षण है जहाँ कहानी पलटने को बेकरार है।

कुंडलियाँ इशारा कर रही हैं कि यह संघर्ष जल्द थमने वाला नहीं। अप्रैल और मई आग से भरे महीने बताए जा रहे हैं। शनि और मंगल की युति तनाव को लंबा खींचेगी।

“शनि सिखाता है, मंगल सज़ा देता है। दोनों साथ हों तो समय कठोर हो जाता है,” यह पुरानी ज्योतिषीय कहावत फिर प्रासंगिक लगने लगी है।

आगे क्या? जवाब बेचैन करने वाला है। ड्रोन हमले बढ़ेंगे। मिसाइलों की बरसात होगी। प्रॉक्सी युद्ध गहराएंगे। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर खतरे मंडराएंगे। पूरा पश्चिम एशिया इस आग की तपिश महसूस करेगा।

लेकिन हर भविष्यवाणी सिर्फ अंधेरा नहीं दिखाती। नास्त्रेदमस के लंबे सात महीनों के युद्ध का भी हवाला दिया जा रहा है।

कुछ ज्योतिषी दावा कर रहे हैं कि यह संकट अपने भीतर एक बदलाव का बीज भी लिए हुए है। गर्मियों के आखिर तक ईरान के लिए “मुक्ति” और एक तरह का पुनर्जन्म संभव है।

“हर विनाश अपने भीतर सृजन का बीज छुपाए होता है,” यह कथन जैसे इस पूरे परिदृश्य पर फिट बैठता है।

वैदिक ज्योतिष के कई चेहरे इसे सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक भूकंप की शुरुआत मानते हैं। उनके मुताबिक दबाव बढ़ेगा, सत्ता डगमगाएगी और अंततः एक नई पहचान उभरेगी। शायद “प्राचीन पर्शिया” की स्मृति फिर सिर उठाए।

इस अंधेरे में एक हल्की रोशनी भी है।

जब बृहस्पति कर्क राशि में प्रवेश करेगा, तब संवाद के दरवाजे खुल सकते हैं। कुछ ज्योतिषी जुलाई के अंतिम सप्ताह की ओर इशारा कर रहे हैं। कुछ सितंबर और अक्टूबर में चरणबद्ध समझौते की संभावना देखते हैं। लेकिन इतिहास बार-बार साबित कर चुका है : “शांति कभी सीधे रास्ते से नहीं आती, वह संघर्ष के काँटों से होकर गुजरती है।”

भविष्यवक्ताओं की मानें तो एक और संकेत चिंता बढ़ाता है। यूरेनस का मिथुन राशि में प्रवेश। इतिहास गवाह है ;  जब-जब ऐसा हुआ, अमेरिका बड़े युद्धों में उलझा है। आशंका है कि यह संघर्ष सीमाओं से बाहर फैल सकता है। तेल की कीमतें उछल सकती हैं। दूसरी शक्तियां परोक्ष रूप से मैदान में उतर सकती हैं।

ज्योतिषियों की भाषा अलग है, लेकिन निष्कर्ष एक सा है। फिलहाल युद्ध का मैदान अमेरिका और इज़राइल के पक्ष में झुका हुआ दिखता है। लेकिन जीत का ताज अभी दूर है। यह लड़ाई सिर्फ गोलियों और बमों से तय नहीं होगी। इसका असली हिसाब वक्त करेगा।

एक वरिष्ठ ज्योतिषी के शब्दों में गूंजती सच्चाई है:

“युद्ध मैदान में जीते जाते हैं, लेकिन उनका अर्थ समय तय करता है।”

नीचे धरती पर सैनिक आगे बढ़ रहे हैं। मोर्चा संभाले खड़े हैं। ऊपर आसमान में ग्रह अपनी चाल चल रहे हैं। और दुनिया ठहरी हुई सांसों के साथ देख रही है।

आखिर फैसला कौन करेगा?  

सितारे?  

या इंसान की जिद, उसकी बुद्धि और उसका साहस?

“ग्रह दिशा देते हैं, लेकिन मंज़िल इंसान खुद चुनता है।”

 क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 अप्रैल 2026

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जी, ऐसा ही है।

दरवाज़ा संविधान ने खोला था, इरादा साफ था। सदियों की अन्याय-भरी सीढ़ियाँ तोड़नी थीं। आरक्षण उस वक़्त एक बैसाखी था, स्थायी बैरिकेड नहीं। लेकिन सियासत ने उसे हथियार बना दिया। वोटों की गिनती ने समाज की दरारों को भरने के बजाय और गहरा कर दिया। जो अस्थायी पुल होना था, वही स्थायी मोर्चा बन गया। आज हाल यह है कि पढ़ा-लिखा मतदाता भी उसी खांचे में खड़ा है, जहां उसके दादा खड़े थे। फर्क बस इतना है कि अब गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गया है।

