Sunday, August 30, 2026

 


सितंबर आते ही बज उठती थी Come September 

पूरा इंडिया नचा था हॉलीवुड की इस फिल्मी टयून पर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 September 2026

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जरा आंखें बंद कीजिए। धूल भरी सड़क है, आगे घोड़ी पर दूल्हा है, पीछे बारातियों की भीड़। अचानक बैंड वाला अपनी तुरही उठाता है और ऐसी धुन छेड़ देता है कि बूढ़े की मूंछ भी फड़कने लगे और जवान के पैर अपने-आप थिरकने लगें। 

यही था वह दौर, जब ‘Come September’ की धुन ने भारत की शादियों, पिकनिकों और महफिलों में ऐसी दस्तक दी कि वह विदेशी होकर भी बिल्कुल अपनी लगने लगी।

साठ के दशक में हॉलीवुड फिल्म Come September  भारत पहुंची और देखते ही देखते उसकी धुन दिलों पर छा गई।

इस धुन को बॉबी डैरिन ने रचा था। फिल्म में उनके साथ रॉक हडसन, जीना लोलोब्रिजिडा और सैंड्रा डी जैसे सितारे थे। डैरिन ने बारह-तार वाले गिटार पर इसकी शुरुआती धुन तैयार की थी। मकसद था: रोमांस भी हो, लय भी हो और उसमें थोड़ी शरारत भी। नतीजा ऐसा निकला कि गिटार, मैंडोलिन, एकॉर्डियन और बोंगो की आवाजें मिलकर ऐसी दिलकश रवानी पैदा कर गईं, कि बस हर कोई ट्विस्ट करने को आतुर।

भारत में इस धुन को किसी तर्जुमे की जरूरत नहीं पड़ी। इसमें बोल नहीं थे, लेकिन कहानी पूरी थी। उसमें जवानी थी, आजादी का अहसास था और जिंदगी को थोड़ा खुलकर जीने की गुंजाइश भी। मोहल्लों में बारात निकलती तो बैंड वाले फिल्मी गीतों के साथ पश्चिमी धुनों का भी तड़का लगा देते। ‘Come September’ बजते ही बारात का अनुशासन अक्सर छुट्टी पर चला जाता था। दूल्हे के रिश्तेदार, पड़ोसी और रास्ते के तमाशबीन, सबके पैर अपनी-अपनी पॉलिटिक्स करने लगते थे।

फिर बहुत सालों बाद आई: दूसरी कमाल की धुन, ब्राजील। आर्य बारोसो की मशहूर ब्राजीली रचना Aquarela do Brasil, जिसे दुनिया ने अलग-अलग वाद्य और ऑर्केस्ट्रा संस्करणों में जाना, भारत में भी एक खास पहचान बना चुकी थी। खासकर बैंड बाजों और ऑर्केस्ट्रा की दुनिया में इसकी लय ऐसी घुसी कि शहर ही नहीं, दूरदराज के कस्बों और गांवों की शादियों तक में इसकी गूंज सुनाई देती थी। कई बार बारातियों को यह भी मालूम नहीं होता था कि धुन ब्राज़ील की है। उनके लिए वह बस ‘बैंड वाले की जबरदस्त धुन’ थी।

यही तो संगीत का कमाल है। पासपोर्ट उसका अपना होता है, लेकिन दिलों पर कोई वीजा नहीं लगता।

‘Come September’ और ‘Brazil’ जैसी धुनों ने भारत में एक अजीब सांस्कृतिक घालमेल पैदा किया। ब्राज़ील की लय, हॉलीवुड की धुन और भारतीय बारात, तीनों एक ही सड़क पर मिल गए।  शादी की रौनक में ऐसा घुल जाता था जैसे समोसे में चटनी।

‘Come September’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी। धुन ऊपर जाती, नीचे आती और कानों में अटक जाती।  उस समय के ‘ट्विस्ट’ और आज के ‘फ्री स्टाइल’ के बीच शायद कोई औपचारिक समझौता नहीं था, लेकिन पैर अपना फैसला खुद कर लेते थे। विदेशी धुन भारतीय शादी के लिए तैयार थी, बस उसमें ढोल, नगाड़ा और थोड़ी देसी बेफिक्री जोड़नी थी।

बॉलीवुड भी भला पीछे कैसे रहता?

भारतीय संगीतकारों ने ‘Come September’ की लय और सुरों से प्रेरणा ली। इसकी छाप कई गीतों और बैकग्राउंड स्कोर में दिखाई दी। Hamraaz जैसी फिल्मों में इसकी गूंज महसूस हुई। बाद के दशकों में भी इसकी धुन नए रूपों में लौटती रही। राजा का ‘नजरें मिलीं, दिल धड़का’ और दूसरे लोकप्रिय गीतों में भी इस तरह की पश्चिमी लय का असर सुनाई दिया। भारतीय संगीतकार विदेशी धुनों को सुनते, उनमें से कोई टुकड़ा पकड़ते और उसे अपनी मिट्टी में रोप देते। फिर उससे एक नया पौधा निकलता, जिसमें विदेशी खुशबू भी होती और देसी रंग भी।


साठ और सत्तर के दशक की शादियों को याद कीजिए। न डीजे था, न लेजर लाइट, न कान फोड़ने वाले स्पीकर। एक बैंड था, कुछ चमकती तुरहियां थीं, ढोल था और उत्साहित बाराती थे। फिर भी मजा कम नहीं था। बल्कि शायद ज्यादा था।

आज बारात में डीजे होता है और गाने की आवाज इतनी तेज होती है कि दूल्हे को भी पता नहीं चलता कि उसकी शादी हो रही है या चुनाव प्रचार। उस जमाने में एक अच्छी धुन ही काफी थी।

‘Come September’ इसलिए याद रह गई क्योंकि उसने संगीत को केवल सुनने की चीज नहीं रहने दिया। उसने लोगों को चलाया, झुमाया और कुछ देर के लिए सामाजिक लिहाज की जंजीरें ढीली कर दीं।

‘Brazil’ ने भी यही काम अपनी अलग लय में किया। उसकी मस्ती भरी चाल ने भारतीय बारातों को बताया कि दुनिया बहुत बड़ी है, लेकिन नाचने के लिए जगह हर जगह मिल सकती है।

साठ साल से ज्यादा गुजर गए। लेकिन कभी-कभी किसी पुराने विवाह समारोह में वह धुन सुनाई पड़ जाती है तो बीता हुआ जमाना अचानक लौट आता है।

धूल उड़ती सड़क, रंगीन कपड़े, घोड़ी पर बैठा दूल्हा, हाथ में फूलों की माला और आगे-आगे उछलता बाराती।

तुरही बजती है: ‘Come September…’

और कहीं दूर से ‘Brazil’ की लय मिल जाती है।

तब समझ आता है कि संगीत की कोई सरहद नहीं होती। हॉलीवुड की धुन हो या ब्राज़ील की लय; भारत की बारात उसे अपना बना लेती है।

Saturday, August 29, 2026

 


यूपी की हवा में कौन-सा रुख? तिलचट्टों का शोर या योगी की हैट्रिक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

31 अगस्त 2026

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एक तरफ योगी की मजबूत सत्ता, सख्त कानून-व्यवस्था और चमकते एक्सप्रेसवे हैं। दूसरी तरफ बेरोजगार युवा, पेपर लीक और सोशल मीडिया पर गरजता एक अजीब नारा: “हम कॉकरोच हैं!”

चुनावी बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में सवाल गूंज रहा है: हवा किस तरफ है?

2027 की गर्मियों में 403 विधानसभा सीटों पर फैसला होगा। बहुमत के लिए 202 सीटें चाहिए। अगस्त 2026 के उपलब्ध सर्वेक्षणों में मुकाबला फिलहाल कांटे का दिखता है। भाजपा-एनडीए और सपा के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन लगभग बराबरी की जमीन पर खड़े नजर आते हैं।

लेकिन एक दिलचस्प फर्क है। मुख्यमंत्री पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ अभी भी अखिलेश यादव से काफी आगे दिखाई देते हैं। यानी पार्टी बनाम पार्टी मुकाबला कड़ा है, मगर चेहरे की लड़ाई में योगी का पलड़ा भारी है।

2012 में सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। 2017 में भाजपा ने 312 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 2022 में भाजपा 255 सीटों पर सिमटी, जबकि सपा 111 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी।

यूपी की राजनीति अब काफी हद तक भाजपा बनाम सपा हो चुकी है। बसपा कमजोर जरूर हुई है, लेकिन उसका वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। दो अंकों में रहने वाला उसका वोट प्रतिशत कई सीटों पर नतीजों का गणित बदल सकता है।

बूढ़ा हाथी अब अकेले युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन उसकी चिंघाड़ अभी भी कई मैदान हिला सकती है।

और अब मैदान में एक नया जीव चर्चा में है: कॉकरोच।

नाम सुनते ही मुस्कान आती है। मगर राजनीति में कभी-कभी मजाक भी गंभीर संकेत बन जाता है।

“हम कॉकरोच हैं”; यह नारा पहली नजर में हास्यास्पद लगता है। लेकिन इसके भीतर युवाओं की गहरी बेचैनी छिपी है। 18 से 25 वर्ष के लाखों मतदाता डिजिटल दुनिया में जीते हैं। उन्हें लंबे भाषणों से ज्यादा मीम, रील और वायरल वीडियो प्रभावित करते हैं।

उनके सामने सवाल बहुत असली हैं, नौकरी कहां है? भर्ती कब होगी? पेपर लीक क्यों होते हैं? परीक्षा होगी तो परिणाम कब आएगा?

यहीं से “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसा व्यंग्यात्मक नैरेटिव गंभीर हो जाता है। संदेश सीधा है: अगर व्यवस्था हमें बार-बार कुचलती है, तो हम कॉकरोच की तरह फिर उठ खड़े होंगे।

इस नैरेटिव की खासियत यह है कि इसमें जाति का झंडा नहीं है। इसमें हिंदुत्व का नारा भी नहीं है। यह सीधे रोजगार, शिक्षा और भर्ती व्यवस्था की नाकामी पर चोट करता है।

अगर यह आंदोलन सड़क से सोशल मीडिया तक फैलता है, तो भाजपा के युवा वोट में हलचल पैदा कर सकता है। तीन से पांच प्रतिशत वोट का मामूली झटका भी करीबी मुकाबलों वाली दर्जनों सीटों पर फर्क डाल सकता है।

राजनीति में जीत हमेशा अपने वोट बढ़ाने से नहीं मिलती। कभी-कभी सामने वाले के वोटर को घर बैठा देना ही काफी होता है।

फिर भी योगी सरकार की जमीन कमजोर नहीं है।

कानून-व्यवस्था उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। एक्सप्रेसवे, सड़कें, एयरपोर्ट, बिजली, राशन, आवास और निवेश जैसे मुद्दों ने सरकार को डिलीवरी और विकास की छवि दी है। राम मंदिर ने सांस्कृतिक राजनीति को भी नई ऊर्जा दी।

सबसे महत्वपूर्ण बात: भाजपा का संगठन मजबूत है। बूथ स्तर तक उसकी पकड़ है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग भी उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।

लेकिन दो कार्यकाल के बाद सवाल भी बदलते हैं।

अब आगे क्या?

यही भाजपा की असली परीक्षा है।

बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती में देरी, महंगाई, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी बहस के बड़े मुद्दे बन सकते हैं। युवा अब भाषण नहीं, नियुक्ति चाहता है।

स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी भी भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। मतदाता सरकार से संतुष्ट हो सकता है, लेकिन अपने विधायक से नहीं।

मतदाता की भाषा में कहें तो; “लखनऊ ठीक है साहब, लेकिन हमारे मोहल्ले का विधायक बदलना चाहिए!” आगरा में यही स्थिति है। जनता विधायकों से नाराज है, मगर झुकाव भाजपा की तरफ है। 

कुछ ब्राह्मण वर्गों में नाराजगी की चर्चाएं भी तेज हैं। “ठाकुर राज” जैसी शिकायतें सुनाई देती हैं। प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर असंतोष के स्वर हैं।

अखिलेश यादव इस मौके को भुनाना चाहते हैं। PDA की राजनीति में ‘P’ को पंडित तक ले जाने की कोशिश इसका संकेत है।

लेकिन नाराजगी का अर्थ वोट का पूरा हस्तांतरण नहीं होता। ब्राह्मणों का भाजपा से रिश्ता कई दशकों पुराना है। सपा की पुरानी यादव-केंद्रित छवि और कानून-व्यवस्था की पुरानी स्मृतियां भी उसके रास्ते में हैं।

अखिलेश ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को नई ऊर्जा दी। PDA के जरिए दलितों और गैर-यादव पिछड़ों तक पहुंच बढ़ी। लेकिन विधानसभा का चुनाव अलग खेल है।

यहां उम्मीदवार, बूथ प्रबंधन, स्थानीय समीकरण और छोटे सामाजिक गठजोड़ बहुत मायने रखते हैं। कांग्रेस अभी जूनियर पार्टनर है। छोटे दल और AIMIM जैसे खिलाड़ी कुछ सीटों पर वोट काट सकते हैं।

विपक्ष के पास मुद्दे हैं। संगठन भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। लेकिन अभी लहर दिखाई नहीं देती।

और मुद्दा होना तथा लहर होना; दो अलग चीजें हैं।

तो फिर हवा किस तरफ है?

अगस्त 2026 की तस्वीर में हवा किसी एक दिशा में तूफानी रफ्तार से नहीं बह रही। मुकाबला पिछली बार से निश्चित रूप से कठिन है। सत्ता विरोधी भावना मौजूद है, लेकिन अभी वह सुनामी नहीं बनी है।

कॉकरोच आंदोलन भाजपा के युवा वोट को प्रभावित कर सकता है। लेकिन उसका गैर-दलीय चरित्र विपक्ष के लिए भी जोखिम है। वह वोट में बदलेगा, मतदान से दूरी बनाएगा या केवल सोशल मीडिया का शोर रहेगा; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

आखिरकार चुनाव अभी दूर है। अगले दस महीनों में उम्मीदवार, गठबंधन, जातीय समीकरण और अंतिम समय का नैरेटिव बहुत कुछ बदल सकते हैं।

फिलहाल भाजपा के पास कई ठोस फायदे हैं, योगी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन, कानून-व्यवस्था की छवि, कल्याणकारी योजनाएं और दिखाई देने वाला विकास।

इसलिए शुरुआती तस्वीर साफ है:

मुकाबला कड़ा है, मगर हवा पूरी तरह बदली नहीं है।

अगर योगी सरकार बेरोजगारी और भर्ती की समस्या पर निर्णायक कदम उठाती है, युवाओं की नाराजगी कम करती है, स्थानीय विधायकों के खिलाफ असंतोष साधती है और सामाजिक संतुलन बनाए रखती है, तो भाजपा की बढ़त कायम रह सकती है।

2027 की कहानी अभी खुली किताब है। मगर शुरुआती पन्नों पर योगी का नाम साफ दिखाई देता है।

कॉकरोच शोर मचा सकते हैं। विपक्ष चुनौती दे सकता है। लेकिन चुनाव का फैसला अंततः काम, भरोसे और मतदाता के मूड से होगा।

और अगर अगले दस महीनों में सरकार प्रदर्शन मजबूत करती है, संगठन एकजुट रहता है और युवा असंतोष को समय रहते साध लिया जाता है, तो उत्तर प्रदेश में फिर इतिहास लिखा जा सकता है; 

योगी आदित्यनाथ की हैट्रिक।

क्योंकि चुनाव में नारा कुछ दिनों तक चलता है।

काम का हिसाब पांच साल तक चलता है।

 जब पूरा हिंदुस्तान गाता था: दूरदर्शन के यादगार विज्ञापन जिंगल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 अगस्त 2026

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एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब दूरदर्शन था। चैनल एक था, बातचीत एक थी और शाम को पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठकर टीवी देखता था।

रिमोट का आतंक नहीं था। मोबाइल की घंटी नहीं थी। रील्स और शॉर्ट्स नाम की कोई आफ़त नहीं थी। विज्ञापन आते थे तो लोग उठकर पानी लेने नहीं जाते थे। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे।

सत्तर से अस्सी और नब्बे के दशक,  भारतीय टेलीविजन विज्ञापन का सुनहरा दौर था। केबल टीवी ने अभी दस्तक नहीं दी थी। इंटरनेट तो किसी साइंस-फिक्शन कहानी का हिस्सा लगता था।

विज्ञापन छोटे थे, मगर उनका असर लंबा था। धुन सीधी थी, बोल आसान थे और संदेश दिल में उतर जाता था। आज के करोड़ों रुपये वाले विज्ञापन देखकर कभी-कभी लगता है, तब विज्ञापन बनाए जाते थे, आज विज्ञापन बनाए जाते हैं ताकि विज्ञापन बनते हुए दिखाई दें!

