Wednesday, June 24, 2026

 


सेक्स का बुखार: क्या दुनिया अब बिस्तर के इर्द-गिर्द घूम रही है?

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मोबाइल स्क्रीन से बेडरूम तक, कारोबार से राजनीति तक... आखिर सेक्स है क्या: सुख, शक्ति, सनक या सभ्यता का सबसे बड़ा जुनून?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

26 जून 2026

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रात के दो बजे हैं।

दुनिया के तमाम शहर सो रहे हैं । सड़कें खाली हैं। लेकिन करोड़ों उंगलियां अब भी मोबाइल स्क्रीन पर फिसल रही हैं। कोई डेटिंग ऐप पर प्रेम खोज रहा है। कोई अश्लील सामग्री देख रहा है। कोई सोशल मीडिया पर अपनी खूबसूरती को "लाइक्स" में बदल रहा है। और कोई अकेलेपन, आकर्षण और इच्छाओं के बीच झूल रहा है।

तो क्या दुनिया को सचमुच सेक्स का बुखार चढ़ गया है?

आज सेक्स हर जगह दिखाई देता है। फिल्मों में, विज्ञापनों में, वेब सीरीज में, गीतों में, फैशन में और सोशल मीडिया में। देह एक उत्पाद बन गई है। आकर्षण एक पूंजी बन गया है। और इच्छा एक बाजार। किसी को सेक्सी बोलो तो खुशी होती है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या इंसान पहले से ज्यादा कामुक हो गया है, या फिर सेक्स केवल पहले से ज्यादा दिखाई देने लगा है?

सच शायद दोनों के बीच कहीं छिपा है।

सेक्स केवल शारीरिक संबंध नहीं है। यह जीवन की निरंतरता का आधार है। प्रकृति ने इसे प्रजनन के लिए बनाया था। लेकिन इंसान ने इसे प्रेम, आनंद, शक्ति, पहचान, कला, मनोरंजन और व्यापार से जोड़ दिया। आज सेक्स एक बहु-अरब डॉलर का वैश्विक उद्योग है। यह मनोरंजन का साधन भी है और कई लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा तथा व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रतीक भी।

लेकिन क्या यह हमेशा ऐसा ही था?

इतिहास बताता है कि सेक्स के प्रति मानव समाज का नजरिया समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन यूनान और रोम में प्रेम, सौंदर्य और कामुकता कला और साहित्य के महत्वपूर्ण विषय थे। मूर्तियों, चित्रों और कविताओं में इसका खुला चित्रण मिलता है। तब इसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता था।

फिर समय बदला।

यूरोप में ईसाई धार्मिक प्रभाव बढ़ने के साथ सेक्स को मुख्य रूप से विवाह और संतानोत्पत्ति तक सीमित करने की कोशिश हुई। मध्यकाल और बाद के विक्टोरियन युग में नैतिकता के नाम पर इच्छाओं पर नियंत्रण बढ़ा। विशेष रूप से महिलाओं की कामनाओं को संदेह और पाप की दृष्टि से देखा गया।

कुछ धर्मों, सभ्यताओं में सेक्स को पाप के रूप में देखा गया, लेकिन, भारत की कहानी कुछ अलग है।

करीब दो हजार वर्ष पहले रचित कामसूत्र आज भी दुनिया के सबसे चर्चित ग्रंथों में गिना जाता है। लेकिन यह केवल यौन मुद्राओं की किताब नहीं थी, जैसा कि आम धारणा बना दी गई है। इसके रचयिता वात्स्यायन ने इसे जीवन जीने की कला के रूप में प्रस्तुत किया था। इसमें प्रेम, आकर्षण, संवाद, सामाजिक व्यवहार, सौंदर्यबोध, विवाह और भावनात्मक संतुलन तक की चर्चा मिलती है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि कामसूत्र स्त्री की इच्छा और उसके सुख को भी महत्व देता है। उस दौर के अनेक समाजों की तुलना में यह दृष्टिकोण कहीं अधिक प्रगतिशील माना जा सकता है।

फिर ऐसा क्या हुआ कि आज दुनिया में सेक्स को लेकर इतनी खुली चर्चा दिखाई देती है?

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण 1960 के दशक की यौन क्रांति थी। गर्भनिरोधक गोलियों के व्यापक उपयोग ने पहली बार करोड़ों लोगों को गर्भधारण के भय से काफी हद तक मुक्त कर दिया। सेक्स और प्रजनन के बीच का पारंपरिक संबंध कमजोर पड़ने लगा।

यहीं से समाज में बड़ा बदलाव शुरू हुआ।

लोगों ने विवाह पूर्व संबंधों को अधिक स्वीकार करना शुरू किया। शादी की उम्र बढ़ी। शिक्षा और करियर प्राथमिकता बने। इंटरनेट ने सांस्कृतिक सीमाओं को ध्वस्त कर दिया। पोर्नोग्राफी, डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया ने यौन अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व दृश्यता प्रदान की।

आज का युवा उस दुनिया में बड़ा हो रहा है जहां सेक्स हर जगह मौजूद है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।

कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि कुछ देशों में किशोरों और युवाओं के बीच वास्तविक यौन गतिविधियों में कमी आई है। यौन रोगों, सहमति, व्यक्तिगत सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने व्यवहार को प्रभावित किया है। यानी सेक्स की चर्चा और दृश्यता बढ़ी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति पहले से अधिक यौन सक्रिय है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर का मानना है कि अत्यधिक व्यावसायीकरण ने सेक्स को एक उत्पाद में बदल दिया है। सोशल मीडिया की तुलना संस्कृति, अवास्तविक अपेक्षाएं और पोर्नोग्राफी की लत रिश्तों को कमजोर कर सकती है। कई युवा प्रदर्शन के दबाव, शरीर की छवि और आत्मविश्वास की कमी से भी जूझ रहे हैं।

दूसरी ओर, डॉ. विजयधूत का तर्क है कि खुलापन लोगों को शर्म और अपराधबोध से मुक्त करता है। सहमति, लैंगिक समानता और विविध यौन पहचानों को स्वीकार करना आधुनिक समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। उनके अनुसार चुप्पी से अधिक नुकसान होता है, जबकि स्वस्थ संवाद समझ पैदा करता है।

यहीं आधुनिक पश्चिमी सोच और भारतीय कामसूत्र दर्शन के बीच एक दिलचस्प अंतर दिखाई देता है।

समाजशास्त्री टी.पी. श्रीवास्तव के अनुसार आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत संतुष्टि पर जोर देता है। व्यक्ति की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है। इसके विपरीत कामसूत्र आनंद को जीवन के व्यापक संतुलन का हिस्सा मानता है। वहां सुख है, लेकिन जिम्मेदारी भी है। आकर्षण है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव भी है। इच्छा है, लेकिन उसके साथ संयम और संतुलन भी है।

शायद यही कारण है कि अनेक विद्वान मानते हैं कि भारत की प्राचीन सोच आज भी प्रासंगिक हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता विद्या जी कहती हैं कि इंसान की जैविक प्रकृति हजारों वर्षों में बहुत नहीं बदली है। बदला है उसका परिवेश। तकनीक ने इच्छाओं तक पहुंच आसान कर दी है। गर्भनिरोधकों ने पुराने भय कम कर दिए हैं। इंटरनेट ने कल्पनाओं को वैश्विक बना दिया है।

लेकिन एक सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सदियों पहले था।

क्या सेक्स केवल मनोरंजन है, या उससे कहीं अधिक?

इतिहास, संस्कृति और मानवीय अनुभव बताते हैं कि यह केवल शरीर का मामला नहीं है। इसमें भावनाएं हैं। रिश्ते हैं। जिम्मेदारियां हैं। संवेदनाएं हैं। जीवन की निरंतरता है। कुछ दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराएं तो इसे आत्मिक ऊर्जा का स्रोत भी मानती हैं।

अब तो जमाना प्राकृतिक सेक्स से काफी आगे निकल चुका है, एनिमल सेक्स से लेकर, LGBTQ और न जाने क्या क्या तक!!

शायद आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वतंत्रता और संतुलन के बीच रास्ता खोजे। आनंद और जिम्मेदारी के बीच पुल बनाए। बाजार और मानवीय संवेदना के बीच सामंजस्य स्थापित करे।

क्योंकि सेक्स जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब वह केवल उपभोग की वस्तु बन जाता है, तो उसकी मानवीय गहराई कहीं खोने लगती है।

और शायद यही बहस आने वाले वर्षों में और तेज होने वाली है।

आखिर सवाल सेक्स का नहीं है।

सवाल यह है कि हम इंसान होने का अर्थ किस तरह समझते हैं।


 काफी हुआ है, बहुत बाकी है!

चमकते एक्सप्रेसवे, जर्जर इंसाफ़: क्या सिर्फ़ सड़कें बन जाने से देश विकसित हो जाता है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 जून 2026

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एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। ओडिशा में दलितों को अपमानित कर सिर मुंडवाने, घुटनों के बल चलने और गंदा पानी पीने पर मजबूर किया जाता है। झारखंड में अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को डायन बताकर मार दिया जाता है, जिनमें अक्सर जमीन हड़पने की साज़िशें छिपी होती हैं। उत्तर प्रदेश में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले युवाओं को ऑनर किलिंग का शिकार होना पड़ता है। दहेज के दानव ने आज भी घरों को नहीं छोड़ा है और लगभग हर दिन दर्जनों महिलाएं इसकी भेंट चढ़ जाती हैं।

औपनिवेशिक दौर की लालफीताशाही अब भी आम नागरिक का रास्ता रोकती है। राजनीति और कारोबार में परिवारवाद तथा जातिगत नेटवर्क सत्ता और अवसरों पर अपना शिकंजा बनाए हुए हैं। कानून बदल गए, इमारतें बदल गईं, तकनीक बदल गई, लेकिन मानसिकता बदलने की रफ़्तार बेहद धीमी रही।

यही भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास है। देश का हार्डवेयर इक्कीसवीं सदी में पहुंच चुका है, लेकिन उसका सामाजिक और प्रशासनिक सॉफ्टवेयर अब भी कई जगह उन्नीसवीं सदी के कोड पर चल रहा है। यही वह खाई है जो चमकते विकास और वास्तविक प्रगति के बीच मौजूद है।

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क्या विकास का मतलब सिर्फ़ चौड़ी सड़कें हैं?

क्या हवाई अड्डों की चमक किसी नागरिक को इंसाफ़ दिला सकती है?

क्या बुलेट ट्रेन की रफ़्तार उस मुकदमे को तेज़ कर सकती है जो बीस साल से अदालत में धूल खा रहा है?

और सबसे बड़ा सवाल। अगर थाना आज भी सत्ता के इशारे पर काम करे, अदालत में तारीख़ पर तारीख़ मिलती रहे और भ्रष्टाचार नए कपड़े पहनकर सामने खड़ा रहे, तो क्या हम सचमुच विकसित भारत की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

पिछले बारह वर्षों में भारत का चेहरा बदला है। यह बात स्वीकार करनी होगी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की तथाकथित "डबल इंजन" सरकारों ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में अभूतपूर्व गति दिखाई है।

2014 में राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई लगभग 91 हजार किलोमीटर थी। आज यह डेढ़ लाख किलोमीटर के करीब पहुंच चुकी है। हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वंदे भारत ट्रेनें देश के कई हिस्सों को जोड़ रही हैं। यूपीआई ने भुगतान की दुनिया बदल दी है। करोड़ों लोगों तक सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे पहुंच रहा है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं। गांवों तक नल का पानी पहुंचा है। लाखों घर बने हैं।

यह उपलब्धियां वास्तविक हैं। इन्हें नकारना नाइंसाफी होगी।

लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा कहीं अधिक अहम है।

देश का हार्डवेयर बदल गया है, मगर सॉफ्टवेयर आज भी पुराना है।

नई सड़कें बन गईं, लेकिन पुरानी व्यवस्था जस की तस खड़ी है। कंक्रीट और इस्पात का ढांचा आधुनिक हो गया, मगर पुलिस, अदालतें, प्रशासनिक संस्कृति और जवाबदेही की व्यवस्था अब भी औपनिवेशिक दौर की परछाइयों में जी रही है।

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों के लिए ऐतिहासिक निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त किया जाए, अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल मिले, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बने और जांच तथा कानून-व्यवस्था के काम अलग-अलग हों।

बीस साल बीत गए।

आज तक कोई भी राज्य इन निर्देशों को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया।

कई राज्यों में पुलिस अब भी 1861 के उस कानून की मानसिकता के तहत काम कर रही है जिसे अंग्रेजों ने जनता की सेवा नहीं, बल्कि जनता को नियंत्रित करने के लिए बनाया था।

कानून बदलना आसान है। व्यवस्था बदलना मुश्किल।

भारतीय न्याय संहिता और अन्य नए आपराधिक कानूनों ने पुराने आईपीसी और सीआरपीसी की जगह ले ली है। इनमें कई सकारात्मक बदलाव भी हैं। अपराध स्थल की वीडियोग्राफी, पीड़ितों के अधिकार और समयबद्ध प्रक्रियाओं जैसे प्रावधान स्वागत योग्य हैं।

लेकिन सवाल फिर वही है।

अगर कानून लागू करने वाला तंत्र पुराना ही रहे तो नया कानून कितना नया साबित होगा?

न्यायपालिका की हालत भी कम चिंताजनक नहीं है।

देश की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में ही नब्बे हजार से ज्यादा मामले प्रतीक्षा में हैं। अनेक हाईकोर्ट  न्यायाधीश_कमी के साथ काम कर रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई बार आधे से अधिक पद खाली रहे हैं।

नतीजा यह है कि एक सामान्य नागरिक को संपत्ति विवाद जैसे मामलों में न्याय पाने के लिए दो दशक तक इंतजार करना पड़ सकता है।

सोचिए।

जिस देश में एक्सप्रेसवे दो साल में बन जाते हैं, वहां न्याय मिलने में बीस साल क्यों लगते हैं?