शुरुआत में सोच अलग थी। सुधारकों के लिए आरक्षण एक सर्जिकल स्ट्राइक था। एक झटका, जो बराबरी का रास्ता साफ करे। उनका लक्ष्य जाति को स्थायी पहचान बनाना नहीं था, बल्कि उसे धीरे-धीरे अप्रासंगिक कर देना था। लेकिन राजनीति की गंध अलग होती है। यहां आदर्श नहीं, अंकगणित चलता है। यहां दर्द भी वोट में बदलता है और उम्मीद भी।

फिर आए वे खिलाड़ी, जिन्होंने जाति को स्थायी इंजन बना दिया। कांशी राम, मायावती, मुलायम, अखिलेश आदि  ने जातिगत आक्रोश को अनुशासित वोट बैंक में ढाला। यह सिर्फ सामाजिक आंदोलन नहीं था, यह सटीक चुनावी गणित था। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती ने और धार दी। 2007 में उन्होंने जो किया, वह एक केस स्टडी है। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, सबको जोड़कर सत्ता का समीकरण गढ़ा। 206 सीटें सिर्फ आंकड़ा नहीं थीं, वह संदेश था कि जाति को जोड़कर भी जीता जा सकता है, तोड़कर भी।

शुरुआत डॉ राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को वैचारिक धार देकर की। उनका 60 प्रतिशत का नारा सिर्फ नारा नहीं था, सामाजिक पुनर्संतुलन का प्रस्ताव था। लेकिन जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वह भी वोट की भाषा में अनुवादित हो गया। और फिर आया वह क्षण जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। मंडल कमीशन की सिफारिशें जब लागू हुईं, तो देश दो खेमों में बंट गया। वीपी सिंह ने इसे लागू किया, सरकार चली गई, लेकिन राजनीति बदल गई। उत्तर भारत में नई जातीय ताकतें उभरीं। समाजवादी पार्टियां, क्षेत्रीय दल, सबने अपने-अपने खांचे बना लिए।

दक्षिण में कहानी अलग दिखती है, पर सार वही है। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र काझागम ने गैर-ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। 69 प्रतिशत आरक्षण सिर्फ नीति नहीं था, एक स्थायी सामाजिक समझौता था। नतीजा यह हुआ कि दशकों से सत्ता उन्हीं खेमों में घूम रही है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने सरकारों की चाबी अपने पास रखी।  देव गौडा का उदय इसी गणित की देन था।

चुनाव अब विचारों से कम, जातीय नक्शों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास अपना डेटा है। कौन-सी सीट पर कौन-सी जाति भारी है, किसे टिकट देना है, किसे वादा करना है। उत्तर प्रदेश में यह फार्मूला खुलकर दिखता है। यादव बहुल सीटों पर समाजवादी टिकट, दलित बहुल इलाकों में अलग रणनीति। यह ठंडा, सटीक, बेरहम गणित है। यहां विचारधारा अक्सर बैक सीट पर बैठी रहती है।

कम्युनिस्टों ने एक अलग सपना देखा था। वर्ग संघर्ष का। उन्हें लगा कि आर्थिक बराबरी से जाति मिट जाएगी। लेकिन जमीन ने उनका भ्रम तोड़ दिया। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आंदोलन खुद जातियों में बंट गए। केरल और बंगाल में कुछ सफलता मिली, लेकिन वहां भी जाति की छाया कभी पूरी तरह नहीं गई। सच्चाई यह है कि आदमी रोजमर्रा की जिंदगी में जाति जीता है। शादी में, जमीन में, रिश्तों में। ऐसे में  वर्ग संघर्ष ठोस आरक्षण के सामने कमजोर पड़ गया।

आज तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी, शहर फैले, नौकरियां बदलीं। लेकिन जाति जिंदा है, क्योंकि उसका सीधा रिश्ता लाभ से जुड़ा है। एक डिग्री के साथ भी जाति प्रमाणपत्र चाहिए। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांग, नया वादा, नया ध्रुवीकरण। भीतर ही भीतर असमानता भी बढ़ती है। एक ही जाति के भीतर कुछ समूह सारा लाभ समेट लेते हैं, बाकी किनारे खड़े रह जाते हैं।

यह एक चक्र है, जो खुद को लगातार मजबूत करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बचाए रखती है। और फिर वही कहानी दोहराई जाती है। सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या हमने उसे लक्ष्य तक पहुंचने का साधन बनाया या रास्ते में ही उसका स्थायी शिविर खड़ा कर लिया।

भारतीय लोकतंत्र अभी भी उस जवाब की तलाश में है। जब तक कोई नई राजनीति, नई भाषा, नया भरोसा नहीं उभरेगा, तब तक यह कोड नहीं टूटेगा। जाति की स्याही अभी सूखी नहीं है। बैलेट पेपर पर उसका नाम अब भी सबसे गाढ़ा लिखा है।

Saturday, April 4, 2026

 सात फेरे से पहले सात सवाल: बदलती पीढ़ी का ‘न’ जो सिर्फ इंकार नहीं, इकरार है अपने आप से

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 अप्रैल 2026

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दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर पीली-सी रोशनी तैर रही थी। लैपटॉप की स्क्रीन पर एक लाइन चमक रही थी, “वन वे, पेरिस।”

फोन पर माँ की आवाज़ अटक कर रह गई, “बेटा, शादी कब…?”

