सेक्स का बुखार: क्या दुनिया अब बिस्तर के इर्द-गिर्द घूम रही है?
_________________________
मोबाइल स्क्रीन से बेडरूम तक, कारोबार से राजनीति तक... आखिर सेक्स है क्या: सुख, शक्ति, सनक या सभ्यता का सबसे बड़ा जुनून?
_______________________
बृज खंडेलवाल द्वारा
26 जून 2026
__________________________
रात के दो बजे हैं।
दुनिया के तमाम शहर सो रहे हैं । सड़कें खाली हैं। लेकिन करोड़ों उंगलियां अब भी मोबाइल स्क्रीन पर फिसल रही हैं। कोई डेटिंग ऐप पर प्रेम खोज रहा है। कोई अश्लील सामग्री देख रहा है। कोई सोशल मीडिया पर अपनी खूबसूरती को "लाइक्स" में बदल रहा है। और कोई अकेलेपन, आकर्षण और इच्छाओं के बीच झूल रहा है।
तो क्या दुनिया को सचमुच सेक्स का बुखार चढ़ गया है?
आज सेक्स हर जगह दिखाई देता है। फिल्मों में, विज्ञापनों में, वेब सीरीज में, गीतों में, फैशन में और सोशल मीडिया में। देह एक उत्पाद बन गई है। आकर्षण एक पूंजी बन गया है। और इच्छा एक बाजार। किसी को सेक्सी बोलो तो खुशी होती है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या इंसान पहले से ज्यादा कामुक हो गया है, या फिर सेक्स केवल पहले से ज्यादा दिखाई देने लगा है?
सच शायद दोनों के बीच कहीं छिपा है।
सेक्स केवल शारीरिक संबंध नहीं है। यह जीवन की निरंतरता का आधार है। प्रकृति ने इसे प्रजनन के लिए बनाया था। लेकिन इंसान ने इसे प्रेम, आनंद, शक्ति, पहचान, कला, मनोरंजन और व्यापार से जोड़ दिया। आज सेक्स एक बहु-अरब डॉलर का वैश्विक उद्योग है। यह मनोरंजन का साधन भी है और कई लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा तथा व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रतीक भी।
लेकिन क्या यह हमेशा ऐसा ही था?
इतिहास बताता है कि सेक्स के प्रति मानव समाज का नजरिया समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन यूनान और रोम में प्रेम, सौंदर्य और कामुकता कला और साहित्य के महत्वपूर्ण विषय थे। मूर्तियों, चित्रों और कविताओं में इसका खुला चित्रण मिलता है। तब इसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता था।
फिर समय बदला।
यूरोप में ईसाई धार्मिक प्रभाव बढ़ने के साथ सेक्स को मुख्य रूप से विवाह और संतानोत्पत्ति तक सीमित करने की कोशिश हुई। मध्यकाल और बाद के विक्टोरियन युग में नैतिकता के नाम पर इच्छाओं पर नियंत्रण बढ़ा। विशेष रूप से महिलाओं की कामनाओं को संदेह और पाप की दृष्टि से देखा गया।
कुछ धर्मों, सभ्यताओं में सेक्स को पाप के रूप में देखा गया, लेकिन, भारत की कहानी कुछ अलग है।
करीब दो हजार वर्ष पहले रचित कामसूत्र आज भी दुनिया के सबसे चर्चित ग्रंथों में गिना जाता है। लेकिन यह केवल यौन मुद्राओं की किताब नहीं थी, जैसा कि आम धारणा बना दी गई है। इसके रचयिता वात्स्यायन ने इसे जीवन जीने की कला के रूप में प्रस्तुत किया था। इसमें प्रेम, आकर्षण, संवाद, सामाजिक व्यवहार, सौंदर्यबोध, विवाह और भावनात्मक संतुलन तक की चर्चा मिलती है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि कामसूत्र स्त्री की इच्छा और उसके सुख को भी महत्व देता है। उस दौर के अनेक समाजों की तुलना में यह दृष्टिकोण कहीं अधिक प्रगतिशील माना जा सकता है।
फिर ऐसा क्या हुआ कि आज दुनिया में सेक्स को लेकर इतनी खुली चर्चा दिखाई देती है?