कमी संसाधनों की नहीं दिखती। कमी प्राथमिकता की दिखती है।

भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भी तस्वीर मिली-जुली है।

डिजिटल व्यवस्था ने छोटे स्तर की रिश्वतखोरी में कमी जरूर की है। सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे खातों में पहुंचने लगा है। बिचौलियों की भूमिका घटी है।

फिर भी अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर सवाल बने हुए हैं। मुखबिरों की सुरक्षा कमजोर है। बड़े भ्रष्टाचार मामलों में सजा की दर बेहद कम है।

उधर वीआईपी संस्कृति अब भी जीवित है।

काफिले दौड़ते हैं। सड़कें खाली कराई जाती हैं। प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग दिखाई देते हैं। आम आदमी और खास आदमी के बीच की खाई अब भी पूरी तरह नहीं पटी।

जाति और लिंग आधारित भेदभाव भी कानून की किताबों से भले हट गए हों, लेकिन व्यवहारिक जीवन में उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है।

राजनीति में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी भाषण खूब सुनाई देते हैं, लेकिन चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

यहीं सबसे बड़ा खतरा छिपा है।

जब हार्डवेयर तेज़ी से आगे बढ़े और सॉफ्टवेयर पीछे छूट जाए, तो विकास का भ्रम पैदा होता है।

उपग्रह से देखने पर शहर चमक सकते हैं। रात में रोशन एक्सप्रेसवे किसी विदेशी पर्यटक को प्रभावित कर सकते हैं। कांच के टर्मिनल और आधुनिक रेलवे स्टेशन तस्वीरों में शानदार लग सकते हैं।

लेकिन किसी राष्ट्र की असली परीक्षा उसकी सड़कों पर नहीं, उसके थानों और अदालतों में होती है।

एक ऐसा देश जहां नागरिक को निष्पक्ष पुलिस न मिले, समय पर न्याय न मिले और सत्ता को जवाबदेह ठहराने वाली संस्थाएं कमजोर हों, वह केवल दिखने में विकसित हो सकता है, वास्तव में नहीं।

2047 के विकसित भारत का सपना केवल बुलेट ट्रेनों, एयरपोर्टों और एक्सप्रेसवे से पूरा नहीं होगा।

विकसित भारत तब बनेगा जब नागरिक को यह भरोसा होगा कि कानून सबके लिए बराबर है, पुलिस सत्ता की नहीं संविधान की सेवक है, और अदालत में इंसाफ़ उसकी उम्र से लंबा नहीं चलेगा।

सड़कें देश को जोड़ती हैं। लेकिन न्याय, जवाबदेही और समानता ही राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। यही वह बुनियाद है, जिसके बिना विकास की सबसे चमकदार इमारत भी खोखली साबित हो सकती है।

Monday, June 22, 2026

 बीस लाख सपने, सवा लाख सीटें: भारत को और मेडिकल कॉलेज चाहिए या नई परीक्षा व्यवस्था ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 जून 2026

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हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। बेटा या बेटी डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है।

इस वर्ष नीट-यूजी परीक्षा में 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। दूसरी ओर, देश में एमबीबीएस की कुल सीटें लगभग 1.29 लाख हैं। देशभर के 823 मेडिकल कॉलेजों में 1,29,602 सीटें उपलब्ध हैं। यानी एक सीट के लिए औसतन 16 से अधिक अभ्यर्थियों के बीच मुकाबला है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटों के लिए यह प्रतिस्पर्धा और भी भयावह है।

140 करोड़ की आबादी वाले देश का स्वास्थ्य भविष्य इतनी सीमित सीटों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। कुछ साल पहले जहां एमबीबीएस सीटों की संख्या करीब 1.09 लाख थी, वह बढ़कर लगभग 1.30 लाख तक पहुंच गई है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं और कई संस्थानों में सीटें बढ़ाई गई हैं। लेकिन मांग की रफ्तार आपूर्ति से कहीं तेज है।

डॉक्टर बनने का सपना अब केवल महानगरों या संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के छात्र दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कई युवा कोचिंग संस्थानों में वर्षों बिताते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। फिर भी सरकारी सीटें इतनी कम हैं कि मेहनत और प्रतिभा के बावजूद हजारों योग्य छात्र पीछे छूट जाते हैं।

आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) ने अनजाने में एक विशाल कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है, जो छात्रों की आशंकाओं और सपनों से मुनाफा कमाता है। उनका तर्क है कि यह परीक्षा अब प्रतिभा, संवेदनशीलता और वास्तविक समझ से अधिक महंगी कोचिंग, परीक्षा तकनीकों और रटंत शिक्षा को बढ़ावा देती है। इससे ग्रामीण, गरीब और सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए अवसर असमान हो जाते हैं। कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या, ऊंची फीस और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं ने इस धारणा को मजबूत किया है कि शिक्षा के इर्द-गिर्द एक शक्तिशाली व्यावसायिक तंत्र विकसित हो चुका है। हालांकि, नीट को “माफियाओं की साजिश” कहना एक राय है, स्थापित तथ्य नहीं, क्योंकि इसके समर्थन में संगठित आपराधिक गठजोड़ का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

जब सफलता केवल योग्यता से नहीं, बल्कि फीस भरने की क्षमता से तय होने लगे, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

देश की कुल एमबीबीएस सीटों में लगभग 63 हजार सीटें सरकारी संस्थानों में हैं। शेष सीटें निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में हैं, जहां फीस लाखों रुपये सालाना से लेकर पूरे पाठ्यक्रम के लिए करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है।

ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए डॉक्टर बनने का सपना अक्सर अधूरा रह जाता है।

यह केवल छात्रों की समस्या नहीं है। यह देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है।

आज भी भारत के अनेक ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र विशेषज्ञों के बिना चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर और मरीज के अनुपात में सुधार की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।

मेडिकल शिक्षा का विस्तार केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।

समाधान मानकों को कम करना नहीं, अवसरों को बढ़ाना है। साल में दो बार अगर नीट परीक्षा अगर आयोजित हो जाए, तो कोई आफत नहीं आ जाएगी।

हर जिले में एक सुसज्जित मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़ा शिक्षण अस्पताल होना चाहिए। जिला अस्पतालों को चरणबद्ध तरीके से मेडिकल कॉलेजों में बदला जाए। शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए बेहतर वेतन, पारदर्शी भर्ती और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

सड़कें, हवाई अड्डे और औद्योगिक गलियारे जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण स्वास्थ्य ढांचा भी है। डॉक्टर किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की विशेष जरूरत है।

साथ ही, निजी मेडिकल शिक्षा की फीस पर प्रभावी नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का सपना केवल आर्थिक मजबूरी के कारण नहीं टूटना चाहिए।

नीट में शामिल होने वाले 20 लाख से अधिक छात्र केवल आंकड़े नहीं हैं। वे देश की ऊर्जा हैं, उसकी आकांक्षाएं हैं और भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं।

डॉक्टर बनने का अवसर कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, हर योग्य छात्र का अधिकार होना चाहिए।

Sunday, June 21, 2026

 सियासत के कीचड़ में बेटियाँ क्यों?

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राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है।

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बेटी तो बेटी होती है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 जून 2026

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सूरज ढल चुका था, लेकिन लखनऊ की एक पुरानी हवेली में रोशनी अभी भी जल रही थी। अखबारों के बिखरे पन्नों और टीवी चैनलों के शोर के बीच 22 वर्षीय प्रिया अपनी किताबों में डूबी थी। तभी फोन की घंटी बजी। दोस्त का संदेश था, “प्रिया, तुम ठीक हो? सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है?”

स्क्रीन खुलते ही उसकी दुनिया बदल गई।

कहीं चोरी की अफवाह, कहीं गुमशुदगी की मनगढ़ंत कहानी, कहीं फोटोशॉप की गई तस्वीरें। एक ट्रोल ने लिखा, “नेता की बेटी का असली चेहरा सामने आ गया।” देखते ही देखते लाइक्स, कमेंट्स और शेयरों की बाढ़ आ गई। कुछ लोग इसे मजाक समझ रहे थे, कुछ इसे राजनीतिक हथियार बना रहे थे।

घर में सन्नाटा था। माँ की आँखों में आँसू थे। पिता की खामोशी में गुस्सा और बेबसी।

राजनीति हमेशा ऐसी नहीं थी। मतभेद होते थे, तीखी बहसें भी होती थीं, लेकिन परिवारों को निशाना बनाने की परंपरा नहीं थी। विरोधियों पर वैचारिक हमले होते थे, निजी जीवन पर नहीं। आज बहस का मंच कीचड़ उछालने का अखाड़ा बनता जा रहा है। मुद्दे गायब हैं, मर्यादा लापता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कभी किसी नेता की बेटी को फर्जी वीडियो से बदनाम किया जाता है, कभी किसी की पत्नी या माँ को अभद्र टिप्पणियों का शिकार बनाया जाता है। चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया तक, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब निजी हमलों में बदलती जा रही है।

तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश, कोई प्रदेश इससे अछूता नहीं है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और खतरनाक बना दिया है। एक झूठी पोस्ट मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। किसी को सनसनी चाहिए, किसी को लाइक्स चाहिए, तो किसी को अपने विरोधी को नीचा दिखाने का अवसर।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में कहा, “बेटी तो बेटी होती है।” यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति और तहजीब की याद दिलाने वाला संदेश है। बेटियों का सम्मान किसी दल, धर्म, जाति या विचारधारा का विषय नहीं हो सकता।

इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी एक स्वर में इसकी निंदा की। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन समस्या केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। जब तक राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संयम और जवाबदेही का पाठ नहीं पढ़ाएँगे, तब तक ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं।

जरा उस लड़की की कल्पना कीजिए, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। वह स्कूल जाती है, सपने देखती है, दोस्तों के साथ हँसती है। अचानक पिता की राजनीतिक पहचान उसकी अपनी पहचान पर भारी पड़ जाती है। उसकी तस्वीरें वायरल होने लगती हैं। संदर्भ बदल दिए जाते हैं। स्कूल में सवाल उठते हैं, मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो जाती है। परिवार की नींद उड़ जाती है।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार की आलोचना होनी चाहिए, विपक्ष से सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन जब बहस परिवारों तक पहुँच जाती है, तब असली मुद्दे दम तोड़ देते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और किसानों की समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। चर्चा अफवाहों और अपमान तक सिमट जाती है।

हमें ठहरकर सोचना होगा।

हर सनसनीखेज पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई परखें। राजनीतिक कार्यकर्ता हों, इन्फ्लुएंसर हों या आम नागरिक, सभी को संयम दिखाना होगा। झूठ फैलाने वाला दोषी है, लेकिन बिना जाँच उसे आगे बढ़ाने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है।

सत्ता बदलती रहती है। नेता आते-जाते रहते हैं। लेकिन समाज की शालीनता एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

बेटी तो बेटी होती है। यह कोई नारा नहीं, हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि जब सियासत बेटियों को निशाना बनाती है, तब हार किसी एक दल की नहीं होती, पूरे समाज की होती है। और इस हार की भरपाई कोई चुनावी जीत नहीं कर सकती।

Saturday, June 20, 2026

 सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाया, अब परीक्षा आगरा की है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 जून 2026

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आगरा में सुबह की सैर अब सैर नहीं, संघर्ष बन गई है। स्कूल जाते बच्चे तेज़ बाइकों से बचते हुए सड़क पार करते हैं, बुज़ुर्ग फुटपाथ न होने पर जान जोखिम में डालकर चलते हैं, और ताज देखने आए पर्यटक पार्क की गाड़ियों, आवारा पशुओं, ठेलों और खुले नालों के बीच रास्ता तलाशते हैं। प्रेम के इस शहर में पैदल चलना आज एक साहसिक एडवेंचर,  काम बन गया है।

यह तस्वीर अब बदल सकती है। 19 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सुरक्षित, सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है ,  संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) और 21 के तहत। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़क पर पहला हक मोटर वाहनों का नहीं, पैदल यात्री का है। पीठ ने दिव्यांगजनों के लिए सुगम सुविधाओं और एक अलग राष्ट्रीय पैदल-सुरक्षा कानून की सिफारिश की, और कहा कि उल्लंघन की स्थिति में नागरिक मोटर वाहन अधिनियम से स्वतंत्र मुआवज़े और कानूनी राहत के हकदार होंगे।

यह फैसला अचानक नहीं आया। ठीक एक साल पहले, मई 2025 में, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ केंद्र को फुटपाथ-दिशा-निर्देश और एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड बनाने का आदेश दे चुकी थी। मौजूदा फैसला उसी सिलसिले की अगली कड़ी है : अदालत ने मामले को अनुच्छेद 32 की याचिका के रूप में फिर दर्ज किया, केंद्र को पक्ष बनाया, और 1985 के ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन फैसले का हवाला देकर कहा कि फुटपाथ तक सुरक्षित पहुँच गरिमा से जीने के अधिकार का हिस्सा है।

आगरा के लिए यह चेतावनी है

यह शहर दशकों से वाहनों के हिसाब से बढ़ा, इंसानों के हिसाब से नहीं। सड़कें चौड़ी हुईं, फ्लाईओवर बने, पार्किंग बढ़ी ;  पर फुटपाथ या तो बने ही नहीं, या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। एम.जी. रोड, फतेहाबाद रोड, सिकंदरा, शाहगंज और यमुना किनारा मार्ग पर एक ही कहानी दिखती है: दुकानों ने फुटपाथ निगल लिए हैं, वाहन उन पर खड़े हैं, बिजली के खंभे और टूटे स्लैब राह रोकते हैं, खुले मैनहोल जान जोखिम में डालते हैं। इसकी सबसे बड़ी कीमत वही चुकाते हैं जिनके पास निजी वाहन नहीं ;  बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग, दिव्यांगजन।

विरोधाभास भी चुभता है: हर साल लाखों पर्यटक ताज देखने आते हैं, पर शहर की सड़कों पर वे खुद को असुरक्षित पाते हैं। यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं । इसका असर सड़क सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी पड़ता है, क्योंकि पैदल चलना हतोत्साहित होने पर ट्रैफिक और प्रदूषण बढ़ते हैं।

मांगें जो अब संवैधानिक ताकत पा गई हैं

शहर के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से इस संकट को उठाते रहे हैं ;  लेखों, अभियानों और रिपोर्टों के ज़रिए फुटपाथों की कमी, तेज़ रफ्तार वाहनों, आवारा पशुओं और अव्यवस्थित यातायात के खतरे सामने लाते रहे हैं। उनकी मांग रही है: यमुना किनारा मार्ग समेत हर इलाके से अतिक्रमण हटाया जाए, भारतीय सड़क कांग्रेस के मानकों के अनुरूप फुटपाथ और साइकिल ट्रैक बनें, और अवैध पार्किंग पर सख्ती हो। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब इन्हीं मांगों को कानूनी आधार देता है।

अब परीक्षा प्रशासन की है

देश की सर्वोच्च अदालत का संदेश साफ है: सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं हैं, उन पर पहला हक पैदल चलने वालों का है। अब आगरा विकास प्राधिकरण, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और ट्रैफिक पुलिस की बारी है ,  हर नई सड़क परियोजना में सुरक्षित फुटपाथ, सुगम क्रॉसिंग, साइकिल ट्रैक और दिव्यांगजन-अनुकूल सुविधाएँ अनिवार्य करनी होंगी, पुराने मार्गों का पुनर्विकास करना होगा, और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लगातार चलानी होगी।

जो शहर अपने पैदल यात्रियों की रक्षा नहीं कर सकता, वह खुद को स्मार्ट या विश्वस्तरीय नहीं कह सकता। आगरा ने दशकों मशीनों के लिए सड़कें बनाई हैं। अब समय इंसानों के लिए रास्ते बनाने का है ,  क्योंकि हर नागरिक और हर पर्यटक को बिना डर के चलने का अधिकार है।

असली सवाल यह है कि यह अदालती आदेश कागज़ों तक सीमित तो नहीं रह जाएगा। जवाबदेही अब केवल नैतिक नहीं, क़ानूनी भी है। आगरा के नागरिक संगठनों, मीडिया और स्थानीय निकायों को इस मौके का इस्तेमाल प्राधिकरणों से स्पष्ट समय-सीमा और जवाबदेही माँगने के लिए करना चाहिए, ताकि यह ऐतिहासिक फैसला सिर्फ एक और रिपोर्ट बनकर फाइलों में दफ़न न हो जाए।

Thursday, June 18, 2026

 युद्ध तो खत्म, लेकिन पर्यावरण और मानसूनी बारिश गड़बड़ाने का हिसाब कौन चुकाएगा?

जब बम बरसते हैं, तब जलवायु लहूलुहान होती है: युद्ध को पर्यावरण पर हमला माना जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जून 2026

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उनके लिए युद्ध एक खेल था। वो आए, धमाकेदार आतिशबाजी की, बम, मिसाइल, ड्रोन खूब चले, हजारों मरे, रिहाइशें तबाह हुईं, हवा जहरीली हुई, तापमान बढ़ा, समुद्र खौला, जंगल नष्ट हुए। वो तो गए। मानसून की चाल बिगड़ गई। अब भुगतो।

मानसून भारत की धड़कन है। यही हमारे खेतों को सींचता है, नदियों को भरता है, भूजल को पुनर्जीवित करता है और करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी का आधार बनता है। लेकिन अब यह धड़कन कुछ बेताल-सी लगने लगी है।

मार्च 2026 में उत्तर भारत ने सामान्य से अधिक पश्चिमी विक्षोभ झेले। आमतौर पर मार्च में पाँच से छह पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, लेकिन इस बार उनकी संख्या लगभग आठ रही। बेमौसम बारिश हुई। ओलों ने फसलों को पीटा। तापमान ऊपर-नीचे होता रहा। गर्मी की दस्तक बार-बार टलती रही।

अप्रैल, मई और जून के शुरुआती दिनों में भी यह सिलसिला जारी रहा।

मौसम वैज्ञानिक सावधानी बरतते हुए कहते हैं कि किसी एक मौसमीय घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन वे इस बात पर सहमत हैं कि मानव गतिविधियाँ वायुमंडल के संतुलन को बदल रही हैं। सदियों से चले आ रहे मौसम चक्र अस्थिर हो रहे हैं। चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ रही हैं।

सवाल सीधा है। प्रकृति आखिर कितना बोझ और झेले?