आइए, उन दिनों के कुछ दिलचस्प,  यादगार जिंगल याद करें।

निरमा — कानों में बस जाने वाला जिंगल

“Washing powder Nirma…”

इसके आगे किसी परिचय की जरूरत नहीं।

सफेद कपड़ों में घूमती लड़कियां, झाग और दूध जैसी सफेदी का दावा। निरमा का जिंगल घर-घर की धुन बन गया था।

मां गुनगुनाती थीं, बच्चे गुनगुनाते थे और पिताजी भी बोल भूलने का नाटक करते हुए पूरा जिंगल जानते थे।

निरमा ने साबित किया कि विज्ञापन में शेक्सपियर नहीं चाहिए। एक आसान धुन, कुछ सीधे शब्द और भरपूर दोहराव: बस, काम तमाम।

हमारा बजाज :  मध्यमवर्ग का राष्ट्रगीत

“बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।”

यह सिर्फ स्कूटर का विज्ञापन नहीं था। यह उभरते हुए भारतीय मध्यमवर्ग का सपना था।

स्कूटर पर बच्चे, पत्नी, पति और कभी-कभी रिश्तेदार भी। वही स्कूटर दफ्तर जाता था, बच्चों को स्कूल छोड़ता था और रविवार को पूरा परिवार पिकनिक पर ले जाता था।

बजाज ने वाहन नहीं बेचा। उसने आकांक्षा बेची।

लिरिल :  झरने के नीचे आज़ादी

“ला ला ला ला… लिरिल।”

झरना, झाग, ताजगी और बेफिक्री।

लिरिल ने साबुन को नहाने की चीज़ से उठाकर आज़ादी का प्रतीक बना दिया। नहाना अचानक एक रोमांचक अनुभव लगने लगा।

विज्ञापन ने साबुन कम बेचा, कल्पना ज्यादा बेची।

लाइफबॉय :  सेहत की पहरेदारी

“तंदुरुस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय।”

लाइफबॉय का अंदाज़ सीधा था। बीमारी और कीटाणुओं के खिलाफ मोर्चा खोलो और साबुन का इस्तेमाल करो।

न कोई बड़ी फिल्मी कहानी, न लंबा भाषण। बस समस्या, समाधान और याद रह जाने वाली धुन।

विक्स:  खिच-खिच का इलाज

“विक्स की गोली लो, खिच-खिच दूर करो।”

क्या शानदार सादगी थी!

गले में खिच-खिच हुई, विक्स की गोली आई और समस्या गई।

आज के विज्ञापन में पहले समस्या खोजी जाती है, फिर उपभोक्ता की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई जाती है और अंत में उत्पाद आता है। विक्स ने मामला दो पंक्तियों में निपटा दिया।

विको टर्मरिक :  छह शब्दों की बाज़ीगरी

“Vicco Turmeric, नहीं cosmetic.”

बस छह शब्द।

परंपरा, आयुर्वेद और भारतीयता को आधुनिक विज्ञापन भाषा में पैक कर दिया गया।

पीली ट्यूब घर-घर पहचानी जाने लगी। आज भी उसका नाम सुनते ही पुराना दूरदर्शन सामने आ जाता है।

रसना :  बचपन का स्वाद

“I love you, Rasna.”

रसना सिर्फ पेय नहीं था। वह गर्मियों की छुट्टियां थीं। घर में आए रिश्तेदार थे। रसोई में तैयार होता ठंडा शरबत था। बच्चों की खुशी थी।

उस छोटी-सी बच्ची की आवाज़ ने एक पाउडर को बचपन की याद बना दिया।

मैगी :  “मम्मी, मैं भूखा हूं!”

मैगी ने भारतीय रसोई में समय की नई परिभाषा लिखी।

“Fast to cook, good to eat.”

बच्चा भूखा है। मां व्यस्त है। समाधान सामने है, दो मिनट की मैगी।

बाद में दो मिनट पर बहस हो सकती है। लेकिन भारतीय मां और बच्चे के बीच मैगी की दोस्ती पर बहस की जरूरत नहीं।

पान पराग :  स्वागत में क्या है?

“पान पराग से स्वागत कीजिए।”

शम्मी कपूर, अशोक कुमार, बाराती और शादी का पूरा फिल्मी माहौल।

पान पराग ने भारतीय मेहमाननवाज़ी को विज्ञापन में बदल दिया। थोड़ा नाच, थोड़ा गाना, थोड़ा दिखावा और खूब सारा उत्सव।

भारतीय शादी में जितना ड्रामा होता है, विज्ञापन ने उतना ही स्क्रीन पर डाल दिया।

ओनिडा :  पड़ोसी की जलन

“Neighbour’s envy, owner’s pride.”

और वह शैतान!

ओनिडा ने टीवी को मनोरंजन के साधन से उठाकर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया।

आपके घर में टीवी है? तो पड़ोसी को जलना चाहिए!

यह उस बदलते भारत की निशानी थी, जहां उपभोक्तावाद धीरे-धीरे दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।

और भी बहुत कुछ था

लिज्जत पापड़ का “कुर्रम कुर्रम”, अमूल के चुटीले विज्ञापन, बजाज के भावुक अभियान और सबसे बढ़कर “मिले सुर मेरा तुम्हारा”, ये सब सिर्फ विज्ञापन नहीं थे। ये उस दौर की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा थे।

पियूष पांडे, प्रह्लाद कक्कड़ और कई दूसरे रचनात्मक लोगों ने भारतीय विज्ञापन को एक अलग ज़बान दी। उसमें हास्य था, भावना थी, संगीत था और सबसे बड़ी बात, भारतीय मिट्टी की खुशबू थी।

आज विज्ञापन की दुनिया बहुत बड़ी हो गई है। टीवी के साथ यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स और शॉर्ट्स की पूरी फौज खड़ी है।

ध्यान की अवधि घट गई है। हर कोई अगले तीन सेकंड में दर्शक को पकड़ लेना चाहता है। रचनात्मकता भी जैसे इंस्टेंट नूडल बन गई है, डालो, पकाओ और भूल जाओ।

आज का मोबाइल वह नया घरेलू तानाशाह है, जिसके सामने पूरा परिवार अलग-अलग स्क्रीन पर झुका बैठा है। रील्स और शॉर्ट्स हमारी जेबों में ऐसे घुस आए हैं जैसे बरसात में कॉकरोच।

शोर ज्यादा है। सनसनी ज्यादा है। उत्तेजना ज्यादा है। लेकिन याद रहने वाली रचनात्मकता शायद कम है।

तब एक जिंगल सालों चलता था। आज कई विज्ञापन एक सप्ताह में कूड़ेदान में चले जाते हैं।

शायद हमें दूरदर्शन के विज्ञापन नहीं, वह हिंदुस्तान याद आता है जो उनके साथ जुड़ा था।

एक चैनल था।

एक ड्राइंग रूम था।

पूरा परिवार था।

एक जिंगल बजता था।

और देखते-देखते पूरा हिंदुस्तान गाने लगता था:

“वॉशिंग पाउडर निरमा…”

क्या वह सचमुच बेहतर दौर था?

शायद नहीं।

लेकिन यकीनन वह ज्यादा अपना था।

Friday, August 28, 2026

 


छिपकलियों, कॉकरोचों और मेंढकों को भी समझना होगा: मौजूदा निज़ाम की निरंतरता क्यों ज़रूरी है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 अगस्त, 2026

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किसी भी मुल्क की सियासत में बदलाव ज़रूरी है, लेकिन हर बदलाव बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी जो व्यवस्था मुश्किलों के बावजूद स्थिर हो गई हो, उसे अचानक बदलना खुद एक बड़ा जोखिम बन जाता है। भारत के लिए 2014 के बाद का दौर इसी सवाल को बार बार उठाता है। क्या निरंतरता को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए कि बदलाव आकर्षक लगता है?

2014 के बाद भारत के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी खूबी सियासी स्थिरता रही है। सरकारें अपना कार्यकाल पूरा कर रही हैं और नीतियों को समय मिल रहा है। पहले की तरह बार-बार सत्ता बदलने और नीतियों के पलटने की बेचैनी अपेक्षाकृत कम हुई है।

निरंतरता का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी नीति को नतीजा देने का मौका मिलता है। हर नई सरकार अगर पुरानी लकीर मिटाकर नई लकीर खींचे, तो देश आगे बढ़ने के बजाय फाइलों में ही उलझा रहेगा।


भारत जैसे विशाल और विविध देश में केंद्र और राज्यों के रिश्ते बेहद अहम हैं। पिछले बारह वर्षों में विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के साथ केंद्र के रिश्तों को लेकर बहस और आरोप जरूर हुए हैं, लेकिन राष्ट्रपति शासन को सामान्य राजनीतिक हथियार बनाने की कोई परंपरा नहीं बनी।

संवैधानिक संस्थाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है। संसद, अदालतें, चुनाव व्यवस्था और पंचायतों से लेकर राज्यों तक लोकतांत्रिक संस्थाएं लगातार काम करती रही हैं। असहमति भी रही, विरोध भी हुआ और सड़कों पर आंदोलन भी हुए। मगर लोकतंत्र का पहिया चलता रहा।

यही किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा है। सरकार से सहमत होना लोकतंत्र नहीं है। असहमति के बावजूद व्यवस्था का चलते रहना लोकतंत्र है।


पिछले बारह साल फूलों की सेज नहीं रहे। आतंकवादी हमले हुए, नागरिक आंदोलनों ने सरकार को चुनौती दी और विपक्ष ने कई मुद्दों पर तीखा विरोध किया। संसद में भी खूब हंगामा हुआ और सियासी बयानबाज़ी ने कई बार मर्यादा की सीमा छुई।

फिर भी व्यवस्था बिखरी नहीं। विरोध अपनी जगह रहा और शासन अपनी जगह। आंदोलन हुए, लेकिन देश चलता रहा। यही सिस्टम की सहनशक्ति है।

लोकतंत्र कोई ऐसा पंखा नहीं है जिसे स्विच दबाते ही चलना शुरू कर दें। इसे चलाए रखने के लिए संस्थाओं, परंपराओं और जनता के भरोसे की जरूरत होती है।


अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की हैसियत बदली है। Brand India को लेकर आत्मविश्वास बढ़ा है। विदेशों में बसे भारतीयों ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं और समाजों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।

बड़ी ताकतों के दबाव के बीच भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश की है। अमेरिका हो, रूस हो या कोई और ताकत; नई दुनिया में भारत ने किसी एक खेमे का पिछलग्गू बनने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने की नीति अपनाई है।

बहुध्रुवीय दुनिया में यही रणनीतिक स्वायत्तता है। कभी दोस्ती, कभी दूरी और कभी दो टूक बात; कूटनीति में यही तो हुनर है।


अर्थव्यवस्था में चुनौतियां कम नहीं हैं। निर्यात पर दबाव है, वैश्विक बाजार अनिश्चित है और रोजगार से लेकर महंगाई तक कई सवाल हैं। फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने झटकों को झेलने की क्षमता दिखाई है।

कारोबार को आसान बनाने, उद्यमिता को बढ़ावा देने और नए कारोबारियों को अवसर देने की कोशिशों के नतीजे दिखाई देने लगे हैं। करोड़ों युवाओं की महत्वाकांक्षाएं भी अब नौकरी से आगे बढ़कर कारोबार और स्टार्टअप की ओर देख रही हैं।

अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत होती है भरोसे और स्थिर माहौल की। कारोबारी यह नहीं चाहते कि आज बनाई गई नीति कल किसी नए राजनीतिक प्रयोग के साथ कूड़ेदान में चली जाए।

इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ ठीक है

मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने की बात का अर्थ यह कतई नहीं कि सरकार से सवाल न पूछे जाएं। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है। गलत नीतियों पर सवाल उठना चाहिए और जहां सुधार की जरूरत हो, वहां सुधार होना चाहिए।

सरकार कोई दूध की धुली संस्था नहीं होती। सत्ता में रहते हुए गलतियां भी होती हैं और फैसलों पर बहस भी होनी चाहिए। मगर आलोचना और अराजकता में फर्क है।

देश को मजबूत विपक्ष भी चाहिए और जवाबदेह सरकार भी। लेकिन सिर्फ सरकार बदलने के लिए सरकार बदलना कोई नीति नहीं हो सकती।


सियासत में कुछ लोग हर पांच साल बाद नई बोतल में पुरानी शराब बेचने निकल पड़ते हैं। कोई कहता है सब बदल दो, कोई कहता है पूरा सिस्टम उलट दो। छिपकलियां दीवार पर चढ़ती-उतरती रहें, कॉकरोच इधर-उधर भागते रहें और मेंढक तालाब में टर्राते रहें; देश को आखिर आगे तो बढ़ना है।

बदलाव लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन बदलाव अपने आप में उपलब्धि नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि बदलाव से देश मजबूत होगा या कमजोर।

बारह साल में कोई व्यवस्था परिपूर्ण नहीं हो जाती। लेकिन अगर संस्थाएं काम कर रही हों, चुनाव हो रहे हों, सत्ता संवैधानिक दायरे में चल रही हो, अर्थव्यवस्था झटके झेल रही हो और दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनी जा रही हो, तो अचानक सब कुछ दांव पर लगाने की जरूरत क्या है?


मौजूदा निज़ाम को जारी रखने का तर्क किसी पार्टी के प्रति अंधभक्ति नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच का सवाल है। निरंतरता का अर्थ यह नहीं कि सरकार को खुली छूट दे दी जाए। इसका अर्थ है: जो अच्छा हुआ है, उसे आगे बढ़ाया जाए; जो गलत है, उसे सुधारा जाए।

देश बनाना कोई पांच साल का प्रोजेक्ट नहीं। यह पीढ़ियों का काम है। संस्थाएं और नीतियां बनने में साल लगते हैं, लेकिन उन्हें बिगाड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन आएगा? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था बनी है, उसे कौन संभालेगा?

भारत को प्रयोगशाला बनाने से पहले यह देखना होगा कि प्रयोग की कीमत कौन चुकाएगा।

स्थिरता को बचाना जड़ता नहीं है। कभी-कभी यही सबसे समझदार बदलाव होता है; बिना व्यवस्था बदले, व्यवस्था को बेहतर बनाना

 हिमालय में  मंडराता खतरा

चीन की हरकतों से सावधान रहना होगा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 अगस्त 2026

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26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत (चीन) सीमा पर एक भयंकर बाढ़ और मिट्टी का सैलाब आया। ऊँचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर गया। करीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी (नेपाल में भोटेकोशी) में जा गिरा। यह जगह रसुवागढ़ी-ग्यीरोंग सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मलबा नदी को कुछ देर के लिए रोक दिया। फिर पानी, कीचड़ और पत्थरों का तेज सैलाब नीचे की तरफ दौड़ पड़ा।

इस आपदा ने नेपाल के रसुवा और नuwाकोट जिलों (जिसमें स्याब्रुबेसी शामिल है) और चीन के ग्यीरोंग काउंटी को प्रभावित किया। अब तक 160 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और आंकड़ा बढ़ रहा है। दोनों तरफ सैकड़ों से लेकर एक हजार से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें कई विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं। गाँव, पुल, सड़कें और कई निर्माण नष्ट हो गए। बचाव कार्य जारी है, लेकिन आगे बाढ़ का खतरा बना हुआ है।

यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक चेतावनी है। हिमालय दुनिया के सबसे कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में से एक है। चीन ने भारत और नेपाल की सीमा पर सड़कें, सैन्य ठिकाने, सुरंगें, बाँध और बिजली परियोजनाएँ बड़े पैमाने पर बनाई हैं। इन कामों से पहाड़ों की ढलानें, नदियों का रास्ता और मिट्टी का संतुलन बिगड़ा है। चीन ने वैज्ञानिकों की चेतावनियों और नीचे रहने वाले देशों पर पड़ने वाले असर को बार-बार कम करके आँका है।

1978 में मैंने टिहरी बाँध के विवाद पर लिखा था और हिमालय में बड़े बाँध बनाने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। पानी, बिजली और विकास के फायदे तो हैं। लेकिन भूकंप वाले इलाके में और चीन की सीमा के पास इतने बड़े निर्माण के खतरे भी बहुत हैं। आलोचकों ने कहा था कि बड़ा भूकंप या कोई हादसा होने पर बाढ़ उत्तर भारत के मैदानों तक पहुँच सकती है। वही सवाल आज भी खड़ा है: क्या फायदे इतने बड़े खतरे के लायक हैं?

