Monday, August 10, 2026

 


महिला नेता दिखी नहीं कि गाली शुरू! 

सियासत में मुद्दों से ज्यादा आसान क्यों है चरित्र पर हमला?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अगस्त 2026

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कल्पना कीजिए, चुनावी मंच पर एक महिला नेता खड़ी होती है। वह सरकार से तीखे सवाल पूछती है। विपक्ष को चुनौती देती है। अपनी पार्टी का बचाव करती है। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया का माहौल बदल जाता है। उसके तर्कों पर कम, कपड़ों पर ज्यादा चर्चा होने लगती है। उसकी नीतियों को छोड़कर उम्र, शादी, शक्ल और निजी जिंदगी की चीरफाड़ शुरू हो जाती है।

बस, यहीं हमारी राजनीति का सबसे बदसूरत चेहरा दिखाई देता है।

पुरुष नेता गरजे तो उसे दमदार कहा जाता है। महिला नेता उसी अंदाज में जवाब दे दे, तो उसे “अहंकारी” या “बदतमीज” बता दिया जाता है। पुरुष नेता महत्वाकांक्षी हो तो दूरदर्शी कहलाता है। महिला महत्वाकांक्षी हो तो उसके इरादों पर शक किया जाता है। जैसे राजनीति में महिला का सबसे बड़ा अपराध सिर्फ इतना हो कि उसने चुप रहने से इनकार कर दिया।

महिला चुनाव लड़ सकती है, जीत सकती है और सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकती है। लेकिन जैसे ही वह मुखर होती है, बहस अक्सर मुद्दों से भटक जाती है। फिर शुरू होता है कपड़ों, चरित्र, रिश्तों और निजी जिंदगी पर हमला।

मानो सियासत का कोई अनलिखा नियम हो, महिला को हराना मुश्किल लगे, तो पहले उसे ज़लील कर दो।

पुरुष नेताओं को चोर, भ्रष्ट, निकम्मा या नाकाम कहना “तीखी राजनीतिक बहस” माना जाता है। महिला नेता आंख में आंख डालकर जवाब दे दे, तो शब्दों की तलवार अचानक उसके विचारों को छोड़कर उसकी देह और निजी जिंदगी की तरफ मुड़ जाती है। नीति-विचार पीछे छूट जाते हैं। तर्क दम तोड़ देते हैं। गाली सबसे आसान हथियार बन जाती है।

यह बीमारी किसी एक पार्टी की नहीं है। अफसोस, पूरा राजनीतिक तंत्र इससे संक्रमित दिखाई देता है। अपनी पार्टी की महिला नेता पर फूहड़ टिप्पणी हो, तो बयान जारी होते हैं और आक्रोश उमड़ पड़ता है। लेकिन विरोधी दल की महिला पर वही कीचड़ उछले, तो कई चेहरे अचानक मौन साध लेते हैं।

महिला सम्मान अब सिद्धांत कम, सियासी स्विच ज्यादा बन गया है, अपने लिए ऑन, विरोधियों के लिए ऑफ।

सुनंदा पुष्कर के मामले में भी सार्वजनिक चर्चा कई बार उनकी पहचान से ज्यादा सनसनी के इर्द-गिर्द घूमती रही। जयललिता जैसी शक्तिशाली मुख्यमंत्री को भी कई मौकों पर सिर्फ एक महिला होने के चश्मे से देखा गया। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती पर जाति और लिंग, दोनों को मिलाकर तंज कसे गए। उमा भारती को भी ऐसी निजी टिप्पणियां सुननी पड़ीं, जिनका उनकी नीतियों या राजनीतिक काम से कोई संबंध नहीं था।

कंगना रनौत के विचारों से असहमति हो सकती है। उनकी राजनीति और बयानों की आलोचना भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी को आलोचना से छूट नहीं मिलती। लेकिन असहमति का अर्थ यह नहीं कि महिला होने के कारण उस पर हर तरह की गाली और गंदगी फेंक दी जाए।

किसी महिला नेता की आलोचना लोकतंत्र है। उसकी निजी जिंदगी नोंचना बदतमीजी है।

दोनों में फर्क है। मगर हमारी राजनीति अक्सर यह फर्क जानबूझकर भूल जाती है।

हम महिलाओं को राजनीति में लाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। सम्मेलन होते हैं। मंच सजते हैं। “नारी शक्ति” के नारे गूंजते हैं। भाषणों में महिलाओं के लिए आसमान तक खोल दिया जाता है। फिर टिकट बांटने का वक्त आता है, तो कई दरवाजे बंद मिलते हैं।

महिला आरक्षण का कानून बनना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन असली सवाल सिर्फ सीटों का नहीं है। सवाल उस माहौल का भी है, जिसमें महिला राजनीति करेगी।

मान लीजिए, किसी महिला को सीट मिल गई। वह चुनाव जीत गई। मंत्री भी बन गई। फिर क्या?

क्या उसे वही सम्मान मिलेगा, जो उसके पुरुष सहयोगी को मिलता है? या फिर उसके कपड़ों पर टीवी बहस होगी? शादी पर सवाल उठेंगे? उम्र पर तंज कसे जाएंगे? और उसकी निजी जिंदगी को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के हवाले कर दिया जाएगा?

यही वह दलदल है, जिसमें हमारी राजनीति फंसी हुई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है। कई काबिल महिलाएं शायद राजनीति की तरफ देखकर सोचती होंगी; “यह मैदान मेरे लिए बहुत महंगा पड़ सकता है। यहां काम कम और निजी जिंदगी की सफाई ज्यादा देनी पड़ेगी।”

पुरुष नेता को शायद ही रोज यह सोचना पड़ता हो कि चुनाव लड़ने के बाद उसकी शादी, शरीर या चरित्र राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाएगा। यही असमानता है। और यही असली समस्या है।

हम अक्सर शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते। शिकायत सही हो सकती है। लेकिन एक सवाल हमसे भी पूछना चाहिए, क्या हम अच्छे और काबिल लोगों के लिए राजनीति का माहौल आसान बनाते हैं?

खासकर महिलाओं के लिए?

जितनी अधिक महिलाएं राजनीति में आएंगी, उन्हें दो-चार गालियों से चुप कराना उतना ही मुश्किल होगा। संख्या ताकत है। संगठन ताकत है। और सबसे बड़ी ताकत आर्थिक आजादी है।

जिस महिला के पास अपनी कमाई, अपना काम और अपना मजबूत नेटवर्क है, उसे डराना आसान नहीं होता। देश भर में लाखों महिला उद्यमी आज यही साबित कर रही हैं। वे कारोबार खड़ा कर रही हैं। रोजगार दे रही हैं। फैसले ले रही हैं। उन्हें किसी नेता की कृपा का इंतजार नहीं।

वे अपने पैरों पर खड़ी हैं। यही असली सशक्तिकरण है।

सिर्फ मंच पर “नारी शक्ति जिंदाबाद” बोलने से कुछ नहीं बदलेगा। महिला को अच्छी शिक्षा चाहिए, तो दीजिए। बैंक लोन चाहिए, तो रास्ते आसान कीजिए। काम का मौका चाहिए, तो दीजिए। सुरक्षित माहौल चाहिए, तो सुनिश्चित कीजिए।

और अगर वह राजनीति में आकर आपसे असहमत हो जाए, तो उसके विचारों से लड़िए, उसके कपड़ों से नहीं।

उसके काम पर सवाल उठाइए, चरित्र पर कीचड़ मत फेंकिए।

उसकी नीति की आलोचना कीजिए, निजी जिंदगी को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

लोकतंत्र में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं है। न पुरुष, न महिला। लेकिन आलोचना और गाली में फर्क होता है। बहस और बेहूदगी में फर्क होता है। सवाल और चरित्रहनन में फर्क होता है।

अफसोस, हमारी सियासत में यह फर्क तेजी से धुंधला होता जा रहा है।

सबसे बड़ा पाखंड तब दिखाई देता है, जब कोई नेता सुबह महिला सम्मान पर लंबा भाषण देता है और शाम तक उसकी पार्टी के समर्थक किसी महिला विरोधी पर सोशल मीडिया में गंदगी उछाल रहे होते हैं। फिर पार्टी कहती है, “हमने तो नहीं कहा।”

यह कोई जवाब नहीं है।

घर में आग लगी हो और मालिक कहे कि माचिस मैंने नहीं जलाई, तो क्या घर बच जाएगा?

राजनीतिक दलों को समझना होगा कि उनकी ट्रोल सेना उनसे पूरी तरह अलग नहीं है। लगातार गाली, धमकी और निजी हमले होते रहें और पार्टी चुप बनी रहे, तो वह चुप्पी भी समर्थन का संदेश देती है।

कई बार चुप रहना समर्थन की सबसे आरामदेह भाषा होता है।

महिलाओं को राजनीति में देवी बनाकर रखने की जरूरत नहीं है। उन्हें आलोचना से बचाने की भी जरूरत नहीं है। बस, उन्हें इंसान और बराबर का नागरिक मानने की जरूरत है।

बहुत बड़ी मांग नहीं है।

वे गलत हों, तो खुलकर आलोचना कीजिए। भ्रष्ट हों, तो जांच कीजिए। काम कमजोर हो, तो चुनाव में हराइए। लेकिन सिर्फ इसलिए हमला मत कीजिए कि वे महिला हैं और शायद जवाब नहीं देंगी।

अब वक्त बदल रहा है। महिलाएं जवाब दे रही हैं। अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं। कारोबार खड़ा कर रही हैं। राजनीति में अपनी जगह बना रही हैं। धीरे-धीरे संदेश साफ हो रहा है कि पुरानी गाली-गलौज वाली सियासत हमेशा नहीं चलेगी।

महिला-विरोधी सोच कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह न मानसून है, न भूकंप। इसे इंसानों ने बनाया है। इसलिए इंसान ही इसे बदल सकते हैं।

शुरुआत उस सबसे आसान बहाने को छोड़कर करनी होगी, “अरे, राजनीति में तो यह सब चलता है।”

नहीं। बहुत चल लिया।

बहुत गालियां दे लीं। बहुत चरित्र उछाल लिए। बहुत निजी जिंदगियां नीलाम कर लीं। अब मुद्दों पर लौटिए।

किसी महिला नेता को सिर्फ मुखर, सक्रिय और महत्वाकांक्षी होने की सजा देना उसके साथ ही नहीं, लोकतंत्र के साथ भी नाइंसाफी है। सियासत की असली लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, गालियों की नहीं। नीतियों की होनी चाहिए, निजी जिंदगी की नहीं।

और याद रखिए, जिस लोकतंत्र में आधी आबादी को बोलने से पहले गाली की कीमत सोचनी पड़े, वहां लोकतंत्र का माइक तो चालू है, लेकिन उसकी आवाज अभी भी आधी है।

Sunday, August 9, 2026

 राजनीति को चाहिए नया खून: छात्र संघों की वापसी अब क्यों जरूरी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 अगस्त 2026

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कहते हैं, जब राजनीति में नया खून नहीं आता, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है।

इधर एक अजीब-सी जेन-ज़ी मुहिम ने सबका ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि “कॉकरोचों के नेतृत्व” में चल रही यह नई पीढ़ी की हलचल युवाओं की बेचैनी और बगावत का प्रतीक बन गई है। नाम भले ही मज़ाकिया हो, मगर सवाल गंभीर है। जब युवा अपनी बात कहने के लिए इतने अजीब प्रतीक खोज रहे हैं, तब हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उनके अपने लोकतांत्रिक मंच आखिर कहाँ हैं?

जवाब साफ है: हमने छात्र राजनीति का दरवाज़ा ही बंद कर दिया।

छात्र संघ कभी विश्वविद्यालयों की जान हुआ करते थे। पढ़ाई के साथ बहस होती थी, चुनाव होते थे, भाषण होते थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। छात्र अपनी शिकायतें लेकर संगठित ढंग से प्रशासन के सामने जाते थे। नेतृत्व सीखते थे, हारना सीखते थे और जीत को संभालना भी सीखते थे।

आज हम चाहते हैं कि युवा सीधे आईएएस बनें, सीईओ बनें, वैज्ञानिक बनें और नेता भी बनें। मगर नेता बनने की नर्सरी बंद कर दी गई है। फिर हम शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते। यह तो वही बात हुई: खेत को पानी न दो और फसल से शिकायत करो।

1960 के दशक में शिक्षा आयोग ने भी छात्र संघों को महत्वपूर्ण माना था। सोच यह थी कि संगठित छात्र गतिविधियाँ युवाओं में आत्म-अनुशासन, स्वशासन और नेतृत्व की भावना पैदा करती हैं। कई जगह छात्र संघ कैंटीन चलाते थे, सहकारी दुकानें संभालते थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे।

मतलब साफ था। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने की फैक्टरी नहीं है। वह नागरिक तैयार करने की जगह भी है।

भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति की दिशा बदल दी। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन हो या 1974 का गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, छात्रों ने अपनी ताकत दिखाई। मामूली-सी मेस फीस बढ़ने से शुरू हुआ गुजरात का आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनांदोलन बन गया।

बिहार में छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण की “संपूर्ण क्रांति” का नारा उठा। उसी दौर ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। बाद में आपातकाल और 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा।

कई बड़े राष्ट्रीय नेता छात्र राजनीति की ही देन रहे हैं। अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति सीखी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार के छात्र आंदोलनों से उभरे। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने जेएनयू की छात्र राजनीति में अपने कदम जमाए। ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।

नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अशोक गहलोत जैसे अनेक नेताओं ने भी युवावस्था में संगठन और सार्वजनिक जीवन का अनुभव पाया।

आज सवाल यह है कि अगली पीढ़ी कहाँ से आएगी?

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से?

इंस्टाग्राम रील से?

या किसी “कॉकरोच आंदोलन” के वायरल मीम से?

युवा ऊर्जा को आप दबा सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। जब उसे लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता, वह किसी और रास्ते से बाहर आती है। कभी अचानक विरोध प्रदर्शन बनकर, कभी सोशल मीडिया के गुस्से में और कभी किसी अजीब प्रतीक के पीछे।

खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। लोकतंत्र में भी नहीं।

छात्र संघों को खत्म करने का एक तर्क हमेशा दिया गया: हिंसा, गुटबाजी और बाहरी राजनीतिक दलों का दखल। यह बात पूरी तरह गलत नहीं थी। कई छात्र संघ सचमुच राजनीति के अखाड़े बन गए। पढ़ाई पीछे छूट गई और पोस्टरबाजी आगे आ गई। कैंपस में बहस की जगह कभी-कभी लाठी और धमकी ने ले ली।

मगर बीमारी के कारण मरीज को मार देना इलाज नहीं होता।

गलत छात्र राजनीति को सुधारना चाहिए था, छात्र राजनीति को दफन नहीं करना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बंद या सीमित किए गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ता गया या खत्म हो गया। प्रशासन ने शांति तो पा ली, मगर छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज भी काफी हद तक खो गई।

अब हमें नई सोच के साथ छात्र संघों को वापस लाना चाहिए।

पुराने ढर्रे पर नहीं। नए संविधान और साफ नियमों के साथ।

छात्र संघों का मुख्य काम चुनावी राजनीति नहीं होना चाहिए। उनका ध्यान छात्रों की असली समस्याओं पर रहे: फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, खेल, सुरक्षा, परिवहन और कैंपस सुविधाएँ। बहस, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलों को भी बढ़ावा दिया जाए।

हर चुने हुए छात्र प्रतिनिधि को नेतृत्व का प्रशिक्षण मिले। उसे बातचीत करना, बजट बनाना, विवाद सुलझाना और अलग राय रखने वालों को साथ लेकर चलना सिखाया जाए। चुनाव लड़ना आसान है, लोकतांत्रिक ढंग से काम करना मुश्किल है। यही हुनर सीखना जरूरी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों की नियमित बैठकें हों। शिकायत सड़क पर पहुँचने से पहले बातचीत की मेज तक पहुँचे। अध्यापक मार्गदर्शन करें, मगर छात्रों की आवाज दबाएँ नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में नए लोगों की आमद का कोई विकल्प नहीं है। लोकतंत्र को हर पीढ़ी अपना नया नेतृत्व देती है। यदि युवाओं को कॉलेज में बोलने, बहस करने, हारने, जीतने और जिम्मेदारी लेने का मौका नहीं मिलेगा, तो राजनीति बूढ़ी होती जाएगी।

आज जेन-ज़ी अपनी भाषा खुद बना रही है। कभी मीम, कभी हैशटैग, कभी अजीबोगरीब प्रतीक और कभी “कॉकरोच” जैसा नाम। हमें इस पर केवल हँसना नहीं चाहिए। इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझना चाहिए।

युवा कहना चाहते हैं: “हमें सुना जाए।”

कॉलेज और विश्वविद्यालय इस आवाज के लिए सबसे स्वाभाविक जगह हैं।

राजनीति को नया खून चाहिए। उसे किसी प्रयोगशाला से नहीं लाया जा सकता। वह कैंपस की बहसों, छात्र सभाओं, चुनावों और आंदोलनों से ही निकलेगा। छात्र संघ लोकतंत्र की वह पाठशाला हैं, जहाँ भविष्य के नेता पहली बार जनता का सामना करते हैं।

परीक्षा पास करने से नौकरी मिल सकती है। मगर समाज चलाने के लिए जिम्मेदारी, संवाद और नेतृत्व चाहिए।

इनकी कोई गाइडबुक नहीं होती।

इन्हें जीना पड़ता है।

छात्र संघों को फिर से जीवित कीजिए। उन्हें अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ चलाइए। बाहरी दलों की कठपुतली बनने से बचाइए। मगर युवाओं का लोकतांत्रिक मंच मत छीनिए।

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Syndicated by NPA


Saturday, August 8, 2026

 


कुर्सी जनता की, तिजोरी अपनी? 