दशकों से पर्यावरणविद् जीवाश्म ईंधन, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण के खतरों की चेतावनी देते रहे हैं। लेकिन एक बड़ा प्रदूषक अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रहता है: युद्ध।

हर मिसाइल, हर लड़ाकू विमान, हर टैंक और हर ध्वस्त शहर अपने पीछे एक विशाल कार्बन पदचिह्न छोड़ता है। सैन्य अभियान बेहिसाब ईंधन निगलते हैं। विस्फोट जहरीले रसायन छोड़ते हैं। जलती इमारतें और तबाह होता बुनियादी ढाँचा वातावरण में कालिख और ग्रीनहाउस गैसें छोड़ता है। पुनर्निर्माण के लिए सीमेंट, इस्पात और ऊर्जा की भारी खपत होती है।

युद्ध सिर्फ इंसानों को नहीं मारता। वह नदियों को ज़हरीला करता है, जंगलों को उजाड़ता है, मिट्टी को दूषित करता है और जलवायु को अस्थिर बनाता है।

संघर्षों की पर्यावरणीय कीमत सीमाओं में कैद नहीं रहती। धुएँ को पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं होती। कार्बन उत्सर्जन वीज़ा लेकर नहीं चलता। प्रदूषण हवाओं के साथ महाद्वीपों को पार कर जाता है।

यह कहना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा कि किसी एक युद्ध या सैन्य कार्रवाई ने सीधे भारत के मानसून को प्रभावित किया है। ऐसा कोई ठोस प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना होगा कि हम युद्धों के जलवायु पर पड़ने वाले संचयी प्रभावों को नज़रअंदाज़ कर दें।

जलवायु परिवर्तन किसी एक देश, एक सेना या एक युद्ध का नतीजा नहीं है। यह मानव गतिविधियों के लंबे सिलसिले का परिणाम है, जिसमें युद्ध की मशीनरी भी शामिल है।

हैरानी की बात यह है कि सैन्य उत्सर्जन आज भी वैश्विक जलवायु विमर्श के सबसे कम चर्चित मुद्दों में से एक है।

जब उद्योगों को अपने कार्बन उत्सर्जन का हिसाब देना पड़ता है, तो युद्धों की पर्यावरणीय लागत का पूरा ब्योरा क्यों नहीं लिया जाता? जलवायु सम्मेलन कार्बन बजट की बात करते हैं, लेकिन युद्ध बिना किसी जवाबदेही के उसे राख में क्यों बदल देते हैं?

दुनिया को अब एक नए सिद्धांत की ज़रूरत है: युद्धकालीन पर्यावरणीय जवाबदेही।

सैन्य उत्सर्जन का आकलन हो। उनका स्वतंत्र सत्यापन हो। युद्धों में नष्ट होने वाले पारिस्थितिक तंत्रों को मानवता की साझा धरोहर माना जाए। संघर्षों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को जलवायु न्याय के वैश्विक एजेंडे में शामिल किया जाए।

शांति केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं है, यह पारिस्थितिक अनिवार्यता भी है।

भारतीय मानसून समुद्र, पर्वत, हवाओं और तापमान के नाज़ुक संतुलन पर टिका है। बढ़ते पश्चिमी विक्षोभ, गर्म होते महासागर और बदलती जेट स्ट्रीम हमें चेतावनी दे रहे हैं कि यह संतुलन बेहद नाज़ुक है।

जब हम एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते हैं, तब हम धरती के खिलाफ भी युद्ध छेड़ते हैं।

और वायुमंडल हर वार का हिसाब रखता है।

अगर हमें अपने मानसून, अपने किसानों और अपने भविष्य को बचाना है, तो हमें सुरक्षा की परिभाषा बदलनी होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

युद्धग्रस्त दुनिया स्थिर जलवायु नहीं बना सकती।

इक्कीसवीं सदी का अगला बड़ा शांति आंदोलन, एक हरित आंदोलन भी होना चाहिए।

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Wednesday, June 17, 2026

 बंगाल का भूचाल और बदलते भारतीय राजनीतिक नक्शे

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

19 जून 2026

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 का नतीजा केवल एक राज्य में सत्ता के बदलने का संकेत नहीं है; यह भारतीय राजनीति की जलवायु में आ रहे व्यापक बदलावों की पहली प्रभावी आहट भी है। जो क्षेत्रीय किले तकरीबन अपराजेय माने जाते थे, वहां दरारें उभर आई हैं और पुरानी बिसात उलटने लगी है। 

भाजपा की प्रचंड उपस्थिति और तृणमूल कांग्रेस की अप्रत्याशित कुर्सी‑घटती स्थिति केवल सीटों का गणित नहीं बता रही; यह बताती है कि भारतीय राजनीति के खेल के नियम बदल रहे हैं। भाजपा ने लगभग 207 सीटें पाकर बंगाल में नया अध्याय लिखा, जबकि ममता बनर्जी की पार्टी करीब 80 सीटों पर सिमट गई; यह बदलाव सिर्फ़ आंकड़ों का मुआयना नहीं, उन परिस्थितियों का परिणाम है जिनमें करिश्माई नेतृत्व, संगठन का थकना और सत्ता‑विरोधी लहरों का संगम दिखता है। 

लंबे समय तक ममता बनर्जी का व्यक्तित्व और उनकी जमीन‑से‑सभा तक की लडाई उन्हें बंगाल की राजनीति में मजबूती देता रहा, पर अब भ्रष्टाचार के आरोप, संगठनात्मक थकावट और विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा शहरी मतदाताओं के बीच भाजपा की बढ़ती पैठ ने तृणमूल की नींव हिला दी है। नतीजों के बाद भीतर से उठ रही बगावत की फुसफुसाहटें, नेताओं की नाराज़गी और पाला बदलने की अटकलें संकेत देती हैं कि दीवारों में पहले ही दरारें आ चुकी थीं।

यह बदलाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं दिखता। देश भर में क्षेत्रीय दल आज अस्तित्व और प्रासंगिकता की चुनौती से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र की शिवसेना, दिल्ली‑पंजाब की आम आदमी पार्टी या तमिलनाडु की एआईएडीएमके; हर जगह राजनीतिक समीकरण दबाव में हैं। कई बार विचारधारा मंचों पर सुंदर दिखती है, पर सियासत की बिसात पर अंकगणित और हित सिद्धांतों पर भारी पड़ते हैं; इसीलिए आज सत्ता के गलियारों में दल‑बदल, गठबंधन और नए समीकरणों की फुसफुसाहटें तेज़ हैं। कल तक जो नेता एक‑दूसरे पर तीखे हमले करते थे, वे अब साथ आने की संभावनाएँ तलाश रहे हैं, क्योंकि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है, न स्थायी दुश्मन; स्थायी रहता है सत्ता और हित का समीकरण। इसी उथल‑पुथल के बीच विपक्षी एकता की परतें भी उधड़ती दिख रही हैं; बाहरी चुनौतियाँ जितनी महत्वपूर्ण हैं, उससे कहीं अधिक भीतर की असहमति और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ उन गठजोड़ों को कमजोर कर रही हैं जिनका लक्ष्य भाजपा को चुनौती देना है।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भाजपा अपनी चुनावी बढ़त को दीर्घकालिक राजनीतिक ताकत में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद पूर्ण बहुमत न मिलने ने उसे और सक्रिय कर दिया है; परमुख मुद्दों में परिसीमन जैसे संवेदनशील विषय पर वह व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। 

संसदीय क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का प्रस्ताव विशेषकर दक्षिणी राज्यों में चिंता का कारण बना हुआ है; उन राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के अनुपात में प्रतिनिधित्व घटाना उन्हें दंडित करने जैसा होगा। भाजपा इसे प्रतिनिधित्व और शासन की प्रभावशीलता बढ़ाने वाला कदम बताती है, जबकि आलोचक इसे संघीय ढाँचे पर असंतुलन पैदा करने का प्रयास मानते हैं। आने वाले वर्षों में यह बहस भारतीय राजनीति का एक बड़ा और स्थायी मुद्दा बन सकती है।

राज्य‑स्तरीय परिदृश्य भी उस बदलते नक्शे की तरह अनिश्चित है। बिहार में नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद नए समीकरण आकार ले रहे हैं; सहयोगी बेचैन हैं और दावेदार सक्रिय। तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की एंट्री पारंपरिक द्रविड़ राजनीति को चुनौती देती नजर आ रही है और नई ताकतें मैदान बदल रही हैं। पुरानी बिसात उलट रही है, नए खिलाड़ी उतर रहे हैं और राजनीति के पुरानी पैटर्न अब उतने स्थायी नहीं रह गए हैं। कांग्रेस भी तमाम उतार‑चढ़ाव के बावजूद नए समीकरण तलाश रही है, और कभी कट्टर विरोधी रहे दलों के बीच संवाद की संभावनाएँ उभर रही हैं। समाजवादी पार्टी में भी उथल पुथल चालू है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी नींद से जाग उठीं हैं, उधर उवैसी साहब मैदान में उतर चुके हैं।

अंततः इसका निर्णायक पहलू मतदाता का व्यवहार है।  क्षेत्रीय दल समाप्त नहीं हो रहे, पर अब सिर्फ़ करिश्माई नेतृत्व, जातीय समीकरण या पहचान‑राजनीति पर निर्भर रहकर लगातार सफलता पाना आसान नहीं रहा। संगठन, प्रदर्शन और जनता के साथ सतत संवाद पहले से कहीं अधिक अहम हो गया है। 

बंगाल का जनादेश इसलिए सिर्फ़ एक राज्य का फैसला नहीं है, बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए एक स्पष्ट संदेश है: इस नए दौर में वही टिकेगा जो समय के साथ खुद को बदल सकेगा; अकड़ नहीं, लचीलापन काम आएगा, क्योंकि राजनीति में हवा का रुख़ बदलते देर नहीं लगती।

Tuesday, June 16, 2026

 क्या 1947 का विभाजन एक सही निर्णय था? 

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एक दर्दनाक फैसले ने भारत की सभ्यतागत धारा को बचाए रखा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

17 जून 2026

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1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियाँ सुनकर रूह काँप उठती है।

लेकिन इतिहास केवल आँसुओं से नहीं लिखा जाता। कभी-कभी मुल्कों को दिल नहीं, दिमाग से फैसले लेने पड़ते हैं। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि चुनना अच्छे और बुरे के बीच नहीं, बल्कि बुरे और उससे भी बुरे के बीच पड़ता है।

1947 का विभाजन ऐसा ही फैसला था।

आज, लगभग अस्सी साल बाद, यह सवाल फिर उठता है कि अगर भारत अखंड रहता, तो क्या वह एक स्थिर और मजबूत राष्ट्र बन पाता? क्या वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत विरासत को सुरक्षित रख पाता? या फिर वह लगातार सांप्रदायिक टकराव, राजनीतिक खींचतान और संवैधानिक गतिरोध में उलझा रहता?

सच यह है कि विभाजन किसी जश्न का नतीजा नहीं था। यह राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार करने का फैसला था।

जून 1947 में कांग्रेस ने माउंटबेटन योजना को मंजूरी दी। तब तक हालात हाथ से निकल चुके थे। मुस्लिम लीग अलग देश की मांग पर अड़ी थी। उसने बार-बार साफ कर दिया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राजनीतिक क़ौमें हैं।

साझा सत्ता, संघीय ढाँचे और समझौते के कई प्रस्ताव सामने आए, लेकिन बात नहीं बनी। 1946 के "डायरेक्ट एक्शन डे" के बाद भड़की हिंसा ने साफ संकेत दे दिया कि सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण नहीं होगा।

बंगाल से पंजाब तक दंगे फैल गए। खून-खराबा बढ़ता गया। कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल था—क्या देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया जाए या एक कड़वा फैसला लेकर आगे बढ़ा जाए?

कहावत है, "नासूर बन चुके घाव का इलाज कभी-कभी सर्जरी ही होती है।"

विभाजन उसी सर्जरी जैसा था।

1941 की जनगणना के मुताबिक, ब्रिटिश भारत की लगभग एक-चौथाई आबादी मुस्लिम थी और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनका बहुमत था। ऐसे में अखंड भारत में सत्ता साझेदारी, प्रांतीय अधिकार और धार्मिक पहचान के मुद्दे लगातार टकराव का कारण बन सकते थे।

यह कहना मुश्किल है कि ऐसा भारत कितना स्थिर रहता। लेकिन आज़ादी से पहले के हालात देखकर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि साझा शासन की राह दिन-ब-दिन कठिन होती जा रही थी।

विभाजन के बाद भारत एक स्पष्ट बहुसंख्यक जनसंख्या और मजबूत राजनीतिक केंद्र के साथ उभरा। नए गणराज्य ने धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया, लेकिन उसकी सांस्कृतिक जड़ें हजारों साल पुरानी भारतीय परंपराओं में गहराई से जुड़ी रहीं।

आलोचक कह सकते हैं कि यह केवल एक अनुमान है, लेकिन यह भी सच है कि अखंड भारत में पहचान आधारित राजनीति और ज़्यादा तीखी हो सकती थी। संवैधानिक सौदेबाज़ी, क्षेत्रीय असंतोष और अलगाववादी दबाव लोकतंत्र को लगातार अस्थिर कर सकते थे।

दूसरे शब्दों में कहें तो विभाजन ने एक बड़ा संघर्ष पैदा किया, लेकिन शायद कई और बड़े संघर्षों को टाल भी दिया।

पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश में हिंदू और सिख आबादी में आई तेज़ गिरावट भी इस बहस को नया आयाम देती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि किसी भी सभ्यता की निरंतरता के लिए जनसांख्यिकीय संतुलन अहम भूमिका निभाता है।

उधर भारत ने अपनी विविधता को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया। यही स्थिरता आगे चलकर हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी प्रगति और मजबूत लोकतंत्र की नींव बनी।

यह भी एक विचारधारा का पक्ष है कि आज जिस तरह हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की चर्चा होती है, उसका स्वरूप अखंड भारत में अलग हो सकता था।

इतना जरूर कहा जा सकता है कि विभाजन कोई जीत नहीं था। वह एक सुरक्षा कवच था। उसने उस राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार किया, जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं रह गया था।

जो लोग भारत को हिंदू सभ्यता की ऐतिहासिक मातृभूमि मानते हैं, उनके लिए विभाजन ने यह सुनिश्चित किया कि बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए निरंतर राजनीतिक संघर्ष न करना पड़े।

विभाजन के घाव आज भी हरे हैं। उसकी पीड़ा कभी भुलाई नहीं जा सकती।

लेकिन इतिहास का एक कठोर सच यह भी हो सकता है कि उस दौर में उपलब्ध विकल्पों में विभाजन सबसे कम विनाशकारी फैसला था।

कभी-कभी मुल्कों को ज़िंदा रहने के लिए अपने दिल पर पत्थर रखना पड़ता है।

 


"जानते नहीं, मैं कौन हूँ?" : तमीज़ हार रही है, रसूख जीत रहा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 जून 2026

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"घट गए इंसाँ, बढ़ गए साए।"

हमारे शहर बड़े हो गए हैं। इमारतें आसमान छू रही हैं। गाड़ियाँ चमक रही हैं। जेबें भर रही हैं। लेकिन दिल सिकुड़ते जा रहे हैं।

सवाल सीधा है। क्या तरक़्क़ी का मतलब सिर्फ़ दौलत, ओहदा और शोहरत है? या फिर तमीज़, तहज़ीब और इंसानियत भी उसकी पहचान हैं?