भूवैज्ञानिक लंबे समय से कहते आए हैं कि हिमालय पृथ्वी की पपड़ी का कमजोर और सक्रिय हिस्सा है। यहाँ लगातार उठान, दरारें और दबाव चल रहे हैं। ऊपरी शिवालिक की ढलानें चिकनी मिट्टी और रेत की वजह से अस्थिर हैं। बड़े निर्माण पहाड़ी पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकते हैं। पहाड़ों का तेज उठना और भूकंप की गतिविधि उनकी अस्थिरता को साफ दिखाती है। इसलिए इस इलाके में बड़े बाँध और जलाशय खास तौर पर खतरनाक हैं। ये बातें नई नहीं हैं। दशकों से वैज्ञानिक यही चेतावनी देते आए हैं।

चीन ने इन चेतावनियों को ज्यादातर नजरअंदाज किया है। शोधकर्ताओं ने बार-बार कहा है कि बाँध टूटने या ग्लेशियर झीलों के फटने से बड़ी तबाही हो सकती है। खुदाई, सुरंगें और बड़े जलाशय ढलानों को कमजोर कर सकते हैं और पानी के सिस्टम को बिगाड़ सकते हैं। फिर भी निर्माण काम चलते रहे, और नीचे वाले देशों को पूरी जानकारी कम ही दी गई। इस हफ्ते ग्लेशियर टूटा तो सैलाब ऐसे इलाके से गुजरा जहाँ पहले से काफी बदलाव हो चुके थे। तात्कालिक कारण प्राकृतिक लगता है: बर्फ और चट्टान का गिरना। लेकिन इतने बड़े निर्माण से पूरे इलाके का खतरा बढ़ जाता है। छोटे बदलाव भी यहाँ बड़ी तबाही ला सकते हैं।

पूर्व में भी यही रवैया दिखता है। चीन ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो) पर एक बहुत बड़ा बाँध बना रहा है, जो थ्री गॉर्जेस बाँध से भी बड़ा होगा। उस जगह के पास सक्रिय दरार भी पाई गई है। अगर भूकंप या कोई और हादसा हुआ तो पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के बड़े हिस्से बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। नीचे वाले देशों ने चिंता जताई है, लेकिन चीन निर्माण जारी रखे हुए है और खतरों की बात को कम करके बता रहा है।

26 अगस्त की यह आपदा सिर्फ स्थानीय घटना नहीं है। यह एक साफ चेतावनी है। चीन की तेज रफ्तार वाली ऊँचाई वाली परियोजनाओं ने इस कमजोर पहाड़ी क्षेत्र में खतरा बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों और नीचे रहने वाले लोगों की चेतावनियों को कम आँककर, और अपनी महत्वाकांक्षा को प्राथमिकता देकर, चीन ने और बड़ी घटनाओं की संभावना बढ़ा दी है। जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पहले से कमजोर हो रहे हैं। गलत जगह पर भारी निर्माण इस खतरे को और बढ़ा देता है।

क्षेत्रीय सरकारों, वैज्ञानिक संस्थाओं और नीचे रहने वाले लोगों को चीन की परियोजनाओं की पूरी जानकारी चाहिए। ग्लेशियर झीलों और कमजोर ढलानों की स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाकों में और बड़े निर्माण पर लगाम लगानी होगी। वरना ऐसी तबाही बार-बार हो सकती है। इस हफ्ते मारे गए लोगों और उजड़े गाँवों को सिर्फ प्राकृतिक हादसा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। ये उन फैसलों का नतीजा हैं जो ऐसे पहाड़ों में लिए गए जहाँ अस्थिरता की चेतावनी पीढ़ियों से दी जा रही है; और जिन्हें अभी भी नजरअंदाज किया जा रहा है।

Thursday, August 27, 2026

 बदलाव की दहलीज पर आगरा: ताज के साये से विकास के नए क्षितिज तक

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

28 अगस्त 2026

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आगरा शायद अब खुद को भी चौंकाने की तैयारी में है। सदियों से यह शहर एक खूबसूरत मगर कठिन दुविधा में जीता आया है। ताजमहल ने आगरा को दुनिया भर में शोहरत दी, लेकिन उसी ताज की हिफाजत के नाम पर औद्योगिक विकास पर तरह-तरह की पाबंदियां भी लगती रहीं। कारखाने शक की निगाह से देखे गए, नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरियों के जंगल से गुजरना पड़ा और हर बड़ी योजना फाइलों, समितियों, एनओसी व अदालतों के चक्कर काटती रही।

अब यह तस्वीर बदलती दिख रही है। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ताज ट्रेपेजियम जोन (लगभग 10,400 वर्ग किमी) में दो साल पुराना व्यापक प्रतिबंध हटाया। कोर्ट ने गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के करीब 400 लंबित आवेदनों पर टीटीजेड प्राधिकरण को विशेषज्ञ निगरानी (नीरी व सीईसी के प्रतिनिधियों की सहमति) के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी। इससे पर्यावरण मानकों के भीतर स्वच्छ उद्योगों के लिए रास्ता खुला है। विधानसभा चुनाव (अपेक्षित फरवरी-मार्च 2027) से पहले अगले महीने-वर्ष आगरा के इतिहास में निर्णायक साबित हो सकते हैं। कई परियोजनाएं पूरी होने के करीब हैं, अनेक निर्माणाधीन हैं और कई पाइपलाइन में हैं।

असली सवाल विकास और विरासत के बीच संतुलन साधने का है। आगरा को धुआं उगलती चिमनियां नहीं चाहिएं; उसे चाहिए स्वच्छ उद्योग, नई तकनीक, सेवा क्षेत्र, पर्यटन आधारित कारोबार और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग। ताज की हिफाजत भी जरूरी है और आगरा के नौजवानों को रोजगार भी।

आगरा की आर्थिक बुनियाद पहले से मजबूत है। यह देश के सबसे बड़े पर्यटन केन्द्रों में शामिल है। जूता उद्योग, संगमरमर की जड़ाई, हस्तशिल्प, कालीन, फाउंड्री, कांच के सामान और पेठा जैसे छोटे-मझोले कारोबार यहां की पुरानी पहचान हैं। शिक्षा क्षेत्र भी फैल रहा है। भौगोलिक स्थिति इसकी बड़ी ताकत है; दिल्ली, जयपुर, ग्वालियर, लखनऊ से सड़क-रेल कनेक्टिविटी शानदार है। यमुना एक्सप्रेसवे और अन्य मार्गों ने यात्रा का नक्शा बदल दिया है।

सबसे बड़ा बदलाव आगरा मेट्रो ला रही है। ताज ईस्ट गेट से मनकामेश्वर (करीब 6 किमी) प्राथमिक खंड मार्च 2024 से संचालित है। मनकामेश्वर से आईएसबीटी तक ट्रायल और सीएमआरएस निरीक्षण अगस्त 2026 में सफल रहे। कॉरिडोर-1 (सिकंदरा से ताज ईस्ट गेट, 14.25 किमी) नवंबर 2026 में पूर्ण संचालन के लक्ष्य पर है; सिकंदरा से ताज तक यात्रा समय घटकर करीब 28 मिनट रह जाएगा। कॉरिडोर-2 (आगरा कैंट से कालिंदी विहार) पर भी निर्माण तेज है। कभी तांगे-रिक्शे और जाम की पहचान वाला शहर आधुनिक जन परिवहन के युग में प्रवेश कर रहा है।

हवाई अड्डे का नया सिविल टर्मिनल भी उम्मीद जगा रहा है। अगस्त 2026 तक करीब 70 प्रतिशत काम पूरा; 30 नवंबर 2026 तक हैंडओवर का लक्ष्य। क्षमता बढ़कर लगभग 1400 यात्रियों तक पहुंचेगी, मल्टीलेवल पार्किंग, एयरोब्रिज और आधुनिक सुविधाएं होंगी। बेहतर कनेक्टिविटी पर्यटकों को दिल्ली से दिनभर की यात्रा के बजाय दो-तीन दिन रुकने के लिए प्रेरित कर सकती है।

सड़कों पर चौड़ीकरण, फ्लाईओवर, रेलवे ओवरब्रिज, नए पुल और ड्रेनेज योजनाएं शहर की सूरत बदल रही हैं। यमुना पर मेट्रो पुल समेत कई पुलों का काम आगे बढ़ रहा है। ग्रेटर आगरा की टाउनशिप और अटल टाउनशिप योजनाएं भीड़भाड़ वाले पुराने शहर से बाहर विकास फैलाने की कोशिश हैं; कई टाउनशिप में प्लॉट आवंटन प्रक्रिया चल रही है।

शिल्पग्राम के पास यूनिटी मॉल (लगभग 128 करोड़ रुपये) उत्तर प्रदेश के ओडीओपी व जीआई टैग उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प को बड़ा बाजार दे सकता है। अगस्त 2026 तक करीब 42 प्रतिशत काम पूरा; नवंबर लक्ष्य है, हालांकि गति पर प्रशासनिक निगरानी बढ़ी है। पर्यटन अब सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, मेहताब बाग, बटेश्वर और ब्रज क्षेत्र मिलकर बड़ा सर्किट बना रहे हैं। हेरिटेज वॉक, होमस्टे और बेहतर सुविधाएं रुकने की अवधि बढ़ा सकती हैं।

छत्रपति शिवाजी महाराज म्यूजियम (पहले मुगल म्यूजियम का नाम बदला गया) तेज गति से तैयार हो रहा है; लक्ष्य 2026 का अंत। कोठी मीना बाजार में शिवाजी स्मारक (50 फुट प्रतिमा, म्यूजियम आदि) पर भी काम आगे बढ़ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में एसएन मेडिकल कॉलेज को मिनी एम्स स्तर पर विकसित किया जा रहा है: किडनी ट्रांसप्लांट शुरू, क्रिटिकल केयर यूनिट और अन्य ब्लॉक निर्माणाधीन; पूर्ण रूप 2027 तक अपेक्षित। लेडी लॉयल अस्पताल का विस्तार भी चल रहा है। साइंस पार्क व नक्षत्रशाला (लगभग 40 करोड़) भूमि संबंधी बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ रहा है। कैलाश मंदिर का कायाकल्प चरणबद्ध तरीके से हो रहा है। हाईकोर्ट बेंच की मांग अभी भी लंबित है और अधिवक्ता आंदोलनरत हैं।

ताज के पास प्रस्तावित बैराज/रबर डैम वर्षों से एनओसी और अध्ययनों में अटका है; बजट आवंटित होने के बावजूद निर्माण शुरू नहीं हुआ। पर्यावरण संबंधी चिंताएं जायज हैं, मगर फाइलों को धूल खाने देना भी संरक्षण नहीं कहलाता। ब्यूरोक्रेसी की सुस्ती विकास की बड़ी बाधा बनी हुई है।

आगरा शहर की आबादी लाखों में है; मेट्रो क्षेत्र अनुमानित 25 लाख से अधिक। तेज बढ़ोतरी ने मकान, पानी, सीवर, सड़क, कचरा प्रबंधन और परिवहन पर दबाव डाला है। समाधान शहर की बढ़त रोकना नहीं, बल्कि समझदारी से बढ़ाना है।

अगले बारह महीने अहम हैं। मेट्रो का विस्तार, एयरपोर्ट टर्मिनल, नई सड़कें-पुल, टाउनशिप, पर्यटन परियोजनाएं और स्वच्छ उद्योगों पर नीतिगत फैसले मिलकर तकदीर बदल सकते हैं। आगरा चौराहे पर खड़ा है; एक रास्ता जाम, प्रदूषण और लालफीताशाही की तरफ; दूसरा स्वच्छ उद्योगों, बेहतर कनेक्टिविटी, रोजगार और आधुनिक विकास की ओर। अगर स्वच्छ उद्योग, आधुनिक बुनियादी ढांचा और पर्यावरण संरक्षण हमसफर बन जाएं, तो आगरा सिर्फ ताज का शहर नहीं, उत्तर भारत का बड़ा विकास केन्द्र बन सकता है।

Tuesday, August 25, 2026

 द ग्रेट समन्वय:

जब पूरब और पश्चिम की बनी खिचड़ी!

कितना भारतीय है आज का एवरेज इंडियन?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 अगस्त 2026

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देश भ्रमण के अनेक फायदे हैं। कूपमंडूकता और कई दृष्टि-भ्रम रास्ते में ही टूट जाते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम निकलें, तो बहुत से पूर्वाग्रह अपने आप ध्वस्त होते चलते हैं।

खूबसूरती से बदल रहा है भारत।

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आसमान को छूती कांच की इमारतें खड़ी हैं। बाजू में पुराना हनुमान जी का मंदिर है।

इमारत के भीतर युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ग्लोबल मार्केट की बातें कर रहे हैं। बाहर कोई जूते उतारकर मंदिर की घंटी बजाता है और श्रद्धा से हाथ जोड़ लेता है।

किसी को यह विरोधाभास नहीं लगता। यही तो आज का भारत है।

बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, गुरुग्राम या चंडीगढ़ चले जाइए। नज़ारा बदलता जाएगा, मगर कहानी एक ही मिलेगी। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, चमचमाते एयरपोर्ट, शॉपिंग मॉल और गगनचुंबी इमारतें शहरों का चेहरा बदल रही हैं। मोबाइल फोन हाथ का हिस्सा बन गया है। डिजिटल पेमेंट ने बटुए की जगह ले ली है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दफ्तरों, स्कूलों और घरों में दस्तक दे रही है।

भारत तेज़ी से भविष्य की ओर दौड़ रहा है। लेकिन अपना अतीत पीछे नहीं छोड़ रहा।

यहीं भारत की मौजूदा यात्रा की खूबसूरती है। यह केवल पश्चिमीकरण की कहानी नहीं है। न ही पुराने ज़माने में लौटने की ज़िद है।

यह दिलचस्प समन्वय है। पूरब की आत्मा और पश्चिम की आधुनिकता का संगम।

पुराने को कबाड़खाने में नहीं फेंका जा रहा। नए को आंख मूंदकर अपनाया भी नहीं जा रहा। भारत चुन रहा है, परख रहा है और फिर अपने रंग में ढाल रहा है।

हैदराबाद का रोहित अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी में काम करता है। दफ्तर में अंग्रेज़ी बोलता और नवीनतम तकनीक इस्तेमाल करता है। शाम को पूजा में शामिल होता है या परिवार के साथ त्योहार की तैयारी करता है। दोनों दुनिया उसके भीतर रहती हैं और आराम से साथ चलती हैं।

आज का भारतीय सिलिकॉन वैली की तरक्की से प्रभावित हो सकता है, मगर वाराणसी की गलियों से रिश्ता भी बनाए रखता है। वह क्वांटम फिजिक्स पढ़ सकता है और गीता में जीवन का अर्थ खोज सकता है। हवाई जहाज़ से सात समंदर पार जा सकता है, फिर भी गांव की मिट्टी नहीं भूलता।