भ्रष्ट अफसरशाही के लालच का कड़वा सच

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अगस्त 2026

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दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए: क्या कर रहे हो? जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा: “UPSC की तैयारी कर रहे हैं।”

क्यों?

“देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”

इरादे नेक हैं। सपने बड़े हैं। मगर कहानी का अगला अध्याय हमेशा इतना खूबसूरत नहीं होता।

कुर्सी मिलते ही कुछ लोगों की सेवा का दायरा बदल जाता है। देश पीछे छूट जाता है और खुद आगे आ जाता है।

सरकारी अफसर को तनख्वाह मिलती है। सरकारी मकान मिलता है। गाड़ी मिलती है। चिकित्सा सुविधा मिलती है। भत्ते मिलते हैं। रुतबा मिलता है। नौकरी के बाद पेंशन भी मिलती है।

तो फिर सवाल सीधा है; 

साहब को और क्या चाहिए?

यही सवाल उन अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिन पर रिश्वत, कमीशन, सरकारी धन की हेराफेरी या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं।

IAS और IPS कोई मामूली नौकरी नहीं है। UPSC की कठिन परीक्षा पास करके अधिकारी प्रशासन और शासन की सबसे ताकतवर गलियों तक पहुंचते हैं। उनके हाथ में फैसले होते हैं। फाइलें होती हैं। ठेके होते हैं। नीतियों को लागू करने की ताकत होती है।

कभी भारतीय नौकरशाही को “Steel Frame of India” कहा गया था।

लेकिन लोहे का फ्रेम भी जंग खा सकता है।

खतरा वहीं शुरू होता है जहां ताकत बहुत हो और निगरानी कम। विवेकाधिकार बड़ा हो और जवाबदेही छोटी। फाइल रोकने की ताकत हो, लेकिन जवाब देने की मजबूरी न हो।

फिर तनख्वाह कम नहीं पड़ती।

नीयत छोटी पड़ जाती है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी भ्रष्टाचार के पीछे कई कारण गिनाते हैं: अत्यधिक विवेकाधिकार, पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक-नौकरशाही गठजोड़, कमजोर जवाबदेही, धीमी न्याय प्रक्रिया, कम सजा दर और व्यक्तिगत लालच। इन सबके मेल से पद सेवा का माध्यम न रहकर निजी लाभ का जरिया बन सकता है।

भ्रष्टाचार के लिए अक्सर कम वेतन, महंगाई और आर्थिक मजबूरी का बहाना दिया जाता है। लेकिन वरिष्ठ नौकरशाहों के मामले में यह दलील ज्यादा दूर तक नहीं जाती।

जिस अधिकारी को सम्मानजनक वेतन, सरकारी आवास, वाहन, चिकित्सा सुविधा और दूसरी सुविधाएं मिल रही हों, उसके लिए रिश्वतखोरी को मजबूरी कहना जनता के जख्म पर नमक छिड़कना है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर इसे ज्यादा कड़वे अंदाज में कहती हैं:

“झोला लेकर सिस्टम में दाखिल होते हैं, ट्रकों का काफिला लेकर निजी महल के लिए विदा होते हैं।”

बात कड़वी है, लेकिन सवाल जरूरी है।

नाम बड़े हैं। मामले पुराने हैं। और पैटर्न बार-बार सामने आता है।

पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता को कोयला आवंटन से जुड़े कई मामलों में अदालत ने दोषी ठहराया। झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल पर मनरेगा धन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे। छत्तीसगढ़ के अनिल टुटेजा का नाम कथित शराब सिंडिकेट मामले में सामने आया।

हरियाणा में पंकज अग्रवाल और प्रदीप कुमार से जुड़े मामलों में बैंक फंड की कथित हेराफेरी और फर्जी दस्तावेजों के आरोप सामने आए। राजस्थान के सुबोध अग्रवाल का नाम जल जीवन मिशन की टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जोड़ा गया। उत्तर प्रदेश के अभिषेक प्रकाश पर रिश्वत और कमीशन से जुड़े आरोप लगे। झारखंड के छवि रंजन भूमि से जुड़े मामलों में जांच के घेरे में आए।

इनमें से जहां अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है, वहां आरोप को दोषसिद्धि कहना नाइंसाफी होगी।

लेकिन सवाल फिर भी खड़ा होता है; 

आखिर इतने मामले क्यों सामने आते हैं?

क्या सरकारी कुर्सी सचमुच सेवा का माध्यम है?

या कुछ लोगों के लिए वह कमाई का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुकी है?

भ्रष्टाचार का कोई जेंडर नहीं होता

भ्रष्टाचार को भी अब जेंडर की नजर से देखने की जरूरत नहीं।

भ्रष्टाचार न पुरुष होता है, न महिला।

जिस तरह कोई पुरुष अधिकारी कानून तोड़ सकता है, उसी तरह महिला अधिकारी भी जांच और कानून के दायरे में आ सकती है। पूजा सिंघल का मामला इसका चर्चित उदाहरण है।

NEET-UG पेपर लीक की जांच में भी महिलाओं समेत कई लोगों के नाम सामने आए। कुछ विशेषज्ञों और अन्य आरोपियों पर प्रश्न याद करने, साझा करने या पैसे के बदले उपलब्ध कराने जैसे आरोप लगे।

संदेश साफ है:

ईमानदारी का कोई जेंडर नहीं। बेईमानी का भी नहीं।

हर भ्रष्टाचार कांड के बाद वही राजनीतिक तमाशा शुरू होता है।

विपक्ष कहता है: सरकार नाकाम है।

सरकार कहती है: हमने कार्रवाई की।

फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। बयान आते हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं। गिरफ्तारियां होती हैं। चार्जशीट दाखिल होती है।

और उसके बाद?

मामला अदालत पहुंचता है।

फिर तारीख पर तारीख।

गिरफ्तारी खबर बन जाती है, लेकिन सजा इतिहास बन जाती है।

CBI और ED जैसी एजेंसियों ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई की है। राज्य सरकारों ने भी अधिकारियों को निलंबित किया और विभागीय जांच शुरू की।

लेकिन छापा, गिरफ्तारी या चार्जशीट अपने आप में भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है।

अंतिम कसौटी अदालत का फैसला है।

और फैसला जितना देर से आएगा, व्यवस्था की कमजोरी पर भ्रष्टाचारी का भरोसा उतना ही बढ़ेगा।

सिर्फ वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।

अधिकारी को अच्छा वेतन दीजिए। सम्मान दीजिए। सुविधाएं दीजिए। लेकिन अगर नीयत में खोट है, तो लालच का पेट कभी नहीं भरता।

लालच की कोई सैलरी स्लिप नहीं होती।

सरकारी अधिकारी जनता के पैसे और अधिकारों के रखवाले हैं। वे सरकारी कुर्सी के मालिक नहीं हैं। सरकारी पद निजी जागीर नहीं है।

इसलिए भ्रष्टाचार रोकना है तो सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे चाहिए।

तेज सुनवाई चाहिए।

संपत्ति की सख्त जांच चाहिए।

फैसलों में पारदर्शिता चाहिए।

जहां जरूरत हो, विवेकाधिकार सीमित करना होगा।

और सबसे जरूरी: कानून की नजर में कोई बड़ा नहीं होना चाहिए।

न IAS।

न IPS।

न नेता।

न कोई रसूखदार।

कुर्सी चाहे कितनी भी ऊंची हो, कानून उससे ऊंचा होना चाहिए।

क्योंकि कुर्सी जनता देती है।

कुर्सी के साथ तिजोरी नहीं देती।

और जिस दिन अफसर यह फर्क भूल जाएगा, उसी दिन लोकसेवा, निजी सेवा में बदल जाएगी।

Friday, August 7, 2026

 


आरटीआई या रंगदारी का नया धंधा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 अगस्त 2026

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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है।

मैसूर विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कर्नाटक के पूर्व सूचना आयुक्त डॉ. एल. कृष्णमूर्ति ने इसी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि फर्जी आरटीआई कार्यकर्ताओं की बढ़ती संख्या इस कानून की आत्मा को खत्म कर रही है। उनके अनुसार, जिस कानून ने 2जी जैसे बड़े घोटाले उजागर किए, उसी का इस्तेमाल अब सरकारी दफ्तरों को परेशान करने और बेवजह हजारों पन्नों की सूचनाएं मांगने में हो रहा है।

देशभर से सामने आए मामले इस चिंता को और बढ़ा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के ऊना में एक स्वयंभू आरटीआई कार्यकर्ता पर आरोप लगा कि उसने पत्थर खदान संचालकों से 75 लाख रुपये की मांग की। आरटीआई से दस्तावेज जुटाए गए और फिर शिकायत करने की धमकी देकर रकम मांगी गई। सतर्कता विभाग ने जाल बिछाकर उसे पहली किश्त लेते हुए गिरफ्तार किया।

असम में दुलाल बोरा का मामला और भी चौंकाने वाला है। उस पर उगाही और धोखाधड़ी के दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए। बताया गया कि उसने दो हजार से अधिक दूसरी अपीलें दायर कीं और कई बार एक ही दिन में सौ से ज्यादा आरटीआई आवेदन भेज दिए। आरोप था कि बाद में अधिकारियों और ठेकेदारों से पैसे लेकर मामलों को ठंडे बस्ते में डालने का खेल चलता था।

हरियाणा के गुरुग्राम में एक आरटीआई कार्यकर्ता और एक यूट्यूबर पर स्कूल प्रबंधन से लाखों रुपये की उगाही का आरोप लगा। पहले लगातार आरटीआई लगाई गईं, फिर अदालत और आयकर विभाग की कार्रवाई का डर दिखाया गया। अंत में शिकायतें वापस लेने के बदले मोटी रकम मांगी गई।

गुजरात के सूरत में तो यह पूरा नेटवर्क बन गया। पुलिस ने दर्जनों मुकदमे दर्ज किए। आरोप था कि कुछ लोग नगर निगम से भवनों की जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करते, फिर मापने वाली फीता लेकर खुद को निरीक्षक बताकर निर्माण स्थलों पर पहुंच जाते। बिल्डरों और मकान मालिकों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूले जाते।

आंध्र प्रदेश में दो लोगों पर सूचना आयोग ने आगे आरटीआई लगाने तक पर रोक लगा दी। आयोग ने पाया कि वे एक के बाद एक दर्जनों अपीलें और शिकायतें दायर कर सरकारी अधिकारियों को लगातार परेशान कर रहे थे। कई आवेदन वर्षों पुराने रिकॉर्ड मांगते थे, जिनका जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं था।

तमिलनाडु के थेनी में एक व्यक्ति ने 781 आरटीआई आवेदन केवल जिला न्यायालय के खिलाफ दायर कर दिए। नतीजा यह हुआ कि सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगा। सूचना आयोग ने उस पर जुर्माना लगाया और इसे कानून के खुले दुरुपयोग का मामला बताया।

यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। इन मामलों का तरीका लगभग एक जैसा है। पहले आरटीआई डालो। फिर दस्तावेज जुटाओ। उसके बाद शिकायत, जांच या मीडिया में बदनामी का डर दिखाओ। आखिर में समझौते के नाम पर पैसे मांगो। कई जगह निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी आरटीआई का इस्तेमाल किया गया। कहीं एक ही विषय पर सैकड़ों आवेदन भेजे गए, तो कहीं पूरे विभाग को कागजों के ढेर में दबा दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा कि आरटीआई का इस्तेमाल ईमानदार अधिकारियों को डराने या सरकारी कामकाज रोकने के लिए नहीं होना चाहिए। एक अन्य टिप्पणी में अदालत ने यहां तक कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म कुछ मामलों में नया कारोबार बनता जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे लोग खुद को समाजसेवी और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा बताकर कानून की साख को चोट पहुंचाते हैं। जनता का भरोसा कमजोर होता है। सरकारी दफ्तर हर आवेदक को शक की नजर से देखने लगते हैं। असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

आरटीआई कानून का जन्म जनता को ताकत देने के लिए हुआ था, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसे दबाव, धमकी और वसूली के हथियार में बदलने की कोशिश की है। जब अधिकार की आड़ में कारोबार शुरू हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी कानून की विश्वसनीयता को होता है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि सूचना मांगने का अधिकार कहीं कुछ लोगों के लिए डर और सौदेबाजी का लाइसेंस तो नहीं बनता जा रहा।

Monday, August 3, 2026

 अंग दान, महा दान

बीस हज़ार नई ज़िंदगियाँ: अंगदान ने बदली भारत की तस्वीर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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आगरा का सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज अब अंग प्रत्यारोपण सेवाओं के विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सुपर स्पेशियलिटी विंग में किडनी प्रत्यारोपण की सभी प्रमुख तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और जल्द नियमित प्रत्यारोपण शुरू होने की उम्मीद है। यहां कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा पहले से उपलब्ध है, जबकि भविष्य में लिवर, हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण की भी योजना है। मेडिकल कॉलेज का एनाटॉमी विभाग देहदान (कैडवर डोनेशन) भी स्वीकार करता है। दान किए गए शरीरों का उपयोग एमबीबीएस और पीजी छात्रों के प्रशिक्षण, एनाटॉमी अध्ययन तथा सर्जिकल शिक्षा में किया जाता है। देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति एनाटॉमी विभाग में पंजीकरण करा सकते हैं।

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हाल ही में गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस ने ग्रीन कॉरिडोर की मदद से जीवित हृदय समय पर पहुँचाकर इतिहास रचा।

एक परिवार अपने प्रियजन को हमेशा के लिए विदा कर रहा था। उसी समय, किसी दूसरे अस्पताल में एक मरीज नई जिंदगी की उम्मीद से ऑपरेशन थिएटर में ले जाया जा रहा था। एक घर का ग़म, दूसरे घर की खुशी बन गया। 

अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इंसान इस दुनिया से जाने के बाद भी कई लोगों की धड़कनों में ज़िंदा रह सकता है।

भारत ने वर्ष 2025 में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। पहली बार देश में 20,138 अंग प्रत्यारोपण किए गए। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 6-7 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2013 में यह संख्या केवल 4,990 थी। यानी एक दशक में अंग प्रत्यारोपण चार गुना से भी अधिक बढ़ गया। दिल्ली-एनसीआर सबसे आगे रहा, जहाँ 4,500 से अधिक प्रत्यारोपण हुए। इसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना और केरल का स्थान रहा। मृत्यु के बाद अंगदान करने वालों में तमिलनाडु ने फिर मिसाल पेश की। महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक भी इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।

आज भारत जीवित दाताओं से अंग प्रत्यारोपण में दुनिया का अग्रणी देश है। कुल प्रत्यारोपण की संख्या के मामले में भारत अब केवल अमेरिका और चीन से पीछे है। यह उपलब्धि देश के डॉक्टरों, सर्जनों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत का नतीजा है। साथ ही, यह उन परिवारों की संवेदनशील सोच को भी सलाम है, जिन्होंने अपने दुःख के बीच किसी अनजान व्यक्ति को जीवन देने का फैसला किया।

एक दाता परिवार के सदस्य ने कहा, “हमारा बेटा तो चला गया, लेकिन उसकी किडनी और लीवर अब दो और परिवारों में धड़क रहे हैं। हमें लग रहा है कि वो अब भी कहीं ज़िंदा है।” एक लाभार्थी, जो कई साल से डायलिसिस पर था, भावुक होकर बोला, “जब डॉक्टर ने कहा कि अंग मिल गया है, तो लगता था जैसे मौत के मुँह से वापस लौट आया हूँ। अब मैं बच्चों के साथ खेल सकता हूँ। दाता परिवार का शुक्रिया अदा करने के शब्द नहीं हैं।”