उसने रुककर, जैसे अपने ही भीतर झाँककर कहा, “माँ, शायद… कभी नहीं।”

और फिर एक खामोशी। ऐसी, जैसे दीवार से पुरानी कील निकल जाए। तस्वीर अब भी टंगी है, पर सहारा बदल चुका है।

यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जो शादी को मंज़िल नहीं, विकल्प मानती है। और विकल्प भी ऐसा, जिसे टाल देना अब बगावत नहीं, सामान्य बात है।

कभी शादी जीवन का पासपोर्ट हुआ करती थी। समाज की मुहर। परिवार की गारंटी। इज़्ज़त का बीमा।

आज वही पासपोर्ट कई युवाओं को बेड़ियों जैसा लगता है।

बदलाव ने कोई शोर नहीं किया। वह दबे पांव आया। पहले करियर ने दरवाज़ा खटखटाया। फिर आत्मनिर्भरता भीतर आई। और फिर एक सवाल उठा, सीधा और असहज, “शादी क्यों?”

जब इस “क्यों” का जवाब ठोस नहीं मिला, तो परंपरा की दीवार में पहली दरार पड़ी।

आंकड़े भी अब कहानी कहने लगे हैं। 1993 में जहां 80 प्रतिशत किशोर शादी को अपना भविष्य मानते थे, आज यह संख्या 67 प्रतिशत पर आ गई है। महिलाओं में गिरावट और तेज़ है। यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, सोच का भूकंप है।

आज की युवती कमाती है, निवेश करती है, अकेले दुनिया घूम आती है। उसे सहारे की ज़रूरत नहीं, साथ की तलाश है।

और फर्क यहीं है।

सहारा मजबूरी है। साथ चुनाव है।

दिल्ली की 29 साल की एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। शानदार सैलरी। अपना घर। अपने फैसले। उसने अपने दोस्तों की शादियाँ देखीं। किसी ने करियर छोड़ा, किसी ने शहर, और किसी ने खुद को।

उसने तय किया, संबंध रहेंगे,  पर बिना कागज़ के। बिना औपचारिक रिश्ते के।

वह मुस्कराकर कहती है, “रिश्ता दिल से होना चाहिए, दस्तावेज़ से नहीं।”

यह सोच अब किनारे की लहर नहीं रही। यह बीच धारा में उतर चुकी है। सहजीवन बढ़ रहा है। रिश्ते हैं, पर बिना स्थायी मुहर के। जैसे लोग ऐप डाउनलोड करते हैं। जरूरत हो तो रखें, नहीं तो डिलीट।

कठोर लगता है। पर यही सच्चाई है।

इस कहानी में पैसा भी एक बड़ा किरदार है। बच्चा पालना अब सिर्फ भावनात्मक नहीं, आर्थिक प्रोजेक्ट बन चुका है। अमेरिका में एक बच्चे पर 18 साल में करीब 3.8 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। भारत में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनशैली की कीमतें आसमान छू रही हैं।

करीब 70 प्रतिशत लोग मानते हैं कि बच्चों की परवरिश अब बहुत महंगी हो गई है।

तो युवा खुद से पूछता है, “क्या मैं अपनी ज़िंदगी जी पाऊंगा?”

और जवाब अक्सर ‘नहीं’ की तरफ झुक जाता है।

इसके ऊपर अनिश्चितता का बादल है। महामारी की यादें अभी सूखी नहीं हैं। नौकरियों का बाज़ार भरोसेमंद नहीं रहा। जलवायु संकट भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है।

ऐसे में स्थायी बंधन कई लोगों को जोखिम लगता है।

लेकिन सबसे गहरी दरार घर के भीतर से आती है।

बचपन में देखे गए रिश्ते। माँ-बाप की खामोश लड़ाइयाँ। बच्चों के नाम पर खिंचती लंबी चुप्पियाँ। “समझौता” जो प्यार बनकर पेश किया गया।

इन दृश्यों ने शादी की चमक फीकी कर दी।

एक युवा कहता है, “मैंने अपने घर में प्यार नहीं, समझौता देखा है।” और वहीं वह तय करता है कि वह वही कहानी दोहराएगा नहीं।

संयुक्त परिवार अब धीरे-धीरे किस्सों में सिमट रहे हैं। न दादी की गोद, न नानी का सहारा। आज के दादा-दादी भी अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। बच्चे अलग शहरों में, अलग दुनिया में।

बच्चा पालना अब अकेले का प्रोजेक्ट है। भारी। थकाने वाला। कभी-कभी डरावना।

तो युवा क्या करता है?