एक ही मेज़ पर लैपटॉप और दीपक रखे हो सकते हैं। यही भारत का नया मिज़ाज है।

यह समन्वय अचानक पैदा नहीं हुआ।

भारत और पश्चिम के संपर्क ने अनेक संस्थागत बदलाव किए। औपनिवेशिक शासन शोषण और लूट से भरा था। फिर भी स्वतंत्र भारत ने कुछ आधुनिक संस्थाओं को अपनाया और लोकतांत्रिक उद्देश्यों के अनुसार ढाला।

संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, सिविल सर्विस, आधुनिक विश्वविद्यालय और लिखित कानून इसी प्रक्रिया का हिस्सा बने।

इन संस्थाओं ने आम आदमी के लिए नए रास्ते खोले।

कभी जन्म, जमीन और खानदान ही इंसान की हैसियत तय करते थे। आधुनिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं ने नए दरवाज़े खोले। साधारण परिवार का बच्चा विश्वविद्यालय पहुंच सकता था। गांव का लड़का या लड़की सरकारी नौकरी के लिए मुकाबला कर सकता था। नागरिक अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता था।

व्यवस्था आज भी मुकम्मल नहीं है। कमियां भी हैं, खामियां भी।

मगर ऊपर चढ़ने के लिए नई सीढ़ियां जरूर बनी हैं। एस्केलेटर्स भी हैं।

लोकतंत्र ने इस बदलाव में एक और ताकत जोड़ी।

मतपत्र ने उन लोगों को भी राजनीतिक महत्व दिया, जो सदियों तक सत्ता के गलियारों से दूर रहे। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने करोड़ों लोगों को राष्ट्रीय संवाद में शामिल किया।

भारत ने लोकतंत्र को रेडीमेड मशीन की तरह नहीं अपनाया। उसने इसे अपने ढंग से भारतीय बनाया।

चुनाव जनभागीदारी के बड़े मेले बन गए। जाति, भाषा, क्षेत्र और समुदाय राजनीति में आए, लेकिन उनके साथ नई उम्मीदें और आकांक्षाएं भी आईं।

जिनकी आवाज़ पहले कमजोर थी, वे धीरे-धीरे मंच तक पहुंचने लगे।

पश्चिम से आया संस्थागत ढांचा भारतीय समाज की धड़कन से जुड़ गया।

सामाजिक सुधार की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही।

स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों के आधुनिक विचारों ने भारतीय चिंतकों को प्रभावित किया। मगर सुधार केवल बाहर से नहीं आया। समाज सुधारकों ने आधुनिक तर्क और अपनी नैतिक-धार्मिक परंपराओं, दोनों का सहारा लेकर कुरीतियों को चुनौती दी।

एक तरफ नए विचार थे। दूसरी तरफ अपनी जड़ें थीं। दोनों ने मिलकर बदलाव की जमीन तैयार की।

शिक्षा पूरब और पश्चिम के बीच सबसे मजबूत पुल बनी। आधुनिक स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने वैज्ञानिक सोच, सवाल करने की आदत और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया। अंग्रेज़ी, औपनिवेशिक विरासत के बावजूद, अनेक भाषाओं वाले देश में उपयोगी संपर्क भाषा बनी।

तमिलनाडु का वेंकटेश दिल्ली में काम कर सकता है। बिहार का इंजीनियर दिनेश चेन्नई में नौकरी पा सकता है। बंगाल का सुब्रतो बेंगलुरु में पढ़ सकता है।

आधुनिक संचार ने दूरी घटाई।

दूरी घटी तो अवसर बढ़े।

रेलवे, तार और डाक व्यवस्था पहले प्रशासनिक जरूरतों के लिए बनाई गई थीं। बाद में उन्होंने भारत के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ दिया। विचार तेजी से फैले। अखबारों की पहुंच बढ़ी। राष्ट्रीय आंदोलन को नई ताकत मिली।

इतिहास भी कभी-कभी अजीब मज़ाक करता है। साम्राज्य के लिए बनी सुविधाएं राष्ट्रीय एकता की ताकत बन गईं।

आर्थिक आधुनिकता ने भी समाज का ढांचा बदला। उद्योग, व्यापार, बैंकिंग और शहरों में रोजगार ने पारंपरिक पेशों की दीवारें कमजोर कीं। बेटे को हमेशा पिता का काम नहीं करना पड़ा। बेटी को भी पुरानी सीमाओं में कैद रहना जरूरी नहीं रहा।

शिक्षा और रोजगार ने महिलाओं के लिए नए आसमान खोले। आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानूनी अधिकार और पेशेवर अवसरों ने सामाजिक सोच बदली।

आधुनिकता ने जीवन का बाहरी ढांचा बदला। मगर भारत की सांस्कृतिक धड़कन कायम रही।

त्योहार आज भी कैलेंडर को रंग देते हैं। शादियां बड़े पारिवारिक आयोजन हैं। धार्मिक यात्राओं में युवाओं की भीड़ बढ़ रही है।

परंपरा गायब नहीं हुई। उसने अपग्रेड होना सीख लिया है।

दीवाली अब एलईडी की रोशनी में चमकती है। मंदिर की घंटियां मोबाइल कैमरे में कैद होती हैं। पूजा की सामग्री ऑनलाइन मंगाई जाती है। दर्शन के लिए ऐप से बुकिंग होती है। योग की कक्षाएं दुनिया भर में ऑनलाइन चल रही हैं। पुरानी परंपराएं डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी हैं।

मगर अपनी पहचान के साथ।

यह बदलाव है। यह अनुकूलन है।

भारत की सभ्यता हमेशा विचारों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई है। बाहर से आई चीजों को उसने जस का तस स्वीकार नहीं किया। उन्हें अपनी जरूरतों और संस्कारों के अनुसार ढाला।

आज का दौर उसी लंबी प्रक्रिया का नया अध्याय है। पश्चिम ने विज्ञान, तकनीक और आधुनिक संस्थाओं के शक्तिशाली औजार दिए। कानून, प्रशासन और लोकतांत्रिक भागीदारी के नए तरीके दिए।

भारतीय परंपरा ने परिवार, कर्तव्य, समुदाय और नैतिक जिम्मेदारी के विचारों को मजबूत रखा।

एक ने प्रगति का रास्ता दिखाया।

दूसरी ने पूछा—प्रगति किसके लिए और किस दिशा में?

यही सवाल आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण है।

कोई समाज तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ सकता है, मगर भीतर से खाली हो सकता है। वह अमीर हो सकता है, मगर अकेला भी। व्यक्तिगत आज़ादी हो सकती है, मगर सामुदायिक रिश्ते कमजोर पड़ सकते हैं।

भारत का परिवार और समाज से जुड़ाव केवल रूढ़िवाद नहीं है। यह इंसानी रिश्तों को बचाए रखने की कोशिश भी है। बेशक, हर परंपरा आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती।

जो परंपरा इंसान की गरिमा या समानता को चोट पहुंचाती है, उस पर सवाल उठना चाहिए। केवल पुरानी होने से कोई बात पवित्र नहीं हो जाती।

उसी तरह, केवल नया और विदेशी होने से हर विचार श्रेष्ठ नहीं बन जाता।

असली समझ संतुलन में है।

भारत के सामने चुनौती है कि वह अपनी विरासत की श्रेष्ठ चीजों को बचाए और आधुनिक ज्ञान को खुले मन से अपनाए।

पूरब और पश्चिम किसी जंग के मैदान में आमने-सामने खड़े नहीं हैं। वे अब एक ही चौराहे पर मिल रहे हैं। एक के पास पुरानी स्मृतियां, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक अनुभव हैं।

दूसरे के पास आधुनिक संस्थाएं, वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी शक्ति है। दोनों मिलकर नया भारतीय समन्वय रच रहे हैं।

भारत शायद दुनिया को यही दिखा रहा है कि आधुनिक बनने का मतलब सांस्कृतिक समर्पण नहीं है। परंपरा का अर्थ ठहराव भी नहीं है।

कोई देश कल की ओर देख सकता है, बिना अपनी सदियों पुरानी स्मृतियों को मिटाए।

शायद यही भारत की आधुनिक यात्रा का सबसे बड़ा सबक है।

भविष्य बनाने के लिए हमेशा अतीत को जलाना जरूरी नहीं।

कभी-कभी भविष्य की सबसे मजबूत इमारत उसी नींव पर खड़ी होती है, जिसमें अतीत की अच्छी ईंटें भी लगी हों।

भारत पीछे नहीं जा रहा।

वह आंख मूंदकर पश्चिम की ओर भी नहीं दौड़ रहा।

वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।

और इस यात्रा में पूरब और पश्चिम प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं।

वे भारत के नए युग के दो साथी हैं।

 गिफ्ट का सूट, जूतों की लूट और पत्रकारों की जलवा-ए-फ़ज़ीहत!

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खरांची से बृज खंडेलवाल द्वारा 

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दक्षिण प्रांत के पाजीपुर कस्बे की यह दास्तान पत्रकारिता के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से नहीं, बल्कि रेडीमेड सूट के कपड़े पर कढ़ाई करके लिखी जानी चाहिए।

हुआ यूँ कि एक बड़ी रेडीमेड वस्त्र कंपनी ने अपना शानदार शोरूम खोला। उद्घाटन पर पत्रकारों को खास तौर पर दावत दी गई। पत्रकार भी कैमरे, कलम और उम्मीदों की बड़ी-बड़ी जेबें लेकर तशरीफ ले आए।

कार्यक्रम खत्म हुआ तो राज़ खुला।

गिफ्ट में थे सिर्फ आठ सूट।

मगर पत्रकार थे पूरे बाईस।

बस हुज़ूर, फिर क्या था!

प्रेस फ्रीडम खतरे में पड़ गई। पत्रकारिता की अस्मिता पर हमला हो गया। ऐसा संकट आया, मानो किसी ने संपादकीय पन्ने की जगह साबुन का इश्तिहार छाप दिया हो।

कंजूस मालिक ने मासूमियत से पूछा, “कितने आदमी  थे?”

एक बुज़ुर्ग पत्रकार का ख़ून खौल उठा। “यह मीडिया की तौहीन है!” दूसरे ने दहाड़ लगाई, “आठ सूट और बाईस आदमी! जनाब, यह कैसा हिसाब है? यह गणित आपने किस मदरसे में पढ़ा?”

देखते ही देखते कांच की बोतलें हवा में उड़ने लगीं। उद्घाटन समारोह कम और आईपीएल का फाइनल ज्यादा लगने लगा। कुछ लोगों को मामूली चोटें भी आईं। अगले दिन शहर में कंपनी के शोरूम से ज्यादा चर्चा सूटों की हो रही थी।

रविवार को लोकल प्रेस क्लब की हंगामी बैठक बुलाई गई।

चेहरे गंभीर थे। आवाजें भारी थीं। माहौल में इंकलाब की खुशबू थी।

फैसला हुआ कि अब कोई पत्रकार गिफ्ट नहीं लेगा। गिफ्टबाजी का बहिष्कार होगा। और अगर कोई गिफ्ट देगा भी, तो प्रेस क्लब के सभी 213 सदस्यों को बराबर मिलेगा।

वाह! पत्रकारिता बच गई।

नैतिकता ने अंगड़ाई ली। उसूलों ने सीना फुलाया। सिद्धांतों ने खड़े होकर सलाम ठोंका।

फिर शादी का मौसम आ गया।

एक नेताजी के बड़े साहबज़ादे की शादी का निमंत्रण आया। प्रेस क्लब के पत्रकारों को बाकायदा कार्ड मिला। खुशियों की लहर दौड़ गई। किसी ने नया कुर्ता निकाला, किसी ने इत्र लगाया, किसी ने बरसों पुराना कैमरा चमकाया।

पंद्रह तारीख की शाम आंधी और बारिश ने बारातघर पर धावा बोल दिया। बिजली गुल। जनरेटर में डीजल खत्म। मोमबत्तियां जल रही थीं और लालटेनें अपनी आखिरी सरकारी नौकरी निभा रही थीं।

नेताजी खुद पत्रकारों की खातिरदारी में लगे थे।

तभी,

भक्क्काटा!

बिजली आ गई।

संगीत शुरू हुआ। जाम छलके। महफ़िल जवान हुई।

और फिर सबकी नजर एक ही दिशा में जम गई।

आठ पत्रकार।

आठों ने एक ही रंग के।

एक ही डिजाइन के।

एक ही कंपनी के सूट पहन रखे थे।

बाकी चौदह पत्रकारों की आंखों में शरारत चमक उठी।

“क्यों उमर भाई, आजकल फैशन में यूनिफॉर्म चल रहा है क्या?”

“ख़ां साहब, कहीं किसी जमींदार के अब्बाजान के मातम में तो नहीं गए थे?”

“सुना है, मुफ्त के कपड़े मिले थे उधर!”

बस जनाब, पार्टी का सारा लुत्फ़ गया तेल लेने।

आठों सूटधारी पत्रकार ऐसे खिसके, जैसे बिजली विभाग का बिल देखकर आम आदमी खिसकता है। कोई पंडाल के पीछे, कोई खाने की मेज के पास, कोई अंधेरे कोने में जाकर अपनी पत्रकारिता तलाशने लगा।

मगर किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ।

उधर, तुमकाडा जिले से खबर आई कि एक पत्रकार के दादाजी की शोकसभा में बड़ी तादाद में मीडिया वाले पहुंचे। मातमपुर्सी खत्म हुई, लोग बाहर निकले, तो जूते-चप्पलों का ऐसा महाभारत सामने था कि ईरान-अमेरिका भी शर्मिंदा हो जाएं।

दर्जनों जूते। एक ही रंग। एक ही ठप्पा। एक ही डिजाइन। एक ही कंपनी।

किसका कौन सा? पहचानने का कोई चांस नहीं।

तभी रैम्बो बाबू ने मंजर देखा। उनसे चुप रहा नहीं गया।

बोले, “क्यों बे! तुम सब जूते वाली फैक्ट्री में आग लगने की खबर कवर करने गए थे न?”

सन्नाटा।

ऐसा सन्नाटा कि अगर कोई पिन गिरती, तो शायद वही अपना जूता पहचान लेती।

फिर सब बगलें झांकने लगे।

आखिर लोकतांत्रिक फैसला हुआ, जिसके पैर में जो फिट हो जाए, वही उसका।

बस, फिर क्या था!

मीडिया वाले एक-एक करके निकल लिए। किसी के पैर में अपना जूता था, किसी के पैर में किसी और का। एक साहब का दायां जूता शायद उनका था, बायां किसी दूसरे अखबार का।

पत्रकारिता की इज्जत पीछे रह गई।

जूते आगे निकल गए।

व्याकुल दुनिया के संपादक ने इस तमाम फ़ज़ीहत पर गहरी सांस लेकर फरमाया:

“सबक सिर्फ इतना है कि मुफ्त का सूट हो या मुफ्त का जूता, मीडिया की पहचान छिपाए नहीं छिपती। कभी सभी के सूट एक जैसे होते हैं, कभी जूते। कभी घरों में एक जैसे शोपीस, बेडशीट, घड़ियां और क्रॉकरी बरामद होती हैं। गिफ्ट देने वाले भी वही घिसे-पिटे सामान बांटते रहते हैं, और बाकी दुनिया तमाशा देखकर ठहाके लगाती रहती है।”

आखिर पत्रकारिता का भी अपना एक उसूल है।

खबर चाहे अलग-अलग हो, मगर गिफ्ट सबको एक जैसा चाहिए

Monday, August 24, 2026


बादल, कंप्यूटर और पवित्र अग्नि: भारत का दोमुखी यथार्थवाद

न्यूटन और नास्त्रेदमस, दोनों का सम्मान है!