विशेषज्ञ भी इस बदलाव को सराहते हैं। प्रसिद्ध ट्रांसप्लांट सर्जन  कहते हैं, “अंगदान सबसे बड़ा उपहार है। कृपया अपने अंग स्वर्ग न ले जाएँ; स्वर्ग को पता है कि हमें यहाँ उनकी ज़रूरत है।” 

राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल पर 2023 से अब तक पाँच लाख से अधिक लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया है। ‘जुग-जुग जियो अभियान’, NOTTO मोबाइल ऐप और ‘वन नेशन, वन पॉलिसी’ ने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है। कई नए एम्स में किडनी और लीवर प्रत्यारोपण की सुविधाएँ बढ़ी हैं। 

फिर भी चुनौती बाकी है। हर साल लाखों मरीज अंगों की प्रतीक्षा में हैं। बहुत से लोग समय पर अंग न मिलने से जान गँवा देते हैं। 

यही कमी ग्रे मार्केट को बढ़ावा देती है। ग़रीबों से किडनी चुराकर या जबरदस्ती बेचने के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। दलाल ग़रीब किसानों, मजदूरों और कर्ज में डूबे लोगों को फुसलाते हैं। नकली रिश्ते, फर्जी दस्तावेज़ बनाकर अवैध प्रत्यारोपण कराए जाते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली-एनसीआर और यहाँ तक कि बांग्लादेश-कम्बोडिया से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट भी पकड़े गए हैं। ग़रीब दाता को थोड़े पैसे मिलते हैं, जबकि मरीज से लाखों वसूले जाते हैं। कई बार किडनी चुरा ली जाती है या धोखे से निकाल ली जाती है। यह काला व्यापार मानवीय गरिमा का घोर अपमान है।

कानून सख्त है, लेकिन जागरूकता और पारदर्शिता बढ़ाकर ही इस ग्रे मार्केट पर अंकुश लगाया जा सकता है। 

जब मृत्यु के बाद अंगदान समाज की स्वाभाविक संस्कृति बनेगी, तभी असली सफलता मिलेगी। आख़िरकार, इंसान की सबसे बड़ी विरासत उसकी दौलत नहीं, बल्कि वह जीवन है जो वह दूसरों को देकर जाता है। अंगदान सचमुच मृत्यु के बाद भी जीवन का सबसे सुंदर उत्सव है।

 गेट कीपर्स का दौर खत्म: सेल्फ पब्लिशिंग ने बदल दी है किताबों की दुनिया

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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सन् 1455 में योहानेस गुटेनबर्ग ने जब चल अक्षरों वाली मुद्रण मशीन का आविष्कार किया, तब शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि एक दिन किताबें छापना इतना आसान हो जाएगा कि हर लेखक अपना स्वयं का प्रकाशक बन सकेगा। गुटेनबर्ग की छापाखाने ने ज्ञान को राजमहलों और मठों की दीवारों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। अब, लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष बाद, सेल्फ पब्लिशिंग उसी क्रांति को एक नए मुकाम पर ले गई है।

आज हालात यह हैं कि जहां देखिए, वहां सेल्फ पब्लिशिंग कंपनियों की भरमार है। सोशल मीडिया, गूगल और यूट्यूब पर हर दिन दर्जनों विज्ञापन दिखाई देते हैं: "अपनी किताब छपवाइए", "बेस्टसेलर लेखक बनिए", "सिर्फ कुछ दिनों में अपनी पुस्तक प्रकाशित कराइए।" ये कंपनियां पांडुलिपि तैयार करने, संपादन, कवर डिजाइन, ISBN, ई-बुक, प्रिंटिंग, अमेज़न लिस्टिंग और प्रचार तक की हर सुविधा एक ही छत के नीचे उपलब्ध करा रही हैं। पैकेज लगभग ₹2,999 से शुरू होकर ₹50,000 या उससे अधिक तक जाते हैं। इतनी किफायती और आसान प्रक्रिया देखकर कोई भी व्यक्ति यह सोच सकता है: "क्यों न मैं भी अपनी किताब प्रकाशित करूं?"

एक समय था जब किताब लिखना ही काफी नहीं था। असली इम्तिहान किसी प्रकाशक को यह विश्वास दिलाना होता था कि आपकी पांडुलिपि छपने लायक है। लेखक वर्षों तक शोध करते, लिखते, बार-बार संशोधन करते और फिर भी अक्सर उनके हिस्से में केवल अस्वीकृति या खामोशी आती थी। न जाने कितनी उत्कृष्ट रचनाएं पाठकों तक पहुंचने से पहले ही प्रकाशकों की मेज पर दम तोड़ देती थीं।

सदियों तक किताब लिखना ही सबसे बड़ी चुनौती नहीं था। असली इम्तिहान था किसी प्रकाशक को यह यकीन दिलाना कि आपकी किताब छपने लायक है। लेखक बरसों तक मेहनत करते, रिसर्च करते, कई-कई बार पांडुलिपि लिखते और सुधारते। फिर भी जवाब में या तो एक शालीन-सा "अफसोस" मिलता, या फिर बिल्कुल खामोशी। न जाने कितनी शानदार किताबें सिर्फ इसलिए पाठकों तक नहीं पहुंच सकीं क्योंकि वे कुछ प्रकाशकों की कारोबारी सोच या निजी पसंद पर खरी नहीं उतरीं।

पारंपरिक प्रकाशन ने साहित्य को बहुत कुछ दिया है। बड़े-बड़े लेखकों को पहचान मिली और अनगिनत कालजयी रचनाएं दुनिया तक पहुंचीं। लेकिन यह भी सच है कि प्रकाशकों ने लंबे समय तक साहित्य के "दरबान" की भूमिका निभाई। वही तय करते थे कि किस लेखक की आवाज़ लोगों तक पहुंचेगी और किसकी नहीं।

सोचिए, अगर किसी जमाने में शेक्सपीयर, कालिदास, प्रेमचंद या एमिली डिकिंसन जैसे रचनाकारों की पांडुलिपियां किसी प्रकाशक की मेज पर ही ठुकरा दी जातीं, तो दुनिया कितना बड़ा साहित्यिक ख़ज़ाना खो देती। शायद ऐसे न जाने कितने प्रतिभाशाली लेखक इतिहास के अंधेरे में गुम हो गए, जिनकी रचनाएं कभी छप ही नहीं सकीं।

लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

डिजिटल तकनीक, सस्ती प्रिंटिंग, प्रिंट-ऑन-डिमांड, ई-बुक्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने प्रकाशन की दुनिया में एक नई इंकलाबी हवा चला दी है। अब किसी लेखक को अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने के लिए किसी प्रकाशक की इजाज़त का इंतजार नहीं करना पड़ता। वह अपनी किताब खुद प्रकाशित कर सकता है, उसकी कीमत तय कर सकता है, डिजाइन चुन सकता है और सीधे पाठकों तक पहुंच सकता है। साहित्य पर कुछ गिने-चुने लोगों का एकाधिकार अब टूट रहा है।

इसके आंकड़े भी इसी बदलाव की गवाही देते हैं। अमेरिका में 2025 के दौरान चार मिलियन से अधिक किताबें प्रकाशित हुईं। इनमें लगभग साढ़े तीन मिलियन किताबें सेल्फ पब्लिशिंग के जरिए आईं। पारंपरिक प्रकाशकों की तुलना में अब स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किताबों की संख्या पांच गुना से भी ज्यादा हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में जहां पारंपरिक प्रकाशन की रफ्तार बेहद धीमी रही, वहीं सेल्फ पब्लिशिंग तेज़ी से आगे बढ़ी है।

पिछले कुछ महीनों में मेरी मुलाकात एक दर्जन से अधिक ऐसे लेखकों से हुई जिन्होंने अपनी किताबें स्वयं प्रकाशित कीं। उन्होंने मुझे अपने हस्ताक्षर वाली प्रतियां बड़े गर्व से भेंट कीं। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। वे किसी प्रकाशक की मंजूरी के मोहताज नहीं थे। उन्होंने अपनी रचनात्मक तकदीर खुद अपने हाथों में ले ली थी।

आज सेल्फ पब्लिशिंग केवल एक विकल्प नहीं रही, बल्कि हजारों लेखकों की पहली पसंद बनती जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक लेखक किताब छपवाने, बाजार तक पहुंचाने और उसके प्रचार के लिए पूरी तरह प्रकाशकों पर निर्भर रहते थे। अब यह तस्वीर बदल चुकी है।

अमेज़न किंडल डायरेक्ट पब्लिशिंग (KDP), Amazon, Kobo और Google Play Books जैसे प्लेटफॉर्म ने पूरी दुनिया को एक खुला बाज़ार बना दिया है। अब आगरा, मैसूर या कोच्चि में बैठा कोई लेखक अपनी किताब अपलोड करता है और कुछ ही मिनटों में न्यूयॉर्क, लंदन या सिडनी का पाठक उसे खरीद सकता है।

प्रिंट-ऑन-डिमांड तकनीक ने प्रकाशन का खर्च भी काफी कम कर दिया है। अब हजारों प्रतियां पहले से छापकर गोदाम भरने की जरूरत नहीं पड़ती। जब कोई पाठक ऑर्डर देता है, तभी उसकी प्रति छपती है। इससे आर्थिक जोखिम लगभग खत्म हो जाता है।

किताबों के प्रचार का तरीका भी पूरी तरह बदल गया है। पहले लेखक अपने प्रकाशक की मेहरबानी पर निर्भर रहते थे। आज सोशल मीडिया हर लेखक का अपना मंच बन चुका है। किसी किताब की अच्छी समीक्षा, एक पॉडकास्ट, यूट्यूब इंटरव्यू, इंस्टाग्राम रील या वायरल पोस्ट रातों-रात हजारों पाठकों तक पहुंच सकती है। आज मुंहज़बानी प्रचार एक क्लिक की रफ्तार से पूरी दुनिया में फैल जाता है।

इस पूरी क्रांति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने भी नई जान फूंक दी है। अब AI लेखक की जगह नहीं लेता, बल्कि उसका मददगार बन गया है। शोध, विचारों की रूपरेखा, भाषा सुधार, संपादन, प्रूफरीडिंग, किताब की सज्जा, कवर डिजाइन, चित्र, अनुवाद और प्रचार सामग्री तैयार करने जैसे कई काम AI कुछ ही मिनटों में आसान कर देता है। इससे समय और खर्च दोनों बचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि नए लेखक अब तकनीकी झंझटों से डरते नहीं हैं और आत्मविश्वास के साथ अपनी किताब प्रकाशित कर पा रहे हैं।

बेशक, AI कल्पनाशक्ति, संवेदनाएं और जीवन के अनुभवों की जगह कभी नहीं ले सकता। एक अच्छी कहानी, गहरी सोच और सच्ची भावनाएं अब भी इंसान ही रच सकता है। लेकिन AI उस सफर को कहीं ज्यादा आसान जरूर बना देता है।

कई दशक पहले, जब फोटोकॉपी मशीनें नई-नई आई थीं, तब ज़ेरॉक्स कंपनी के एक अधिकारी ने कहा था, "एक दिन हर व्यक्ति अपना खुद का प्रकाशक होगा।" उस समय यह बात किसी ख्वाब जैसी लगती थी। आज वह भविष्यवाणी सच साबित हो चुकी है।

फिर भी यह समझना जरूरी है कि सेल्फ पब्लिशिंग कोई जादू की छड़ी नहीं है। अगर किताब कमजोर है तो केवल खुद प्रकाशित कर देने से वह बेहतरीन नहीं बन जाएगी। अच्छी संपादन प्रक्रिया, आकर्षक डिजाइन, सावधानी से की गई प्रूफरीडिंग और लगातार प्रचार आज भी उतने ही जरूरी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब लेखक इन सेवाओं को अपनी पसंद से चुन सकता है। उसे अपनी रचना का पूरा नियंत्रण किसी और के हवाले नहीं करना पड़ता।

सेल्फ पब्लिशिंग की सबसे बड़ी कामयाबी सिर्फ ज्यादा किताबें छापना नहीं है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है रचनात्मक आज़ादी। अब क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक, छोटे विषयों पर लिखने वाले लोग, भूले-बिसरे इतिहास, नए प्रयोग और अलग सोच रखने वाले रचनाकार भी बिना किसी रुकावट के अपनी बात दुनिया के सामने रख सकते हैं।

इतिहास में पहली बार किसी लेखक की सफलता इस बात पर कम निर्भर है कि कोई प्रकाशक उसे पसंद करता है या नहीं। अब फैसला सीधे पाठक करते हैं। अगर रचना दमदार है तो वह अपनी जगह बना ही लेती है।

छापाखाने ने किताबों को जन्म दिया था। इंटरनेट ने उन्हें हर घर तक पहुंचा दिया। और सेल्फ पब्लिशिंग ने उन्हें सचमुच लोकतांत्रिक बना दिया है। शायद यही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी साहित्यिक क्रांति है।

Sunday, August 2, 2026

 दिल्ली-हरियाणा की गंदगी का बोझ, भुगत रहे आगरा और ब्रज मंडल

यमुना कब तक राजधानी और उसके पड़ोसी राज्यों का सीवर बनी रहेगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 अगस्त 2026

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नदियाँ कभी सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति और सभ्यता को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। लेकिन जब कोई शहर या राज्य अपनी गंदगी नदी में उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी सीमाएँ नहीं मानता। वह भी बहते-बहते दूर तक पहुँचता है। आज यमुना इसी राष्ट्रीय शर्म की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।

हाल ही में तमिलनाडु ने कर्नाटक पर आरोप लगाया कि बेंगलुरु का सीवर मिला पानी लगातार दक्षिण पिनाकिनी (थेनपेन्नई) नदी में छोड़ा जा रहा है। जल परीक्षण में भारी जैविक प्रदूषण, अमोनिया, फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और रासायनिक कचरे की पुष्टि हुई। तमिलनाडु ने न केवल सख़्त एतराज़ जताया, बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से तत्काल दख़ल देने की मांग भी की।

सवाल है, जब दक्षिण भारत की एक नदी के लिए इतना शोर उठ सकता है, तो यमुना के लिए यह ख़ामोशी क्यों?

यमुना दिल्ली पहुँचने से पहले ही हरियाणा में बीमार हो चुकी होती है। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि राज्य के 11 बड़े नाले लगातार गंदगी यमुना में उँडेल रहे हैं। इनमें पानीपत-सोनीपत का ड्रेन नंबर-6, फरीदाबाद का बुढ़िया नाला, बल्लभगढ़-पालवल का गौंछी ड्रेन और गुरुग्राम के कई बड़े ड्रेन शामिल हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा से यमुना में पहुँचने वाले प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला गुरुग्राम छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत में हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नदी में जा रहा है। फरीदाबाद की अवैध डाइंग इकाइयाँ रासायनिक और रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में छोड़ती हैं। बल्लभगढ़ और पलवल से भी बिना शोधन का सीवेज सीधे यमुना में गिरता है।

दिल्ली पहुँचते-पहुँचते हालात और बदतर हो जाते हैं। वज़ीराबाद से ओखला तक केवल 22 किलोमीटर का हिस्सा यमुना के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है। नजफ़गढ़ नाला समेत कई बड़े नाले रोज़ करोड़ों लीटर सीवेज और औद्योगिक कचरा नदी में गिराते हैं। दिल्ली जल बोर्ड के ताज़ा अनुमान बताते हैं कि इन नालों का प्रवाह पहले के आकलन से कहीं अधिक है। नतीजा यह है कि कई स्थानों पर पानी में घुली ऑक्सीजन शून्य हो जाती है और फीकल कोलीफॉर्म सुरक्षित सीमा से सैकड़ों गुना ऊपर पहुँच जाता है। यहाँ यमुना नदी नहीं, एक बदहाल नाला दिखाई देती है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दिल्ली और हरियाणा की यह साझा गंदगी नीचे आगरा, मथुरा, वृंदावन और पूरे ब्रज मंडल के हिस्से आती है। ऊपर वालों की लापरवाही, नीचे रहने वालों की सज़ा बन जाती है।

आगरा केवल एक शहर नहीं, ताजमहल का नगर है। यह विश्व धरोहर और भारत की पहचान है। लेकिन ताजमहल के सामने बहने वाली यमुना अब जीवन नहीं, बीमारियाँ लेकर आती है। ज़हरीला पानी भूजल को दूषित कर रहा है। जलीय जीव समाप्त हो रहे हैं। नदी का प्राकृतिक प्रवाह दम तोड़ रहा है। एक मृतप्राय नदी के किनारे दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत भी उदास दिखाई देती है।

इस पूरे संकट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका भी कठघरे में है। उनका काम केवल पानी की जाँच करना नहीं, बल्कि प्रदूषण रोकना भी है। यदि दशकों से यमुना की यही हालत है, तो सवाल उठना लाज़िमी है कि प्रभावी कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? क्या रिपोर्टें केवल फाइलों की ज़ीनत बढ़ाने के लिए बनती हैं? क्या कानून सिर्फ़ छोटे लोगों पर लागू होते हैं? बड़े शहरों, उद्योगों और सरकारी एजेंसियों पर नहीं?