लखनऊ के एक सरकारी अस्पताल का मंज़र याद आता है।

ओपीडी के बाहर एक महिला घंटों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। हाथ में रेफ़रल पर्ची थी। चेहरे पर थकान थी। आँखों में उम्मीद।

तभी एक साहब आए। झकाझक कुर्ता। साथ में दो लोग। उन्होंने अटेंडेंट से कुछ कहा और सीधे डॉक्टर के कमरे में दाख़िल हो गए।

लाइन में खड़े एक व्यक्ति ने एतराज़ किया।

जवाब आया, "जानते नहीं, मैं कौन हूँ?"

महिला चुपचाप फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गई।

यह सिर्फ़ एक अस्पताल की कहानी नहीं है। यह आज के समाज का आईना है।

अस्पताल हो, हवाई अड्डा हो, स्कूल हो या सरकारी दफ़्तर। हर जगह एक अनकहा नियम चलता दिखता है। क़ानून सबके लिए बराबर है, लेकिन कुछ लोग ख़ुद को क़ानून से ऊपर समझते हैं।

आज हैसियत सिर्फ़ पैसे से तय नहीं होती। पहचान, रसूख, संपर्क, उपनाम और दिखावा मिलकर एक ऐसा नशा पैदा करते हैं, जिसमें इंसान अपनी असल औक़ात भूल जाता है।

हमने एक नया जुमला गढ़ लिया है: "जुगाड़ है तो सब मुमकिन है।"

वीआईपी संस्कृति इसी सोच का सबसे बदसूरत चेहरा है।

सड़क पर किसी काफ़िले की सायरन बजाती गाड़ी दिखते ही ट्रैफ़िक थम जाता है। एम्बुलेंस रास्ता तलाशती रह जाती है। सड़क, जो सबकी है, कुछ लोगों की जागीर बन जाती है।

आलीशान सोसायटियों में घरेलू कामगारों के लिए अलग गेट होते हैं। अलग लिफ्ट होती है। आने-जाने के अलग नियम होते हैं। इसे सुरक्षा का नाम दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि यह भेदभाव का नया लिबास है।

विडंबना देखिए। जिन हाथों से हमारा घर चलता है, हम उन्हीं हाथों को सम्मान देने में कतराते हैं।

स्कूलों में दाख़िला भी अब कई बार योग्यता से ज़्यादा पहुँच और पहचान का खेल बन गया है। सिफ़ारिशी ख़त, ऊँची जान-पहचान और मोटे दान के दम पर सीटें हासिल की जाती हैं।

बच्चे बहुत जल्दी सीख जाते हैं कि नियम कमज़ोरों के लिए होते हैं।

हम अक्सर मान लेते हैं कि अच्छी शिक्षा इंसान को बेहतर बना देती है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?

ऊँची डिग्रियाँ तहज़ीब की गारंटी नहीं होतीं। फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी, अच्छे व्यवहार का प्रमाणपत्र नहीं है।

हम सबने ऐसे पढ़े-लिखे लोग देखे हैं जो ड्राइवर से बदतमीज़ी करते हैं, फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा देते हैं और सफ़ाई कर्मचारियों को नाम से नहीं, इशारों से बुलाते हैं।

हमारे स्कूल और कॉलेज प्रतियोगिता तो सिखाते हैं, मगर हमदर्दी नहीं। आगे निकलना सिखाते हैं, साथ लेकर चलना नहीं।

सच तो यह है कि बराबरी का एहसास छोटी-छोटी बातों से पैदा होता है।

लाइन में लगना।

अपनी बारी का इंतज़ार करना।

सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना।

दूसरों की सुविधा का ख़याल रखना।

तहज़ीब की शुरुआत यहीं से होती है।

जब लोग यह मान लेते हैं कि व्यवस्था ताक़तवरों के आगे झुक जाती है, तब उनका भरोसा टूटने लगता है।

अस्पताल की लाइन में खड़ा व्यक्ति अगली बार किसी अजनबी की मदद करने से पहले सोचेगा। कॉलोनी के गेट पर रोकी गई घरेलू सहायिका ख़ुद को अपमानित महसूस करेगी।

बदतमीज़ी संक्रामक होती है।

एक बुरा व्यवहार, कई और बुरे व्यवहारों को जन्म देता है।

कहा भी गया है, "अदब इंसान का सबसे ख़ूबसूरत ज़ेवर है।"

बदलाव की शुरुआत घर से होगी।

बच्चों को सिखाइए कि सफ़ाई कर्मचारी, चौकीदार, ड्राइवर और घरेलू सहायिका सिर्फ़ सेवा देने वाले लोग नहीं, बल्कि सम्मान के हक़दार इंसान हैं।

उन्हें लाइन में लगना सिखाइए। अपनी बारी का इंतज़ार करना सिखाइए। हर किसी से आँख मिलाकर बात करना और शुक्रिया कहना सिखाइए।

याद रखिए, किसी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के बर्ताव से होती है।

जिस समाज में दौलत, इंसानियत से बड़ी हो जाए, वहाँ दीवारें तो बहुत खड़ी होती हैं, लेकिन दिलों के बीच पुल नहीं बन पाते।

तमीज़ कमज़ोरी नहीं है।

तहज़ीब दिखावा नहीं है।

विनम्रता किसी ओहदे की मोहताज नहीं होती।

असल हैसियत आपके बैंक बैलेंस से नहीं, आपके व्यवहार से झलकती है।

और शायद यही सबक हम सबसे ज़्यादा भूलते जा रहे हैं।

Monday, June 15, 2026

 नाचने वाली से रियासत की मलिका तक: बेगम समरू की हैरतअंगेज़ दास्तान

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 जून 2026

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इतिहास कभी-कभी ऐसी कहानियां रचता है जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। एक किशोरी नाचने वाली, जो हालात के थपेड़ों में बहती हुई सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाए, हजारों सैनिकों की कमान संभाले, बादशाहों, मराठों और अंग्रेजों से बराबरी की बातचीत करे और लगभग छह दशक तक एक समृद्ध रियासत पर राज करे। यह कहानी है बेगम समरू की।

लगभग 1753 में फ़र्ज़ाना ज़ेब-उन-निसा के रूप में जन्मी इस महिला ने भारतीय इतिहास में वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना भी उस दौर में किसी महिला के लिए आसान नहीं थी। मुगल साम्राज्य बिखर रहा था। मराठा शक्ति उभर रही थी। अंग्रेज अपनी जड़ें मजबूत कर रहे थे। ऐसे उथल-पुथल भरे दौर में बेगम समरू ने अपनी अक्ल, हिम्मत और सियासी दूरदर्शिता के बल पर खुद को स्थापित किया।

उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी तथा इतिहास शोधकर्ता राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक "बेगम समरू का सच" में लिखते हैं, "यह एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली नाचने वाली लड़की की असाधारण कहानी है, जिसने लगभग अट्ठावन वर्षों तक सरधना पर शासन किया।"

फ़र्ज़ाना की जिंदगी तब बदली जब उनकी मुलाकात यूरोपीय भाड़े के सैनिक वाल्टर रेनहार्ट समरू से हुई। रेनहार्ट एक साहसी लेकिन विवादास्पद सैनिक था, जिसने उत्तर भारत की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई थी। उसका उपनाम "सम्ब्रे" था, जो भारतीय बोलचाल में बदलकर "समरू" हो गया।

फ़र्ज़ाना और रेनहार्ट केवल जीवनसाथी नहीं बने, बल्कि राजनीतिक और सैन्य साझेदार भी बने। मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने रेनहार्ट को मेरठ के निकट सरधना की जागीर प्रदान की थी। यह उपजाऊ और समृद्ध इलाका था, जिससे अच्छी आय होती थी। धीरे-धीरे फ़र्ज़ाना भी प्रशासन और सैन्य मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।

4 मई 1778 को आगरा में वाल्टर रेनहार्ट की अचानक मृत्यु हो गई। बहुतों को लगा कि अब फ़र्ज़ाना का प्रभाव समाप्त हो जाएगा। लेकिन इतिहास ने दूसरा मोड़ लिया। फ़र्ज़ाना ने न केवल सरधना की जागीर संभाली, बल्कि लगभग चार हजार सैनिकों वाली प्रशिक्षित फौज की कमान भी अपने हाथों में ले ली। यही वह क्षण था जब वे "बेगम समरू" के रूप में उभरीं।

आगरा से बेगम समरू का रिश्ता बेहद गहरा था। राज गोपाल सिंह वर्मा के शोध के अनुसार, शाहगंज क्षेत्र में रेनहार्ट समरू का विशाल आवास और बाग था। आज उसके अवशेष इतिहास की खामोश कहानी सुनाते हैं। रेनहार्ट को पहले वहीं दफनाया गया और बाद में उनका मकबरा आगरा के रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान में बनाया गया। यह मकबरा आज भी मौजूद है और उस दौर की याद दिलाता है।

बेगम समरू अक्सर आगरा आती थीं। उन्होंने चर्चों और धार्मिक संस्थानों को आर्थिक सहायता दी। शाहगंज और भोगीपुरा क्षेत्र में उनकी संपत्तियां थीं। उनके सौतेले पुत्र ज़फ़र याब खान का मकबरा भी आगरा में ही स्थित है। इस तरह आगरा उनके जीवन और विरासत का अहम हिस्सा बना रहा।

पति की मृत्यु के बाद बेगम समरू ने जिस कुशलता से सत्ता संभाली, वह अपने आप में अनोखी मिसाल है। उन्होंने मुगल दरबार से संबंध बनाए रखे। मराठा सरदार महादजी सिंधिया के साथ भी उनके मधुर संबंध रहे। दूसरी ओर अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी से भी टकराव के बजाय समझदारी भरा व्यवहार किया। यही संतुलन उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक में बताते हैं कि बेगम समरू केवल नाम की शासक नहीं थीं। वे फैसले स्वयं लेती थीं, सैन्य अभियानों का नेतृत्व करती थीं और राजनीतिक रणनीतियां तैयार करती थीं। उस दौर में जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखा जाता था, बेगम समरू सत्ता के केंद्र में खड़ी दिखाई देती हैं।

1781 में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया और जोआना नोबिलिस समरू नाम धारण किया। हालांकि धर्म परिवर्तन के बाद भी उन्होंने स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से दूरी नहीं बनाई। उनकी पहचान भारतीय और यूरोपीय प्रभावों के अद्भुत संगम के रूप में बनी रही।

उनकी सबसे बड़ी धरोहरों में से एक है सरधना का भव्य चर्च, बेसिलिका ऑफ आवर लेडी ऑफ ग्रेसेज़। 1829 में पूर्ण हुआ यह चर्च उत्तर भारत के सबसे सुंदर और विशाल गिरजाघरों में गिना जाता है। इसके अलावा उन्होंने आगरा, कलकत्ता, बंबई और मद्रास के चर्चों को भी उदारतापूर्वक सहायता दी। सड़कें, भवन, बाग और जनकल्याण के अनेक कार्य उनके शासनकाल की पहचान बने।

हालांकि उनका जीवन संघर्षों से मुक्त नहीं था। उन्हें अपने ही परिवार से विरोध झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उनके सौतेले पुत्र ने उन्हें सत्ता से हटाकर नजरबंद कर दिया। लेकिन उनकी लोकप्रियता और प्रभाव इतने मजबूत थे कि वे फिर सत्ता में लौट आईं। इस वापसी में महादजी सिंधिया और उनके अन्य सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

बेगम समरू के जीवन से जुड़ी अनेक किंवदंतियां भी प्रचलित हैं। कुछ कथाएं उन्हें बेहद कठोर और निर्मम शासक के रूप में पेश करती हैं। लेकिन राज गोपाल सिंह वर्मा स्पष्ट करते हैं कि ऐसी कई कहानियां लोककथाओं और अफवाहों पर आधारित हैं। उनके समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। इसलिए इतिहास और किंवदंती के बीच अंतर करना जरूरी है।

27 जनवरी 1836 को सरधना में बेगम समरू का निधन हो गया। उन्हें उसी भव्य चर्च में दफनाया गया जिसे उन्होंने स्वयं बनवाया था। उनके निधन के साथ भारतीय इतिहास का एक अनोखा अध्याय समाप्त हुआ।

अपनी 272 पृष्ठों की पुस्तक "बेगम समरू का सच" में राज गोपाल सिंह वर्मा लिखते हैं, "यह पुस्तक पाठकों को बेगम समरू और उनके पति वाल्टर रेनहार्ट समरू के जीवन की उस ऐतिहासिक यात्रा से परिचित कराती है, जिसने उत्तर भारत की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।"

वास्तव में, बेगम समरू की कहानी केवल एक महिला शासक की कहानी नहीं है। यह साहस, महत्वाकांक्षा, कूटनीति और नेतृत्व की कहानी है। यह उस महिला की दास्तान है जिसने अपने समय की सभी सामाजिक सीमाओं को तोड़ा और इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया। मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजी सत्ता के उदय के बीच चमकता हुआ यह सितारा आज भी इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है और याद दिलाता है कि असाधारण लोग अक्सर साधारण परिस्थितियों से ही जन्म लेते हैं।

Saturday, June 13, 2026

 भारत की सबसे बड़ी ताकत: यहां अच्छी ज़िंदगी अभी भी आम आदमी की पहुंच में है

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माना कि ग़म बहुत हैं जमाने में,

पर दिल बहलाने के बहाने भी बहुत हैं

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अक्सर यात्रा करने वालों को हकीकत, यानी ग्राउंड रियलिटीज से नजदीकी रिश्ता हो जाता है, जो नेताओं के बयानों, या अखबारी संपादकीयों से भिन्न होता है। दो घंटे पड़ोसी यात्री,  जो अमेरिका से हाल ही में लौटा है, से बतिया के, बंगलौर के नए बने एयर टर्मिनल पर उतरते ही नए भारत की एक आकर्षक तस्वीर से सामना हुआ। 

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जून 2026

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सुबह दूध वाला घंटी बजाता है।

अख़बार दरवाज़े पर आ गिरता है।

मोबाइल पर एक क्लिक करते ही सब्ज़ी, दवा और खाना घर पहुंच जाता है। डॉक्टर उसी दिन मिल जाता है। घर की सफाई हो चुकी होती है।

भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह कोई विलासिता नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। सर्विस सेक्टर का चौंकाने वाला विस्तार हुआ है, हर तरह की सेवा, किसी ऐप के द्वारा, फटाफट उपलब्ध है।

यही वजह है कि आज भारत दुनिया के सबसे आकर्षक देशों में से एक बनकर उभर रहा है।

दशकों तक भारतीयों की निगाहें पश्चिम की ओर लगी रहीं। अमेरिका अवसरों की धरती माना गया। यूरोप समृद्धि का प्रतीक था। विदेशी नौकरी और पासपोर्ट सफलता का पर्याय समझे जाते थे। यह सपना आज भी बहुतों को आकर्षित करता है। लेकिन विदेशों में बसे अनेक भारतीय अब एक नई सच्चाई को समझ रहे हैं। अच्छी ज़िंदगी केवल ऊंची तनख्वाह से नहीं मिलती।

कई बार उसकी असली पहचान रोज़मर्रा की सुविधाओं से होती है।

मोबाइल इंटरनेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने डिजिटल क्रांति को आम आदमी तक पहुंचा दिया है। दुनिया में सबसे सस्ते डेटा प्लान यहीं मिलते हैं। कुछ सौ रुपये में महीने भर वीडियो कॉल, ऑनलाइन पढ़ाई, मनोरंजन और कारोबार चल सकता है। जिन सुविधाओं पर पश्चिमी देशों में हजारों रुपये खर्च होते हैं, वे भारत में बेहद सुलभ हैं।