पढ़े लिखे होने का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अगस्त, 2026

_________________________

कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी।

एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब!  पर दोनों सरकारी जवाब थे।

राज्य ने सूखे से निपटने के लिए 28.52 करोड़ रुपये के आपात क्लाउड-सीडिंग अभियान की घोषणा की। 31 जिलों में से 29 बारिश की कमी से जूझ रहे थे। विमान बादल ढूंढेंगे, वैज्ञानिक हालात पर निगरानी रखेंगे, सैकड़ों उड़ान घंटे तय किए गए।

उसी सुबह कोडागु के पाडी इग्गुथप्पा मंदिर में रुद्र होम होना था; कृषि मंत्री पी.एम. नरेंद्रस्वामी शामिल होने वाले थे। बताया गया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह अनुष्ठान रखा गया, उम्मीद यही थी कि देवता कर्नाटक पर मेहरबान होंगे।

एक तस्वीर सोचिए: एक तरफ वैज्ञानिक क्लाउड-इंजीनियरिंग, दूसरी तरफ हवनों का धुआँ; दोनों का मकसद समान है: बारिश।

यह भारत की दोहरी ज़िंदगी है।

हम रॉकेट बनाते हैं, पर अहम काम से पहले मुहूर्त पूछते हैं। उपग्रह भेजते हैं, पर नए व्यापार के लिए सितारों की सलाह लेते हैं। हम दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करते हैं, पर कई बार दफ्तरों का नक्शा वास्तु और अंकशास्त्र तय करते हैं। विज्ञान और अंधविश्वास यहां सिर्फ पड़ोसी नहीं, कभी-कभी वे एक ही बेडरूम शेयर करते हैं।

ISRO की सफलताएँ और वैज्ञानिक क्षमता बहुमूल्य हैं। फिर भी बड़े कार्यक्रमों से पहले “मुहूर्त शुभ है या नहीं” जैसे सवाल उठते हैं। गणित रॉकेट को चलाता है; इंसान अक्सर ग्रह-नक्षत्रों पर भरोसा कर लेता है।

यह विरोधाभास शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में भी दिखता है। हमारे पास विश्वस्तरीय मेडिकल संस्थान हैं, पर डिजिटल बाजार पर वही फोन चमत्कारी दवाइयाँ, कुंडली-वाले ऐप और तांत्रिक इलाज भी बेचते हैं। इतिहास पर गर्व करना ठीक है, पर पुरानी कथाओं से आधुनिक आविष्कार निकालना सबूत नहीं है।

पर्यावरण की भी यही कहानी  है। वैज्ञानिक नदियों की सफाई, जलवायु परिवर्तन और भूजल घटने की चेतावनी दे रहे हैं; अदालतें आदेश दे रही हैं; पर त्यौहारों में टनों सामग्री उन्हीं नदियों में विसर्जित कर दी जाती है। आस्था कहती है नदी पवित्र है; नदी के पास पीआर टीम नहीं है: वह कचरा ढोती आगे बढ़ती है।

हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है, पर सामाजिक फैसलों में जाति, कुंडली और परंपरा का प्रभाव आज भी दिखता है। एक हाथ में आधुनिक डिग्री हो सकती है; दूसरे हाथ में जन्मपत्री मजबूती से थमी रहती है।

कर्नाटक का मामला इसलिए आँख खोलने वाला है क्योंकि विज्ञान और आस्था एक साथ सामने आए। क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं; यह सही परिस्थितियों पर निर्भर एक तकनीक है। रुद्र होम आस्था और परंपरा का मामला है। प्रार्थना उम्मीद देती है; पर उम्मीद हाइड्रोलॉजी की जगह नहीं ले सकती। हवन सूखी नहर की मरम्मत नहीं कर सकता; मंत्र खाली जलाशय भर नहीं देते।

प्राचीन ज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है; पर पुराने किस्सों को साक्ष्य मान लेना खतरे की घंटी है। अखबार हो या टीवी, डिजिटल मीडिया, ज्योतिषियों की भरमार है। तमाम लोग राशिफल पढ़कर ही दिन शुरू करते हैं। 

सुबह प्रार्थना कीजिए; दोपहर तक जलाशय बना लीजिए। यही मिश्रित तर्कहीनता से निकलने की असली चुनौती है।

भारत ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व बनने का सपना देखता है। सपने अच्छे हैं। पर पहले फर्क सीखिए। ज्ञान और विश्वास, सबूत और भावना, शोध और आत्म–प्रशंसा के बीच। वरना हम दो दुनियाओं में यूं ही जीते रहेंगे: एक हाथ उपग्रह छोड़ेगा, दूसरा शुभ मुहूर्त खोजेगा; एक विमान बादल में बीज डालेगा, दूसरा सरकारी दल पवित्र अग्नि में आहुति देगा, और विरोधाभास धुएँ और बादलों के बीच नाचता रहेगा। 


 












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बादल, कंप्यूटर और पवित्र अग्नि: भारत का दोमुखी यथार्थवाद

न्यूटन और नास्त्रेदमस, दोनों का सम्मान है!

पढ़े लिखे होने का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अगस्त, 2026

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कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी।

एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब!  पर दोनों सरकारी जवाब थे।

राज्य ने सूखे से निपटने के लिए 28.52 करोड़ रुपये के आपात क्लाउड-सीडिंग अभियान की घोषणा की। 31 जिलों में से 29 बारिश की कमी से जूझ रहे थे। विमान बादल ढूंढेंगे, वैज्ञानिक हालात पर निगरानी रखेंगे, सैकड़ों उड़ान घंटे तय किए गए।

उसी सुबह कोडागु के पाडी इग्गुथप्पा मंदिर में रुद्र होम होना था; कृषि मंत्री पी.एम. नरेंद्रस्वामी शामिल होने वाले थे। बताया गया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह अनुष्ठान रखा गया, उम्मीद यही थी कि देवता कर्नाटक पर मेहरबान होंगे।

एक तस्वीर सोचिए: एक तरफ वैज्ञानिक क्लाउड-इंजीनियरिंग, दूसरी तरफ हवनों का धुआँ; दोनों का मकसद समान है: बारिश।

यह भारत की दोहरी ज़िंदगी है।

हम रॉकेट बनाते हैं, पर अहम काम से पहले मुहूर्त पूछते हैं। उपग्रह भेजते हैं, पर नए व्यापार के लिए सितारों की सलाह लेते हैं। हम दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करते हैं, पर कई बार दफ्तरों का नक्शा वास्तु और अंकशास्त्र तय करते हैं। विज्ञान और अंधविश्वास यहां सिर्फ पड़ोसी नहीं, कभी-कभी वे एक ही बेडरूम शेयर करते हैं।

ISRO की सफलताएँ और वैज्ञानिक क्षमता बहुमूल्य हैं। फिर भी बड़े कार्यक्रमों से पहले “मुहूर्त शुभ है या नहीं” जैसे सवाल उठते हैं। गणित रॉकेट को चलाता है; इंसान अक्सर ग्रह-नक्षत्रों पर भरोसा कर लेता है।

यह विरोधाभास शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में भी दिखता है। हमारे पास विश्वस्तरीय मेडिकल संस्थान हैं, पर डिजिटल बाजार पर वही फोन चमत्कारी दवाइयाँ, कुंडली-वाले ऐप और तांत्रिक इलाज भी बेचते हैं। इतिहास पर गर्व करना ठीक है, पर पुरानी कथाओं से आधुनिक आविष्कार निकालना सबूत नहीं है।

पर्यावरण की भी यही कहानी  है। वैज्ञानिक नदियों की सफाई, जलवायु परिवर्तन और भूजल घटने की चेतावनी दे रहे हैं; अदालतें आदेश दे रही हैं; पर त्यौहारों में टनों सामग्री उन्हीं नदियों में विसर्जित कर दी जाती है। आस्था कहती है नदी पवित्र है; नदी के पास पीआर टीम नहीं है: वह कचरा ढोती आगे बढ़ती है।

हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है, पर सामाजिक फैसलों में जाति, कुंडली और परंपरा का प्रभाव आज भी दिखता है। एक हाथ में आधुनिक डिग्री हो सकती है; दूसरे हाथ में जन्मपत्री मजबूती से थमी रहती है।

कर्नाटक का मामला इसलिए आँख खोलने वाला है क्योंकि विज्ञान और आस्था एक साथ सामने आए। क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं; यह सही परिस्थितियों पर निर्भर एक तकनीक है। रुद्र होम आस्था और परंपरा का मामला है। प्रार्थना उम्मीद देती है; पर उम्मीद हाइड्रोलॉजी की जगह नहीं ले सकती। हवन सूखी नहर की मरम्मत नहीं कर सकता; मंत्र खाली जलाशय भर नहीं देते।

प्राचीन ज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है; पर पुराने किस्सों को साक्ष्य मान लेना खतरे की घंटी है। अखबार हो या टीवी, डिजिटल मीडिया, ज्योतिषियों की भरमार है। तमाम लोग राशिफल पढ़कर ही दिन शुरू करते हैं। 

सुबह प्रार्थना कीजिए; दोपहर तक जलाशय बना लीजिए। यही मिश्रित तर्कहीनता से निकलने की असली चुनौती है।

भारत ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व बनने का सपना देखता है। सपने अच्छे हैं। पर पहले फर्क सीखिए। ज्ञान और विश्वास, सबूत और भावना, शोध और आत्म–प्रशंसा के बीच। वरना हम दो दुनियाओं में यूं ही जीते रहेंगे: एक हाथ उपग्रह छोड़ेगा, दूसरा शुभ मुहूर्त खोजेगा; एक विमान बादल में बीज डालेगा, दूसरा सरकारी दल पवित्र अग्नि में आहुति देगा, और विरोधाभास धुएँ और बादलों के बीच नाचता रहेगा। 


Sunday, August 23, 2026

 (A Mass communication study)

मोदी के मैजिक मंत्र: 

कैसे एक माहिर संचारक (कम्युनिकेटर) विचारों को राष्ट्रीय मिशन में बदल देता है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

25 अगस्त, 2026

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देश अपने घरों में बंद था। सड़कें सुनसान थीं, बाजार खामोश थे और कारखानों के पहिए थम गए थे। कोरोना का अदृश्य खौफ लगभग हर घर में दाखिल हो चुका था। किसी को नहीं मालूम था कि यह संकट कब खत्म होगा।

तभी टेलीविजन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज गूंजी।

शाम के पांच बजे ताली बजाइए। घंटी बजाइए। थाली बजाइए। डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों और कोरोना योद्धाओं का शुक्रिया अदा कीजिए।

कुछ दिन बाद एक और अपील आई।

रात नौ बजे घर की बत्तियां बुझाइए। दरवाजे या बालकनी में खड़े होकर नौ मिनट तक दिया, मोमबत्ती या मोबाइल की रोशनी जलाइए।

निर्देश आसान थे। समय तय था। काम सबके लिए एक था। लाखों लोगों ने उसका पालन किया।

कोई इन प्रतीकों से सहमत था, कोई असहमत। उनके व्यावहारिक असर पर भी बहस हुई। मगर एक बात साफ थी, संप्रेषण बेहद स्पष्ट था।


यही शायद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक संचार शैली का सबसे दिलचस्प पहलू है। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में उन्होंने कठिन नीतियों, आर्थिक रणनीतियों और राष्ट्रीय लक्ष्यों को छोटे-छोटे सूत्रों, मंत्रों, नारों और याद रह जाने वाले वाक्यों में बदलने की कला विकसित की है।

तीन शब्द। पांच बिंदु। सात संकल्प।

3S, 5T, 5F, पंच प्रण और सप्तधारा।

इनमें वैज्ञानिक स्पष्टता भी है और संचार की समझ भी। ग्रामीण विकास हो, आर्थिक तरक्की हो, युवाओं के कौशल की बात हो, आत्मनिर्भर भारत का सपना हो या 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य; संदेश में अक्सर लक्ष्य साफ होता है, रास्ता बताया जाता है और नागरिक की भूमिका भी तय की जाती है। कई बार लगता है किसी कॉरपोरेट कंपनी के हेड का प्रेजेंटेशन चल रहा है: यह लक्ष्य है। यह रणनीति है। यह आपकी भूमिका है। और यह समय सीमा है।


रेडियो पर मन की बात हो, संसद में भाषण हो, चुनावी सभा हो या लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का संबोधन, मोदी की भाषा में आम तौर पर बहुत कम अस्पष्टता दिखाई देती है।

हंसी-मजाक, दोहरे अर्थ वाले वाक्य और बेवजह की हल्की-फुल्की टिप्पणियां उनकी शैली का मुख्य हिस्सा नहीं हैं। इसके बजाय वे अक्सर ऐसे दिखाई देते हैं जैसे कोई विश्वविद्यालय का प्रोफेसर पूरी तैयारी के साथ कक्षा में आया हो। नोट्स तैयार हैं। विषय स्पष्ट है। और विद्यार्थियों के लिए संदेश भी। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां विद्यार्थी पूरा देश है।

तीन, पांच और सात का जादू

मोदी के शुरुआती सूत्रों में एक था 5T—Talent, Tradition, Tourism, Trade और Technology।

इन पांच शब्दों में भारत की एक पूरी तस्वीर खींच दी गई। परंपरा के साथ तकनीक। पर्यटन के साथ व्यापार। पुरानी सभ्यता के साथ नई अर्थव्यवस्था।

संदेश साफ है: भारत को अपने अतीत और भविष्य में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है।

फिर आया 3S: Speed, Skill और Scale।

विकास तेज होना चाहिए। युवाओं के पास कौशल होना चाहिए। काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।

तीन शब्दों में आर्थिक नीति का एक बड़ा खाका सामने आ जाता है।

5F भी इसी शैली का शानदार उदाहरण है: Farm, Fibre, Fabric, Fashion और Foreign।

खेत से फाइबर, फाइबर से कपड़ा, कपड़े से फैशन और फैशन से विदेशी बाजार।

पूरी वैल्यू चेन पांच शब्दों में।

फिर आया एक ऐसा सूत्र जो स्कूल की ब्लैकबोर्ड पर लिखे किसी समीकरण जैसा लगता है: 

IT + IT = IT

यानी Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow.