हरियाणा सरकार ने 2027 तक बिना शोधन के पानी को पूरी तरह रोकने और नालों के बीओडी स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे लाने का लक्ष्य रखा है। नए एसटीपी, सीईटीपी और ड्रेन टैपिंग की योजनाएँ भी बनाई गई हैं। दिल्ली सरकार भी सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने के दावे कर रही है।

लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी कहती है। पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल से प्रदूषण आज भी लगातार यमुना में पहुँच रहा है। अवैध इकाइयाँ फिर से चालू हो जाती हैं और नालों में सीधा डिस्चार्ज रुकने का नाम नहीं लेता।

यमुना किसी एक राज्य की जागीर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। संविधान हर नागरिक को स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार देता है। फिर आगरा और ब्रज के लोगों को प्रदूषित पानी क्यों मिले? ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को इस लापरवाही की क़ीमत क्यों चुकानी पड़े?

अब वक़्त आ गया है कि दिल्ली और हरियाणा दोनों सरकारें अपनी साझा ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। राजधानी और उसके औद्योगिक शहरों का विकास तभी मायने रखेगा, जब उसकी गंदगी दूसरे राज्यों की तक़दीर न बने। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य बोर्डों को भी अपनी निष्क्रियता छोड़नी होगी। केवल नोटिस जारी करना या नए लक्ष्य घोषित करना काफ़ी नहीं है। दोषी एजेंसियों और उद्योगों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना शोधन का एक भी लीटर सीवेज या औद्योगिक कचरा यमुना में न गिरे।

यमुना सिर्फ़ पानी की धारा नहीं, हमारी सभ्यता की धड़कन है। यदि हम इसे बचाने में नाकाम रहे, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितनी योजनाएँ बनीं या कितने वादे किए गए। वह सिर्फ़ इतना लिखेगा कि एक राष्ट्र अपनी सबसे पवित्र नदियों में से एक को दिल्ली, फरीदाबाद, पानीपत, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल के सीवर में बदलने से नहीं बचा सका। यही हमारी सबसे बड़ी पर्यावरणीय और नैतिक नाकामी होगी।

Saturday, August 1, 2026

 


ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में उद्योगों को अनुमति देने में जल्दबाज़ी न हो।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अगस्त 2026

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क्या हम ताजमहल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएँ में दफ़न कर रहे हैं?

आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली बनी रहती है। हर दिन उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम जाने वाले हज़ारों ट्रक, डंपर, बसें और भारी वाहन इस शहर की साँसों पर नया बोझ डालते हैं। यमुना और उसकी सहायक नदियाँ सूख रही हैं, तालाब और झीलें ग़ायब हो चुके हैं, पेड़ों की हरियाली सिमटती जा रही है और सड़कों पर बेकाबू ट्रैफिक दम घोंट रहा है। ऐसे नाज़ुक हालात में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में नए उद्योगों को अनुमति देने से पहले उसके हर फ़ायदे और हर संभावित नुक़सान का बेहद गहराई और वैज्ञानिक नज़रिए से आकलन करना ज़रूरी है। कहीं ऐसा न हो कि आज का छोटा-सा फ़ैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी बन जाए।

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ताज महल के आसपास के संरक्षित क्षेत्र TTZ (लगभग 10,400 वर्ग किमी, जिसमें आगरा और आसपास के जिले शामिल हैं) में 1990 के दशक की शुरुआत से वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। 1990 के आसपास या 1990 के दशक के मध्य-अंत में आगरा क्षेत्र में लगभग 1.9–2.1 लाख वाहन थे। 2026 के मध्य तक आगरा जिले में निजी वाहनों की संख्या लगभग 8.5 लाख पहुँच गई है (एक आधिकारिक रिपोर्ट में आगरा आरटीओ का कुल आँकड़ा करीब 16.9 लाख बताया गया है)। यह लगभग 35 वर्षों में 4 से 8 गुना या उससे भी अधिक की वृद्धि है।

स्थानीय वाहनों की यह वृद्धि पारगमन यातायात से और बढ़ जाती है। आगरा यमुना एक्सप्रेसवे (रोज़ाना 50,000 से अधिक वाहन) और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (2020 से 2025 के बीच दैनिक यातायात लगभग दोगुना) जैसे प्रमुख मार्गों पर स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे कनेक्शनों से भी हज़ारों ट्रक, पर्यटक बसें और कारें गुज़रती रहती हैं। स्थानीय वाहनों और बढ़ते पारगमन/पर्यटक यातायात से ज़ोन के अंदर वाहन-किलोमीटर लगातार बढ़ रहे हैं। वाहनों की इतनी बड़ी वृद्धि ने कई उपलब्धियों को बेअसर कर दिया है, जिससे प्रदूषण स्तर सुरक्षित सीमा तक  नहीं आ पा रहा। अध्ययन और आधिकारिक आकलन बार-बार वाहनों (स्थानीय + पारगमन) को ताजमहल और पूरे TTZ के लिए हवा की गुणवत्ता की समस्या का प्रमुख कारण बताते हैं। “वाहन विस्फोट” अभी भी प्रदूषण की चुनौती को बनाए रखे हुए है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2024 में लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध में कुछ राहत देते हुए ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) में लगभग 400 लंबित गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के आवेदनों पर विचार करने की इजाज़त दी है। लेकिन इसे उद्योगों के लिए खुला निमंत्रण नहीं समझना चाहिए। अदालत ने रोज़गार और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। हर आवेदन को नीरी (NEERI) और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के विशेषज्ञों की सर्वसम्मति से मंज़ूरी लेनी होगी। किसी विवाद की स्थिति में अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा। इसके बावजूद भविष्य में किसी भी तरह की और ढील बेहद एहतियात के साथ ही दी जानी चाहिए। इस पूरे क्षेत्र की हवा अब भी चिंताजनक है और पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरे अभी टले नहीं हैं।

साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने कोयला और कोक से चलने वाले सैकड़ों उद्योगों, खासकर फाउंड्रियों, को प्राकृतिक गैस अपनाने या बंद करने का आदेश दिया था। उस समय सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का स्तर 17 से 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था और हवा में धूल-कण (SPM) 400 से 750 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुँच जाते थे। यही प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को पीला कर रहा था और अम्लीय वर्षा का कारण बन रहा था।

अदालत के उस फैसले से बड़ा फ़ायदा हुआ। सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर घटकर 4 से 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) में भी कमी आई। इससे ताजमहल को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाली जहरीली गैसों से काफी हद तक राहत मिली।

लेकिन पूरी तस्वीर अभी भी तसल्लीबख्श नहीं है। हवा में मौजूद बारीक धूल-कण अब भी बेहद ज़्यादा हैं। पीएम-10 (PM₁₀) का स्तर कई स्थानों पर 120 से 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे भी अधिक दर्ज किया जाता है, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों के लिए तय सीमा केवल 60 है। पीएम-2.5 (PM₂.₅) का वार्षिक औसत भी अक्सर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे अधिक रहता है। सर्दियों में यह और खतरनाक हो जाता है। मानसून में वायु गुणवत्ता कभी-कभी सामान्य रहती है, लेकिन सर्दियों में अक्सर "खराब", "बहुत खराब" या "गंभीर" श्रेणी में पहुँच जाती है। यही बारीक धूल ताजमहल पर जमती है और लोगों की सेहत पर भी बुरा असर डालती है। पिछले तीस वर्षों में सुधार तो हुआ है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।

इस लगातार बने हुए प्रदूषण का कारण केवल उद्योग नहीं हैं। इसके पीछे कई गहरे पर्यावरणीय संकट भी हैं। यमुना नदी लगभग सूख चुकी है और उसका पानी बुरी तरह प्रदूषित है। नदी अब वह नमी और ठंडक नहीं दे पाती, जो कभी ताजमहल के आसपास का प्राकृतिक वातावरण बनाए रखती थी। आसपास की ज़मीन तेज़ी से बंजर होती जा रही है। मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और हरियाली लगातार घट रही है। ज़िले के कुछ हिस्सों में हरित क्षेत्र केवल लगभग 7 प्रतिशत रह गया है। पेड़-पौधे कम होने से धूल को रोकने की प्राकृतिक क्षमता घट गई है। सड़कों की धूल, निर्माण कार्य, छोटे उद्योग, वाहनों का धुआँ और दूसरे राज्यों में पराली व बायोमास जलाने का धुआँ भी इस संकट को और बढ़ा रहा है।

ऐसी हालत में पूरे टीटीज़ेड को उद्योगों के लिए और खोलना, चाहे वे "गैर-प्रदूषणकारी" ही क्यों न हों, ख़तरे से खाली नहीं है। अभी तक इस क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन क्षमता (Carrying Capacity) का पूरा अध्ययन भी नहीं हुआ है और लंबे समय से लंबित विज़न डॉक्यूमेंट भी तैयार नहीं हो पाया है। एक बार उद्योग लग जाने के बाद ईंधन और उत्सर्जन के नियमों का सख़्ती से पालन कराना हमेशा आसान नहीं रहा है। नए उद्योगों से यातायात, निर्माण और ऊर्जा की माँग बढ़ेगी, जिससे अब तक मिले पर्यावरणीय लाभ कमज़ोर पड़ सकते हैं।

इसलिए आगे बढ़ने का रास्ता बेहद सोच-समझकर तय करना होगा। केवल उन्हीं व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के एमएसएमई को अनुमति मिले, जो बिजली या प्राकृतिक गैस का उपयोग करें और जिनकी हर आवेदन पर विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग गहराई से जाँच हो। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

इसके साथ-साथ यमुना में पर्याप्त स्वच्छ जल प्रवाह बहाल करना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना, मिट्टी संरक्षण के उपाय अपनाना, सड़कों की धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर सख़्त नियंत्रण रखना तथा वायु गुणवत्ता की लगातार निगरानी कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करना भी उतना ही ज़रूरी है। जब तक हवा में धूल-कणों का स्तर लगातार और स्पष्ट रूप से कम न हो जाए तथा क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता मज़बूत न हो जाए, तब तक उद्योगों के लिए और छूट देने पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

ताजमहल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण की सेहत का आईना है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया था कि सख़्त नियमों से प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है। 

Friday, July 31, 2026

 बारह साल बाद भी अधूरी तस्वीर!

क्या यही है 'नया भारत' का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 जुलाई 2026

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क्या सिर्फ़ चमचमाती सड़कें, ऊँची इमारतें और डिजिटल ऐप्स ही किसी देश की तरक्की का पैमाना हैं? अगर चुनाव पैसे के दम पर लड़े जाएँ, अदालतों में इंसाफ़ वर्षों तक अटका रहे, सरकारी स्कूल कमज़ोर होते जाएँ, पुलिस पर भरोसा घटता जाए और इलाज जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम "नए भारत" की मंज़िल पर पहुँच गए हैं?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता में आए अब बारह साल हो चुके हैं। इस दौरान बड़े-बड़े वादे हुए, कई उपलब्धियाँ भी मिलीं। सड़कों, डिजिटल सेवाओं, आधारभूत ढाँचे और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई। लेकिन देश के बुनियादी संस्थानों की हालत पर नज़र डालें तो तस्वीर उतनी रोशन नहीं दिखती। कई पुराने मसले आज भी जस के तस हैं, बल्कि कुछ और पेचीदा हो गए हैं। इनका असर सीधे करोड़ों आम नागरिकों की ज़िंदगी पर पड़ता है।

सबसे बड़ा अधूरा काम चुनाव सुधार है। वर्षों से अदालतें, चुनाव विशेषज्ञ और कई समितियाँ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की सिफारिश करती रही हैं। फिर भी राजनीति में धनबल और बाहुबल का दबदबा कम नहीं हुआ।

2024 के लोकसभा चुनाव में चुने गए लगभग 46 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। इनमें से करीब एक-तिहाई मामलों में हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। औसतन हर सांसद की घोषित संपत्ति लगभग 38 करोड़ रुपये रही। चुनावी खर्च का अनुमान करीब एक लाख करोड़ रुपये लगाया गया। वहीं एजेंसियों ने 8,800 करोड़ रुपये से अधिक नकदी और अन्य प्रलोभन जब्त किए। यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए कई सवाल खड़े करती है।

2017 में शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को पारदर्शिता बढ़ाने का उपाय बताया गया था। लेकिन 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। तब तक लगभग दो अरब डॉलर के बराबर चंदा इस व्यवस्था से गुजर चुका था, जिसका बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ दल को मिला। आज भी चुनावों के लिए सरकारी फंडिंग नहीं है, राजनीतिक दलों के खर्च पर प्रभावी सीमा नहीं है और कमजोर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने जैसी व्यवस्था मौजूद नहीं है। वोटर सूची से नाम हटाने के आरोप भी बार-बार सामने आते हैं। कुल मिलाकर चुनाव जीतना,  ईमानदारी से अधिक अहम  है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी देश दो हिस्सों में बँटता जा रहा है। एक ओर महँगे निजी स्कूल हैं, दूसरी ओर लगातार कमजोर होते सरकारी विद्यालय। पिछले दस वर्षों में लगभग 90 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए, यानी औसतन हर दिन करीब 25 स्कूल। उधर निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ती रही।

आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। यानी कमज़ोर शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उन्हीं पर पड़ रहा है जिनके पास विकल्प सबसे कम हैं।

देश में शिक्षा के कई अलग-अलग ढाँचे हैं; सीबीएसई, राज्य बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम, मदरसे और पंचायत स्कूल। लेकिन सबके लिए एक समान गुणवत्ता मानक नहीं है। भाषा नीति पर विवाद जारी है। स्वतंत्र सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी पढ़ाई और गणित में भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति ने बड़े बदलावों का वादा किया था, लेकिन अमीर और गरीब की शिक्षा के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है।

भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका अंदाज़ बदल गया है। रोजमर्रा के सरकारी कामों में रिश्वत की शिकायतें अब भी आम हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि कंपनियाँ राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं और बाद में सरकारी ठेके हासिल कर लेती हैं। कुछ उद्योगों, खासकर खनन और दवा क्षेत्र में, नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में "वॉशिंग मशीन" शब्द भी खूब चर्चा में रहा। विपक्ष के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे, वे सत्ता पक्ष में शामिल होते ही कानूनी दबाव से राहत पाते दिखाई दिए। उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बना लोकपाल भी अब तक अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाया है।

न्यायपालिका की हालत भी चिंताजनक है। देशभर की अदालतों में 5.6 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से लगभग पाँच करोड़ मामले जिला अदालतों में हैं। कई उच्च न्यायालयों में दस-दस वर्षों से मुकदमे लंबित पड़े हैं। बड़ी संख्या में न्यायाधीशों के पद खाली हैं। आम नागरिक इंसाफ़ के इंतज़ार में बूढ़ा हो जाता है, जबकि प्रभावशाली लोग लंबी कानूनी प्रक्रिया का बोझ आसानी से झेल लेते हैं।

पुलिस व्यवस्था भी आज़ादी के डेढ़ सौ साल पुराने ढाँचे पर टिकी हुई है। अधिकांश राज्यों में अब भी 1861 के पुलिस कानून की सोच हावी है। पुलिस बल में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। राजनीतिक दखल, हिरासत में हिंसा और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की शिकायतें लगातार आती रहती हैं। 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार के कई निर्देश दिए थे, लेकिन अधिकांश आज भी अधूरे हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था में भी कई कमियाँ बनी हुई हैं। दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता नहीं है। निजी अस्पताल अक्सर दवाओं और जाँचों के लिए वास्तविक लागत से कई गुना अधिक शुल्क वसूलते हैं। आयुष्मान भारत योजना में फर्जीवाड़े के कारण हजारों अस्पतालों पर कार्रवाई करनी पड़ी। मिलावटी दवाओं से बच्चों की मौत जैसी घटनाओं ने भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और मरीजों की परेशानी आज भी जारी है।

इन सभी समस्याओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ये मिलकर उस फ़ासले की कहानी कहती हैं जो बड़े वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद है। चुनाव सुधार, बेहतर शिक्षा, ईमानदार प्रशासन, तेज़ न्याय, आधुनिक पुलिस व्यवस्था और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी अधूरा एजेंडा हैं।


यह भी सच है कि पिछले दशक में भारत ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल एक्सप्रेसवे, ऐप्स और ऊँची इमारतों से महान नहीं बनता। उसकी असली ताकत इस बात से तय होती है कि वह आम आदमी की रोज़मर्रा की परेशानियों को कितनी ईमानदारी से हल करता है।

आज भी छह बड़े सवाल देश के सामने खड़े हैं:

बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली, महँगाई, पर्यावरण संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की असमानता, तथा सामाजिक सौहार्द को मजबूत करना। करोड़ों युवा अच्छी नौकरियों की तलाश में हैं। किसान अनिश्चित आमदनी से जूझ रहे हैं। महँगाई हर परिवार का बजट बिगाड़ रही है। हवा और पानी का प्रदूषण लोगों की सेहत पर हमला कर रहा है। समाज में बढ़ती दूरियाँ लोकतंत्र को भी कमज़ोर करती हैं।

सरकार की आलोचना करना देश-विरोध नहीं है। एक मज़बूत लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना ही बेहतर शासन की बुनियाद होती है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी केवल उपलब्धियाँ गिनाने में नहीं, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने में होती है। भारत को ऐसा विकास चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, टिकाऊ हो और हर नागरिक तक उसका लाभ पहुँचे।

 जब पहरेदार ही राग दरबारी गाने लगे!!