फिर आती है यूपीआई की कहानी।

चाय वाला हो या सब्ज़ी बेचने वाला, रिक्शा चालक हो या बड़ा शोरूम, हर कोई एक ही डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ा है। न छुट्टे पैसे की चिंता, न बैंक के चक्कर। मोबाइल का एक स्कैन और भुगतान पूरा। भारत ने डिजिटल भुगतान का ऐसा मॉडल बनाया है जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है।

विदेशी पर्यटक अक्सर हैरान रह जाते हैं जब सड़क किनारे नारियल बेचने वाला भी क्यूआर कोड से भुगतान स्वीकार करता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं है।

दुनिया के कई देशों में डॉक्टर के पास जाना जेब पर भारी पड़ सकता है। भारत में अब भी बड़ी आबादी के लिए चिकित्सा अपेक्षाकृत सुलभ और किफायती है। आधुनिक अस्पतालों में दुनिया भर से मरीज इलाज कराने आते हैं। वहीं मोहल्लों के क्लीनिक आज भी लाखों लोगों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं।

भारत का मेडिकल टूरिज्म उद्योग केवल कम लागत की वजह से नहीं, बल्कि बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के कारण भी तेजी से बढ़ रहा है।

लेकिन शायद भारत की सबसे बड़ी सुविधा समय है।

मध्यम वर्ग का परिवार भी घरेलू सहायक, रसोइया, ड्राइवर या देखभाल करने वाले कर्मचारी की मदद ले सकता है। इससे कामकाजी लोगों को परिवार, करियर और अपने शौक के लिए अधिक समय मिलता है।

पश्चिमी देशों में ऐसी सेवाएं अक्सर केवल अमीरों तक सीमित रहती हैं।

भारत में किफायत और सुविधा मिलकर जीवन को आसान बनाती हैं।

ट्रांसपोर्ट भी इस कहानी का अहम हिस्सा है।

मेट्रो, बस, ऑटो और रेल आज भी आम आदमी की पहुंच में हैं। नई एक्सप्रेसवे परियोजनाएं, आधुनिक हवाई अड्डे, मेट्रो नेटवर्क और तेज़ रेल सेवाएं देश को पहले से कहीं बेहतर तरीके से जोड़ रही हैं।

यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं।

जिस देश को कभी लालफीताशाही और धीमी व्यवस्था के लिए जाना जाता था, वही आज डिजिटल प्रशासन और बुनियादी ढांचे के विकास का उदाहरण बनता जा रहा है।

लेकिन भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि न तो इंटरनेट है, न यूपीआई और न ही सड़कें।

उसकी सबसे बड़ी ताकत है यहां की जीवंत जीवनशैली।

कहां मिलेगा ऐसा देश जहां शहरों  में दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व और होली की रौनक दिखाई दे? कहां मिलेगा ऐसा देश जहां बर्फीले पहाड़, रेगिस्तान, समुद्र तट, वर्षावन और महानगर एक ही राष्ट्र की पहचान हों?

भारत केवल एक देश नहीं है।

यह अनेक संसारों का संगम है।

यहां त्योहार सड़कों पर उतर आते हैं। शादियां पूरे समाज का उत्सव बन जाती हैं। पड़ोसी परिवार जैसे लगते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के जीवन का हिस्सा बने रहते हैं। दोस्तियां दशकों तक चलती हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में यह सामाजिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है।

बेशक भारत के सामने चुनौतियां भी हैं। यातायात की अव्यवस्था है। प्रदूषण चिंता का विषय है। बुनियादी सुविधाओं में असमानता है। 

लेकिन इन सबके बावजूद भारत एक अनमोल चीज़ देता है। कम खर्च में बेहतर जीवन।

इसीलिए कई प्रवासी भारतीय वापस लौट रहे हैं। इसीलिए विदेशी पेशेवर भारत को अपना ठिकाना बना रहे हैं।

इसीलिए उद्यमी, डिजिटल नोमैड, सेवानिवृत्त लोग और युवा परिवार भारत को नए नजरिए से देखने लगे हैं।

आधुनिक भारत की कहानी केवल आर्थिक विकास या तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है।

यह उस देश की कहानी है जहां जीवन अब भी रिश्तों से चलता है। जहां छोटी-छोटी खुशियां बड़ी दौलत मानी जाती हैं। जहां घर, परिवार और समुदाय आज भी सबसे बड़ी पूंजी हैं।

अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए हमेशा अमीर होना जरूरी नहीं। और शायद यही भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

Thursday, June 11, 2026

 गर्मियों की छुट्टी का मजा, रोमांच हुआ गायब

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नानी तेरी मोरनी को...

बचपन बिकाऊ है!

नानी के घर से स्पोर्ट्स कोचिंग तक का सफर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 जून 2026

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वे भी क्या दिन थे।

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों की दुनिया बदल जाती थी। कोई नानी के घर भागता था, कोई दादा-दादी के गांव। कोई पहाड़ों में ट्रेकिंग करता, कोई आम के बागों में चढ़ जाता। दोपहरें कॉमिक्स पढ़ते गुजरती थीं। शामें गिल्ली-डंडा, पतंगबाजी और बेवजह की शरारतों में बीतती थीं।

घड़ी का कोई महत्व नहीं था। कोई लक्ष्य नहीं था। कोई प्रदर्शन नहीं था। छुट्टियां आत्मा की मरम्मत का मौसम थीं।

फिर भारत बदल गया।

अब गर्मी की छुट्टियां भी बच्चों की नहीं रहीं।

सुबह स्विमिंग क्लास। फिर क्रिकेट अकादमी। फिर गिटार सीखना। फिर डांस क्लास। फिर कोडिंग कोर्स। फिर स्पोकन इंग्लिश। शाम को ऑनलाइन वर्कशॉप।

बच्चा स्कूल से छुट्टी पाता है, लेकिन बचपन से नहीं।

आज भारत में जन्म लेते ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। डेढ़-दो साल के बच्चों को प्ले स्कूल भेजा जा रहा है, जब वे ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाए होते। मध्यमवर्गीय परिवार सालाना पचास हजार से एक लाख रुपये तक फीस भर रहे हैं। माता-पिता को डर है कि कहीं उनका बच्चा दौड़ में पीछे न रह जाए।

और यह डर काल्पनिक नहीं है।

भारत में अवसर सीमित हैं और दावेदार करोड़ों। अच्छी नौकरियां कम हैं। सरकारी नौकरियां और भी कम। प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीटें मुट्ठी भर हैं। यही वजह है कि कोचिंग संस्कृति एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। बच्चा स्कूल में पढ़ता है, फिर कोचिंग में पढ़ता है, फिर टेस्ट सीरीज में बैठता है। उसकी पूरी किशोरावस्था प्रतियोगिता की प्रयोगशाला बन जाती है।

लेकिन अब यह होड़ केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है।

खेल भी कमाई का नया टिकट बन गए हैं।

माता-पिता क्रिकेटरों की करोड़ों की नीलामी देखते हैं। ओलंपिक पदक विजेताओं को मिलने वाले नकद पुरस्कार देखते हैं। सरकारी नौकरियां और विज्ञापन अनुबंध देखते हैं। फिर वे अपने बच्चों को खेल अकादमियों में भेज देते हैं। खेल अब स्वास्थ्य, आनंद और मित्रता का माध्यम कम, करियर की रणनीति अधिक बनता जा रहा है।

सच यह है कि कुछ बच्चे सितारे बनेंगे, लेकिन लाखों नहीं। हर सफल खिलाड़ी के पीछे हजारों ऐसे बच्चे होंगे जो वर्षों का समय, मेहनत और उम्मीदें लगाकर भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे।

इसी बीच मनोरंजन उद्योग ने भी बचपन को बाजार में उतार दिया है।

गायन प्रतियोगिताएं, नृत्य प्रतियोगिताएं, टैलेंट शो और क्विज कार्यक्रम बच्चों को सफलता के शॉर्टकट के रूप में बेच रहे हैं। माता-पिता ऑडिशन दर ऑडिशन भटक रहे हैं। बच्चे कैमरों, जजों और वोटिंग के दबाव में बड़े हो रहे हैं।

कुछ को शोहरत मिलती है। कुछ को पुरस्कार मिलते हैं। लेकिन अधिकांश बच्चे कुछ वर्षों बाद गुमनामी में लौट आते हैं। पीछे छूट जाती है थकान, निराशा और खोया हुआ बचपन।

सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों के पास अब खाली समय नहीं बचा।

खाली समय, जिसे आधुनिक समाज लगभग अपराध मानने लगा है।

किताबें पढ़ना समय की बर्बादी समझा जाता है। पेड़ों पर चढ़ना अनुपयोगी गतिविधि बन गया है। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। गांव की गलियां, खेतों की पगडंडियां, रिश्तेदारों के घरों की चहल-पहल और बेफिक्र आवारागर्दी अब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनती जा रही हैं। जिन बच्चों को कुछ नहीं करना वो मोबाइल वाचिंग करते हैं, या रील बनाते हैं।

हर शौक को करियर में बदला जा रहा है। गाना सीखो ताकि स्टार बनो। नाचो ताकि टीवी पर आ सको। खेलो ताकि करोड़पति बन सको। कोडिंग सीखो ताकि नौकरी मिल सके। अंग्रेजी सीखो ताकि इंटरव्यू निकल जाए।

मानो जीवन का हर क्षण किसी भविष्य की कमाई में निवेश किया जाना चाहिए।

पैसे की चमक इतनी तेज हो गई है कि बचपन उसकी रोशनी में धुंधला पड़ गया है।

समस्या खेल, संगीत, पढ़ाई या प्रतियोगिताओं में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जो हर बच्चे को एक परियोजना, एक निवेश और एक संभावित आय स्रोत की तरह देखने लगी है।

माता-पिता दोषी नहीं हैं। वे डरे हुए हैं। महंगाई बढ़ रही है। रोजगार अनिश्चित हैं। भविष्य धुंधला है। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा चाहते हैं।

लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है।

यदि बच्चा बचपन में ही थक गया, तो वह जीवन कब जिएगा?

यदि छुट्टियां भी प्रशिक्षण शिविर बन गईं, तो यादें कहां बनेंगी?

यदि हर प्रतिभा का मूल्य रुपये में तय होगा, तो खुशी का मूल्य कौन तय करेगा?

शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है।

हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते-करते उनका वर्तमान छीन रहे हैं।

और एक दिन जब वे सफल होकर पीछे मुड़कर देखेंगे, तो शायद पूछेंगे: 

वे गर्मियां कहां चली गईं, जिनमें जिंदगी कमाई नहीं, खुशियां हुआ करती थी?

Wednesday, June 10, 2026

 


धार्मिक स्थलों को उन्मादी भीड़ से बचाओ

तीर्थ स्थान या थीम पार्क?

रीलबाज़ों, सेल्फीबाज़ों और धार्मिक पर्यटन की भीड़ ने पवित्र स्थलों का क्या हाल कर दिया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 जून 2026

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क्या भगवान अब भक्तों से मिलते हैं या कैमरे के लेंस से?

क्या तीर्थयात्रा अब आत्मा की यात्रा है या इंस्टाग्राम की स्टोरी?

इन दिनों किसी भी पवित्र धाम का दृश्य देख लीजिए। वृंदावन हो, केदारनाथ हो, बद्रीनाथ हो या वैष्णो देवी। ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि किसी मेले, पिकनिक स्पॉट या मनोरंजन पार्क में पहुँच गए हों। हाथ में माला कम, मोबाइल ज्यादा हैं। भक्ति कम, रील ज्यादा है। श्रद्धा कम, प्रदर्शन ज्यादा है।

भारत की प्राचीन परंपरा में तीर्थयात्रा जीवन के उत्तरार्ध का विषय मानी जाती थी। जब व्यक्ति संसार के मोह-माया, दौड़-धूप और महत्वाकांक्षाओं से कुछ दूरी बनाता था, तब वह ईश्वर की ओर मुड़ता था। साठ वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और आध्यात्मिक जीवन की परिकल्पना यूँ ही नहीं की गई थी। इसके पीछे गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव था।

लेकिन आज तस्वीर उलट गई है।

कॉलेज से छुट्टी मिली नहीं कि चलो वृंदावन। नई कार खरीदी नहीं कि चलो चारधाम। शादी की सालगिरह है तो केदारनाथ।  हनीमून, चलो तिरुपति जी के दर्शन से शुरू करें, वेरी गुड idea!! जन्मदिन है तो महाकाल। मंदिर अब मन की शांति के स्थान नहीं रहे, बल्कि "चेक-इन" करने और सोशल मीडिया पर दिखाने के मंच बनते जा रहे हैं।

इन धार्मिक स्थलों पर पहुँचने वाली विशाल युवा भीड़ अपने साथ क्या ला रही है?

प्लास्टिक की बोतलें। चिप्स के पैकेट। डिस्पोज़ेबल कप। लाउडस्पीकर जैसी आवाजें। सड़क किनारे फैला कचरा। शराब की खाली बोतलें। सेल्फी के लिए धक्का-मुक्की। ऊँची आवाज में फिल्मी गाने। और सबसे बढ़कर, पवित्रता के प्रति उदासीनता।

हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर साफ दिख रहा है। पहाड़ कूड़ेदान बन रहे हैं। नदियाँ प्लास्टिक से भर रही हैं। तीर्थ मार्गों पर कूड़े के ढेर लग रहे हैं। जहाँ कभी घंटियों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती थी, वहाँ अब मोबाइल नोटिफिकेशन और रीलों का शोर गूँजता है।

भक्ति अब एक उपभोक्ता उत्पाद बन गई है।

एक पैकेज टूर खरीदिए। हेलीकॉप्टर से दर्शन कीजिए। पाँच मिनट मंदिर में बिताइए। दस सेल्फियाँ लीजिए। फिर लौटकर घोषणा कर दीजिए कि आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो गया।

यह आध्यात्मिकता नहीं है। यह धार्मिक उपभोक्तावाद है।

कड़वा लग सकता है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम एक असहज प्रश्न पूछें। क्या सभी तीर्थस्थल पर्यटन के लिए खुले रहने चाहिए? क्या हर धार्मिक स्थल को मनोरंजन और अवकाश उद्योग का हिस्सा बना देना चाहिए?

शायद नहीं।

देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर आयु-आधारित प्रतिबंधों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। कम से कम पचास या साठ वर्ष से कम आयु के लोगों की सामान्य पर्यटक एंट्री सीमित की जा सकती है। विशेष धार्मिक, शैक्षिक या पारिवारिक कारणों को छोड़कर तीर्थस्थलों को वरिष्ठ नागरिकों और वास्तविक साधकों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह किसी पीढ़ी के खिलाफ युद्ध नहीं होगा। बल्कि पवित्र स्थलों की गरिमा बचाने का प्रयास होगा।

युवाओं के लिए घूमने-फिरने के हजार विकल्प हैं। पहाड़ हैं। समुद्र तट हैं। ट्रैकिंग है। खेल हैं। सांस्कृतिक यात्राएँ हैं। रोमांचक पर्यटन है। जीवन का आनंद लीजिए। दुनिया देखिए। काम कीजिए। सपने पूरे कीजिए।

लेकिन हर जगह को पर्यटन स्थल बना देना बुद्धिमानी नहीं है।

कुछ स्थान ऐसे भी होने चाहिए जहाँ शांति हो। मौन हो। ध्यान हो। अनुशासन हो। जहाँ लोग फोटो खिंचवाने नहीं, आत्मचिंतन करने जाएँ।

आज वृंदावन की गलियाँ, गंगा के घाट, हिमालय के धाम और अनेक मंदिर उस भीड़ के बोझ तले कराह रहे हैं जो दर्शन से अधिक प्रदर्शन में विश्वास करती है। यह "टच एंड गो" संस्कृति तीर्थों को आध्यात्मिक केंद्रों से मनोरंजन केंद्रों में बदल रही है।

यदि अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ मंदिर तो देखेंगी, लेकिन उनकी आत्मा खो चुकी होगी।

तीर्थ यात्रा कोई वीकेंड पिकनिक नहीं है। यह मन की तैयारी, अनुशासन, संयम और श्रद्धा की यात्रा है।

जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हमारे पवित्र स्थल भीड़ तो जुटाएँगे, लेकिन भक्ति नहीं। श्रद्धालु तो आएँगे, लेकिन शांति नहीं। मंदिर तो बचेंगे, मगर उनकी मर्यादा धीरे-धीरे भीड़ के पैरों तले कुचलती चली जाएगी।

 10 जून 2026

बैडमिंटन लंदन में 

जब माई लार्ड बैडमिंटन खेलने विलायत गए!!!