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण 1960 के दशक की यौन क्रांति थी। गर्भनिरोधक गोलियों के व्यापक उपयोग ने पहली बार करोड़ों लोगों को गर्भधारण के भय से काफी हद तक मुक्त कर दिया। सेक्स और प्रजनन के बीच का पारंपरिक संबंध कमजोर पड़ने लगा।
यहीं से समाज में बड़ा बदलाव शुरू हुआ।
लोगों ने विवाह पूर्व संबंधों को अधिक स्वीकार करना शुरू किया। शादी की उम्र बढ़ी। शिक्षा और करियर प्राथमिकता बने। इंटरनेट ने सांस्कृतिक सीमाओं को ध्वस्त कर दिया। पोर्नोग्राफी, डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया ने यौन अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व दृश्यता प्रदान की।
आज का युवा उस दुनिया में बड़ा हो रहा है जहां सेक्स हर जगह मौजूद है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।
कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि कुछ देशों में किशोरों और युवाओं के बीच वास्तविक यौन गतिविधियों में कमी आई है। यौन रोगों, सहमति, व्यक्तिगत सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने व्यवहार को प्रभावित किया है। यानी सेक्स की चर्चा और दृश्यता बढ़ी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति पहले से अधिक यौन सक्रिय है।
सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर का मानना है कि अत्यधिक व्यावसायीकरण ने सेक्स को एक उत्पाद में बदल दिया है। सोशल मीडिया की तुलना संस्कृति, अवास्तविक अपेक्षाएं और पोर्नोग्राफी की लत रिश्तों को कमजोर कर सकती है। कई युवा प्रदर्शन के दबाव, शरीर की छवि और आत्मविश्वास की कमी से भी जूझ रहे हैं।
दूसरी ओर, डॉ. विजयधूत का तर्क है कि खुलापन लोगों को शर्म और अपराधबोध से मुक्त करता है। सहमति, लैंगिक समानता और विविध यौन पहचानों को स्वीकार करना आधुनिक समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। उनके अनुसार चुप्पी से अधिक नुकसान होता है, जबकि स्वस्थ संवाद समझ पैदा करता है।
यहीं आधुनिक पश्चिमी सोच और भारतीय कामसूत्र दर्शन के बीच एक दिलचस्प अंतर दिखाई देता है।
समाजशास्त्री टी.पी. श्रीवास्तव के अनुसार आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत संतुष्टि पर जोर देता है। व्यक्ति की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है। इसके विपरीत कामसूत्र आनंद को जीवन के व्यापक संतुलन का हिस्सा मानता है। वहां सुख है, लेकिन जिम्मेदारी भी है। आकर्षण है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव भी है। इच्छा है, लेकिन उसके साथ संयम और संतुलन भी है।
शायद यही कारण है कि अनेक विद्वान मानते हैं कि भारत की प्राचीन सोच आज भी प्रासंगिक हो सकती है।
सामाजिक कार्यकर्ता विद्या जी कहती हैं कि इंसान की जैविक प्रकृति हजारों वर्षों में बहुत नहीं बदली है। बदला है उसका परिवेश। तकनीक ने इच्छाओं तक पहुंच आसान कर दी है। गर्भनिरोधकों ने पुराने भय कम कर दिए हैं। इंटरनेट ने कल्पनाओं को वैश्विक बना दिया है।
लेकिन एक सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सदियों पहले था।
क्या सेक्स केवल मनोरंजन है, या उससे कहीं अधिक?
इतिहास, संस्कृति और मानवीय अनुभव बताते हैं कि यह केवल शरीर का मामला नहीं है। इसमें भावनाएं हैं। रिश्ते हैं। जिम्मेदारियां हैं। संवेदनाएं हैं। जीवन की निरंतरता है। कुछ दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराएं तो इसे आत्मिक ऊर्जा का स्रोत भी मानती हैं।
अब तो जमाना प्राकृतिक सेक्स से काफी आगे निकल चुका है, एनिमल सेक्स से लेकर, LGBTQ और न जाने क्या क्या तक!!
शायद आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वतंत्रता और संतुलन के बीच रास्ता खोजे। आनंद और जिम्मेदारी के बीच पुल बनाए। बाजार और मानवीय संवेदना के बीच सामंजस्य स्थापित करे।
क्योंकि सेक्स जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब वह केवल उपभोग की वस्तु बन जाता है, तो उसकी मानवीय गहराई कहीं खोने लगती है।
और शायद यही बहस आने वाले वर्षों में और तेज होने वाली है।
आखिर सवाल सेक्स का नहीं है।
सवाल यह है कि हम इंसान होने का अर्थ किस तरह समझते हैं।