क्यों मुख्यधारा का मीडिया हाशिये पर जा रहा है और सोशल मीडिया नई चौपाल बन गया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

1 अगस्त 2026

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आज भारत की सबसे बड़ी खबर वह नहीं है जो हर रात टीवी स्टूडियो में चीख-चीखकर दिखाई जाती है। सबसे बड़ी खबर वह है, जिसे दिखाने से बचा जाता है।

लोकतंत्र केवल तब कमजोर नहीं होता, जब सरकारें मीडिया पर सेंसर लगा दें। वह तब भी कमजोर होता है, जब पत्रकार खुद सवाल पूछना छोड़ दें। आज देश के बड़े हिस्से का मुख्यधारा का मीडिया सत्ता से जवाब मांगने के बजाय उसकी आवाज़ दोहराता दिखाई देता है।

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। उसका काम था भ्रष्टाचार उजागर करना, सरकार से सवाल पूछना और आम आदमी की आवाज़ बनना। आज उसकी बड़ी भूमिका सत्ता का बचाव करती नज़र आती है। पहरेदार अब गोद में बैठा हुआ लगता है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया। बड़े मीडिया संस्थानों का मालिकाना हक़ कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों के हाथों में सिमट गया है। उनके कारोबार केवल मीडिया तक सीमित नहीं हैं। ऐसे माहौल में संपादकीय आज़ादी अक्सर मुनाफ़े और राजनीतिक रिश्तों के आगे पीछे छूट जाती है।

विज्ञापनों ने भी इस संकट को गहरा किया है। मीडिया संस्थानों की बड़ी आय सरकार और कॉरपोरेट विज्ञापनों से आती है। जिनसे कमाई होती है, उनके खिलाफ़ जांच करना आसान नहीं होता। खामोशी फ़ायदेमंद बन जाती है और सवाल महंगे पड़ने लगते हैं।

टीवी बहसें भी अब एक जैसी लगती हैं। वही चेहरे, वही प्रवक्ता और वही तयशुदा बहसें। किसान, मज़दूर, शिक्षक, वैज्ञानिक और आम नागरिक शायद ही कभी राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनते हैं। एजेंडा ताकतवर तय करते हैं और बाकी लोग उसे देखते रहते हैं।

जो पत्रकार अलग रास्ता चुनते हैं, उन्हें मुकदमों, ट्रोलिंग, आर्थिक दबाव और ऑनलाइन गालियों का सामना करना पड़ता है। डर धीरे-धीरे आत्म-सेंसरशिप में बदल जाता है। जब डर काम करने लगे, तब सेंसरशिप की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

हर शाम टीवी पर शोर बढ़ता है, लेकिन सच कम होता जाता है। बहस की जगह हंगामा ले लेता है। तथ्यों की जगह नारे आ जाते हैं। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की परेशानियाँ और पर्यावरण जैसे मुद्दे स्टूडियो की राजनीति में कहीं खो जाते हैं।

विद्वानों एडवर्ड हरमन और नोम चॉम्स्की ने वर्षों पहले लिखा था कि मीडिया पर मालिकाना हक़, विज्ञापन और राजनीतिक दबाव यह तय करते हैं कि जनता क्या देखेगी और क्या नहीं। हमेशा झूठ नहीं दिखाया जाता, लेकिन पूरा सच भी नहीं दिखाया जाता।

इसीलिए "गोदी मीडिया" जैसा शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है। कोई इससे सहमत हो या नहीं, लेकिन इतना साफ़ है कि लाखों लोगों का टीवी समाचारों पर भरोसा कम हुआ है।

विडंबना यह है कि जो मीडिया कभी जनता की आवाज़ था, वह आज कई बार सरकारों, विज्ञापनदाताओं और निवेशकों की ज़्यादा चिंता करता दिखाई देता है। उसकी सबसे बड़ी समस्या टीआरपी नहीं, बल्कि घटती विश्वसनीयता है। भरोसा एक बार टूट जाए तो लौटना आसान नहीं होता।

इसी खाली जगह को सोशल मीडिया ने भर दिया है।

हाल का जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान देखते ही देखते राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। युवाओं ने टीवी चैनलों या अखबारों का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने अपनी बात खुद दुनिया तक पहुँचाई।

इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और एक्स पर वीडियो, मीम, भाषण और पोस्ट कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच गए। अब किसी संपादक की मंजूरी की ज़रूरत नहीं रही। मोबाइल फोन ही कैमरा भी है, न्यूज़रूम भी और प्रसारण केंद्र भी।

इस आंदोलन का हास्य, व्यंग्य और मीम पारंपरिक पत्रकारिता से कहीं तेज़ फैला। युवा गंभीर संपादकीय से ज़्यादा चुटीले पोस्ट और छोटे वीडियो से जुड़ते दिखे।

बेशक सोशल मीडिया की अपनी कमियाँ भी हैं। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं, एल्गोरिद्म सनसनी को बढ़ावा देते हैं और तथ्य जांच हमेशा समय पर नहीं हो पाती। फिर भी इसने लाखों लोगों को बोलने का मंच दिया है।

अब यह बदलाव लौटने वाला नहीं है। भारत की नई पीढ़ी रात नौ बजे के टीवी बुलेटिन या अगली सुबह के अखबार का इंतज़ार नहीं करती। वह खुद खबर बनाती है, साझा करती है और उस पर बहस करती है।

यही कारण है कि मुख्यधारा का मीडिया धीरे-धीरे हाशिये पर जा रहा है, जबकि सोशल मीडिया नई जन-चौपाल बन चुका है। आज राजनीति, आंदोलन और जनमत का बड़ा हिस्सा वहीं आकार लेता है।

एक आज़ाद मीडिया का काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, उससे सवाल पूछना है। अगर मुख्यधारा का मीडिया अपनी यह भूमिका नहीं निभाएगा, तो जनता अपनी आवाज़ के लिए नए मंच खोजती रहेगी।

Tuesday, July 28, 2026

 स्कूल खाली हो रहे हैं, जंतर-मंतर भर रहा है! क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था जवाब देगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जुलाई 2026

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अगर बच्चा एक साधारण पैराग्राफ भी नहीं पढ़ सकता, तो नए स्कूल भवन बनाने का क्या मतलब है?

अगर सरकारी स्कूल इतने अच्छे हैं, तो लाखों माता-पिता उन्हें छोड़कर निजी स्कूलों की ओर क्यों जा रहे हैं?

और अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था सही दिशा में है, तो हजारों युवा हाल ही में जंतर-मंतर पर नीट के खिलाफ न्याय और जवाबदेही की मांग लेकर सड़कों पर क्यों उतर आए?

ये अलग-अलग सवाल नहीं हैं। ये एक ही संकट की अलग-अलग तस्वीरें हैं।

जंतर-मंतर पर गूंजा जनाक्रोश केवल नीट परीक्षा के खिलाफ नहीं था। वह पूरे शिक्षा तंत्र के खिलाफ बढ़ते अविश्वास का विस्फोट था। देश की जेन ज़ी पीढ़ी अब केवल एक परीक्षा पर सवाल नहीं उठा रही। वह उस व्यवस्था को चुनौती दे रही है, जो समझ से ज्यादा रटने को, सीखने से ज्यादा कोचिंग को और प्रतिभा से ज्यादा किस्मत को महत्व देती है।

यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 की ताज़ा रिपोर्ट इस बेचैन करने वाली सच्चाई की पुष्टि करती है। भारत की स्कूली शिक्षा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कुछ उपलब्धियां दिखती हैं, लेकिन उनसे कहीं बड़े संकट भी सामने आते हैं। एक तरफ सुधार होता है, दूसरी तरफ व्यवस्था की कोई और कमजोरी उसे पीछे धकेल देती है।

देश में कुल छात्र संख्या 24.80 करोड़ से घटकर 24.72 करोड़ रह गई। अकेले सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख बच्चे कम हुए, जबकि निजी स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए छात्र जुड़े। माता-पिता अपने फैसले से साफ संदेश दे रहे हैं। एक ही वर्ष में 8,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गए। अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की संख्या भी घटी। आज भी एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जहां लगभग 34 लाख बच्चों को एक साथ कई कक्षाओं में पढ़ाया जाता है।

लेकिन सबसे बड़ा संकट स्कूल की इमारतों में नहीं, कक्षाओं के भीतर है।

एएसईआर 2024 बताता है कि महामारी के बाद कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक हैं। कक्षा तीन के केवल लगभग एक चौथाई बच्चे ही कक्षा दो का पाठ ठीक से पढ़ सकते हैं। लगभग दो-तिहाई बच्चे साधारण घटाव तक नहीं कर पाते। पारख (PARAKH) और नीति आयोग की रिपोर्टें बताती हैं कि कक्षा छह के अनेक विद्यार्थी साधारण भिन्न और रोजमर्रा की गणितीय समझ में भी कमजोर हैं। आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते पढ़ने की क्षमता भी पहले से गिर चुकी है।

यानी बच्चे कक्षा तो पास कर रहे हैं, लेकिन सीख नहीं रहे। उनके हाथ में प्रमाणपत्र है, पर आत्मविश्वास नहीं। अंक हैं, लेकिन ज्ञान नहीं।

स्कूलों में बिजली, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन हजारों स्कूलों में आज भी खेल का मैदान नहीं है, दिव्यांगों के लिए सुविधाएं नहीं हैं, कंप्यूटर काम नहीं करते और इंटरनेट केवल कागज़ों में मौजूद है।

शिक्षा पर सरकारी खर्च भी चिंता बढ़ाता है। पिछले एक दशक में केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार घटी है। कम निवेश का सीधा असर शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है। इमारतें जल्दी बन सकती हैं, लेकिन भरोसा धीरे-धीरे बनता है।

देश की स्कूली शिक्षा पांच बड़ी बीमारियों से जूझ रही है।

सबसे बड़ी बीमारी है कमजोर सीखने की क्षमता। बच्चे वर्षों तक स्कूल जाते हैं, लेकिन पढ़ना, लिखना और साधारण गणित तक ठीक से नहीं सीख पाते।

दूसरी समस्या है बीच रास्ते पढ़ाई छोड़ देना। पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले लगभग आधे बच्चे बारहवीं तक पहुंच ही नहीं पाते। हर स्तर पर स्कूल बदलने की मजबूरी ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ाती है।

तीसरी चुनौती है शिक्षकों की भारी कमी। एक लाख से अधिक स्कूल आज भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।

चौथी समस्या है शिक्षा व्यवस्था का बिखराव। प्राथमिक स्कूल बहुत हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल अपेक्षाकृत कम। बच्चों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है, जिससे पढ़ाई की निरंतरता टूट जाती है।

पांचवीं चुनौती है गहरी असमानता। राज्यों, आय वर्गों और सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में भारी अंतर है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों की सीखने की क्षमता अब भी पीछे है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती।

देश में दर्जनों शिक्षा बोर्ड, अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां चल रही हैं। सीबीएसई, सीआईएससीई, एनआईओएस, राज्य बोर्ड, संस्कृत बोर्ड, मदरसा बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय बोर्ड; सब अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। यह विविधता कम और भ्रम ज्यादा पैदा करती है।

भारत का एक छात्र लगभग पच्चीस वर्ष तक किसी न किसी परीक्षा की तैयारी करता रहता है। स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगी परीक्षा, नौकरी। लेकिन जीवन जीने की कला, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या समाधान जैसे कौशल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

नीट को लेकर जंतर-मंतर पर जो गुस्सा दिखाई दिया, वह अचानक नहीं फूटा। उसकी शुरुआत उन कक्षाओं में हुई थी जहां समझने से ज्यादा रटाया गया। उन कोचिंग सेंटरों में हुई, जहां स्कूलों से ज्यादा भरोसा पैदा हो गया। उन घरों में हुई, जहां माता-पिता अपनी सारी जमा-पूंजी एक अनिश्चित भविष्य पर दांव लगाने को मजबूर हैं।

भारत कभी नालंदा और तक्षशिला जैसी विश्वविख्यात शिक्षा परंपरा का केंद्र था। आज भी आईआईटी और कुछ चुनिंदा संस्थान दुनिया में सम्मान पाते हैं। लेकिन पूरी शिक्षा व्यवस्था अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी, जिसकी एक उभरती महाशक्ति से उम्मीद की जाती है।

भारत को केवल अधिक स्कूलों की जरूरत नहीं है। बेहतर स्कूलों की जरूरत है।

केवल अधिक दाखिलों की नहीं, बेहतर सीखने की जरूरत है।

केवल अधिक परीक्षाओं की नहीं, बेहतर शिक्षा की जरूरत है।

जेन ज़ी अपना फैसला सुना चुकी है। वह सड़कों पर उतर चुकी है। अब परीक्षा सरकार, नीति-निर्माताओं और पूरे समाज की है।

देश का हर छात्र आज सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है—

क्या हमारी शिक्षा हमें जिंदगी के लिए तैयार करेगी, या सिर्फ अगली परीक्षा के लिए?

यही सवाल भारत के भविष्य का भी फैसला करेगा।

 


जब कॉकरोचों ने हिला दिया सत्ता का सिंहासन: जेन ज़ी ने कर दिखाया, जो विपक्ष नहीं कर सका

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 जुलाई 2026

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साल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ।

कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया।

कहावत है, "जहाँ चाह, वहाँ राह।" इस बार राह इंस्टाग्राम से होकर निकली।

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), पहले मज़ाक लगती थी। लेकिन मज़ाक ही आंदोलन बन गया। युवाओं ने कहा, "अगर हमें कॉकरोच कहते हो, तो याद रखो, एक को कुचलोगे, सौ और निकल आएँगे।"

फिर आया नीट-यूजी पेपर लीक।

परीक्षा रद्द हुई। करीब बीस लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा की चिंता सताने लगी। कई छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। वर्षों से जमा गुस्सा, पेपर लीक, महँगी कोचिंग, बेरोज़गारी और सुस्त व्यवस्था, अब ज्वालामुखी बन चुका था।

चिंगारी मिली और आग फैल गई।

सीजेपी ने वही भाषा बोली जो आज का युवा समझता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह इंस्टाग्राम रील्स थीं। लंबे भाषणों की जगह मीम थे। गुस्से को हँसी में बदलकर उन्होंने व्यवस्था पर सबसे तीखा वार किया।

जंतर-मंतर धीरे-धीरे धरना स्थल नहीं, युवा गणराज्य बन गया। गीत गूंजे, पोस्टर बने, बहस हुई, कविताएँ पढ़ी गईं। माता-पिता भी साथ आए। शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समर्थन दिया। सोनम वांगचुक का 26 दिन का अनशन आंदोलन को नैतिक ताकत दे गया। पुलिस की लाठी और आँसू गैस ने भी आंदोलन की आग बुझाने के बजाय और हवा दे दी।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी।

सिर्फ एक मांग थी: जवाबदेही।

व्यवस्था की नाकामी की लंबी बहसों में सरकारें अक्सर बच निकलती हैं। लेकिन जब उंगली सीधे एक जिम्मेदार व्यक्ति की ओर उठे, तब बचना आसान नहीं होता।

आखिरकार सरकार ने हालात भाँप लिए। संसद लगातार ठप थी। देशभर में छात्रों का समर्थन बढ़ रहा था। तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल रही थीं। टकराव लंबा खिंचता तो नुकसान और बढ़ता।

धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। सरकार ने जांच, मुआवजे और किसी तरह की प्रताड़ना न होने का भरोसा दिया। तत्काल संकट टल गया।

दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष इस पूरी लड़ाई में अगली कतार में नहीं, पीछे की सीट पर बैठा दिखाई दिया।

वर्षों से विपक्ष शिक्षा, बेरोज़गारी और संस्थाओं की विफलता पर सरकार को घेरता रहा है। लेकिन जब असली जनआंदोलन उठा, तब उसकी भूमिका दर्शक जैसी रही। वह आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर पाया, केवल समर्थन देने पहुँचा।