लोग समीकरण याद रखते हैं। शायद इसीलिए यह सूत्र भी याद रह गया।

मोदी की भाषा में यही संचार-कला बार-बार दिखाई देती है।

नारे नहीं, याद रखने की तकनीक

Reform, Perform, Transform: 

पहले सुधार, फिर बेहतर प्रदर्शन और अंत में बदलाव।

Per Drop More Crop; हर बूंद से ज्यादा फसल।

कृषि, सिंचाई और जल संरक्षण जैसे जटिल विषय को चार शब्दों में समेट दिया गया।

इसी तरह Make in India, Atmanirbhar Bharat, Vocal for Local और Swadeshi एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

एक ही विचार अलग-अलग नारों के जरिए बार-बार सामने आता है।

और यही दोहराव संदेश को सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बना देता है।

मोदी की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पंक्तियों में से एक है; 

सबका साथ, सबका विकास।

बाद में इसमें दो और शब्द जुड़ गए: 

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास।

साथ, विकास, विश्वास और प्रयास।

चार शब्द, लेकिन एक पूरी राजनीतिक सोच।

यही शैली पार्टी संगठन तक भी पहुंचती है। भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए बताए गए सात मंत्र: सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, संवेदना और संवाद; सिर्फ विचार नहीं हैं। समान ध्वनि वाले शब्दों के कारण वे आसानी से याद भी रहते हैं। यहां भाषा केवल सूचना नहीं देती। भाषा स्मृति बनाती है।


कोविड-19 महामारी ने मोदी की संचार शैली को सबसे नाटकीय तरीके से सामने रखा।

देश डरा हुआ था। अस्पतालों पर दबाव था। कारोबार बंद हो रहे थे। करोड़ों लोगों के रोजगार और भविष्य को लेकर चिंता थी। ऐसे समय में संचार खुद शासन का एक महत्वपूर्ण औजार बन गया।

पहले आया जनता कर्फ्यू।

फिर शाम पांच बजे कोरोना योद्धाओं के सम्मान में ताली, घंटी और थाली बजाने की अपील हुई।

इस प्रतीक पर बहस हुई। आलोचना भी हुई। लेकिन संचार की दृष्टि से इसका एक असर जरूर हुआ।

डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी और दूसरे फ्रंटलाइन वर्कर अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए।

इसके बाद आया 21 दिन का लॉकडाउन।

मोदी ने इसे समझाने के लिए भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से एक जाना-पहचाना रूपक निकाला: लक्ष्मण रेखा।

आपका घर आपकी सीमा है।

बेवजह बाहर मत निकलो।

घर में रहो।

संक्रमण की कड़ी तोड़ो।

फिर आया रात नौ बजे, नौ मिनट का संदेश।

बत्तियां बुझाइए।

दीया जलाइए।

मोमबत्ती जलाइए।

मोबाइल की रोशनी जलाइए।

नौ मिनट तक एक साझा प्रतीक बनाइए।

इसके बाद सात बिंदुओं वाली अपील में बुजुर्गों की रक्षा करने, सामाजिक दूरी रखने, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, आरोग्य सेतु का इस्तेमाल करने, गरीब परिवारों की मदद करने, कर्मचारियों की चिंता करने और कोरोना योद्धाओं का सम्मान करने की बात कही गई।

पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही था: सरकार अकेली कोरोना से नहीं लड़ रही है। आप भी इस लड़ाई का हिस्सा हैं।

यही सहभागी संप्रेषण है।

घर में बंद डरा हुआ नागरिक भी किसी काम का हिस्सा बन गया।

संकट के समय एक छोटा-सा साझा काम भी लोगों में सामूहिकता और भरोसे की भावना पैदा कर सकता है।

संकट से 2047 तक

कोरोना के बाद यही संचार शैली तत्काल संकट से निकलकर भारत के दीर्घकालीन सपने तक पहुंची।

2022 में आया पंच प्रण।

2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति। अपनी विरासत पर गर्व। एकता को मजबूत करना। नागरिक कर्तव्यों को निभाना।

2047 बहुत दूर का सपना है।

लेकिन पांच संकल्प उसे समझने योग्य बना देते हैं।

इसके बाद डेमोग्राफी, डेमोक्रेसी और डायवर्सिटी यानी जनसांख्यिकी, लोकतंत्र और विविधता का त्रिफलक सामने आया।

दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण जैसे मुद्दों को भी तीन के ढांचे में पेश किया गया।

फिर आया सप्तधारा का विचार।

विकसित भारत के रास्ते में सात बड़ी धाराएं: मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, गति शक्ति और कनेक्टिविटी, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा भारत की सॉफ्ट पावर।

यहां प्रतीक और आधुनिकता का अनोखा मेल दिखाई देता है।

प्राचीन भारत में सप्त सिंधु की कल्पना थी।

आज के भारत के सामने सप्तधारा है।

एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन और आधुनिक लॉजिस्टिक्स हैं। दूसरी तरफ योग, आयुर्वेद, संस्कृति और पर्यटन।

एक पैर सभ्यतागत स्मृति में है।

दूसरा 2047 में।

यह शैली मोदी तक सीमित नहीं

यह संचार शैली अब दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों में भी दिखाई देती है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का उदाहरण लिया जा सकता है। उन्होंने बदलती दुनिया को 3 Cs: Competition, Conflict और Choke Points, के जरिए समझाया है।

जवाब के लिए 4 Ds: Derisking, Diversification, distortions से निपटना और सुरक्षा का एक मार्जिन बनाए रखना, जैसी शब्दावली सामने आती है। पुरानी सोच थी: Just in Time। नई दुनिया कह रही है: Just in Case। जटिल भू-राजनीति भी कुछ याद रहने वाले शब्दों में बदल जाती है।

मगर नारा शासन नहीं है

यहां एक जरूरी सवाल भी है।

सूत्र और नारे प्रभावशाली हो सकते हैं, लेकिन वे शासन का विकल्प नहीं हैं।

सिर्फ नारे से कारखाना नहीं बनता।

मंत्र से रोजगार पैदा नहीं होता।

दिया जलाने से बीमारी ठीक नहीं होती।

कोई आकर्षक वाक्य नदी को साफ नहीं कर सकता।

अंततः असली परीक्षा काम की है।

नीतियों के परिणामों को आंकना जरूरी है। सरकार के दावों को जांचना जरूरी है। नागरिकों, अर्थशास्त्रियों, पत्रकारों और विपक्षी दलों को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।

राजनीतिक संचार लोगों को जोड़ सकता है।

लेकिन परिणाम ही उसकी अंतिम कसौटी हैं।

फिर भी संचार को कम करके नहीं आंका जा सकता।

1.4 अरब से ज्यादा लोगों के देश में कोई नीति अगर सरकारी फाइलों में बंद रह जाए तो वह जनभागीदारी का अभियान नहीं बन सकती।

पहले लोगों को बात समझनी होगी।

फिर वे उससे जुड़ेंगे।

यहीं मोदी की संचार शक्ति सबसे दिलचस्प बन जाती है।

वे जानते हैं कि लोग तीन शब्द तीस पैराग्राफ से ज्यादा आसानी से याद रखते हैं।

लोग लंबे भाषण से ज्यादा आसानी से कोई ठोस काम याद रखते हैं।

और अस्पष्ट वादे से ज्यादा आसानी से एक तय समय सीमा याद रखते हैं।


भारत के राजनीतिक इतिहास में संक्षिप्त और ताकतवर नारों की परंपरा पुरानी है।

महात्मा गांधी के दौर में "भारत छोड़ो" और "करो या मरो" जैसे छोटे वाक्यों ने विशाल जनसमूह को आंदोलित किया था।

समय बदल गया है।

माइक की जगह टेलीविजन, मोबाइल, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है।

लेकिन संचार का मूल सिद्धांत आज भी वही है।

लोगों को एक वाक्य दीजिए।

एक उद्देश्य दीजिए।

और उसमें उनकी भूमिका तय कर दीजिए।

मोदी के 3S, 5T, 5F, पंच प्रण, सप्तधारा और Per Drop More Crop जैसे सूत्र इसी आधुनिक संचार परंपरा के अध्ययन का विषय बन सकते हैं।

ये सिर्फ नारे नहीं हैं। ये याद रखने की तकनीक हैं।

इनके जरिए जटिल नीतियों को सरल बनाया जाता है, भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जाता है और लोगों को किसी बड़े राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

आखिर असली कमाल केवल आकर्षक नारा गढ़ने में नहीं है।

कमाल है किसी विचार को साझी जिम्मेदारी में बदल देने में।

पानी बचाइए।

स्थानीय सामान खरीदिए।

नई स्किल सीखिए।

बुजुर्गों की रक्षा कीजिए।

गरीब की मदद कीजिए।

कोरोना योद्धाओं का सम्मान कीजिए।

और विकसित भारत बनाने में अपना योगदान दीजिए।

भाषा छोटी है।

मगर लक्ष्य बहुत बड़ा है।

भाषण खत्म होता है।

कैमरे बंद हो जाते हैं।

लेकिन संदेश का सफर शुरू हो जाता है।

वह अखबार की हेडलाइन बनता है। टीवी की पट्टी बनता है। गांव की सभा में दोहराया जाता है। व्हाट्सऐप पर घूमता है। घर की बातचीत में पहुंचता है।

यही है नारे के पीछे का विज्ञान।

एक अच्छा वक्ता लोगों को सोचने के लिए कुछ देता है।

एक माहिर संचारक उन्हें याद रखने और कुछ करने के लिए देता है।

Saturday, August 22, 2026

 इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की दुकानदारी: 

जब शिक्षा से ज्यादा जरूरी हो जाए मुनाफा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 अगस्त, 2026

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नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं।

"एडमिशन शुरू हैं!"

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स।

नाम सुनकर लगता है, बस दाखिला लो और भविष्य जेब में डाल लो। मगर कई कॉलेजों के भीतर जाइए। खाली कुर्सियां आपका स्वागत करती मिलेंगी।

यही भारतीय उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है।

कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री ने हाल में कहा कि राज्य अब नए सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं खोलेगा। पहली नजर में यह फैसला पीछे हटने जैसा लग सकता है। असल में, यह देर से आया हुआ एक समझदार फैसला है।


पिछले तीन दशकों में प्रोफेशनल शिक्षा का ऐसा विस्तार हुआ कि हर शहर और कस्बे में कॉलेज कुकुरमुत्तों की तरह उग आए। इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल, फार्मेसी, मैनेजमेंट और होम्योपैथी कॉलेजों की बाढ़ आ गई।

शिक्षा धीरे-धीरे कारोबार बन गई।कॉलेज की सीट एक उत्पाद बन गई। छात्र ग्राहक बन गया।

कर्नाटक में हर साल करीब 28 से 30 हजार इंजीनियरिंग सीटें खाली रह जाती हैं। देश भर में इंजीनियरिंग की लगभग 30 से 40 प्रतिशत सीटों पर दाखिला नहीं हो पाता। यानी हर साल तीन से पांच लाख सीटें खाली रह सकती हैं।

तमिलनाडु की तस्वीर भी कम परेशान करने वाली नहीं है। टीएनईए काउंसलिंग के तीसरे दौर के बाद भी करीब 37,943 इंजीनियरिंग सीटें खाली थीं। लगभग 1,57,570 सीटें भर गईं, लेकिन बड़ी संख्या में सीटें फिर भी खाली रह गईं। राज्य में करीब 418 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं।

सवाल यह नहीं कि छात्रों ने इंजीनियरिंग छोड़ दी है। असली बात यह है कि छात्र अब हर कॉलेज में दाखिला लेने को तैयार नहीं हैं।

अच्छे और पुराने संस्थानों में आज भी भीड़ है। शहरों के प्रतिष्ठित कॉलेज, जहां पढ़ाई और प्लेसमेंट बेहतर हैं, छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं।

लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के कई निजी कॉलेजों की हालत पतली है। कुछ कॉलेजों में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। कुछ को गिनती के विद्यार्थी मिले।

संदेश साफ है। सीटें बढ़ा देने से मांग पैदा नहीं होती।

निजी कॉलेजों ने एक नया नुस्खा खोज लिया है। पुराने कंप्यूटर साइंस कोर्स के नाम के साथ कोई फैशनेबल शब्द जोड़ दीजिए। नया कोर्स तैयार।

एआई एंड मशीन लर्निंग। एआई एंड डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी।इंटरनेट ऑफ थिंग्स। डेटा एनालिटिक्स। नाम अलग-अलग हैं। कई बार पढ़ाई का बड़ा हिस्सा लगभग एक जैसा होता है।

ब्रोशर नया है, सीटें नई हैं और फीस भी नई।

मुश्किल यह नहीं कि एआई पढ़ाई जा रही है। मुश्किल यह है कि कई जगह एआई सिर्फ एक चमकदार लेबल बन गया है। अच्छी लैब बनाना महंगा है। योग्य शिक्षक रखना महंगा है। रिसर्च कराना महंगा है। ब्रोशर बदलना सस्ता है। मुनाफे की दुनिया अक्सर आसान रास्ता चुनती है।

दूसरी तरफ मैकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की सीटें खाली रह रही हैं। यह एक अजीब विरोधाभास है।

देश मैन्युफैक्चरिंग की बात करता है। बड़े-बड़े कारखानों की बात करता है। नई सड़कें, पुल, बिजली, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी की बातें होती हैं।

मगर युवाओं को एक ही दिशा में धकेला जा रहा है। सॉफ्टवेयर की तरफ।

कल को हमारे पास कोड लिखने वाले बहुत होंगे, लेकिन मशीन बनाने वाले कम। पुल बनाने वाले कम। बिजली और ऊर्जा व्यवस्था संभालने वाले कम।

इसे शिक्षा नीति नहीं, शैक्षिक सट्टेबाजी कहना ज्यादा ठीक होगा।


आईआईआईटी-बेंगलुरु के पूर्व निदेशक एस. सदागोपन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की।अनुमान यह था कि इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स में केवल करीब 17 प्रतिशत ही सीधे नौकरी के लिए तैयार माने जा सकते हैं।

जरा सोचिए। मां-बाप लाखों रुपये खर्च करते हैं। बच्चा चार साल पढ़ता है। डिग्री हाथ में आती है। फिर नौकरी का दरवाजा कहता है: अभी आप तैयार नहीं हैं।


समिति ने कंप्यूटर साइंस सीटों में कमी, एक जैसे कोर्सों पर रोक और एआई को अलग-अलग शाखाओं में शामिल करने की सिफारिश की।

बात बिल्कुल वाजिब है।



निजीकरण के समर्थकों ने कहा था कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। गुणवत्ता सुधरेगी। दक्षता आएगी। लेकिन शिक्षा के एक बड़े हिस्से में हुआ कुछ और।

अगर एक कॉलेज मुनाफा कमा सकता है, तो दूसरा खोलो। अगर 60 सीटें बिकती हैं, तो 120 कर दो।कंप्यूटर साइंस चल रहा है, तो उसके पांच नए संस्करण निकाल दो। दाखिले कम हों, तो विज्ञापन बढ़ा दो।


मगर बड़ी तस्वीर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।

शिक्षा के विस्तार में राजनीतिक रसूख, ट्रस्ट, सोसायटी और कारोबारी हितों की भूमिका लगातार बढ़ती गई।हर सरकार ने कॉलेज खोलने को विकास का तमगा बना दिया। मगर किसी ने ठीक से नहीं पूछा: क्या हमें सचमुच एक और कॉलेज चाहिए?

उत्तर प्रदेश में 2026 में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में मांग और सीटों के बीच बड़ा असंतुलन दिखाई दे रहा है। AKTU की UPTAC काउंसलिंग के बाद करीब 74,000 बीटेक सीटें खाली रह गईं, जिनमें अधिकांश निजी कॉलेजों की हैं। लोकप्रिय CSE में भी 22,000 से अधिक सीटें खाली रहीं। छात्र नोएडा, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के प्रतिष्ठित कॉलेजों को तरजीह दे रहे हैं। कई निजी संस्थानों में JEE Main के बिना 12वीं के अंकों पर सीधे दाखिले की व्यवस्था करनी पड़ी। जरूरत से ज्यादा सीटें बढ़ने से कई कॉलेज आर्थिक दबाव और भविष्य के संकट से जूझ रहे हैं।

यही कहानी मेडिकल शिक्षा में भी दिखाई देती है। नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणाएं बड़ी सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेडिकल कॉलेज केवल एक इमारत का नाम नहीं है।

उसे अनुभवी डॉक्टर चाहिए। शिक्षक चाहिए। लैब चाहिए। अस्पताल चाहिए। मरीज चाहिए। क्लीनिकल ट्रेनिंग चाहिए।

इनके बिना मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक बड़ा भवन और चमकदार नामपट्ट बनकर रह सकता है।

होम्योपैथी और दूसरे प्रोफेशनल कोर्सों में भी कई संस्थान सीटें भरने के लिए जूझ रहे हैं। फिर भी नए संस्थान खोलने की होड़ खत्म नहीं होती।

यह कैसी तरक्की है?

जब पुरानी दुकान में ग्राहक नहीं हैं, तब नई दुकान क्यों खोली जा रही है?


हर साल नई इमारतें खड़ी करना बंद कीजिए। मौजूदा कॉलेजों को मजबूत बनाइए। खाली पड़े परिसरों का बेहतर इस्तेमाल कीजिए। उन्हें स्किलिंग और री-स्किलिंग सेंटर बनाइए। अच्छे शिक्षक लाइए। लैब सुधारिए। उद्योगों से सीधा रिश्ता जोड़िए।

और सबसे जरूरी बात; जितनी वास्तविक जरूरत है, उतनी ही सीटें रखिए। देश को 500 कमजोर इंजीनियरिंग कॉलेजों की जरूरत नहीं है। 100 अच्छे संस्थान शायद ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।


खाली सीटें केवल दाखिले की समस्या नहीं हैं। वे व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का खामोश फैसला हैं।


कई वर्षों से उच्च शिक्षा को समाज सेवा का लिबास पहनाकर एक बड़े कारोबार की तरह चलाया जा रहा है।

कॉलेज खोलने वालों को फायदा हुआ। राजनीतिक रसूख बढ़ा। इमारतें बनती गईं। सीटें बढ़ती गईं। मगर बेरोजगार डिग्रीधारियों की फौज भी बढ़ती गई।

समस्या निजी संस्थानों के होने की नहीं है। समस्या यह है कि शिक्षा को केवल मुनाफे की नजर से नहीं देखा जा सकता। कॉलेज इसलिए नहीं चलना चाहिए कि वह सीटें बेच सकता है। सरकार को तय करना होगा कि देश को किस तरह के पेशेवर चाहिए। कितने इंजीनियर चाहिए। कितने डॉक्टर चाहिए। किस इलाके में कॉलेज की जरूरत है।

सिर्फ वोट, जमीन और मुनाफे के लिए कॉलेज नहीं खुलने चाहिए।


Friday, August 21, 2026

 जब बड़े सो रहे थे, बच्चों ने घंटी बजा दी!  