वह रुकता है। सोचता है। और कई बार साफ कह देता है, “नहीं।”

यह “नहीं” गुस्सा नहीं है। यह हिसाब है। जिंदगी की बैलेंस शीट।

शादी अब अनिवार्यता नहीं रही। वह विकल्प है। और हर विकल्प हर किसी के लिए जरूरी नहीं होता।

कुछ लोग अकेले खुश हैं। कुछ बिना शादी के रिश्तों में संतुष्ट हैं। कुछ अपने काम में ही अपना संसार ढूंढ लेते हैं। बिना शादी के प्रेम भी है, सेक्स संबंध भी हैं, और बिन फेरे हम तेरे की स्वीकृति भी बढ़ रही है।

समाज असहज है। माता-पिता बेचैन हैं। पर सवाल अब भी खड़ा है, क्या शादी सिर्फ इसलिए होनी चाहिए क्योंकि वह हमेशा से होती आई है?

परंपरा का सम्मान जरूरी है। लेकिन परंपरा का बोझ हर पीढ़ी को खुद तौलना होगा।

यह बदलाव डराता है। पर इसमें एक ईमानदारी भी है।

अब लोग शादी इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि करनी है। वे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि चाहते हैं।

और जब चाहत सच्ची होती है, तभी रिश्ता टिकता है।

दरवाज़ा अब भी आधा खुला है।

माँ अब भी इंतज़ार में है।

लेकिन बेटी अब अपराधबोध में नहीं, अपने फैसले में खड़ी है।

यही इस कहानी का असली मोड़ है।

शादी खत्म नहीं हो रही। वह अपना रूप बदल रही है।

और हर बदलाव, अंत नहीं होता। वह एक नई शुरुआत की दस्तक होता है।

बस फर्क इतना है कि अब सात फेरे लेने से पहले, लोग सात सवाल पूछ रहे हैं।

 हंसी का भारत: ठहाकों में छिपी तहज़ीब, तंज में लिपटी सच्चाई

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 अप्रैल 2026

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हंसी कब सिर्फ हंसी रहती है?

कब वह एक हथियार बन जाती है, और कब मरहम?

भारत में यह फर्क समझना आसान नहीं। यहां ठहाका भी दर्शन है, मुस्कान भी राजनीति है, और चुटकुला कई बार अदालत से ज्यादा सटीक फैसला सुनाता है।

दो हजार साल से भी ज्यादा वक्त से हंसी इस देश की नसों में बह रही है। मंदिरों की कथाओं से लेकर चौपाल की गपशप तक, कविताओं से लेकर कटाक्ष तक, यह सिर्फ मनोरंजन नहीं रही। यह एक सांस्कृतिक औजार रही है। कभी समाज को आईना दिखाने के लिए, कभी दर्द को हल्का करने के लिए, और कभी सत्ता के कान खींचने के लिए।

भारत जितना विविध है, उसकी हंसी भी उतनी ही बहुरंगी है। भाषा बदलती है, लहजा बदलता है, पर व्यंग्य का तीर वही रहता है। कहीं यह सीधे सीने में उतरता है, कहीं धीरे से चुभता है। यही उसकी ताकत है। यही उसकी खूबसूरती।

उत्तर भारत की हंसी को देखिए। यहां शब्द तलवार हैं। फुर्तीली, चुटीली, और कई बार चुभती हुई। मुगल दरबारों की परंपरा ने इसे धार दी। अकबर और बीरबल की कहानियां आज भी गलियों में जिंदा हैं। एक किस्सा सुनिए। बादशाह ने कहा, राज्य के पांच सबसे बड़े मूर्ख ढूंढो। बीरबल ने आम लोगों में ही उन्हें खोज निकाला। एक आदमी जिसने अपनी दाढ़ी में तिनका बांध रखा था ताकि खोई हुई अंगूठी का दावा कर सके। हास्यास्पद? हां। पर साथ ही यह लालच और मूर्खता पर सटीक वार भी है।

यह शैली सीधी है। बात घुमा कर नहीं कहती। नौटंकी और लोकनाट्य में यही रंग और गहरा होता है। मंच पर हंसी, पर भीतर सवाल। सत्ता पर तंज, समाज पर चोट।

अब दक्षिण की ओर चलिए। यहां हंसी धीमी है, पर गहरी। यह तुरंत ठहाका नहीं मांगती। यह सोचने पर मजबूर करती है। तेनालीराम की कहानियां इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। एक व्यापारी ने दावा किया कि वह किसी को भी मूर्ख बना सकता है। तेनाली ने एक फुसफुसाहट में पूरा खेल पलट दिया। व्यापारी खुद मजाक बन गया।

यहां व्यंग्य परतों में चलता है। ओट्टमथुल्लल जैसे लोकनृत्य, तमिल और तेलुगु कथाएं, सबमें यही खासियत दिखती है। हंसी यहां शोर नहीं करती। यह चुपचाप अंदर तक उतर जाती है।

फिर भी, यह विभाजन दीवार नहीं है। यह सिर्फ अलग-अलग रास्ते हैं, जो एक ही मंजिल की ओर जाते हैं। एक साझा समझ। एक साझा मुस्कान।