यहीं उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आई।

आज का विपक्ष विरोध तो करता है, लेकिन भरोसा नहीं जगा पाता।

इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उसे जोड़ने वाला धागा कोई साझा विचार नहीं, बल्कि केवल भाजपा विरोध है। चुनाव आते ही सीटों पर झगड़े शुरू हो जाते हैं। राज्यों में साथी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। "एक अनार, सौ बीमार" जैसी हालत हो जाती है।

नेतृत्व का सवाल भी अब तक अनसुलझा है।

राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं, लेकिन ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और दूसरे क्षेत्रीय नेता भी अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ने को तैयार नहीं। जहाँ कई नाविक हों, वहाँ नाव अक्सर भँवर में फँस जाती है।

संगठन भी विपक्ष की कमजोर कड़ी है।

भाजपा ने दशकों तक बूथ स्तर तक अपना संगठन खड़ा किया। दूसरी ओर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल स्थानीय कार्यकर्ताओं, अनुशासन और जमीनी नेटवर्क की कमी से जूझ रहे हैं। कई राज्यों में गुटबाजी अलग सिरदर्द है।

वंशवाद भी विपक्ष के गले की हड्डी बना हुआ है।

अधिकांश बड़े विपक्षी दल अब भी परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। नई पीढ़ी के नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर सीमित दिखाई देता है। इसके उलट भाजपा खुद को कार्यकर्ता आधारित संगठन के रूप में पेश करने में सफल रही है। राजनीति में धारणा भी आधी लड़ाई जीत लेती है।

विपक्ष की एक और समस्या है कि उसके पास आलोचना तो बहुत है, लेकिन विकल्प कम हैं।

महँगाई, बेरोज़गारी, पेपर लीक और संस्थागत संकट जैसे मुद्दे वास्तविक हैं। लेकिन मतदाता केवल शिकायत नहीं, समाधान भी सुनना चाहता है। केवल सरकार को कोसने से चुनाव नहीं जीते जाते।

जन टिप्पणीकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का मानना है कि लगातार चुनावी हार ने विपक्ष को गहरी निराशा में धकेल दिया है। उसका पूरा ध्यान केवल मोदी सरकार को हटाने पर केंद्रित हो गया है। कॉकरोच आंदोलन उसे एक सुनहरा अवसर लगा। लेकिन राजनीति में बाजी उसी की होती है जो समय रहते चाल बदल ले।

यहीं नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीतिक चतुराई दिखाई।

सरकार ने टकराव को लंबा नहीं खींचा। प्रदर्शनकारियों की मुख्य माँगें मान लीं। मंत्री ने इस्तीफा दिया। बातचीत हुई। आंदोलन का तत्काल कारण समाप्त हो गया।

इसे कहते हैं "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"

सरकार ने एक मंत्री खोया, लेकिन बड़ा राजनीतिक संकट टाल दिया। विपक्ष के हाथ का सबसे तेज़ हथियार भी कुंद हो गया। संसद में शोर चलता रहा, लेकिन जनता का ध्यान दूसरी ओर मुड़ चुका था।

इसका मतलब यह नहीं कि समस्याएँ खत्म हो गई हैं। परीक्षा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत अब भी है। युवाओं की बेरोज़गारी और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल भी बने हुए हैं। छात्रों का भरोसा वापस जीतना आसान नहीं होगा।

लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी इस मुश्किल इम्तिहान से निकलने में कामयाब रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी ने साबित कर दिया कि आज का युवा केवल वोटर नहीं, एजेंडा तय करने वाली ताकत भी बन सकता है।

और विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है:

अगर कुछ छात्रों ने मीम और मोबाइल के दम पर वह कर दिखाया, जो अनुभवी नेता वर्षों में नहीं कर सके, तो असली आत्ममंथन किसे करना चाहिए: सरकार को या विपक्ष को?

Sunday, July 26, 2026

 इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत

नीट से निकला गुस्सा, लोकतंत्र का नया चेहरा

जब जेन ज़ी ने अपनी आवाज़ बुलंद की

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जुलाई, 2026

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जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।

लेकिन इस हंसी-मज़ाक और शोर-शराबे के पीछे एक साफ़ और मज़बूत पैगाम था: जवाबदेही चाहिए। हिंसा भी इस आंदोलन का जोश कम नहीं कर सकी। युवाओं के नए झुंड लगातार पहुंचते रहे। बेखौफ, पूरे हौसले के साथ। देखते ही देखते यह धरना लोकतंत्र के एक जीवंत उत्सव में बदल गया।

यह युवा आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक अहम पड़ाव बन गया। शुरुआत परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ गुस्से से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह एक बड़े संदेश में बदल गई; देश के युवाओं की आवाज़ को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

जिस जनदबाव के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा, प्रधानमंत्री से इंस्टाग्राम पर सीधे युवाओं से बात करने की मांग उठी, और नंदन नीलेकणी समेत विशेषज्ञों की नई टास्क फोर्स बनाने का फैसला हुआ, उसने एक बात साबित कर दी। शांतिपूर्ण, संगठित और स्पष्ट जनदबाव सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर कर सकता है।

इस आंदोलन ने सोशल मीडिया की असली ताकत भी दिखा दी। जो काम कभी बड़े मीडिया संस्थान तय करते थे, वह इस बार पूरी तरह इंटरनेट पर हुआ। कहानी वहीं बनी, वहीं फैली और वहीं से पूरे देश तक पहुंची। पारंपरिक मीडिया को इस बार युवाओं के पीछे-पीछे चलना पड़ा।

जेन ज़ी की अपनी अलग भाषा थी; बेबाक, अचानक, प्रतीकों से भरी और बिना किसी बनावट के। उसने राजनीतिक आंदोलनों के पुराने तौर-तरीकों को तोड़ दिया। उसकी सादगी और सच्चाई ने हर विचारधारा के लोगों का ध्यान खींचा।

यह आंदोलन दलगत राजनीति से ऊपर उठ गया। छोटा था, लेकिन रंगों और उम्मीदों से भरा हुआ। जैसे तपती गर्मी के बाद पहली बारिश राहत लेकर आती है, वैसे ही इसने पहली बार सड़कों पर उतरे युवाओं, डिजिटल दौर की पीढ़ी और आम छात्रों को एक मंच पर ला दिया। बिना किसी लिखी हुई स्क्रिप्ट के यह लोकतंत्र का ऐसा नज़ारा था, जिसने नई ऊर्जा और नई उम्मीद जगाई। इसने संकेत दिया कि देश में एक बड़े युवा जागरण की शुरुआत हो चुकी है।

सरकार ने समय रहते कुछ कदम उठाए, जिससे आंदोलन और नहीं भड़का। इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई फिर याद दिला दी; शांतिपूर्ण जनआंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं होते, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं। खासकर युवाओं की आवाज़ को अनसुना करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता।

राजनीति हमेशा एक सबक देती है; नेता जितनी ऊंचाई पर पहुंचता है, अहंकार आने पर उसका गिरना उतना ही दर्दनाक होता है। भारतीय पुराण ऐसी मिसालों से भरे पड़े हैं। सत्ता के नशे में चूर इंद्र को तब विनम्र होना पड़ा, जब बालक कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। अपनी विद्वता पर गर्व करने वाले नारद मुनि का अहंकार भी भगवान विष्णु ने तोड़ा। घमंड इंसान की सोच पर पर्दा डाल देता है, जबकि विनम्रता उसे सही रास्ता दिखाती है।

नीट विवाद नरेंद्र मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया । यह केवल एक परीक्षा का मामला नहीं रहा। यह भरोसे का ऐसा संकट बन गया, जिसने उन लाखों छात्रों और परिवारों को झकझोर दिया है, जो शिक्षा को अपनी तरक्की की सबसे मजबूत सीढ़ी मानते हैं।

कई वर्षों तक नरेंद्र मोदी ने एक आत्मविश्वासी और सक्षम "विश्वगुरु भारत" की छवि बनाई। लेकिन नीट विवाद ने उस तस्वीर में गहरी दरार डाल दी। पेपर लीक, गड़बड़ियों और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों ने एक राष्ट्रीय परीक्षा को सरकारी व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक बना दिया।

सबसे बड़ी भूल संकट का पैदा होना नहीं थी। असली गलती थी सरकार की धीमी और हिचकिचाती प्रतिक्रिया। सच्चा नेतृत्व वही होता है, जो गलती स्वीकार करे, निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों पर तुरंत कार्रवाई करे। लेकिन यहां जवाब बचाव वाला ज़्यादा था, समाधान वाला कम। हर बीतते दिन के साथ लोगों का शक बढ़ता गया कि सरकार हालात को संभाल नहीं रही, बल्कि घटनाओं के पीछे-पीछे चल रही है।

नेतृत्व का मतलब ज़िम्मेदारी लेने का साहस भी होता है। संसदीय लोकतंत्र में कई बार मंत्री अपने विभाग की बड़ी विफलताओं की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देते हैं, चाहे उनकी व्यक्तिगत गलती साबित न हुई हो। ऐसे कदम जनता का भरोसा मज़बूत करते हैं। लेकिन नीट मामले में जवाबदेही की मांग को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इससे यही संदेश गया कि सरकार के लिए अपनी सियासी ताकत बचाना, जनता का भरोसा लौटाने से ज़्यादा अहम है।

इस विवाद ने एक और गहरी कमजोरी उजागर की। जब किसी सरकार को लगातार भारी चुनावी जीत मिलने लगती है, तो अक्सर वह आलोचना सुनना कम कर देती है। लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है, जब सवाल पूछने वालों को दुश्मन नहीं, बल्कि चेतावनी देने वाला समझा जाए। आलोचना छोटी समस्याओं को बड़े राष्ट्रीय संकट बनने से रोकती है।

हमारी प्राचीन परंपरा भी यही सिखाती है। रामायण का वह धोबी, जिसकी कड़ी बात भी भगवान राम तक पहुंची, हमें याद दिलाता है कि शासक सबसे साधारण नागरिक की आवाज़ भी अनसुनी नहीं कर सकता। जनमत चाहे कितना भी कड़वा क्यों न लगे, वही समाज की असली नब्ज़ होता है।

आज की सरकारें संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के सहारे ही सही फैसले ले पाती हैं। यही उनकी आंखें और कान होते हैं। जब इन संस्थाओं पर भरोसा कम होने लगता है या उनकी बात सुनी नहीं जाती, तब सरकारें अपने ही बनाए दायरे में कैद हो जाती हैं। वहां सिर्फ वही आवाज़ सुनाई देती है, जो अच्छी लगे। असुविधाजनक सच बहुत देर से सामने आता है। नीट विवाद ने यही दिखाया। छात्र सड़कों पर थे, माता-पिता परेशान थे, अदालतें दखल दे रही थीं, लेकिन सरकारी बयान कानूनी दलीलों तक सीमित रहे। उनमें संवेदना और आत्ममंथन की कमी साफ़ दिखाई दी।

इतिहास भी ऐसी कई चेतावनियां देता है। 1975 की आपातकालीन अवधि सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण और जनता से बढ़ती दूरी का नतीजा थी। अंत में जनता ने उसी सत्ता को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। आज हालात अलग हैं, लेकिन सबक वही है। लोकतंत्र में अति-आत्मविश्वास, सत्ता का केंद्रीकरण और आलोचना की अनदेखी हमेशा भारी पड़ती है।

नीट का पूरा घटनाक्रम केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है। यह शासन व्यवस्था के लिए चेतावनी है। किसी भी संस्था की साख पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनती है। राजनीतिक ताकत की असली नींव अजेय होने का भ्रम नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होती है।

नरेंद्र मोदी के सामने अभी भी एक अवसर है। वह दिखा सकते हैं कि मजबूत नेतृत्व का मतलब कभी गलती न करना नहीं होता। मजबूत नेता वही होता है, जो अपनी भूल स्वीकार करे, दोषियों को सज़ा दे, संस्थाओं में सुधार लाए और आम नागरिक की आवाज़ सुने।

तालियां अहंकार को कुछ समय तक ज़रूर मिल जाती हैं, लेकिन जनता का भरोसा केवल विनम्रता, ईमानदारी और जवाबदेही से लौटता है। भारत की प्राचीन कथाओं से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक यही सबसे बड़ा सबक रहा है।


 गटर किसने खोलीं?

फिल्म बनेगी: कॉकरोचों का इंतकाम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जुलाई 2026

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दिल्ली में फिर वही मौसम लौट आया है। नहीं, यह बरसात का मौसम नहीं। संसद का भी नहीं। यह है सियासी केंचुल बदलने का मौसम।

नेता अपने उसूल साँप से भी तेज़ी से बदल रहे हैं। गठबंधन स्याही सूखने से पहले टूट रहे हैं। धरने-प्रदर्शन देखते ही देखते समेटे जा रहे हैं। कल की इंक़लाबी हुंकार आज प्रेस कॉन्फ़्रेंस बन जाती है। आज का गुस्सा कल इस्तीफे पर खत्म हो जाता है।

ताज़ा ब्लॉकबस्टर भी वक्त पर आ गई। एक इस्तीफा, कुछ नाटकीय ऐलान, सोशल मीडिया पर शानदार तमाशा, और देखते ही देखते कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने जीत का एलान कर दिया। बैनर समेटे गए, लाउडस्पीकर बंद हुए और सब घर लौट गए, जैसे इतिहास की दिशा ही बदल गई हो।

और हाँ... गाजर भी आई।

एक बार नहीं।

दो-दो बार।

जब नेताजी इंस्टाग्राम पर हाथ में गाजर लेकर देश से बातें करने लगें, तो समझ लीजिए कि भारतीय राजनीति अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी है, जिसकी कल्पना संविधान बनाने वालों ने भी नहीं की होगी।

अर्थशास्त्री संदेश ढूँढ़ते रहे। मनोवैज्ञानिक उसके मायने तलाशते रहे। किसान सोचने लगे कि क्या अब गाजर भी कोई नई विचारधारा बन गई है। उधर मीम बनाने वालों ने तो गाजर को सीधा कैबिनेट मंत्री घोषित कर दिया।

इस बीच डिचकॉक ने अगली फिल्म का ऐलान कर दिया है:

"कॉकरोच फिर लौटेंगे!"

वैज्ञानिक आज भी कॉकरोच पार्टी पर हैरान हैं। परमाणु बम शहर मिटा सकता है। बाढ़ पुल बहा सकती है। चुनाव सरकारें गिरा सकते हैं। लेकिन तिलचट्टे हर बार मुस्कुराते हुए वापस आ जाते हैं। हाथ में एक तरफ इस्तीफे की माँग, दूसरी तरफ भविष्य के गठबंधन का गुलदस्ता।

इतनी जबरदस्त अनुकूलन क्षमता तो शायद डार्विन ने भी नहीं सोची होगी।

सत्ता पक्ष उस स्कूल के हेडमास्टर जैसा है, जिसे लगता है कि सुबह का सूरज भी उसकी इजाज़त लेकर निकलता है। हर उपलब्धि दूरदर्शी नेतृत्व का कमाल है। हर आलोचना साज़िश है। और जो ज़्यादा सवाल पूछे, उसे विकास-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी या हालात खराब हुए तो गाजर-विरोधी भी घोषित किया जा सकता है।

फिर बारी आती है विपक्ष की।

चलते नहीं। दौड़ते भी नहीं। बस... कॉकरोचों की तरह सर्र से निकल लेते हैं।

सीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है: जिंदा रहना। इस हफ्ते दहाड़ेंगे। अगले हफ्ते बातचीत करेंगे। उसके अगले हफ्ते लोकतंत्र बचाने का श्रेय भी खुद ले लेंगे।

नई पीढ़ी ने CJP का नया मतलब निकाल लिया है। अब इसका अर्थ कॉकरोच जनता पार्टी नहीं। बल्कि सर्टिफाइड जंपर्स पार्टी है।

इसका चुनाव चिन्ह कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल या हाथी नहीं होना चाहिए। एक घूमता हुआ दरवाज़ा होना चाहिए।

सदस्य बनने के नियम भी आसान हैं। किसी विचारधारा की ज़रूरत नहीं। सिद्धांत हों तो अच्छा, न हों तो और भी अच्छा। बस एक छोटा बैग, तीन माइक, भरपूर नैतिक गुस्सा और ऐसी रीढ़ चाहिए जो बिना दर्द के 360 डिग्री घूम जाए।

सुना है पार्टी की ट्रेनिंग अकादमी में खास कोर्स भी चलते हैं।

"अगली सूचना तक धरना कैसे दें"

"यू-टर्न लेने की उन्नत कला"

और सबसे लोकप्रिय विषय:

"स्कोर चाहे कुछ भी हो, जीत का एलान कैसे करें।"

दीक्षांत समारोह में सबकी फोटो भी खिंचती है। मुश्किल सिर्फ इतनी होती है कि फोटो छपने तक आधे लोग दूसरी पार्टी में पहुँच चुके होते हैं।

आजकल प्रेस कॉन्फ़्रेंस किसी रियलिटी शो से कम नहीं।

पहला एपिसोड—लोकतंत्र खतरे में है।

दूसरा—लोकतंत्र बच गया।

तीसरा—सरकार हमारी वजह से झुकी।

चौथा—धरना समाप्त।

पाँचवाँ—जल्द मिलेंगे, नया आंदोलन लेकर।

OTT प्लेटफॉर्म के लेखक भी अब शिकायत करने लगे हैं कि राजनीति की पटकथा उनकी कल्पना से भी आगे निकल गई है।

राजनीतिक प्रवक्ता भाषा के सबसे बड़े जादूगर हैं। पीछे हटना रणनीतिक जीत बन जाता है। इस्तीफा नैतिक भूकंप कहलाता है। चुप्पी दूरदर्शिता बन जाती है। और उलझन को रणनीति बताया जाता है।

उधर असली कॉकरोचों ने भी नाराज़गी जता दी है।

राष्ट्रीय कॉकरोच प्रतिष्ठा महासंघ ने बयान जारी किया:

"हम इस तुलना का सख्त एतराज़ करते हैं। हम सिर्फ रसोई में घुसते हैं। नेता टीवी स्टूडियो, व्हाट्सऐप ग्रुप, संस्थाओं और कभी-कभी एक-दूसरे की पार्टियों में भी घुस जाते हैं।

शुक्र है, सोशल मीडिया अब देश की सबसे बड़ी व्यंग्य पत्रिका बन चुका है। एक सूटकेस घसीटते कॉकरोच का मीम चार घंटे की टीवी बहस से ज़्यादा सच्चाई दिखा देता है। एक गाजर वाला इमोजी पूरे हफ्ते की राजनीति समझा देता है।

लोकतंत्र कोई टैलेंट शो नहीं है, जहाँ हर ब्रेक के बाद कलाकार नई पोशाक पहनकर लौट आएँ। इसे ऐसे हुक्मरानों की ज़रूरत है जो जवाब दें, ऐसे विपक्ष की जो अपने पाँव पर डटा रहे, ऐसे पत्रकारों की जो मुश्किल सवाल पूछें और ऐसे नागरिकों की जो हर तालियों के इशारे पर ताली न बजाएँ।

वरना हर चुनाव सिर्फ कीटनाशक छिड़कने का नया कार्यक्रम बनकर रह जाएगा।

स्प्रे बड़े शोर-शराबे से छिड़का जाएगा।

और कॉकरोच हर बार मुस्कुराते हुए लौट आएँगे।

तो आख़िर नालियाँ किसने खोलीं?