जंतर-मंतर से यूपी के गांवों तक उठती आवाज़

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 अगस्त, 2026

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कल्पना कीजिए, श्याम बेनेगल की मशहूर फिल्म अंकुर का वह आखिरी दृश्य। गांव का एक छोटा लड़का सब कुछ चुपचाप देख रहा है: जमींदार की हुकूमत, गरीबों की बेबसी और अन्याय का खेल।

फिर अचानक वह एक पत्थर उठाता है।

पत्थर हवेली की ओर उछलता है। स्क्रीन लाल हो जाती है। एक छोटा-सा पत्थर, मगर उसके भीतर बगावत का एक बड़ा बीज छिपा है।

आज 2026 के भारत में वही दृश्य फिर याद आता है।

इस बार पत्थर असली नहीं है। कभी वह परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ नारा बनता है। कभी सोशल मीडिया का मीम बनता है। कभी जंतर-मंतर पर छात्रों की भीड़ बन जाता है। और अब वही आवाज उत्तर प्रदेश के गांवों के स्कूलों तक पहुंच रही है।

उन्नाव, लखनऊ, कन्नौज और हमीरपुर में बच्चे सवाल पूछ रहे हैं। खाना ठीक क्यों नहीं? पीने का पानी कहां है? शिक्षक पूरे क्यों नहीं हैं? स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क क्यों नहीं है?

हमीरपुर के चंदूपुर और आसपास के गांवों में सैकड़ों बच्चे अपनी मांग लेकर कलेक्ट्रेट तक पहुंच गए। उनकी मांग कोई आसमान से तारे तोड़ने वाली नहीं थी। बस स्कूल तक जाने के लिए एक ठीक सड़क चाहिए थी।

बच्चों को समझाने और दबाव डालने की कोशिशें हुईं। मगर इस बार बच्चे चुप रहने को तैयार नहीं थे। 


असल में यह आग कहीं और भड़की थी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर।

शुरुआत हुई परीक्षा के पेपर लीक से। खासकर NEET-UG जैसी बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा ने लाखों युवाओं का भरोसा हिला दिया। छात्रों को लगा कि वे सालों पढ़ें, कोचिंग में लाखों खर्च करें और आखिर में कोई पेपर चुरा ले जाए; तो मेहनत का मतलब क्या रह जाता है?

कुछ युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने समूह को मजाकिया अंदाज में “कॉकरोच जनता पार्टी” कहा। नाम अजीब था, तरीका भी नया था। पुराने छात्र संगठनों और लंबे-लंबे भाषणों की जगह मीम थे, इंस्टाग्राम था, वीडियो थे और सोशल मीडिया का शोर था।

मगर धीरे-धीरे हंसी के पीछे का गुस्सा साफ दिखाई देने लगा।

सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। पुलिस ने रोका, प्रदर्शनकारियों ने दबाव बनाए रखा।

और फिर हुआ वह, जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

सड़क का दबाव सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गया।

25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी दौर की राजनीति में एक असाधारण घटना मानी गई। पहली बार लगा कि सड़क पर खड़े साधारण छात्रों की आवाज किसी बड़े मंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकती है।

इसके बाद कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से जुड़े करीब 600 अधिकारियों को हटाया गया। परीक्षा प्रश्नपत्रों की जांच के लिए नई चार-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई। परीक्षा केंद्रों और गोपनीयता की सुरक्षा और कड़ी की गई।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण देने की घोषणा की। इसके बाद मंत्री विश्वविद्यालय परिसरों में सीधे पहुंचने लगे। “वन डे, वन यूनिवर्सिटी” जैसे कार्यक्रम शुरू हुए।

सवाल यह है कि यह सब किसने कराया?

न कोई बड़ा विपक्षी आंदोलन।

न कोई अनुभवी राजनीतिक दल।

न कोई स्थापित छात्र यूनियन।

यह काम उन युवाओं ने किया, जिन्हें राजनीति अक्सर नासमझ समझती रही है।

दिलचस्प बात यह भी रही कि जिस विपक्ष से सरकार को चुनौती देने की उम्मीद थी, वह लंबे समय से दिशा खोजता नजर आया। राहुल गांधी के नेतृत्व वाला विपक्ष लगातार चुनावी हार और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझता रहा। INDIA गठबंधन भी कोई ऐसी साफ कहानी नहीं बना पाया, जो आम मतदाता को एक मजबूत विकल्प दिखाई दे।

संसद में हंगामा हुआ, विरोध हुआ, नारे लगे। मगर सत्ता की चमक पर कोई खास खरोंच नहीं आई।

फिर अचानक जंतर-मंतर पर यह अजीब-सी हलचल शुरू हुई।

“कॉकरोच” वाला तमाशा, तीखी भाषा, गालियां और निजी हमले:  कुछ  लोगों को भद्दा लगा लड़कियों द्वारा गालियां बकना; लड़के तो लड़के होते हैं!  मगर राजनीति के ठहरे हुए तालाब में किसी ने पत्थर जरूर फेंक दिया था।

लहरें उठीं।

इसे 1970 के दशक के जयप्रकाश नारायण आंदोलन से मिलाना आसान है। तब भी छात्र फीस, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से परेशान थे। बाद में आंदोलन “संपूर्ण क्रांति” तक पहुंच गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक नैतिक चेहरा बने। इस बार सोनम वांगचुक ने भी युवाओं के गुस्से को एक नैतिक ताकत देने की अधूरी कोशिश की।

मगर दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है।

जेपी आंदोलन पूरी व्यवस्था बदलना चाहता था। 2026 के छात्रों की मांगें ज्यादा सीधी थीं: पेपर लीक बंद करो, जिम्मेदारों को हटाओ, परीक्षा व्यवस्था ठीक करो।

और सबसे बड़ी बात, इनकी राजनीति व्हाट्सऐप, मीम और इंस्टाग्राम पर बनी।

यह यूनियन के दफ्तरों की राजनीति नहीं थी।

यह मोबाइल फोन की राजनीति थी।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

जंतर-मंतर का छोटा पत्थर अब उत्तर प्रदेश के गांवों तक पहुंच गया है। अब बच्चे पेपर लीक के खिलाफ ही नहीं, स्कूल पहुंचने की सड़क, साफ पानी, अच्छा खाना और शिक्षक की मांग कर रहे हैं।

यही असली इम्तिहान है।

मंत्री का इस्तीफा हो जाना आसान है। कुछ अफसरों को हटाना भी आसान है। नई नीति की घोषणा करना तो सबसे आसान काम है।

मुश्किल काम है व्यवस्था को बदलना।

भारत की कोचिंग संस्कृति अभी भी जवान है। परीक्षा का जुनून अभी भी बेकाबू है। गांवों के स्कूलों की हालत कई जगह खराब है। डिग्री और रोजगार के बीच की खाई भी जस की तस है।

फिर भी एक बात साफ हो गई है।

जब बड़े लोग सो जाते हैं, कभी-कभी बच्चे घंटी बजा देते हैं।

अंकुर के उस बच्चे ने एक पत्थर फेंका था।

2026 के बच्चों ने भी पत्थर फेंका है।

अब देखना यह है कि सत्ता पक्ष उस पत्थर को सिर्फ एक शरारत समझती है, या उसके भीतर उगते नए अंकुर को पहचानती है। गनीमत है कि केंद्र सरकार ने इसे पॉजिटिव दृष्टि से लिया है, और तत्परता से आवश्यक पहलें  की हैं।


 रेगिस्तान की रेत से बोर्डरूम तक: शेखावाटी के मारवाड़ियों ने कैसे खड़े किए भारत के कारोबारी साम्राज्य

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अगस्त 2026

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कैमरा घूमता है। पर्दे पर एक भव्य हवेली दिखाई देती है। मोटे-से सेठजी अपनी गद्दी पर बैठे हैं। आसपास बही-खाते, तिजोरियां और रुपयों के बक्से रखे हैं। पास में पुराने हिन्दी सिनेमा के परिचित मुनीमजी खड़े हैं, एक्टर कन्हैया लाल, चेहरे पर चालाक मुस्कान और हाथ में मोटा हिसाब-किताब।

कोई मदद मांगता है, तो पहले खर्च का हिसाब होता है। कोई कर्ज मांगता है, तो ब्याज की नई दर खुल जाती है। दशकों तक हिन्दी फिल्मों ने मारवाड़ी व्यापारी की एक ऐसी छवि बनाई; चतुर, कंजूस और हर समय मुनाफे के पीछे भागने वाला।

लेकिन पूरी सच्चाई इतनी भर नहीं थी।

यह छवि दर्शकों का मनोरंजन जरूर करती रही, मगर एक जीवंत और कर्मठ समुदाय को मजाकिया या खलनायक जैसे किरदारों तक सीमित कर दिया गया। मारवाड़ियों ने केवल दौलत नहीं कमाई। उन्होंने कारखाने लगाए, रोजगार पैदा किए, स्कूल और अस्पताल बनाए और आधुनिक भारत के उद्योगों की बुनियाद मजबूत की।

इस कहानी की शुरुआत राजस्थान के शेखावाटी इलाके से होती है; चूरू, सीकर और झुंझुनूं का सूखा और कठिन भूभाग। यहां पानी कम था, खेती अनिश्चित थी और गर्मियों में धरती अंगारों जैसी तपती थी। इस इलाके ने लोगों को वह सब सिखाया, जो उपजाऊ मैदान शायद ही सिखा पाते हैं; मुश्किल हालात में जीना और कमी को अवसर में बदलना।

इन्हीं धूल भरे कस्बों से भारत के कई बड़े कारोबारी घराने निकले: बिड़ला, बजाज, डालमिया, गोयनका, सिंघानिया, पोद्दार, रूइया, पीरामल और अनेक अन्य। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन परिवारों ने देश के उद्योग, व्यापार और वित्तीय दुनिया की तस्वीर बदली।

मगर शेखावाटी का योगदान केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहा। झुंझुनूं को शहीदों की नगरी भी कहा जाता है। यहां के गांवों से पीढ़ियों से नौजवान सेना में जाते रहे हैं। एक तरफ सीमा पर देश की रक्षा करने वाला जवान था, दूसरी तरफ देश की आर्थिक ताकत बढ़ाने वाला उद्यमी। दोनों को हिम्मत, अनुशासन और सब्र की जरूरत थी।

नक्शे को गौर से देखिए, तो व्यापार का इतिहास एकदम निजी और जीवंत लगने लगता है।

पिलानी का नाम बिड़ला परिवार से जुड़ा है। उन्नीसवीं सदी में शिव नारायण बिड़ला बंबई गए और उनके वंशजों ने भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक खड़ा किया। चिड़ावा डालमियाओं से जुड़ा रहा। नवलगढ़ ने गोयनका, पोद्दार, केड़िया, सेक्सारिया और मोरारका जैसे कारोबारी परिवारों को जन्म दिया। रामगढ़ का रिश्ता रूइया और पोद्दार परिवारों से है, जबकि बगर पीरामल परिवार से जुड़ा है।

सीकर के पास काशी का बास में जमनालाल बजाज का जन्म हुआ। आगे चलकर वे बड़े उद्योगपति ही नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के प्रमुख समर्थक भी बने। चूरू के सादुलपुर ने लक्ष्मी मित्तल को जन्म दिया, जिन्होंने दुनिया भर में इस्पात का विशाल साम्राज्य खड़ा किया। सिंघानिया, सर्राफ, मोदी और अनेक परिवारों ने भी अपने-अपने ढंग से ऐसी ही राह तय की।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर दौलत शेखावाटी में नहीं बनी। रेगिस्तान ने उन्हें जड़ें दीं, जबकि कोलकाता, बंबई और दूसरे व्यापारिक शहरों ने उन्हें बड़ा मंच दिया।

मारवाड़ियों की सफलता केवल मितव्ययिता या बचत का नतीजा नहीं थी। इसके पीछे भरोसा, अनुशासन और बदलते समय के साथ ढलने की क्षमता थी। आर्थिक इतिहासकार थॉमस ए. टिम्बर्ग ने इस सफलता के कई महत्वपूर्ण कारण बताए हैं।

सबसे पहले था समुदाय का मजबूत नेटवर्क। शेखावाटी से निकलने वाला कोई युवा आर्थिक मायने में कभी अकेला नहीं होता था। रिश्तेदार उसे व्यापारियों से मिलवाते, रहने की जगह देते, उधार दिलाते और कारोबार की तालीम का इंतजाम करते। एक व्यापारी की सफलता दूसरे के लिए रास्ता खोलती। गांव और परिवार के रिश्ते धीरे-धीरे देशव्यापी कारोबारी नेटवर्क बन गए।

दूसरी बड़ी चीज थी साख।

नकद पैसा जरूरी था, लेकिन आदमी का वचन अक्सर उससे भी ज्यादा कीमती माना जाता था। व्यापारी पैसा खोकर फिर संभल सकता था, लेकिन साख खोने पर कारोबार के दरवाजे बंद हो सकते थे।

टिम्बर्ग ने मारवाड़ी व्यापारियों के कड़े वित्तीय अनुशासन पर भी जोर दिया। पारंपरिक बही-खाता केवल हिसाब लिखने की किताब नहीं था। वह रोजाना मुनाफे, नुकसान और जिम्मेदारियों पर नजर रखने की पूरी संस्कृति थी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर सोच-समझकर जोखिम उठाने का साहस भी था, खासकर वस्तुओं के व्यापार और सट्टे में।

सबसे बड़ी खूबी थी उनकी अनुकूलन क्षमता।

मुगल दौर में मारवाड़ी वित्तदाता और साहूकार बने। अंग्रेजों के समय वे दलाल, ब्रोकर और व्यापारिक मध्यस्थ बने। बाद में उन्होंने तेजी से उद्योगों की तरफ कदम बढ़ाया। संयुक्त परिवार और आपसी भरोसे की पुरानी व्यवस्था आधुनिकता के रास्ते में रुकावट नहीं बनी। उलटे, इनसे पूंजी जुटाने, जोखिम बांटने और लंबे कारोबारी रिश्ते निभाने में मदद मिली।

भूगोल ने भी इस सफलता में अपना हिस्सा निभाया। अठारहवीं सदी में स्थानीय शासकों ने रास्ते के कर कम किए और व्यापार को बढ़ावा दिया। कपास, ऊन और मसालों से भरे काफिले इस इलाके से गुजरते थे। उन्नीसवीं सदी में रेलवे के आने से व्यापार की दुनिया बदल गई। कोलकाता और बंबई नए आकर्षण केंद्र बन गए।

शेखावाटी के व्यापारी वहां पहुंचे। पहले व्यापारी और वित्तदाता के रूप में, फिर मिलों, कारखानों और बड़े औद्योगिक घरानों के मालिक के रूप में। बीसवीं सदी तक वे कपड़ा, जूट, इस्पात, सीमेंट, मोटर उद्योग और वित्त की दुनिया के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे।

रेगिस्तान ने उन्हें चलना सिखाया, बाजार ने उन्हें विस्तार करना सिखाया।

कमी एक सख्त उस्ताद थी। अनिश्चित बारिश, कीमती पानी और स्थानीय अवसरों की कमी ने लोगों को बाहर निकलने के लिए मजबूर किया। सेना की परंपरा को मजबूत करने वाला अनुशासन और धैर्य ही कारोबारियों के भी काम आया।

धर्म और सामुदायिक संस्थाओं ने भी सामाजिक रिश्तों को मजबूत रखा। रानी सती, खाटू श्यामजी और सालासर बालाजी जैसे तीर्थ आज भी आस्था के बड़े केंद्र हैं। मंडावा, नवलगढ़, फतेहपुर और रामगढ़ की रंगीन हवेलियां एक और कहानी कहती हैं। ये उन परिवारों की निशानियां हैं, जिन्होंने दूर-दराज के शहरों में दौलत कमाई, लेकिन अपने रेगिस्तान को सजाने के लिए लौट आए।

शेखावाटी की कहानी को केवल जाति या व्यापार की कहानी नहीं कहा जा सकता। राजपूत समुदायों ने मजबूत सैन्य और जमींदारी परंपराएं विकसित कीं। अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल और दूसरे व्यापारी समुदायों ने शक्तिशाली कारोबारी नेटवर्क बनाए।

दोनों ने देश को अलग-अलग तरह की ताकत दी; एक ने सरहदों की हिफाजत की, दूसरे ने देश की आर्थिक मांसपेशियां मजबूत कीं।

एक पुरानी कहावत इस जज्बे को खूब बयान करती है; जहां बैलगाड़ी पहुंच सकती है, वहां आखिरकार मारवाड़ी भी पहुंच जाएगा।

कुदरत ने इस इलाके को बहुत कम दिया था। मगर इसके लोगों ने भरोसे, साख, अनुशासन, गतिशीलता और लगातार मेहनत से मौके पैदा किए।

रेगिस्तान ने न तो जादू से अरबपति पैदा किए, न सैनिक। उसने बस ऐसे हालात पैदा किए, जिनमें संघर्ष करने की क्षमता आदत बनी ; और वही आदत, वक्त के साथ, इतिहास बन गई।

Thursday, August 20, 2026

 

तिब्बती भारत में: क्या वे कभी लौटेंगे, या हमेशा के मेहमान बन जाएंगे?