इस पूरे ताने-बाने की जड़ें और गहरी हैं। संस्कृत साहित्य ने हंसी को सिद्धांत दिया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र ने ‘हास्य रस’ को परिभाषित किया। हल्की मुस्कान से लेकर ठहाके तक, हर रूप का स्थान तय किया गया। विदूषक का किरदार इसी का प्रतीक था। वह राजा के सामने सच कह सकता था, क्योंकि वह हंसा रहा था।

शूद्रक का ‘मृच्छकटिकम’ देखिए। प्रेम, गरीबी, चालाकी, और गलतफहमियों के बीच पैदा होती हंसी। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज की विसंगतियों पर टिप्पणी भी है। लालच, वर्गभेद, और सत्ता के खेल, सब पर एक साथ वार।

समय के साथ यह परंपरा जनता के बीच उतर आई। भक्ति आंदोलन ने इसे और धार दी। कबीर ने दोहों में ऐसी चुभन भरी कि पाखंड हिल गया। महाराष्ट्र में पु. ल. देशपांडे ने रोजमर्रा की जिंदगी में हास्य खोजा। बंगाल में सुकुमार राय ने बेतुकी कविताओं से औपनिवेशिक सोच पर व्यंग्य किया।

हर दौर में कुछ चेहरे उभरे, जो हंसी के जरिए समाज से संवाद करते रहे। बीरबल ने राजाओं को आईना दिखाया। हरिशंकर परसाई ने नौकरशाही की परतें उधेड़ीं। वैकोम मुहम्मद बशीर ने गांव की साधारण जिंदगी में छिपी असाधारण विडंबनाओं को उजागर किया।

और फिर आया व्यंग्य का वह रूप, जिसने सीधी टक्कर ली। पंचतंत्र की कहानियों में जानवरों के जरिए इंसानों की पोल खोली गई। अंग्रेजों के दौर में ‘अवध पंच’ जैसे प्रकाशनों ने कलम को हथियार बनाया। कार्टून और कविताओं में साम्राज्य और उसके पिट्ठुओं की खबर ली गई।

आज यह परंपरा नए मंचों पर जिंदा है। स्टैंडअप कॉमेडी, सोशल मीडिया, मीम्स। फर्क सिर्फ इतना है कि मंच बदल गया है, इरादा नहीं। भ्रष्टाचार पर तंज आज भी उतना ही असरदार है, जितना कभी दरबार में था।

कार्टूनिंग इस विरासत का जीवंत उदाहरण है। R. K. Laxman का ‘कॉमन मैन’ कुछ नहीं कहता था, फिर भी सब कह जाता था। खामोश चेहरा, पर भीतर पूरा देश बोलता था। आज Satish Acharya जैसे कलाकार उसी परंपरा को डिजिटल युग में आगे बढ़ा रहे हैं। Rachita Taneja अपनी कॉमिक्स के जरिए जटिल मुद्दों को आसान बनाती हैं।

हंसी यहां अब भी लोकतंत्र का आईना है। यह चुभती है, पर तोड़ती नहीं। यह सवाल पूछती है, पर जवाब थोपती नहीं।

और शायद यही भारत की हंसी की असली पहचान है। यह जोड़ती है, तोड़ती नहीं। यह सिखाती है, बिना उपदेश दिए। यह चोट करती है, पर मरहम भी साथ लाती है।

ठहाका यहां सिर्फ आवाज नहीं है। यह एक विचार है। एक परंपरा है। एक प्रतिरोध है।

और जब अगली बार कोई चुटकुला सुनकर आप हंसें, तो जरा ठहरिए।

हो सकता है, वह सिर्फ मजाक न हो।

हो सकता है, वह सच बोल रहा हो।

Friday, April 3, 2026

 युद्ध के डरावने काले बादलों के पार एक चांदनी रेखा दिख रही है!

क्या पश्चिम एशिया की राख में भारत का सुनहरा बीज अंकुरित होगा: संकट में अवसर की कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 अप्रैल, 2026

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युद्ध सिर्फ शहर नहीं जलाता। वह नक्शे बदल देता है। ताकत की परिभाषा बदल देता है। और सबसे बढ़कर, वह खाली जगह छोड़ जाता है। यही खाली जगह इतिहास की सबसे बड़ी बोली होती है।

पश्चिम एशिया इस वक्त धधक रहा है। इमारतें मलबा हैं। सप्लाई चेन टूट चुकी है। लोग अपने ही घरों में बेघर हैं। लेकिन हर युद्ध की एक मियाद होती है। गोलियां थमती हैं। और फिर शुरू होती है असली जंग। पुनर्निर्माण की जंग। भरोसे की जंग। प्रभाव की जंग।

यहीं भारत की एंट्री होती है। चुपचाप। बिना शोर। बिना दुश्मनी।

नई दिल्ली ने एक संतुलित रास्ता चुना है: नीतिगत खामोश दूरी। सऊदी अरब से रिश्ते। यूएई से साझेदारी। कतर से संवाद। ईरान से जुड़ाव। इज़रायल से सहयोग। किसी से संबंधों का पुल नहीं जलाया। यही सबसे बड़ी पूंजी है। जब धुआं छंटेगा, तब वही देश बुलाया जाएगा जिसने आग में घी नहीं डाला।