लेकिन हर चुनाव, हर धरना, हर इस्तीफा और हर सियासी पुनर्जन्म के साथ वही जानी-पहचानी खड़खड़ाहट फिर सुनाई देती है।

रोशनी मंद पड़ती है।

कैमरे बंद हो जाते हैं।

दिल्ली की चमचमाती इमारतों के नीचे कहीं डिचकॉक मुस्कुराता है।

मैनहोल का ढक्कन धीरे-धीरे उठता है।

और एक खुशमिजाज़ आवाज़ फुसफुसाती है—

"फिक्र मत कीजिए... इंटरवल खत्म हो गया है!"

Friday, July 24, 2026

 हर पाँचवाँ भारतीय होगा बुजुर्ग: क्या भारत तैयार है इस नई चुनौती के लिए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 जुलाई 2026

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एक सुबह घर में अजीब-सी ख़ामोशी उतर आती है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ता है, यादें धुंधली पड़ने लगती हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन जाती है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहाँ हर पाँचवाँ नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग होगा।

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भारत अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसकी सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है। दुनिया लंबे समय तक भारत को "यंग इंडिया" के नाम से जानती रही, लेकिन आने वाले वर्षों में तस्वीर बदलने वाली है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2050 तक देश में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ हो जाएगी। यानी हर पांचवां भारतीय वरिष्ठ नागरिक होगा। आज यह संख्या लगभग 15 करोड़ है। यह केवल जनसंख्या का बदलाव नहीं, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और पारिवारिक व्यवस्था में आने वाले बड़े परिवर्तन का संकेत है।

लोग पहले से अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे स्वस्थ, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन भी जी पाएंगे? 

यही वह चुनौती है, जिसके समाधान की दिशा में हेल्पएज इंडिया ने नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट फॉर लॉन्गेविटी एंड एजिंग रिसर्च (ILAR) की स्थापना की है। 22 जुलाई 2026 को इसका उद्घाटन नीति आयोग के पूर्व सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. विनोद कुमार पॉल ने किया। उन्होंने कहा कि भारत को वृद्धावस्था के लिए अपना ऐसा मॉडल विकसित करना होगा, जिसमें भारतीय पारिवारिक मूल्यों, सामुदायिक सहयोग और आधुनिक विज्ञान का संतुलित समावेश हो।

भारत में औसत आयु लगातार बढ़ रही है, लेकिन स्वस्थ जीवन की अवधि अब भी सीमित है। बड़ी संख्या में बुजुर्ग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गठिया और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, संयुक्त परिवारों का टूटना, युवाओं का रोज़गार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन और बढ़ता अकेलापन बुजुर्गों के जीवन को और कठिन बना रहा है। महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। विधवा होने की अधिक संभावना और आर्थिक निर्भरता उन्हें अतिरिक्त असुरक्षा की ओर धकेल देती है।

हालांकि इस बदलती तस्वीर का एक सकारात्मक पक्ष भी है। तेजी से बढ़ती वरिष्ठ नागरिक आबादी "सिल्वर इकोनॉमी" के रूप में एक नया अवसर लेकर आ रही है। स्वास्थ्य सेवाएं, दवाइयां, सहायक तकनीक, वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनुकूल आवास, बीमा और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बड़ी संभावनाएं उभर रही हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ तभी मिलेगा, जब देश समय रहते अपनी नीतियों और व्यवस्थाओं को तैयार करेगा।

इसी सोच के साथ ILAR को केवल एक शोध संस्थान नहीं, बल्कि नीति निर्माण, अनुसंधान, नवाचार और व्यावहारिक समाधान का राष्ट्रीय मंच बनाया गया है। संस्थान के निदेशक प्रो. अनिल कुमार इंदिरा कृष्णन का कहना है कि लंबी उम्र का अर्थ केवल जीवन के वर्षों में वृद्धि नहीं, बल्कि उन वर्षों में स्वास्थ्य, सम्मान और खुशहाली जोड़ना है। उनका मानना है कि भविष्य की नीतियां तभी प्रभावी होंगी, जब उनके केंद्र में स्वयं बुजुर्गों के अनुभव और उनकी जरूरतें हों।

संस्थान स्वस्थ वृद्धावस्था, सिल्वर इकोनॉमी, वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार, उम्र-अनुकूल तकनीक और वृद्धावस्था से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों पर व्यापक शोध करेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, टेलीमेडिसिन और स्मार्ट उपकरणों के बेहतर उपयोग से लेकर अकेलेपन, देखभाल और सामुदायिक सहयोग जैसे विषय भी इसकी प्राथमिकताओं में शामिल होंगे। हर वर्ष "स्टेट ऑफ एजिंग इन इंडिया" रिपोर्ट प्रकाशित करने, सिल्वर टेक इनोवेशन लैब स्थापित करने, स्वास्थ्य वेधशाला विकसित करने और युवा शोधकर्ताओं के लिए फेलोशिप कार्यक्रम शुरू करने की भी योजना है।

हेल्पएज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोहित प्रसाद का मानना है कि आने वाले दो दशकों में वृद्धावस्था देश के सामने सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में होगी। उनका कहना है कि केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) संस्थाओं और नागरिक समाज को मिलकर काम करना होगा। साक्ष्य-आधारित नीतियों और पर्याप्त निवेश के बिना भविष्य की इस चुनौती का सामना करना कठिन होगा।

हेल्पएज इंडिया स्वयं इस क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। वर्ष 1978 से संस्था वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य, आजीविका, अधिकारों की रक्षा और आपदा राहत के क्षेत्र में लगातार काम कर रही है। पिछले लगभग पांच दशकों में उसे संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या पुरस्कार और भारत सरकार के वयोश्रेष्ठ सम्मान सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। ILAR उसी लंबे अनुभव और विशेषज्ञता का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है।

अब समय आ गया है कि भारत वृद्धावस्था को केवल सामाजिक बोझ के रूप में देखने की मानसिकता बदले। वरिष्ठ नागरिक अनुभव, ज्ञान और सामाजिक पूंजी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उनके लिए उम्र-अनुकूल शहर, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, सामुदायिक देखभाल केंद्र, मजबूत पेंशन व्यवस्था, व्यापक बीमा कवरेज, डिजिटल साक्षरता और ऐसी पीढ़ीगत पहलें विकसित करनी होंगी, जिनसे युवा और बुजुर्ग एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकें।

वर्ष 2050 का भारत आज लिए गए फैसलों पर निर्भर करेगा। यदि अभी दूरदर्शी नीतियां बनाई गईं और पर्याप्त निवेश किया गया, तो देश केवल अधिक आयु वाला समाज नहीं बनेगा, बल्कि ऐसा समाज बनेगा जहां बुजुर्ग स्वस्थ, सक्रिय, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। ILAR ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत कर दी है। अब जरूरत है कि सरकार, निजी क्षेत्र और समाज मिलकर इसे राष्ट्रीय जनआंदोलन का रूप दें, ताकि बढ़ती उम्र भारत के लिए चुनौती नहीं, बल्कि नई ताकत बन सके।


Thursday, July 23, 2026

 बृज मंडल की हरियाली कौन निगल रहा है?

फैंसी प्रोजेक्ट बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 जुलाई 2026

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ब्रज मंडल या ताज ट्रिपेजियम जोन, पर खतरा फिर मंडरा रहा है। इस बार हमला सिर्फ धुएँ या कारखानों से नहीं है। उसके सबसे पुराने पहरेदार, उसके पेड़, तेजी से गायब हो रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने टीटीज़ेड में 10,700 से अधिक पूर्ण विकसित पेड़ों की कटाई को मंजूरी दे दी है। इन पेड़ों की बलि सड़कों, एक्सप्रेसवे, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट विस्तार और दूसरे बड़े प्रोजेक्टों के लिए दी जाएगी। विकास ज़रूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास हरियाली की कीमत पर होगा? मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन में पिछले कुछ वर्षों में हजारों पेड़ कट चुके हैं।

टीटीज़ेड का गठन 1990 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता मामले के बाद हुआ था। करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र आगरा, मथुरा, वृंदावन और आसपास के जिलों को समेटता है। इसका उद्देश्य था ताजमहल को प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण से बचाना। आज वही सुरक्षा कवच धीरे-धीरे टूट रहा है।

हर साल हजारों पेड़ गायब हो रहे हैं। कहीं सड़क चौड़ी हो रही है, कहीं एक्सप्रेसवे बन रहा है। कहीं कॉलोनियाँ उग रही हैं, कहीं व्यावसायिक परिसर। शहर फैल रहे हैं, और हरियाली सिमट रही है। कंक्रीट का जंगल बढ़ रहा है, असली जंगल पीछे हट रहे हैं।

ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में 10,400 वर्ग किमी क्षेत्र में ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) बनाया। इसके बावजूद हरित क्षेत्र लगातार घट रहा है। 2017 में छह जिलों का वन क्षेत्र 664 वर्ग किमी था, जो 2019 में घटकर 657.71 वर्ग किमी रह गया। आगरा में भी 9.38 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हुआ। शहरीकरण, निर्माण, पेड़ों की कटाई, अतिक्रमण, प्रदूषण और जल संकट इसके प्रमुख कारण हैं। लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन रखरखाव की कमी से उनकी जीवित रहने की दर अपेक्षा से कम है। केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि पेड़ों का संरक्षण भी जरूरी है।

सरकारें कहती हैं कि एक पेड़ के बदले दस पौधे लगाए जाएंगे। कागज़ पर यह तर्क अच्छा लगता है। मगर प्रकृति फाइलों से नहीं चलती।

एक पुराना पेड़ बनने में कई दशक लगते हैं। वह कार्बन सोखता है, छाया देता है, हवा साफ करता है, पक्षियों को आश्रय देता है और शहर का तापमान कम करता है। एक छोटा पौधा वर्षों तक उसकी बराबरी नहीं कर सकता। ऊपर से लगाए गए अनेक पौधे देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं।

आगरा पहले ही खराब हवा से जूझ रहा है। धूल, वाहनों का धुआँ और लगातार निर्माण गतिविधियाँ प्रदूषण बढ़ा रही हैं। ऐसे में पेड़ों की कटाई शहर की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर देगी। गर्मी और बढ़ेगी, हवा और खराब होगी।

यमुना के बाढ़ क्षेत्र भी इससे प्रभावित होंगे। पेड़ मिट्टी को बचाते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं और जैव विविधता को सहारा देते हैं। उनके खत्म होने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ता है।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य का कहना है, "विकास का विरोध नहीं है। लेकिन हर परियोजना में पहले यह देखा जाना चाहिए कि कितने पुराने पेड़ों को बचाया जा सकता है। हजारों पेड़ काटना आख़िरी विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।"

वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ मुकुल पांड्या कहते हैं, "आगरा की हरियाली जितनी तेजी से खत्म हो रही है, उतनी तेजी से लौट नहीं रही। पेड़ सिर्फ सौंदर्य नहीं हैं, वे शहर के फेफड़े हैं।"

वृन्दावन के ग्रीन एक्टिविस्ट जगन नाथ पोद्दार कहते हैं, "सरकारें सड़कों और पुलों का उद्घाटन करती हैं, जंगलों का नहीं। पेड़ों को जीवनदाता नहीं, बाधा समझा जाने लगा है। यही सबसे बड़ी त्रासदी है।"

असल सवाल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं है। समझदारी भरे विकास का है। सड़कों का मार्ग बदला जा सकता है। एलिवेटेड कॉरिडोर बनाए जा सकते हैं। पेड़ों का वैज्ञानिक प्रत्यारोपण किया जा सकता है। लगाए गए पौधों की स्वतंत्र निगरानी होनी चाहिए और उनकी जीवित रहने की दर सार्वजनिक की जानी चाहिए।

टीटीज़ेड एक दूरदर्शी सोच का परिणाम था। उसे सिर्फ कागज़ी बाघ बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।

विडंबना देखिए। मोहब्बत की सबसे खूबसूरत निशानी ताजमहल अपने प्राकृतिक रखवालों को खो रहा है। एक सौ साल पुराने पेड़ को काटना आसान है, लेकिन उसे वापस लाने में कई पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

ताजमहल को सिर्फ चमकदार पत्थरों की नहीं, साफ हवा, बहती यमुना और जीवित जंगलों की ज़रूरत है। प्रकृति को कुर्बान करके मिलने वाला विकास दरअसल विकास नहीं, आने वाली पीढ़ियों पर थोपा गया कर्ज है।


Tuesday, July 21, 2026

 बढ़ती फीस, घटते स्तर

निजी स्कूलों की बढ़ती फीस:

क्या हमें अपनी जेब के हिसाब से तालीम मिल रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 जुलाई 2026

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साल 1964-65 में मेरे माता-पिता आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ 6 से 10 रुपये भरते थे। स्कूल की यूनिफॉर्म साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा कोई छिपा हुआ खर्च नहीं था।

आज आगरा के डीपीएस या प्रील्यूड पब्लिक स्कूल जैसे बड़े निजी स्कूल हर महीने 12,000 से 16,000 रुपये तक फीस लेते हैं। यानी साल भर में करीब 1.5 लाख से 4 लाख रुपये का खर्च। यह बढ़ोतरी 1,50,000 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इसी दौरान देश में महंगाई लगभग 100 से 120 गुना बढ़ी है।

सवाल यह है कि स्कूलों की फीस बाकी चीजों के मुकाबले इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ी? और क्या तालीम की गुणवत्ता भी उतनी ही बेहतर हुई है?