बृज खंडेलवाल द्वारा 


भारत की न्याय व्यवस्था का पेंडिंग, लंबित मामलों का पहाड़ किसी अजूबे से कम नहीं। पांच करोड़ से अधिक मुकदमे अदालतों की अलमारियों और कंप्यूटरों में धूल फांक रहे हैं।


विचाराधीन कैदी अपनी संभावित सजा से भी ज्यादा समय जेलों में काट देते हैं। किसान, मजदूर, पीड़ित महिलाएं और आम नागरिक एक तारीख से दूसरी तारीख तक भटकते रहते हैं। कई मामलों में न्याय तब मिलता है, जब पीड़ित के बाल सफेद हो चुके होते हैं और अगली पीढ़ी जवान हो जाती है।


लेकिन इस विशाल बोझ तले दबे देश के मुख्य न्यायाधीश लंदन में हैं। बैडमिंटन कोर्ट पर। रैकेट हाथ में, शटलकॉक हवा में, पांच लाख रुपये की पुरस्कार राशि दांव पर, और पूरा आयोजन पूरे शबाब पर।


वही न्यायपालिका, जिसने कभी बेरोजगार युवाओं को "कॉकरोच" कहकर संबोधित किया था, अब न्याय की हथौड़ी छोड़ रैकेट थामे हुए है। अदालतों की फाइलें धूल खाती रहें, लेकिन स्मैश शानदार होने चाहिए।

दृश्य वाकई मनमोहक है। चतुर गुणी जन कहते हैं हमारी महान  न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र दिखाई देती है: जवाबदेही से, तात्कालिकता से, और कभी-कभी तो भारतीय धरती से भी। लगभग डेढ़ सौ न्यायाधीश और वरिष्ठ वकील लंदन पहुंच गए। किसी न्यायिक सुधार सम्मेलन के लिए नहीं। लंबित मामलों के एवरेस्ट जैसे संकट पर मंथन करने के लिए नहीं। बल्कि शटलकॉक कूटनीति के लिए।

और कानून मंत्री किरेन रिजिजू? उनका काम न्याय व्यवस्था की चरमराती मशीनरी को दुरुस्त करना है। मगर वे भी इस खेल महोत्सव का हिस्सा बने। लंदन पहुंचे, टूर्नामेंट का उद्घाटन किया, और शामें भारत को "विश्वगुरु" बनाने की चर्चाओं में बिताईं। रैलियों, स्वागत समारोहों और सौहार्दपूर्ण मुलाकातों के बीच भविष्य के भारत का खाका भी खींचा गया।

ज़रा कल्पना कीजिए। दिन में बैडमिंटन, रात में नेटवर्किंग। कार्यपालिका और न्यायपालिका विदेशी धरती पर इतने आत्मीय भाव से साथ दिख रही हैं कि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत भी शायद दर्शक दीर्घा में बैठकर असहज महसूस कर रहा हो।

न्याय भले ही आंखों पर पट्टी बांधता हो, लेकिन वह फिटनेस के मामले में पूरी तरह सजग दिखाई देता है। चुस्त, फुर्तीला और पांच करोड़ लंबित मामलों की मूक पुकारों को अनसुना करने की अद्भुत क्षमता से लैस।

इस भव्य रंगमंच में असली विजेता कौन हैं? शटलकॉक।

और पराजित? वे करोड़ों भारतीय जो अब भी यह भोली उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अदालतों में न्याय सिर्फ मिलेगा ही नहीं, समय पर भी मिलेगा।

खेल खत्म। सेट पूरा। और जीत एक बार फिर बैकलॉग के नाम।


Tuesday, June 9, 2026

 क्या भारत की एग्जाम फैक्ट्री कॉकरोच पैदा कर रही है!

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भारत का 58,000 करोड़ रुपये का कोचिंग उद्योग बच्चों को बचा भी रहा है और बर्बाद भी.....

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

10 जून 2026

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पहले जमाने में, कमजोर बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन की जरूरत पड़ती थी, अब हर किसी को......

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भारत की शिक्षा व्यवस्था के अंधेरे गलियारों में आखिर रेंगता क्या है?

सपने? महत्वाकांक्षाएं? उम्मीदें?

या फिर कुछ और?

आधी रात को मेज पर झुका एक टीनएजर । लाल आंखें। थका हुआ शरीर। सामने बिखरे टेस्ट पेपर। दूसरी ओर माता-पिता, जो कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज़ और कुर्बानियों का हिसाब लगा रहे हैं। बच्चे, जो खुद को इंसान नहीं, बल्कि एक रैंक और प्रतिशत के रूप में देखने लगे हैं।

कोचिंग उद्योग इसे तैयारी कहता है।

बहुत से छात्र इसे जद्दोजहद और जीवित रहने की लड़ाई कहते हैं।

जून 2026 में पटना की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसने इस विरोधाभास को नंगा कर दिया। खान ग्लोबल स्टडीज़ के बाहर विरोध प्रदर्शन, तोड़फोड़, आरोप और प्रत्यारोपों का तूफान उठ खड़ा हुआ। सोशल मीडिया गरज उठा। नेता भी मैदान में कूद पड़े।

और उधर दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोचों का अजीब प्रदर्शन!

यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं था। यह भारत के कोचिंग उद्योग की आत्मा की एक झलक थी।

एक ऐसी दुनिया, जहां कुछ शिक्षक फिल्मी सितारों जैसी लोकप्रियता रखते हैं। जहां शैक्षणिक संस्थान कॉरपोरेट साम्राज्य की तरह काम करते हैं। जहां प्रतिस्पर्धा, मुनाफा और जवाबदेही की कमी आपस में टकराती है। और जहां सबसे बड़ी कीमत अक्सर छात्रों को चुकानी पड़ती है।

सवाल असहज है।

कैसा है ये समाज जो अपने सोलह साल के बच्चे से कहता है कि अगले दो साल उसकी पूरी जिंदगी की कीमत तय करेंगे?

कैसे कुछ लोग इस विश्वास के इर्द-गिर्द 58,000 करोड़ रुपये का उद्योग खड़ा कर देते हैं?

कोचिंग अब शिक्षा का सहायक साधन नहीं रही। यह समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। सात करोड़ से अधिक छात्र किसी न किसी रूप में कोचिंग से जुड़े हुए हैं। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह उद्योग 1.3 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है।

आंकड़े इस दीवानगी की वजह बताते हैं।

हर साल 11 लाख से अधिक छात्र जेईई की परीक्षा देते हैं। करीब 20 लाख छात्र नीट में बैठते हैं। देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने की संभावना कई बार पांच प्रतिशत से भी कम होती है।

जब मुकाबला इतना बेरहम हो, तो माता-पिता केवल स्कूलों पर भरोसा करना छोड़ देते हैं।

वे अपने बच्चों को कोटा भेजते हैं। पटना भेजते हैं। सीकर भेजते हैं। हैदराबाद भेजते हैं। ऐसे छात्रावासों में, जहां जिंदगी व्हाइटबोर्ड, रैंकिंग, टेस्ट और प्रदर्शन चार्ट के बीच सिमट जाती है।

कोचिंग उद्योग का उभार कोई हादसा नहीं था। यह उस शिक्षा व्यवस्था का स्वाभाविक नतीजा है जो योग्यता का वादा तो करती है, मगर कई बार लॉटरी जैसी महसूस होती है। करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आईआईटी या एम्स का प्रवेश पत्र आर्थिक असुरक्षा से मुक्ति का सुनहरा टिकट माना जाता है।

स्कूल अब भी रटने को पुरस्कृत करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं तेजी, रणनीति और विशेष कौशल मांगती हैं। कक्षा और परीक्षा कक्ष के बीच एक विशाल खाई मौजूद है।

कोचिंग उद्योग उस खाई को भरने आया था। फिर उसे एहसास हुआ कि यही खाई उसकी सबसे बड़ी कमाई बन सकती है।

तकनीक ने इस कारोबार को और विस्तार दिया है। ऑनलाइन कक्षाएं, रिकॉर्डेड लेक्चर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और व्यक्तिगत शिक्षण उपकरणों ने कोचिंग को महानगरों की सीमाओं से बाहर पहुंचा दिया है। अब छोटे शहर का छात्र भी वही व्याख्यान सुन सकता है जो दिल्ली या मुंबई का छात्र सुनता है।

उद्योग इसे लोकतंत्रीकरण कहता है।

आलोचक इसे बाज़ारीकरण कहते हैं।

दोनों में कुछ न कुछ सच्चाई है।

लेकिन इस उद्योग के सबसे काले अध्याय तब सामने आते हैं जब भारी दबाव और भारी पैसा एक साथ मिलते हैं।

नीट पेपर लीक कांड पूरे देश को झकझोर गया। जांच में ऐसे नेटवर्क सामने आए जो परीक्षा केंद्रों से कहीं आगे तक फैले थे। वर्षों से मेहनत कर रहे छात्रों को अचानक महसूस हुआ कि जिस व्यवस्था पर उन्होंने भरोसा किया था, वह भीतर से खोखली भी हो सकती है।

नुकसान केवल प्रश्नपत्र लीक होने का नहीं था।

भरोसा भी लीक हो गया था।

सुर्खियों से दूर कुछ और त्रासदियां भी हैं।

'डमी एडमिशन' अब आम बात बन चुकी है। छात्र स्कूलों में सिर्फ कागजों पर नामांकित रहते हैं, जबकि उनका अधिकांश समय कोचिंग संस्थानों में गुजरता है। कक्षाएं खाली होती जाती हैं। स्कूलों की भूमिका कमजोर पड़ती जाती है।

फिर आती है मानसिक स्वास्थ्य की समस्या।

चिंता। अवसाद। अकेलापन। थकान।

छात्र समीकरण हल करना सीखते हैं।

निराशा से निपटना नहीं।

असमानता का पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। संपन्न परिवार महंगी कोचिंग, निजी मार्गदर्शन और अनगिनत टेस्ट सीरीज़ खरीद सकते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे वही लड़ाई कहीं कम संसाधनों के साथ लड़ते हैं।

कागज पर दौड़ सबके लिए समान है।

हकीकत में कुछ धावकों के पैरों में पहले से ही बोझ बंधा होता है।

समाधान कोचिंग संस्थानों को खलनायक घोषित करने में नहीं है। वे इसलिए पैदा हुए क्योंकि व्यवस्था ने उनकी जरूरत पैदा की।

असली सुधार कहीं और है।

आईआईटी, एम्स और अच्छे सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में सीटें बढ़ाई जाएं। प्रवेश परीक्षाओं को रटंत प्रणाली से हटाकर समझ और विश्लेषण पर आधारित बनाया जाए। कोचिंग संस्थानों को अपनी वास्तविक सफलता दर सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया जाए। स्कूलों को इतना मजबूत बनाया जाए कि कोचिंग शिक्षा का विकल्प नहीं, सहयोगी बने।

सबसे महत्वपूर्ण बात, छात्र के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को नीति के केंद्र में रखा जाए।

भारत का कोचिंग उद्योग जल्द खत्म होने वाला नहीं है। जिन आकांक्षाओं को वह पोषित करता है, वे वास्तविक हैं। जिस प्रतिस्पर्धा से वह छात्रों को लड़ने में मदद करता है, वह भी वास्तविक है।

लेकिन एक ऐसा देश, जो अपने बच्चों के सपनों को 58,000 करोड़ रुपये की परीक्षा मशीन के हवाले कर देता है, उसे खुद से एक कठिन सवाल पूछना चाहिए।

क्या सफलता की हमारी परिभाषा इतनी संकरी हो गई है कि पूरी एक पीढ़ी यह मान बैठी है कि जिंदगी एक रैंक से शुरू होती है और उसी पर खत्म?

शिक्षा का उद्देश्य नागरिक, चिंतक और नवप्रवर्तक तैयार करना था।

अगर हम सावधान नहीं हुए, तो यह व्यवस्था ऐसे लाखों थके हुए युवाओं को जन्म देगी जो परीक्षा की भूलभुलैया में दौड़ना तो जानते हैं, मगर जीवन का रास्ता भूल चुके होंगे।


Monday, June 8, 2026

 पेड़ों की आवाज़ कौन बनेगा जब प्रगति दस्तक देगी?

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 लंबे समय से हरित प्रहरी लड़ रहे हैं, और कई जंगें जीत भी चुके हैं, लेकिन अब अदालतों को पर्यावरणविद खटकते हैं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

9 जून, 2026

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जब जेसीबी और  बुलडोज़र तरक्की का परचम लेकर आएं ,  तब नदियों, जंगलों, वन्यजीवों और आने वाली नस्लों की तरफ़ से कौन बोलेगा?

और अगर पर्यावरण की हिफाज़त करने वालों को ही तरक्की का दुश्मन समझ लिया जाए, तो फिर प्रकृति की पैरवी कौन करेगा?

ये सवाल आज इसलिए और अहम हो गए हैं क्योंकि 11 मई 2026 को प्रस्तावित पीपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कभी किसी विकास परियोजना का स्वागत किया है? साथ ही यह चिंता भी जताई कि मुकदमेबाज़ी विकास की रफ्तार रोक रही है।

इन टिप्पणियों पर देशभर के 600 से अधिक नागरिकों, पर्यावरण संगठनों, शिक्षाविदों और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने एतराज़ जताया। उन्होंने इन टिप्पणियों को परेशान करने वाला बताया और उन्हें वापस लेने की मांग की।

उनकी चिंता वाजिब है।

पर्यावरण आंदोलन कुछ पेशेवर प्रदर्शनकारियों का शौक नहीं है। इसकी जड़ें भारत के संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं में गहराई तक मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है, जिसमें स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है। संविधान राज्य और नागरिकों दोनों को देश की प्राकृतिक विरासत की रक्षा करने का दायित्व भी सौंपता है।

इतिहास गवाह है कि कई बार पर्यावरण कार्यकर्ता सही साबित हुए हैं।

सत्तर के दशक में हिमालयी क्षेत्र में चला चिपको आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गांवों की महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उनकी कटाई रोकी। उस समय उन्हें विकास विरोधी कहा गया था। आज वही लोग पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत माने जाते हैं। उनके संघर्ष ने भारत की वन नीति को नई दिशा दी।

कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन ने भी यही संदेश दिया। स्थानीय समुदायों ने अंधाधुंध कटाई का विरोध किया और टिकाऊ वन प्रबंधन की पैरवी की। केरल में साइलेंट वैली वर्षावन को बचाने के लिए नागरिकों, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने लंबी लड़ाई लड़ी। अगर वे हार जाते, तो भारत की सबसे समृद्ध जैव विविधता वाली धरोहरों में से एक हमेशा के लिए मिट सकती थी।

भारत के आदिवासी समुदायों ने भी प्रकृति की हिफाज़त में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने देश को याद दिलाया कि जंगल सिर्फ़ लकड़ी और खनिजों के भंडार नहीं हैं। वे जीवित संसार हैं, जो समाज, संस्कृति और पारिस्थितिकी को सहारा देते हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन सभी बांध परियोजनाओं को नहीं रोक सका, लेकिन उसने विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।