सबसे बड़ा मौका पुनर्निर्माण का है। खाड़ी के शहर हों या ईरान के औद्योगिक इलाके, सबको फिर से खड़ा होना है। बंदरगाह चाहिए। एयरपोर्ट चाहिए। अस्पताल चाहिए। सड़कें और बिजली चाहिए। भारतीय कंपनियां पहले से वहां भरोसे का नाम हैं। अब वे तेजी से फैल सकती हैं।

भारतीय इंजीनियर, आर्किटेक्ट, प्रोजेक्ट मैनेजर, टेक्नीशियन। ये सिर्फ कामगार नहीं, चलते फिरते समाधान हैं। इनके साथ आएंगे डॉलर। रेमिटेंस बढ़ेगा। और भारत का चालू खाता सांस लेगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र भी मौका है। सस्ती और भरोसेमंद जेनेरिक दवाएं। अस्पताल चेन। भारत इलाज दे सकता है, वह भी ऐसे दामों पर जिनसे पश्चिम और चीन दोनों असहज हो जाएं।

ऊर्जा सुरक्षा की कहानी भी यहीं बदलती है। होरमुज जलडमरूमध्य की नाजुकता ने दुनिया को जगा दिया है। तेल की कीमतें ऊपर नीचे होंगी। लेकिन युद्ध के बाद स्थिर सप्लाई की दौड़ शुरू होगी। भारत को यहीं सौदेबाजी करनी है। लंबी अवधि के अनुबंध। बेहतर शर्तें।

साथ ही यह मौका है अपने घर को ठीक करने का। गैर जरूरी ईंधन खपत पर लगाम। कड़े दक्षता मानक। सौर, पवन, जल और परमाणु ऊर्जा को तेज रफ्तार। युद्ध एक राजनीतिक ढाल भी देता है। कठिन फैसले लेना आसान हो जाता है। अगर यह मौका चूक गए तो फिर वही पुराना आयात जाल।

रक्षा क्षेत्र में भी हवा बदल रही है। कम लागत, ज्यादा संख्या वाले प्लेटफॉर्म इस युद्ध में कारगर साबित हुए हैं। यही भारत की ताकत है। ड्रोन, मिसाइल, सुरक्षित संचार, डिफेंस सॉफ्टवेयर। आत्मनिर्भर भारत का असली इम्तिहान अब है।

जरूरत है दिमाग में निवेश की। और ज्यादा वैज्ञानिक। और ज्यादा इंजीनियर। डीआरडीओ, निजी लैब, विश्वविद्यालय। अगर आज बीज बोया, तो कल भारत आयातक नहीं, निर्यातक बनेगा। नौकरियां आएंगी। तकनीक नागरिक क्षेत्र में भी उतरेगी।

भू-राजनीति का खेल भी पलट रहा है। चीन की चालें अब उतनी रहस्यमय नहीं रहीं। कर्ज के जाल और अपारदर्शी सौदों ने उसकी छवि को चोट पहुंचाई है। भारत यहां अलग दिखता है। बिना एजेंडा। बिना दबाव। भरोसेमंद साझेदार।

यही वह जगह है जहां भारत क्षेत्र का पसंदीदा विकास सहयोगी बन सकता है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा फिर से रफ्तार पकड़ सकता है। नियम आधारित विकल्प के तौर पर। धीरे धीरे, भारत केंद्र में आ सकता है।

देश के भीतर भी तस्वीर दिलचस्प है। चुनावी मौसम। आईपीएल का शोर। तपती गर्मी। रबी की फसल। आम आदमी की नजर अपने घर आंगन पर है। यह ध्यान भटकाव नहीं, अवसर है। सरकार बिना घबराहट के तैयारी कर सकती है।

यह युद्ध स्थायी संकट नहीं है। यह अस्थायी झटका है। जैसे ही बंदूकें शांत होंगी, पश्चिम एशिया की मांग फूट पड़ेगी। ऑर्डर आएंगे। निवेश आएगा। भारतीय कामगारों के लिए नए दरवाजे खुलेंगे।

अब सवाल है, क्या हम तैयार हैं।

सरकार को तुरंत खाका बनाना होगा। विदेश, वाणिज्य, ऊर्जा और रक्षा मंत्रालय एक साथ बैठें। एक टास्क फोर्स बने। कौशल मानचित्र तैयार हो। नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिले। रक्षा अनुसंधान को रफ्तार दी जाए।

तटस्थता कमजोरी नहीं है। यह धैर्य की रणनीति है। सही वक्त पर सही कदम।

पश्चिम एशिया के घाव भरने में साल लगेंगे। लेकिन मरहम वही लगाएगा जो भरोसेमंद हो। भारत के पास सस्ता कौशल है। भरोसे का इतिहास है। और तकनीक की बढ़ती ताकत है।

मौका दरवाजे पर है। सवाल सिर्फ इतना है। क्या हम उसे पहचानते हैं, या फिर इतिहास की तरह उसे गुजरते देखते रहेंगे।

Thursday, April 2, 2026

 डगमगाता दरबान: कागज़ी शेर बना नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल

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बृज खंडेलवाल द्वारा

3 अप्रैल, 2026

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हवा घुट रही है। नदियाँ सड़ रही हैं।कचरे के पहाड़ शहरों को निगल रहे हैं। और सवाल सीधा है; न्याय कहाँ है?