फीस बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं। शिक्षकों का वेतन बढ़ा है। स्कूलों की इमारतें आधुनिक हुई हैं। स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर, लैब और खेल सुविधाओं पर खर्च बढ़ा है। सरकार के नए नियमों का पालन करना पड़ता है। साथ ही मध्यम वर्ग के परिवार अपने बच्चों को "प्रीमियम" स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं।

आज भारत के लगभग आधे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़े स्कूल स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल मैदान, बस सेवा, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां और जेईई तथा नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराते हैं।

माता-पिता अब सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि बेहतर माहौल, अच्छे सहपाठियों, सामाजिक रुतबे और कॉलेज में दाखिले की उम्मीद के लिए भी पैसा खर्च कर रहे हैं। पिछले दस वर्षों में शहरों के निजी स्कूलों की फीस करीब 169 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि लोगों की आमदनी इतनी तेज़ नहीं बढ़ी।

यहीं से फिक्र शुरू होती है। इसमें कोई शक नहीं कि आज के स्कूल 1960 के दशक की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक हैं। भारतीय छात्र बोर्ड परीक्षाओं, जेईई और नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इसी वजह से भारत बड़ी संख्या में सक्षम इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करता है।

लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा PISA (Programme for International Student Assessment) की आती है, जो रटने के बजाय सोचने, समझने और वास्तविक जीवन में ज्ञान का इस्तेमाल करने की क्षमता को परखती है, तब भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है।

साल 2009 में, जब भारत ने इस परीक्षा में भाग लिया, तब उसकी रैंकिंग सबसे नीचे रहने वाले देशों में थी। वियतनाम, एस्टोनिया और फिनलैंड जैसे देश भारत से काफी आगे रहे। निजी स्कूलों के छात्र सरकारी स्कूलों से बेहतर थे, लेकिन दुनिया के मानकों तक नहीं पहुंच सके।

उसके बाद भारत ने पीसा में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन देश के अपने सर्वे भी यही तस्वीर दिखाते हैं। ASER (Annual Status of Education Report) और NAS (National Achievement Survey), जिसे अब PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण कहा जाता है, बताते हैं कि निजी स्कूलों के बहुत से बच्चे भी अपनी कक्षा के स्तर के अनुसार न ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही गणित कर पाते हैं।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारे स्कूल अब भी समझ विकसित करने के बजाय रटने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं।

एक सेवानिवृत्त शिक्षक का कहना है कि निजी स्कूलों की बेहतर छवि का एक और राज़ है। इनमें ज़्यादातर दाखिला उन परिवारों के बच्चों को मिलता है, जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले से बेहतर होती है। इसलिए अच्छे नतीजों का पूरा श्रेय केवल स्कूलों की पढ़ाई को नहीं दिया जा सकता।

माता-पिता भारी-भरकम फीस इस उम्मीद से भरते हैं कि बच्चों को बेहतरीन तालीम मिलेगी। लेकिन फीस जितनी तेज़ी से बढ़ी है, शिक्षा की गुणवत्ता उतनी नहीं बढ़ी। बड़ी कक्षाएं, शिक्षकों की असमान ट्रेनिंग और परीक्षा-केंद्रित पढ़ाई आज भी आम समस्या हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मकसद रटने की संस्कृति कम करना और बच्चों में सोचने-समझने, हुनर और व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ावा देना है। लेकिन ज़मीन पर इन बदलावों को लागू होने में अभी वक्त लगेगा।

फीस और शिक्षा की गुणवत्ता के बीच बढ़ता यह फ़ासला परिवारों की जेब पर भारी पड़ रहा है। इससे अच्छी शिक्षा सिर्फ़ अमीरों तक सीमित होने का ख़तरा भी बढ़ रहा है। सबसे बड़ी कमी यह है कि स्कूलों से यह साबित करने की कोई ठोस जवाबदेही नहीं मांगी जाती कि बढ़ी हुई फीस से बच्चों की सीखने की क्षमता भी वास्तव में बेहतर हुई है।

अगर 1965 का कोई छात्र आज के स्कूल देखे, तो वह शानदार इमारतों, स्मार्ट क्लासरूम और आधुनिक तकनीक से ज़रूर हैरान होगा। लेकिन शायद वह यह सवाल भी पूछे कि क्या असली तालीम भी उतनी ही आगे बढ़ी है, जितनी फीस बढ़ी है?

जब तक स्कूलों का हिसाब सिर्फ़ चमकदार इमारतों और सुविधाओं से नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के नतीजों से नहीं लिया जाएगा, तब तक माता-पिता शायद अच्छी शिक्षा से ज़्यादा उसकी चमक-दमक की कीमत चुकाते रहेंगे।

Monday, July 20, 2026

 फ्लैट संस्कृति की तरफ बढ़ रहे शहर

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उत्तर प्रदेश कब जागेगा?

फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 2 जुलाई, 2026

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घर हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है। लोग पूरी उम्र की कमाई, भविष्य निधि, बैंक कर्ज और अपनी तमाम बचत लगाकर एक फ्लैट खरीदते हैं। उम्मीद रहती है कि अब परिवार को सुरक्षित और सुकून भरी ज़िंदगी मिलेगी। 

मगर उत्तर प्रदेश के हजारों अपार्टमेंटों में यह सपना धीरे-धीरे एक दर्दनाक हकीकत में बदलता जा रहा है। फ्लैट मिलने के बाद भी लोग राहत नहीं, बल्कि रोज़ नई परेशानियों, झगड़ों और कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाते हैं।

भारत में फ्लैट या अपार्टमेंट मुख्य रूप से शहरी इलाकों की पहचान हैं और अभी भी देश के कुल आवासों में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। शहरी क्षेत्रों में लगभग 31 प्रतिशत परिवार फ्लैटों में रहते हैं, जबकि छोटे शहरों में यह आंकड़ा करीब 24 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर केवल 10–15 प्रतिशत परिवार ही अपार्टमेंट में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, स्वतंत्र मकानों में रहते हैं। तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन की कमी, छोटे परिवार और आधुनिक सुविधाओं की बढ़ती मांग फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 12 से 15 लाख नए शहरी फ्लैट बनते हैं, लेकिन देशभर में फ्लैटों की कुल संख्या का कोई एकीकृत और अद्यतन सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस बीच कर्नाटक सरकार ने एक ऐसी पहल की है, जिससे दूसरे राज्यों को भी सबक लेना चाहिए। कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026 का मसौदा तैयार किया गया है। इस कानून को बनाने से पहले राज्य की 500 से अधिक अपार्टमेंट एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों से विस्तार से राय ली गई। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने फ्लैट मालिकों ने साफ कहा कि उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा, पूरी पारदर्शिता और बिल्डरों की जवाबदेही चाहिए।

अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश ऐसा कानून कब बनाएगा?

आगरा, मथुरा, वृंदावन, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और तेजी से बढ़ते दूसरे शहरों में लाखों लोग बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं। लेकिन इन सोसाइटियों में रहने वाले परिवार अक्सर तीन तरफ़ा दबाव झेलते हैं। 

एक ओर बिल्डर हैं, जो फ्लैट बेचने के बाद अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेते हैं। दूसरी ओर कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी आरडब्ल्यूए हैं, जिनमें लोकतंत्र की जगह कुछ लोगों का कब्ज़ा बना रहता है। तीसरी ओर सरकारी एजेंसियां हैं, जो अक्सर तब तक सक्रिय नहीं होतीं, जब तक मामला अदालत या बड़े विरोध प्रदर्शन तक नहीं पहुंच जाता।

कई सोसाइटियों में वर्षों से निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं। वही लोग लगातार पदों पर बने रहते हैं। रखरखाव शुल्क हर साल बढ़ता जाता है, लेकिन खर्च का पूरा हिसाब निवासियों के सामने नहीं रखा जाता। ऑडिट या तो होता नहीं या फिर उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। आम निवासी यह तक नहीं जान पाते कि उनकी मेहनत की कमाई आखिर खर्च कहां हो रही है।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। कई बिल्डर आरडब्ल्यूए बनने के बाद भी साझा सुविधाओं, कॉमन एरिया, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं सौंपते। इसका नुकसान सीधे फ्लैट मालिकों को उठाना पड़ता है। वे सालों तक अनिश्चितता में जीते रहते हैं।

दूसरी तरफ निर्माण की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है। कहीं छत टपकती है, कहीं दीवारों में दरारें पड़ जाती हैं। खराब पाइपलाइन, बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग और दूसरी तकनीकी खामियां लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं। शिकायत करने पर बिल्डर अक्सर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।

रोजमर्रा की सुविधाओं का हाल भी कम खराब नहीं है। पानी की अनियमित आपूर्ति, बार-बार खराब होने वाली लिफ्ट, बंद पड़े सीसीटीवी कैमरे, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था, कूड़े के ढेर और अग्निशमन के अधूरे इंतजाम कई सोसाइटियों की पहचान बन चुके हैं। पूजा स्थल,  क्लब हाउस, जिम, स्विमिंग पूल, पार्क और बच्चों के खेल मैदान का सपना दिखाकर फ्लैट बेचे जाते हैं, वे कई बार सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाते हैं।

पार्किंग को लेकर भी विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। कई जगह विज़िटर पार्किंग तक बेच दी जाती है। साझा जगहों पर कब्ज़ा हो जाता है और आए दिन झगड़े होते रहते हैं। शिकायत करने वाले लोगों को भी कई बार मानसिक दबाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अलग-अलग कानूनों और नियमों के कारण अधिकार और जिम्मेदारियां साफ नहीं हैं। अदालतों में ऐसे हजारों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। आम परिवार समय और पैसा दोनों गंवाता है, जबकि बड़े बिल्डर कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाते रहते हैं।

ऐसे में उत्तर प्रदेश को भी कर्नाटक की तर्ज पर एक व्यापक और प्रभावी अपार्टमेंट स्वामित्व एवं प्रबंधन कानून बनाने की जरूरत है। हर सोसाइटी में समयबद्ध और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हों। आरडब्ल्यूए बनते ही बिल्डर सभी साझा संपत्तियां, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज तुरंत सौंपे। हर साल स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सभी निवासियों के लिए सार्वजनिक हो। बैठकों में ऑनलाइन भागीदारी की सुविधा भी हो, ताकि अधिक से अधिक लोग निर्णय प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को कानूनी सुरक्षा मिले। शिकायतों का निपटारा महीनों में हो, वर्षों में नहीं। साथ ही नियामक संस्थाओं को ऐसे अधिकार दिए जाएं कि वे नियम तोड़ने वाले बिल्डरों और मनमानी करने वाले आरडब्ल्यूए पर भारी जुर्माना लगा सकें और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकें।

भारत के शहर तेजी से अपार्टमेंट संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में करोड़ों परिवार बहुमंजिला इमारतों में रहेंगे। ऐसे में पुराने और बिखरे हुए कानून अब पर्याप्त नहीं हैं। समय की मांग है कि फ्लैट खरीदारों के अधिकारों को मजबूत कानूनी सुरक्षा मिले।

कर्नाटक ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है। अब उत्तर प्रदेश सरकार, रेरा, नगर निकायों, आवास विकास संस्थाओं और उपभोक्ता मंचों को भी मिलकर ठोस फैसला लेना होगा।

फ्लैट मालिक कोई एहसान नहीं मांग रहे। उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से घर खरीदा है। उन्हें सिर्फ वही हक चाहिए, जिसकी कीमत वे पहले ही चुका चुके हैं। आखिर घर सुकून की जगह होना चाहिए, अदालतों और विवादों का स्थायी मैदान नहीं। उत्तर प्रदेश जितनी जल्दी यह सच समझेगा, उतनी ही जल्दी लाखों परिवारों की जिंदगी आसान हो सकेगी।

Saturday, July 18, 2026

 


बिना मरीज के डॉक्टर!!!

शोध के कुली: नाम के आगे 'डॉ.' लगाने की दौड़ या ज्ञान की तलाश?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जुलाई, 2026

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आजकल भारत में पीएचडी की बड़ी धूम है। हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलरों) की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास पहुँच चुकी है। कागज़ पर यह तस्वीर बहुत शानदार दिखती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है।

पीएचडी का मक़सद नए विचार पैदा करना, देश की समस्याओं का हल ढूँढ़ना और समाज को आगे बढ़ाना था। अफ़सोस, कई जगह यह डिग्री सिर्फ़ नाम के आगे "डॉ." लगाने का ज़रिया बनकर रह गई है। ज्ञान की जगह दिखावा, गुणवत्ता की जगह संख्या और मौलिक सोच की जगह औपचारिकता ने ले ली है।

आज कई शोधार्थी खुद को शोधकर्ता नहीं, बल्कि "रिसर्च कुली" महसूस करते हैं। वे वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन सम्मान, मार्गदर्शन और सुरक्षा के बजाय उन्हें दबाव, अनिश्चितता और शोषण का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी बीमारी है "छापो या मिट जाओ" की संस्कृति। विश्वविद्यालयों और शिक्षकों के मूल्यांकन में शोध-पत्रों की संख्या को बहुत अहमियत दी जाती है। नतीजा यह हुआ कि अच्छी रिसर्च करने के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा शोध-पत्र छापने की होड़ मच गई।

इस होड़ ने एक पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है। पैसे देकर शोध-पत्र लिखवाना, नकली या घटिया पत्रिकाओं में उन्हें छपवाना और एक ही शोध को कई हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग प्रकाशित करना आम बात बन गई है। ऐसे कई शोध-पत्र बाद में वापस भी लेने पड़े। इससे भारतीय शोध की साख  पर सवाल उठे हैं।

दुख की बात यह है कि इन शोधों का बड़ा हिस्सा न उद्योग के काम आता है, न किसानों के, न अस्पतालों के और न समाज के। वे सिर्फ़ विश्वविद्यालय की अलमारी या ऑनलाइन भंडार में धूल खाते रहते हैं।

एक और बड़ी समस्या है शोध-निर्देशक और शोधार्थी के बीच असमान ताक़त का रिश्ता। कई जगह मार्गदर्शक (गाइड) छात्रों पर इतना नियंत्रण रखते हैं कि उनका भविष्य पूरी तरह उन्हीं के हाथ में होता है।

कई संस्थानों से शिकायतें सामने आई हैं कि शोधार्थियों से निजी काम कराए जाते हैं। किसी से गाड़ी चलवाई जाती है, किसी से घरेलू काम करवाए जाते हैं। कई बार सेक्सुअल हरासमेंट की खबरें भी आई हैं। कहीं थीसिस पास कराने के बदले महंगे तोहफ़ों या नक़द की माँग तक के आरोप लगे। जो छात्र विरोध करे, उसकी थीसिस महीनों या वर्षों तक अटक सकती है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य का कम और मालिक-मज़दूर का ज़्यादा लगता है।

देश के बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान भी इस बीमारी से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। लंबे कार्य घंटे, सप्ताह में सत्तर-अस्सी घंटे लैब में रहने का दबाव और लगातार प्रदर्शन साबित करने की मजबूरी ने अनेक शोधार्थियों को मानसिक तनाव की तरफ़ धकेला है।

पीएचडी का सफ़र वैसे ही आसान नहीं होता। कम छात्रवृत्ति, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलापन और लगातार दबाव कई छात्रों को चिंता और अवसाद की ओर ले जाता है। बहुत-से विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य की समुचित सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।

डिग्री पूरी होने के बाद भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। हर साल हज़ारों नए पीएचडी धारक नौकरी की तलाश में निकलते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों में स्थायी पद सीमित हैं और उद्योग जगत अभी भी शोधकर्ताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है।

नतीजा यह होता है कि अनेक पीएचडी धारक अतिथि शिक्षक, अस्थायी व्याख्याता या अपनी योग्यता से बिल्कुल अलग काम करने को मजबूर हो जाते हैं। वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अवसर नहीं मिलता जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।

भारत में पेटेंट की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से बहुत कम तकनीक बाज़ार तक पहुँच पाती है। कुछ आईआईटी, आईआईएससी और चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश विश्वविद्यालयों का शोध प्रयोगशाला से बाहर निकल ही नहीं पाता। उसका लाभ न उद्योग को मिलता है और न आम नागरिक को।

यही वजह है कि डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन नवाचार (इनोवेशन) उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा। शोध का उद्देश्य समस्या का समाधान होना चाहिए, केवल शोध-पत्रों की गिनती नहीं।

सरकार ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन (एएनआरएफ), उद्योग से जुड़े पीएचडी कार्यक्रम और बेहतर वित्तीय सहायता जैसी कई पहल शुरू की हैं। ये अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन पूरे तंत्र को बदलने के लिए अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है।

ज़रूरत इस बात की है कि शोध-निर्देशकों की जवाबदेही तय हो, छात्रों को सम्मानजनक माहौल मिले, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच मज़बूत साझेदारी बने। सबसे ज़रूरी यह है कि शोध का लक्ष्य देश की असली समस्याओं का हल निकालना हो।

भारत को केवल आँकड़ों में सबसे ज़्यादा पीएचडी नहीं चाहिए। देश को ऐसे शोध चाहिए जो खेतों की पैदावार बढ़ाएँ, अस्पतालों को बेहतर बनाएँ, कारखानों को नई तकनीक दें, रोज़गार पैदा करें और लोगों का जीवन आसान बनाएँ।

जब तक पीएचडी केवल प्रतिष्ठा (शोहरत) का तमगा बनी रहेगी, तब तक शोधार्थी ज्ञान के निर्माता नहीं, बल्कि व्यवस्था के "शोध के कुली" बने रहेंगे। डिग्री की असली कीमत उसके काग़ज़ में नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले बदलाव में होती है। वही बदलाव भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।