पर्यावरण आंदोलनों ने कई बार कॉरपोरेट लापरवाही का भी पर्दाफाश किया है।

केरल के प्लाचीमाडा में ग्रामीणों ने कोका-कोला के बॉटलिंग प्लांट पर भूजल के दोहन और स्थानीय संसाधनों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। वर्षों के संघर्ष के बाद संयंत्र बंद हुआ।

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में लोगों ने स्टरलाइट कॉपर संयंत्र के खिलाफ प्रदूषण को लेकर आंदोलन किया। बाद की जांचों और अदालती कार्यवाहियों ने उनकी कई आशंकाओं को सही साबित किया।

हाथियों के संरक्षण के लिए दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के ऊटी क्षेत्र में स्थित सिगुर पठार हाथी गलियारे को बचाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। रिसॉर्टों और अवैध निर्माणों से घिरे इस मार्ग को अदालत ने हाथियों का "आवागमन का अधिकार" मानते हुए अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए। यह फैसला पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।

वृंदावन में भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कई विवादास्पद परियोजनाओं के खिलाफ अदालतों में सफल लड़ाइयां लड़ी हैं।

शायद भारत की सबसे प्रसिद्ध पर्यावरणीय कानूनी जीत ताजमहल से जुड़ी है।

सत्तर के दशक में मथुरा में तेल रिफाइनरी लगाने के प्रस्ताव का पर्यावरणविदों ने विरोध किया था। उन्हें डर था कि इससे ताजमहल को नुकसान पहुंचेगा। बाद में पर्यावरण वकील एम.सी. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि आगरा के आसपास का औद्योगिक प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को नुकसान पहुंचा रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययनों ने उनकी बात की तस्दीक की। अदालत ने ताज ट्रेपेजियम ज़ोन का गठन किया, उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने के निर्देश दिए और कई प्रदूषणकारी इकाइयों को स्थानांतरित कराया।

आज शायद ही कोई कहे कि ताजमहल को बचाना विकास विरोधी कदम था। इसे भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय सफलताओं में गिना जाता है।

मैसूर की चामुंडी पहाड़ियों का मामला भी ऐसा ही है। वहां प्रस्तावित रोपवे परियोजना का पर्यावरणविदों, विरासत विशेषज्ञों, स्थानीय निवासियों और सांस्कृतिक संगठनों ने विरोध किया। उनकी चिंताएं वनों की कटाई, मिट्टी के कटाव और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के व्यावसायीकरण को लेकर थीं। जनविरोध के चलते सरकारों को कई बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा।

बार-बार पर्यावरण आंदोलनों ने एक शुरुआती चेतावनी प्रणाली का काम किया है।

उन्होंने कुएं सूखने से पहले भूजल संकट की चेतावनी दी। उन्होंने स्वास्थ्य संकट पैदा होने से पहले प्रदूषण के खतरे बताए। उन्होंने आपदा आने से पहले पारिस्थितिक जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया।

असल खतरा तब पैदा होता है जब हर पर्यावरणीय चिंता को विकास का दुश्मन बताकर खारिज कर दिया जाता है। इससे वैज्ञानिकों, नागरिकों, वकीलों और स्थानीय समुदायों की आवाज़ दब सकती है। सवाल पूछने का लोकतांत्रिक हक़ कमज़ोर पड़ सकता है।

भारत का पर्यावरणीय इतिहास हमें एक सीधी-सी सीख देता है।

विकास और पर्यावरण दुश्मन नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे के साझेदार हैं। सबसे सफल परियोजनाएं वही होती हैं जो प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करती हैं, स्थानीय समुदायों की रक्षा करती हैं और दूरगामी सोच के साथ आगे बढ़ती हैं।

जलवायु परिवर्तन, जल संकट और प्रदूषण के बढ़ते दौर में भारत को पर्यावरणीय सतर्कता की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।

कठिन सवाल पूछने वालों को चुप नहीं कराया जाना चाहिए। उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय जीतें इसलिए संभव हुईं क्योंकि आम नागरिक खामोश नहीं बैठे। उन्होंने ताकतवर हितों को चुनौती दी, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाए और यह आग्रह किया कि विकास की कीमत अपूरणीय विनाश नहीं हो सकती।

यह रुकावट नहीं है।

यही लोकतंत्र का असली काम है।

Saturday, June 6, 2026

 मौत का लाइसेंस

ये हादसे नहीं, हस्ताक्षरित हत्याएँ हैं 

मौत आती नहीं, बुलाई जाती है निगरानी की नाकामी और जवाबदेही की कब्र पर खड़ा भारत

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"ये हादसे नहीं, प्रशासनिक हत्याएँ हैं"

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 जून 2026

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आगरा चौपाटी पर झूले का जिप लॉक खुला, एक नौजवान ने स्वर्ग की यात्रा शुरू की। बेलनगंज क्षेत्र में मकान खुदाई में पूरी बैंक धंस गई।आए दिन जूता फैक्ट्रियों में आग लग रही है, घटिया मेंटिनेंस से लिफ्टों में लोग फंस रहे हैं। एक्सप्रेसवे पर डेली हादसों की संख्या गिनती से बाहर हो चली है। इस क्रूर व्यवस्था के चंगुल से बाहर सिर्फ नेता हैं, जो इत्तेफाकन हमेशा उठावनी या मृत्यु भोज में ही पहुंचते हैं।

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रात गहरी होती है। शहर सो जाता है। लेकिन कहीं न कहीं एक इमारत ऐसी होती है जो आग का इंतजार कर रही होती है। कोई पुल होता है जो अपने आख़िरी सहारे पर टिका होता है। किसी फैक्ट्री का बॉयलर अपनी सीमा पार कर चुका होता है। किसी गोदाम में नियमों की धज्जियाँ उड़ रही होती हैं। और किसी सरकारी फाइल पर वह आखिरी हस्ताक्षर हो चुका होता है जो सुनिश्चित करता है कि हादसा होने पर भी जिम्मेदार कोई नहीं होगा।

फिर सुबह अखबारों में खबर छपती है।

हम उसे "दुर्घटना" कहते हैं।

लेकिन सच यह है कि यह दुर्घटना नहीं होती। यह एक लंबी प्रक्रिया का अंतिम दृश्य होता है। एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लालच, लापरवाही और मिलीभगत वर्षों तक साथ-साथ चलते हैं।

चार दशक पहले भोपाल गैस त्रासदी ने दुनिया को झकझोर दिया था। हजारों लोग जहरीली गैस के बादलों में घुटकर मर गए। दुनिया ने उस त्रासदी से सबक लिया। सुरक्षा नियम मजबूत हुए। कॉर्पोरेट जवाबदेही पर नए मानदंड बने।

भारत ने क्या सीखा?

यह सवाल आज भी उतना ही असहज है जितना 1984 में था।

मौत कभी अचानक नहीं आती

दिल्ली के एक होटल में इक्कीस लोग जिंदा जल गए। बाद में पता चला कि छह कमरों के लाइसेंस पर पच्चीस कमरे चल रहे थे। फायर एनओसी नहीं थी। निकास द्वार अवरुद्ध थे। खिड़कियां बंद थीं। निरीक्षण भी हुए थे। कागज भी पूरे थे। फाइलें भी चलती रहीं।

बस सुरक्षा कहीं नहीं थी।

जब आग लगी तो लोगों के पास बचने का रास्ता नहीं था।

इसे दुर्घटना कहना सच्चाई से भागना है। यह मौत को पहले से दिया गया निमंत्रण था।

छत्तीसगढ़ के बिजली संयंत्र में बॉयलर फटा। मजदूर मारे गए। गुजरात के मोरबी में मरम्मत के बाद खोला गया पुल टूट गया और 135 लोग नदी में समा गए। राजकोट के गेमिंग ज़ोन में आग लगी तो अवैध निर्माण की परतें खुलने लगीं। महाराष्ट्र और पंजाब में जहरीली शराब गरीबों की जान लेती रही।

घटनाएं अलग-अलग थीं।

कारण एक ही था।

नियमों को बोझ समझने वाली व्यवस्था।

इतिहास बार-बार चेतावनी देता है

1995 में हरियाणा के डबवाली में स्कूल समारोह के दौरान पंडाल में आग लगी। तीन सौ से अधिक लोग मारे गए। अधिकांश बच्चे थे।

1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा में 59 लोग फिल्म देखने गए थे। वे लौटकर घर नहीं आए। बंद निकास, अवैध निर्माण और सुरक्षा नियमों की अनदेखी ने उन्हें मौत के हवाले कर दिया।

2001 में तमिलनाडु के एरवाडी में मानसिक रोगियों को जंजीरों से बांधकर रखा गया था। आग लगी तो वे भाग भी नहीं सके। 28 लोग जिंदा जल गए।

2004 में कुंभकोणम के स्कूल में फूस की छत और संकरी सीढ़ियां 94 बच्चों की चिता बन गईं।

2011 में कोलकाता का एएमआरआई अस्पताल, जो जीवन बचाने के लिए बना था, खुद मौत का जाल बन गया। 95 लोगों की दम घुटने से मौत हुई।

हर बार जांच बैठी।

हर बार रिपोर्ट आई।

हर बार वादे किए गए।

और हर बार कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो गया, मानो कुछ हुआ ही न हो।

सिवाकासी की पटाखा फैक्ट्रियां आज भी समय-समय पर फटती हैं। अखबारों में तस्वीरें छपती हैं। नेता संवेदना व्यक्त करते हैं। मुआवजे घोषित होते हैं। फिर वही पुराना खेल शुरू हो जाता है।

एक राष्ट्रीय बीमारी

इसे मैं "भोपाल त्रासदी सिंड्रोम" कहता हूं।

यह कोई चिकित्सकीय बीमारी नहीं है। यह हमारी प्रशासनिक संस्कृति का स्थायी रोग है।

इसके लक्षण बेहद परिचित हैं।

नियमों को विकास विरोधी बताओ।

निरीक्षण को आय का स्रोत बना दो।

शिकायतों को फाइलों में दबा दो।

चेतावनियों को नजरअंदाज करो।

हादसा होने दो।

फिर जांच समिति बना दो।

कुछ छोटे अधिकारियों को निलंबित कर दो।

मुआवजे की घोषणा कर दो।

और अगले हादसे का इंतजार करो।

इस पूरी प्रक्रिया में वे लोग शायद ही कभी पकड़े जाते हैं जिन्होंने अवैध निर्माण को संरक्षण दिया, जिन्होंने एनओसी को व्यापार बना दिया, जिन्होंने जहरीली शराब या असुरक्षित फैक्ट्रियों को राजनीतिक और प्रशासनिक छतरी प्रदान की।

व्यवस्था के बड़े खिलाड़ी अक्सर बच निकलते हैं।

बलि हमेशा छोटे लोग चढ़ते हैं।

बयान कभी नहीं बदलते

देश बदल गया।

तकनीक बदल गई।

सरकारें बदल गईं।

लेकिन हर त्रासदी के बाद सुनाई देने वाले वाक्य नहीं बदले।

"दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।"

"उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।"

"मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाएगा।"

इन वाक्यों को सुनते-सुनते देश की कई पीढ़ियां बड़ी हो चुकी हैं।

भोपाल ने दुनिया को सिखाया था कि सुरक्षा पर खर्च किया गया पैसा कभी व्यर्थ नहीं जाता।

हमने उससे शायद एक अलग ही सबक सीखा।

कि समय सबसे बड़ा क्लीनर है।

कुछ साल बीत जाएंगे।

जनता भूल जाएगी।

मीडिया नया विषय ढूंढ लेगा।

फाइलों पर धूल जम जाएगी।

और दोषी फिर किसी नई फाइल पर हस्ताक्षर कर रहे होंगे।

आखिर कब तक?

जब बिना फायर एनओसी के होटल चलते हैं, जब अवैध मंजिलें खड़ी होती हैं, जब पुलों का निरीक्षण केवल कागजों पर होता है, जब फैक्ट्रियां सुरक्षा नियमों को मजाक समझती हैं, तब मौत अचानक नहीं आती।

उसे बुलाया जाता है।

उसके लिए रास्ता बनाया जाता है।

इन मौतों को "दुर्घटना" कहना एक राष्ट्रीय आत्म-छल है।

इनके जन्म प्रमाण पत्र पर पहले से ही लालच, भ्रष्टाचार और मिलीभगत के हस्ताक्षर दर्ज होते हैं।

जब तक बड़े संरक्षक बचते रहेंगे और छोटे कर्मचारी बलि के बकरे बनते रहेंगे, तब तक हर आग, हर ढहती इमारत, हर जहरीली बोतल और हर टूटा पुल हमें एक ही बात याद दिलाता रहेगा: 

मौत नई होती है।

लापरवाही पुरानी होती है।

शव बदल जाते हैं।

व्यवस्था नहीं।

और शायद यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है कि भोपाल कभी गया ही नहीं।


Friday, June 5, 2026

 


भगवा लहर या सभ्यतागत बदलाव?

असम और बंगाल की जीत ने बदल दी भारतीय राजनीति की दिशा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 जून 2026

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इतिहास हर रोज़ नहीं बदलता। कभी-कभी एक चुनाव ऐसा मोड़ लेकर आता है जो आने वाले दशकों की दिशा तय कर देता है। 2026 के विधानसभा चुनावों में असम और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत को उसके समर्थक ऐसे ही एक मोड़ के रूप में देख रहे हैं।

उनका मानना है कि यह सिर्फ सरकार बदलने की कहानी नहीं है। यह उस लंबे राजनीतिक और सांस्कृतिक सफर का नया पड़ाव है जो सदियों पहले शुरू हुआ था।

भारत ने लगभग आठ सौ वर्षों तक पहले मुस्लिम सल्तनतों और बाद में ब्रिटिश हुकूमत का दौर देखा। आज़ादी के बाद सत्ता भारतीय हाथों में आई, लेकिन राजनीति का केंद्र लंबे समय तक कांग्रेस के इर्द-गिर्द रहा। भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप रहा है कि समय के साथ धर्मनिरपेक्षता का मतलब संतुलन नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बन गया। उनका कहना है कि बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक पहचान को अक्सर संकोच और अपराधबोध के साथ देखने की कोशिश की गई।

असम और बंगाल के नतीजे इस सोच के खिलाफ जनता के फैसले के रूप में पेश किए जा रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए दो सौ से अधिक सीटें जीत लीं। एक दशक पहले तक राज्य में उसकी मौजूदगी लगभग नगण्य थी। दूसरी ओर, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, जो वर्षों से बंगाल की राजनीति पर छाई हुई थी, बुरी तरह सिमट गई।

असम में भी भाजपा ने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व में पार्टी ने अपना जनाधार और मजबूत किया। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि असम में पहचान, घुसपैठ और स्थानीय संस्कृति जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं।

इन चुनाव परिणामों ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उभरी उस धारणा को भी कमजोर किया है जिसमें कहा जा रहा था कि भाजपा का प्रभाव घट रहा है। भले ही पार्टी को लोकसभा में पहले से कम सीटें मिली थीं, लेकिन उसके बाद हुए कई राज्यों के चुनावों ने दिखाया कि उसका संगठन और जनाधार अब भी मजबूत है।

भाजपा की सफलता के पीछे केवल सांस्कृतिक मुद्दे ही नहीं हैं। पार्टी ने पिछले वर्षों में गरीबों के लिए आवास, गैस कनेक्शन, शौचालय, स्वास्थ्य बीमा और बुनियादी सुविधाओं की योजनाओं को भी बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाया। समर्थकों का तर्क है कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और विकास की राजनीति का यह मेल भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने बंगाल के परिणाम को "वैचारिक भूकंप" बताया है। उनके अनुसार यह चुनाव दिखाता है कि हिंदू पहचान और सनातन परंपराओं को अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र से बाहर नहीं रखा जा सकता। उनका कहना है कि केवल भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही इस विचारधारा का विश्वसनीय प्रतिनिधित्व करते हैं।

हालांकि आलोचक इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में किसी भी एक विचारधारा का वर्चस्व स्वस्थ नहीं माना जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि आज भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक पहचान का सवाल पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