2010 में एक सपना बेचा गया था। नाम: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल। कहा गया, अब पर्यावरण को अदालत में प्राथमिकता मिलेगी। तेज फैसले होंगे।विशेषज्ञ बैठेंगे। कागज़ नहीं, न्याय दौड़ेगा।

यह संस्था उम्मीद का चेहरा बनकर आई थी। लोगों ने सोचा, अब पेड़ों की भी सुनवाई होगी, नदियों को भी आवाज मिलेगी।

लेकिन आज तस्वीर उलटी है।

सोलह साल बाद NGT एक सबक बन चुका है: अच्छी नीयत, कमजोर व्यवस्था में कैसे दम तोड़ देती है।

सबसे बड़ी दरार इसकी आत्मा में है, स्वतंत्रता की कमी। जिस मंत्रालय पर इसे नजर रखनी है, वही इसे पैसा देता है, वही स्टाफ देता है। नियुक्तियाँ भी वहीं से।

नतीजा? निगरानी कम, नज़दीकी ज़्यादा। 2017 के बदलावों ने इसे और कमजोर किया। रीढ़ थी, अब झुक चुकी है।

दूसरी चोट: संसाधनों की कमी।

जज नहीं। विशेषज्ञ नहीं। बेंच बंद।

चेन्नई और कोलकाता जैसे शहर ठंडे पड़ गए। दूर बैठे लोग क्या करें?

दिल्ली आएँ। वक्त गंवाएँ। पैसा झोंकें।

न्याय अब भी दूर। नियम भी अजीब हैं। छह महीने में शिकायत करो, वरना दरवाज़ा बंद।

पर्यावरण का जख्म धीरे-धीरे दिखता है। जब तक दिखे, न्याय का समय निकल चुका होता है।

फैसलों की हालत भी अजीब है।

कभी बहुत सख्त। कभी बेहद नरम।कभी व्यक्ति-आधारित। कभी हद से आगे।

भरोसा टूटता है। मुआवजे का खेल और भी धुंधला है।

वैज्ञानिक आधार कमजोर। पैसा तय होता है, पर सही जगह नहीं पहुँचता।

पर्यावरण राहत कोष तक रकम कम ही जाती है। बीच में ही रास्ता बदल जाता है। प्रक्रिया भी कटघरे में है।

सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है: प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं हो रहा। यहाँ फैसले अक्सर समितियों को सौंप दिए जाते हैं। रिपोर्टें आती हैं।पीड़ित गायब रहते हैं।

सबसे बड़ा सवाल: फैसलों को लागू कौन करेगा?

NGT आदेश देता है। सुर्खियाँ बनती हैं। तालियाँ बजती हैं। फाइल बंद।जमीन पर? कुछ नहीं बदलता।

दिल्ली वायु प्रदूषण संकट: निर्माण, वाहनों और पराली जलाने पर प्रतिबंध से PM2.5 में थोड़ी कमी आई, लेकिन दिवाली के बाद प्रदूषण फिर बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही कुछ सुधार हुआ है।

गंगा नदी प्रदूषण: दशकों से प्रदूषण रोकने के नियम और कानपुर में चमड़ा कारखाने बंद करने के बावजूद विषैले पदार्थ और मल-जनित बैक्टीरिया नहीं रुके। नदी की हालत लगातार खराब हो रही है।

यमुना प्रदूषण और अतिक्रमण: नालों, कचरे और 'आर्ट ऑफ लिविंग' जैसे आयोजनों पर जुर्माने से भी यमुना साफ नहीं हो पाई। अदालती दबाव ही एकमात्र उम्मीद है।

देशभर में ठोस कचरा प्रबंधन की विफलता: बिहार और शहरी लैंडफिल में कचरा निपटान के नियमों के बावजूद कचरे का ढेर लगातार बढ़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन याचिका (ऋधिमा पांडे, 2019) की खारिजी: एनजीटी ने बच्ची की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कानून पर्याप्त हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुनर्जीवित किया।

अवैध खनन और रेत निकासी: उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रतिबंध के बाद भी नदियों का कटाव नहीं रुका। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही कुछ पालन हुआ।

औद्योगिक मामलों में प्रक्रियागत अतिक्रमण: ग्रासिम और सिंगरौली संयंत्र मामलों में एनजीटी के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया।

ग्रेट निकोबार परियोजना: एनजीटी ने वनों, मूंगों, जनजातियों के जोखिम के बावजूद रणनीतिक जरूरतों के नाम पर परियोजना को मंजूरी दे दी।

मुआवजा राशि का उपयोग न होना: प्रदूषण और खनन मामलों में अरबों रुपये की मुआवजा राशि राहत कोष में डाले बिना गलत तरीके से खर्च हो जाती है।

पदों के खाली होने से कामकाज ठप: एनजीटी में बेंचों के खाली होने और देरी के कारण वादियों को दिल्ली जाना पड़ता है, जिससे समयबद्ध मामले अटक जाते हैं। कुछ दिन राहत। फिर वही ज़हर।आख़िर में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ही काम करती है।

सच साफ है।

NGT सुर्खियाँ बनाने में माहिर है। पर अमल में कमजोर। यह अदालत फाइलों में तेज है, जमीन पर बेअसर।पर्यावरण की हालत बिगड़ती गई। हवा जहरीली। नदियाँ बीमार। कचरा बेलगाम। और असली पहरेदार कौन बना?

सुप्रीम कोर्ट।

NGT? एक कागज़ी शेर।

अब भी वक्त है। इसे आज़ाद करना होगा। सरकारी पकड़ से निकालना होगा। खाली पद भरने होंगे। फैसलों को लागू करने की ताकत देनी होगी।कानूनी दायरा बढ़ाना होगा।

वरना यह संस्था इतिहास में एक पंक्ति बनकर रह जाएगी; “इरादा नेक था, लेकिन हिम्मत आधी थी।”और तब तक; हम वही हवा सांस में भरते रहेंगे,

जिसमें सिर्फ धुआँ नहीं, न्याय भी घुट रहा है।

Wednesday, April 1, 2026

 मंदिरों में प्लास्टिक पर प्रहार… अब आस्था भी होगी ‘ग्रीन’!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अप्रैल 2026

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घंटी बजती है। भीड़ उमड़ती है। प्रसाद मिलता है। और पीछे छूट जाता है… प्लास्टिक का पहाड़।

क्या यही हमारी आस्था की पहचान है?

अब तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हो गई है।

Temple Connect ने Blueprint Water के साथ हाथ मिलाया है। मिशन साफ है; मंदिरों और तीर्थस्थलों से एकल-उपयोग प्लास्टिक बोतलों को धीरे-धीरे बाहर का रास्ता दिखाना।

आसान नहीं है। लेकिन जरूरी है।

भारत के मंदिर सिर्फ पूजा के स्थल नहीं, भीड़ के महासागर हैं। रोज़ लाखों लोग आते हैं। पानी पीते हैं। बोतल फेंकते हैं। और देखते ही देखते पवित्र परिसर कूड़ाघर में बदलने लगता है।

आस्था पवित्र… लेकिन आसपास गंदगी। यह विरोधाभास अब चुभने लगा है।

यहीं से इस पहल की शुरुआत होती है।

अब प्लास्टिक की जगह आएगी कागज आधारित, रिसाइकिल होने वाली पैकेजिंग। हल्की। सुविधाजनक। और सबसे बड़ी बात, धरती पर बोझ कम डालने वाली।

Blueprint Water का दावा है कि यह व्यवस्था मंदिरों की रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर बड़े मेलों की भारी भीड़ तक आसानी से लागू हो सकती है। मतलब, न श्रद्धालु परेशान होंगे, न व्यवस्था चरमराएगी।

पर असली लड़ाई सिर्फ बोतल बदलने की नहीं है। आदत बदलने की है।

इसीलिए ‘इको-हीरो’ अभियान भी साथ चलाया जाएगा। संदेश सीधा है, अपनी बोतल साथ लाओ, जिम्मेदारी निभाओ।

सवाल उठता है, क्या श्रद्धालु सुनेंगे?

शायद हाँ। क्योंकि जब बात धर्म की हो, तो असर गहरा होता है।

गिरीश वासुदेव कुलकर्णी कहते हैं, धर्म सिर्फ पूजा नहीं सिखाता, जिम्मेदारी भी सिखाता है। और अगर मंदिर खुद उदाहरण बन जाएं, तो समाज को बदलने में देर नहीं लगती।

दूसरी तरफ, अनुज शाह इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं। उनके शब्दों में, मंदिर देश के सबसे बड़े उपभोग केंद्र हैं। यहां छोटा बदलाव भी बड़ा असर पैदा कर सकता है।

बात में दम है।

अगर हर श्रद्धालु एक प्लास्टिक बोतल कम इस्तेमाल करे, तो सोचिए… हर दिन कितना कचरा कम होगा।

यह पहल धीरे-धीरे लागू होगी। पहले चुनिंदा मंदिर। फिर बड़े आयोजन। और फिर शायद पूरा देश।

लक्ष्य बड़ा है, धार्मिक स्थलों पर ‘ग्रीन वाटर’ को नया सामान्य बनाना।

आस्था अब सिर्फ सिर झुकाने तक सीमित नहीं रहेगी।

आस्था अब जिम्मेदारी भी निभाएगी।

और शायद पहली बार…

मंदिरों में पूजा के साथ-साथ प्रकृति भी मुस्कुराएगी।