दक्षिण भारत में भी राजनीतिक बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि केरल में भी पारंपरिक राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। भले ही भाजपा अभी वहां सत्ता से दूर हो, लेकिन उसकी मौजूदगी पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देने लगी है।

भारत की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। जाति, वर्ग और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी चुनावी फैसलों को प्रभावित कर रही है। यही वजह है कि भाजपा का संदेश देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में असर डाल रहा है।

बंगाल की जीत का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। यह राज्य लंबे समय से विपक्ष का एक बड़ा गढ़ माना जाता था। यदि भाजपा वहां स्थायी रूप से अपनी जड़ें जमा लेती है, तो विपक्षी गठबंधनों की रणनीति पर गहरा असर पड़ सकता है।

लेकिन इतना तय है कि असम और बंगाल के चुनावों ने एक नया संदेश दिया है। भारत का एक बड़ा वर्ग अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को खुलकर राजनीतिक अभिव्यक्ति देने लगा है। भाजपा के समर्थक इसे सभ्यतागत पुनर्जागरण कहते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण का परिणाम मानते हैं।

सच जो भी हो, भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। और फिलहाल ऐसा लगता है कि भगवा राजनीति केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि एक लंबी वैचारिक यात्रा का हिस्सा बन चुकी है

Thursday, June 4, 2026

 वो रात जब रोशनी टिकी रही

अंधेरे से आत्मनिर्भरता तक: भारत की सौर क्रांति की गाथा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 जून 2026

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सावित्री देवी को वह शाम आज भी याद है जब उनकी बेटी ने किताब पढ़ते समय आंखें सिकोड़ना बंद कर दिया था।

उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में वर्षों तक बारह साल की प्रिया मिट्टी के तेल की ढिबरी के सामने बैठकर पढ़ती थी। पीली, कांपती हुई लौ। धुएं से भरा कमरा। आंखों में जलन। कई बार तेल खत्म हो जाता और पढ़ाई भी।

फिर पिछले साल उनकी छत पर एक सौर पैनल लग गया।

"पहली रात वह बल्ब को ही देखती रह गई," सावित्री हंसते हुए बताती हैं। "उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि रोशनी यूं ही बनी रहेगी।"

रोशनी बनी रही।

आज प्रिया अपनी कक्षा में अव्वल आई है और डॉक्टर बनने का सपना देख रही है।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां कभी अंधेरा ही उस की पहचान थी और अब उजाला बदलाव का प्रतीक बन रहा है।

हिमालय की दुर्गम घाटियों से लेकर राजस्थान के तपते रेगिस्तान तक, गांवों की तस्वीर बदल रही है। छतों पर चमकते सौर पैनल दिखाई देते हैं। पंचायत भवनों के बाहर सौर लाइटें जगमगाती हैं। स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, आंगनबाड़ी और सामुदायिक भवन सौर ऊर्जा से रोशन हो रहे हैं। घरों में इन्वर्टर, बैटरियां और सोलर लैम्प आम होते जा रहे हैं।

जहां कभी शाम ढलते ही जिंदगी ठहर जाती थी, वहां अब रात भी काम और पढ़ाई का समय बन रही है।

कर्नाटक के नांजानगुड़ कस्बे के पास एक गांव में मीरा नाम की दर्जिन पहले सूर्यास्त के साथ अपना काम समेट देती थीं। बिजली का कोई भरोसा नहीं था। कभी आती, कभी नहीं। कई बार वोल्टेज इतना तेज होता कि मशीन खराब हो जाती। फिर सरकारी योजना के तहत उन्हें सोलर इन्वर्टर और बैटरी सिस्टम मिला।

अब वह रात नौ-दस बजे तक सिलाई करती हैं। उनकी आमदनी लगभग दोगुनी हो गई है। उन्होंने अपनी भतीजी को भी काम पर रख लिया है।

वह मुस्कुराकर कहती हैं, "पहले मैं सूरज के पीछे भागती थी, अब सूरज मेरे लिए काम करता है।"

यह एक साधारण-सा मजाक है, लेकिन इसके पीछे भारत की बड़ी ऊर्जा कहानी छिपी है।

दशकों तक भारत की अर्थव्यवस्था आयातित तेल और गैस पर निर्भर रही। आज भी देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। दुनिया में कहीं युद्ध छिड़े या तेल उत्पादक देशों में संकट आए, असर भारत के पेट्रोल पंपों और रसोईघरों तक पहुंच जाता है।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया है।

इस बदलाव का सबसे विशाल प्रतीक गुजरात के कच्छ के रण में दिखाई देता है।

जहां कभी केवल नमक, रेत और वीरानी थी, वहां आज दुनिया की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में से एक आकार ले रही है। लगभग 72,600 हेक्टेयर में फैला खावड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क भविष्य में 30 गीगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता रखेगा।

यह इतनी बिजली होगी कि लगभग डेढ़ से दो करोड़ घर रोशन हो सकें।

सौर पैनलों की अंतहीन कतारें। दूर-दूर तक घूमती पवन चक्कियां। और उनके बीच बहती रेगिस्तानी हवा।

एक इंजीनियर ने वहां काम करते हुए कहा था, "ऐसा लगता है जैसे भविष्य यहां बाकी दुनिया से पहले आ गया हो।"

लेकिन इस क्रांति का असली अर्थ उन लोगों की जिंदगी में दिखाई देता है जिनके लिए बिजली कभी एक विलासिता थी।

बिहार के किसान मिथलेश की समस्या रोशनी नहीं, पानी थी। डीजल पंप चलाने में खर्च बहुत आता था। कभी सिंचाई करते, कभी खर्च बचाते। दोनों साथ संभव नहीं थे।

सरकारी सहायता से उन्होंने अपने खेत में सोलर पंप लगवाया।

आज उनकी सिंचाई लगभग मुफ्त है। इस वर्ष उन्होंने दूसरी फसल भी उगाई है। हरे-भरे खेत को देखते हुए वह कहते हैं, "मुझे लगा था यह भी किसी सरकारी वादे जैसा होगा। लेकिन यह चल रहा है, और अच्छी तरह चल रहा है।"

देशभर में ऐसी लाखों कहानियां जन्म ले रही हैं।

आंध्र के रमेश रेड्डी जो एक इंजीनियर हैं, कहते हैं, "लद्दाख में विशाल सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं विकसित हो रही हैं। राजस्थान अपनी सौर क्षमता बढ़ा रहा है। तमिलनाडु, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्क बन रहे हैं। गुजरात और तमिलनाडु के समुद्री तटों पर अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं की तैयारी चल रही है।"

ऊर्जा विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत अब हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी बड़ा दांव लगा रहा है। 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। रिलायंस, अडानी, एनटीपीसी और ओएनजीसी जैसी कंपनियां इस दिशा में भारी निवेश कर रही हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 190 गीगावाट से आगे निकल चुकी है। पीएम सूर्य घर और पीएम-कुसुम जैसी योजनाएं लाखों परिवारों और किसानों तक सौर ऊर्जा पहुंचा रही हैं।

चुनौतियां अभी भी हैं। भंडारण तकनीक महंगी है। कई क्षेत्रों में बिजली ग्रिड कमजोर है। हर गांव तक चौबीसों घंटे भरोसेमंद बिजली पहुंचाने का सफर अभी अधूरा है।

लेकिन बदलाव शुरू हो चुका है।

दूरस्थ स्वास्थ्य केंद्रों में अब टीके सुरक्षित रखे जा सकते हैं। दुकानदार देर तक दुकानें खोलते हैं। बच्चे रात में पढ़ते हैं। महिलाएं अतिरिक्त काम कर आय बढ़ा रही हैं। किसान कम लागत में अधिक उत्पादन कर रहे हैं।

और उत्तराखंड की वह लड़की, प्रिया?

वह अब रात के खाने के बाद पढ़ती है। एक ऐसे बल्ब की रोशनी में जो कांपता नहीं। जो बुझता नहीं। जो हर शाम उसे यह भरोसा देता है कि उसके सपनों का रास्ता अब अंधेरे में नहीं खोएगा।

भारत की सौर क्रांति की असली कहानी शायद गीगावाट, निवेश और सरकारी योजनाओं में नहीं छिपी है।

वह उस स्थिर रोशनी में दिखाई देती है जो पहली बार करोड़ों लोगों के घरों, खेतों और सपनों में टिक गई है।

Tuesday, June 2, 2026

 State of the environment in Taj Trapezium Zone

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विश्व पर्यावरण दिवस 2026

ताज ट्रेपेजियम ज़ोन की पर्यावरणीय स्थिति रिपोर्ट

रिवर कनेक्ट अभियान

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Introduction 

ताज बचाना है तो पर्यावरण बचाना होगा

ताजमहल केवल एक स्मारक नहीं है। यह भारत की पहचान, सांस्कृतिक विरासत और करोड़ों लोगों की भावनाओं का प्रतीक है। लेकिन विडम्बना यह है कि जिस पर्यावरण ने सदियों तक ताजमहल को सुरक्षित रखा, वही आज गंभीर संकट में है। वायु प्रदूषण, यमुना नदी की दुर्दशा, घटती हरियाली, बढ़ता शोर और अनियंत्रित शहरीकरण ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (टीटीज़ेड) की पर्यावरणीय सेहत को लगातार कमजोर कर रहे हैं।

टीटीज़ेड क्या है?

ताज ट्रेपेजियम ज़ोन लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर का पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र है, जिसमें आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस, एटा तथा राजस्थान का भरतपुर क्षेत्र शामिल है। इस क्षेत्र में ताजमहल, आगरा किला, फतेहपुर सीकरी सहित 40 से अधिक राष्ट्रीय महत्व के स्मारक स्थित हैं।

1993 से शुरू हुई जनहित याचिकाओं और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक हस्तक्षेप ने इस क्षेत्र के संरक्षण की नींव रखी। न्यायालय ने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर नियंत्रण, कोयला और कोक के उपयोग पर प्रतिबंध तथा स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए।

अदालत के आदेशों से क्या बदला?

1990 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद लगभग 292 प्रदूषणकारी इकाइयों को प्राकृतिक गैस अपनानी पड़ी या उन्हें स्थानांतरित किया गया। इससे शुरुआती वर्षों में सल्फर डाइऑक्साइड और धूलकणों के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई।

टीटीज़ेड प्राधिकरण का गठन हुआ, हरित पट्टियों के विकास की योजनाएँ बनीं और प्रदूषण नियंत्रण को कानूनी आधार मिला। 

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लेकिन तीन दशक बाद स्थिति फिर चिंताजनक होती दिखाई दे रही है।

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वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति : 2025-26

1. वायु प्रदूषण : ताज की सबसे बड़ी चुनौती

आगरा की वायु गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है। पीएम-10 का वार्षिक औसत स्तर राष्ट्रीय मानक से तीन गुना से अधिक दर्ज किया गया है। सर्दियों और मानसून के बाद स्थिति और गंभीर हो जाती है।

प्रमुख कारण हैं:

• वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या

• निर्माण कार्यों से उड़ती धूल

• डीजल जनरेटर

• छोटे और मध्यम उद्योगों से उत्सर्जन

• कूड़ा एवं जैविक अवशेषों का खुले में जलाया जाना

हवा में मौजूद सूक्ष्म कण ताजमहल के संगमरमर पर जमकर उसे पीला और मटमैला बना रहे हैं। विशेषज्ञ इसे "स्टोन कैंसर" की प्रक्रिया बताते हैं।

2. यमुना नदी : जीवनदायिनी से नाले तक

ताजमहल के पीछे बहने वाली यमुना नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है।

नदी में बिना उपचारित सीवर, औद्योगिक अपशिष्ट और नालों का पानी लगातार गिर रहा है। कई स्थानों पर जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक है, जबकि घुलित ऑक्सीजन का स्तर इतना कम हो जाता है कि जलीय जीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है।

स्थिति की भयावहता के संकेत:

• नदी में दुर्गंध और विषैली गैसों का उत्सर्जन

• मछलियों और अन्य जलीय जीवों का लुप्त होना

• लाखों की संख्या में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया

• सूखते नदी तल से उड़ती धूल

यमुना का सूखा और उजाड़ स्वरूप ताजमहल की सुंदरता तथा उसकी नींव दोनों के लिए खतरा बनता जा रहा है।

3. शोर प्रदूषण : बढ़ता हुआ अदृश्य खतरा

आगरा के कई व्यस्त चौराहों और स्मारकों के आसपास ध्वनि स्तर निर्धारित मानकों से काफी ऊपर दर्ज किए गए हैं।

लगातार बढ़ता ट्रैफिक, निर्माण गतिविधियाँ और अनियंत्रित हॉर्न संस्कृति न केवल पर्यटकों के अनुभव को प्रभावित कर रही हैं बल्कि स्थानीय नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डाल रही हैं।

4. घटती हरियाली

टीटीज़ेड में वन क्षेत्र और हरित आवरण में गिरावट दर्ज की गई है। शहरी विस्तार, भूमि उपयोग परिवर्तन और अवैध कटान के कारण पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर चल रही वृक्ष गणना से वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद है, लेकिन वृक्षारोपण के साथ उनके संरक्षण और रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।

विरासत और पर्यावरण : एक ही सिक्के के दो पहलू

ताजमहल की सुरक्षा केवल स्मारक संरक्षण का विषय नहीं है। यह हवा, पानी, मिट्टी और जैव विविधता के संरक्षण से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न है।

प्रदूषित हवा संगमरमर को नुकसान पहुंचाती है। प्रदूषित यमुना ताज की पृष्ठभूमि और पारिस्थितिकी को प्रभावित करती है। सूखा नदी तल धूल का स्रोत बनता है। बढ़ता तापमान और घटती हरियाली पूरे क्षेत्र के पर्यावरणीय स्वास्थ्य को कमजोर कर रही है।

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रिवर कनेक्ट अभियान की प्रमुख मांगें

यमुना पुनर्जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता

सभी नालों के उपचार, सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता वृद्धि और नदी में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित किया जाए।

ताज डाउनस्ट्रीम बैराज का शीघ्र निर्माण

ताजमहल से लगभग डेढ़ किलोमीटर नीचे प्रस्तावित रबर डैम अथवा बैराज परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए ताकि नदी में जल उपलब्ध रहे, धूल कम हो और पारिस्थितिकी को सहारा मिले।

प्रदूषण की रियल टाइम निगरानी

वायु, जल और शोर प्रदूषण की निगरानी के लिए आधुनिक स्टेशन स्थापित कर आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

हरित क्षेत्र का विस्तार

स्थानीय प्रजातियों के बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और कम से कम तीन वर्षों तक उनके रखरखाव की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

स्वच्छ परिवहन व्यवस्था

भारी वाहनों को शहर से बाहर मोड़ा जाए, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन दिया जाए और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण अनिवार्य बनाया जाए।

जवाबदेही और पारदर्शिता

टीटीज़ेड प्राधिकरण द्वारा प्रतिवर्ष पर्यावरणीय स्थिति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तथा स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था हो।

निष्कर्ष

तीन दशक पहले न्यायपालिका ने ताजमहल और उसके पर्यावरण को बचाने की दिशा दिखाई थी। आज आवश्यकता है कि सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान, नागरिक समाज और आम जनता मिलकर उस संकल्प को फिर से जीवित करें।

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 पर रिवर कनेक्ट अभियान यह स्पष्ट संदेश देता है कि ताजमहल का भविष्य यमुना के भविष्य से जुड़ा है। यदि नदी बचेगी, हरियाली बचेगी और हवा स्वच्छ होगी, तभी आने वाली पीढ़ियाँ ताजमहल की वास्तविक सुंदरता देख सकेंगी।

ताज की रक्षा केवल विरासत संरक्षण नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का राष्ट्रीय संकल्प है।

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Released by

River Connect Campaign 

Convener Brij Khandelwal 

7895852750