बृज खंडेलवाल द्वारा
20 अगस्त, 2026


एक मातृभूमि रोज़मर्रा की जिंदगी से दूर हो सकती है, लेकिन यादों से नहीं मिटती। भारत में रह रहे हजारों तिब्बतियों के लिए तिब्बत आज भी एक सपना भी है और एक ज़ख्म भी—एक ऐसी धरती, जिसे उनमें से बहुतों ने कभी देखा तक नहीं, फिर भी अपना घर मानते हैं।

तिब्बतियों के बड़े पलायन को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है। लेकिन एक कठिन सवाल आज भी पीछा नहीं छोड़ता—क्या तिब्बती कभी अपनी मातृभूमि लौट पाएंगे, या अस्थायी निर्वासन चुपचाप एक स्थायी बसावट में बदल चुका है?

इस सप्ताह कर्नाटक में यह सवाल फिर चर्चा में आया। तिब्बती प्रतिनिधियों ने राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की और अपने समुदाय के लिए अधिक सहयोग तथा तिब्बती मुद्दे पर नए सिरे से ध्यान देने की मांग की।

बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोपेल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात की। उन्होंने कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और तिब्बती संस्कृति के संरक्षण के लिए राज्य सरकार से सहायता मांगी। विशेष रूप से दक्षिण भारत की सबसे बड़ी तिब्बती बस्तियों में से एक, बायलाकुप्पे के तिब्बतियों की समस्याएं उठाई गईं।

बताया जाता है कि शिवकुमार ने सहयोग का भरोसा दिया। उन्होंने तिब्बती संस्कृति को अधिक स्थान देने और मैसूरु दशहरा समारोह में तिब्बती समुदाय की भागीदारी बढ़ाने का भी आश्वासन दिया।

मैसूरु में, हुंसूर के निकट गुरुपुरा तिब्बती बस्ती के एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने सांसद यदुवीर वाडियार से मुलाकात की। उन्होंने उनसे संसद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बती मुद्दा उठाने का आग्रह किया।

प्रतिनिधिमंडल ने 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रंगजेन के आत्मदाह का मुद्दा भी उठाया। यह दर्दनाक घटना याद दिलाती है कि तिब्बत का सवाल आज भी जिंदा है और लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

तिब्बती नेताओं की मांगें केवल राजनीति तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं तथा तिब्बती भाषा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए भी सहायता मांगी।

लेकिन इन तात्कालिक मांगों के पीछे एक और बड़ा सवाल छिपा है—जब निर्वासन पीढ़ियों तक चलने लगे, तो आखिर उसका भविष्य क्या होता है?

भारत में तिब्बती निर्वासन की कहानी 1959 में शुरू हुई। चीन के शासन के खिलाफ विद्रोह के बाद दलाई लामा तिब्बत से निकल आए। हजारों तिब्बती खतरनाक हिमालयी दर्रों को पार करते हुए उनके पीछे भारत पहुंचे। वे अपने घर, परिवार और सदियों पुरानी जीवन-पद्धति पीछे छोड़ आए थे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने उन्हें शरण दी। बस्तियां बसाने, मठ बनाने और स्कूल खोलने के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। धीरे-धीरे और बड़ी मुश्किलों के बीच एक उजड़ा हुआ समुदाय फिर से अपनी जिंदगी बनाने लगा।

धर्मशाला तिब्बती निर्वासित समुदाय का आध्यात्मिक और राजनीतिक केंद्र बन गया। वहीं से केंद्रीय तिब्बती प्रशासन आज भी काम करता है। यह संस्था शिक्षा, कल्याण, संस्कृति और विदेशों में रह रहे तिब्बतियों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कार्यों को संभालती है।

समय के साथ भारत के अनेक हिस्सों में तिब्बती बस्तियां बस गईं। कर्नाटक में बायलाकुप्पे, मुंडगोड और गुरुपुरा जैसी बड़ी बस्तियां विकसित हुईं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भी महत्वपूर्ण तिब्बती समुदाय बस गए।

पहली पीढ़ी के शरणार्थियों ने भारी कठिनाइयां झेलीं। उन्होंने जमीन साफ की, खेती शुरू की और लगभग शून्य से अपने घर बसाए। मठ फिर खड़े हुए। स्कूलों में तिब्बती भाषा और इतिहास पढ़ाया जाने लगा। हस्तशिल्प, खेती, रेस्तरां और छोटे कारोबारों ने परिवारों को सहारा दिया।

जो शुरुआत में शरणार्थियों के अस्थायी शिविर थे, वे धीरे-धीरे एक संगठित समुदायों के नेटवर्क में बदल गए।

भारत वह पनाहगाह था, जिसकी तिब्बतियों को सख्त जरूरत थी। लेकिन वक्त गुजरने के साथ वही पनाहगाह धीरे-धीरे घर जैसा लगने लगा।

यहीं से असली विरोधाभास शुरू होता है।

भारत में जन्मे अनेक युवा तिब्बतियों ने कभी तिब्बत देखा ही नहीं। वे भारतीय भाषाएं बोलते हैं, भारतीय स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं तथा भारतीय दोस्तों और पड़ोसियों के बीच बड़े होते हैं। फिर भी उनकी पहचान में तिब्बत की जगह बेहद गहरी है।

तिब्बत उनकी प्रार्थनाओं में बसता है। उनके गीतों, मठों और परिवारों की कहानियों में तिब्बत जिंदा रहता है।

एक युवा तिब्बती शायद ल्हासा की गलियों से ज्यादा मैसूरु की सड़कों को जानता हो। फिर भी तिब्बत की स्मृति उसके अपनेपन और पहचान की भावना को तय करती रहती है।

इस बीच निर्वासित समुदाय भी बदल रहा है। कड़े सीमा नियंत्रण के कारण तिब्बत से नए लोगों का आना काफी कम हो गया है। दूसरी ओर, कई युवा तिब्बती उच्च शिक्षा और बेहतर करियर के लिए अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं।

नतीजा एक अजीब और दर्दनाक विडंबना है।

जो समुदाय तिब्बत से कभी वापस लौटने की उम्मीद लेकर निकला था, वह अब दुनिया भर में बिखर गया है। हर नई पीढ़ी के साथ तिब्बत से उसकी भौतिक दूरी और बढ़ती जा रही है।

निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर तिब्बतियों की वापसी की संभावना धुंधली दिखाई देती है। तिब्बती आकांक्षाओं और बीजिंग की नीतियों के बीच राजनीतिक मतभेद अभी तक सुलझे नहीं हैं। निर्वासन में रह रहे अनेक तिब्बतियों को चीन के शासन में धर्म, भाषा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों की चिंता है।

फिर भी उम्मीद बड़ी ज़िद्दी चीज़ है।

बुजुर्ग तिब्बतियों के लिए वापसी आज भी एक पवित्र सपना है। युवा पीढ़ी के लिए यह सपना व्यावहारिक सवालों से जुड़ गया है—शिक्षा, रोजगार, नागरिकता, पहचान और अनिश्चित भविष्य।

इस पूरी कहानी में भारत की जगह बहुत खास है। भारत तिब्बत नहीं है। फिर भी अनेक तिब्बतियों के लिए भारत ही एकमात्र घर है, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से जाना है।

शायद लंबे निर्वासन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। एक अस्थायी पनाहगाह बिना किसी औपचारिक फैसले के स्थायी घर बन सकता है।

वापसी की प्रार्थना आज भी जारी है। निर्वासित बस्तियों में तिब्बती झंडा अब भी लहराता है। मठ पुरानी परंपराओं को संभाले हुए हैं। बच्चे उस मातृभूमि की भाषा सीख रहे हैं, जो उनकी पहुंच से बहुत दूर है।

लेकिन इतिहास अपनी चाल चलता रहता है।

क्या तिब्बती कभी तिब्बत लौटेंगे? इसका जवाब कोई निश्चित रूप से नहीं दे सकता।

फिलहाल वे स्मृति और हकीकत के बीच जी रहे हैं—एक घर को दिल में संभाले हुए और दूसरे घर में अपनी जिंदगी बनाते हुए।

भारत ने कभी मजबूर और बेघर शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। साठ साल से अधिक समय बाद वे मेहमान अब पड़ोसी, सहकर्मी, विद्यार्थी, भिक्षु, कारोबारी और भारत के व्यापक सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके हैं।

तिब्बत का सपना आज भी जिंदा है। लेकिन हर गुजरती पीढ़ी के साथ भारत थोड़ा कम निर्वासन और थोड़ा ज्यादा घर बनता जा रहा है।

Wednesday, August 19, 2026

 विश्व फोटोग्राफी डे: 

ताज कैमरे की आंख में कैद होती एक अनंत कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 अगस्त 2026

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एक क्लिक होता है और सदियों पुरानी इमारत अचानक जिंदा हो उठती है। संगमरमर पर ठहरी रोशनी बदलती है, यमुना की लहरें करवट लेती हैं और ताजमहल एक नए चेहरे के साथ कैमरे में उतर जाता है। 

सवाल यह है कि आखिर इस इमारत में ऐसा क्या है, जो लाखों तस्वीरों के बाद भी कैमरे को फिर से क्लिक करने के लिए मजबूर करता है?

यही ताज का जादू है। सदियां गुजर गईं, कैमरे बदल गए, तकनीक आसमान छू गई, लेकिन ताज की तस्वीर का आकर्षण कम नहीं हुआ।

विश्व फोटोग्राफी दिवस, 19 अगस्त, पर ताजमहल एक बार फिर कैमरे की दुनिया के केंद्र में है। 17वीं सदी का यह मकबरा फोटोग्राफी की कई पीढ़ियों का गवाह रहा है। भारी लकड़ी के कैमरों और कांच की प्लेटों से शुरू हुई कहानी आज स्मार्टफोन, ड्रोन और हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों तक पहुंच चुकी है।

आगरा में फोटोग्राफी की यह दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। एमजी रोड का प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो इसका जिंदा सबूत है। वर्ष 1878 में शुरू हुआ यह स्टूडियो आज भी मौजूद है और परिवार की छठी पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।

उस दौर में तस्वीर खींचना चुटकी का खेल नहीं था। बिजली आम नहीं थी। कैमरे भारी थे और तस्वीर तैयार करने के लिए अंधेरे कमरे में घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। प्रिया लाल के डार्करूम में प्राकृतिक रोशनी को पर्दों और शीशों की मदद से नियंत्रित किया जाता था। फोटोग्राफी तब तकनीक से ज्यादा सब्र, हुनर और बारीक नजर का इम्तिहान थी।

प्रिया लाल खंडेलवाल ने ताजमहल और आगरा के दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों की अनेक तस्वीरें तैयार कीं। उनकी तस्वीरें इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचीं और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘Pictorial Agra’ में आगरा के स्मारकों की 25 हाफ-टोन तस्वीरें और उनका संक्षिप्त इतिहास दर्ज है। यह सिर्फ तस्वीरों की किताब नहीं, बल्कि उस दौर के आगरा की एक दृश्य स्मृति है।

लेकिन आगरा और ताज की फोटोग्राफी की कहानी राजा दीन दयाल के बिना अधूरी है। 1844 में जन्मे दीन दयाल ने 19वीं सदी के भारत को कैमरे की नजर से दुनिया के सामने रखा। वे हैदराबाद के निजाम के दरबारी फोटोग्राफर बने और उन्हें ‘राजा मुसव्विर जंग’ की उपाधि मिली।

उनका कैमरा आज के मोबाइल फोन की तरह जेब में नहीं समाता था। विशाल लकड़ी के कैमरे, कांच की प्लेटें और भारी ट्राइपॉड लेकर वे बैलगाड़ियों और सहायकों के साथ लंबी यात्राएं करते थे। महल, किले, मंदिर, मस्जिदें, स्मारक, राजसी जुलूस, हाथी और शिकार; उन्होंने भारत की पूरी शानो-शौकत को अपने लेंस में समेटने की कोशिश की।

हैदराबाद में उनके कैमरे ने केवल इमारतों की खूबसूरती नहीं दिखाई। उसने रियासती जिंदगी, पहनावे, रस्मों, दरबारों और शाही ठाठ को भी हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। आज उनके भारी कैमरे और कांच की नेगेटिव प्लेटें किसी संग्रहालय की वस्तु लग सकती हैं, लेकिन उन तस्वीरों में उन्नीसवीं सदी का भारत आज भी सांस लेता दिखाई देता है।

दीन दयाल की तस्वीरें एक अहम बात सिखाती हैं; बेहतरीन तस्वीर कैमरा नहीं, नजर बनाती है।

ताजमहल इस कहावत को हर रोज सही साबित करता है। फोटोग्राफर के सामने यहां केवल एक इमारत नहीं होती। रोशनी, पानी, आसमान, बादल, पेड़ और छाया मिलकर हर पल नया फ्रेम बनाते हैं।

सुबह की नरम धूप संगमरमर को गुलाबी और सुनहरा कर देती है। दोपहर में उसकी सफेदी तेज चमकती है। शाम ढलते ही ताज किसी पुराने ख्वाब की तरह नजर आता है। पूर्णिमा की रात वही इमारत चांदनी में तैरती हुई लगती है।

यमुना इस दृश्य की खामोश साझेदार है। पानी में ताज का प्रतिबिंब तस्वीर को एक अलग गहराई देता है। धुंध आए तो रहस्य बढ़ जाता है। बादल घिरें तो दृश्य में नाटकीयता उतर आती है। मेहताब बाग से नदी पार का दृश्य हो या मुख्य द्वार से लिया गया क्लासिक फ्रेम, हर कोण अपनी अलग कहानी कहता है।

ताज की तस्वीरों की लोकप्रियता को डायना बेंच ने भी नया आयाम दिया। 1992 में राजकुमारी डायना की यहां खींची गई तस्वीर ने इस जगह को दुनिया के सबसे चर्चित फोटो स्पॉट्स में शामिल कर दिया।

ताजमहल 1983 से यूनेस्को विश्व धरोहर है और 2007 में न्यू सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड में शामिल हुआ। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। आज लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है। लिहाजा ताज की तस्वीरें अब सिर्फ पेशेवर कैमरों से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से भी पैदा होती हैं।

सेल्फी, रील और सोशल मीडिया ने ताज को एक नया डिजिटल जीवन दिया है। कभी फोटोग्राफर घंटों एक सही फ्रेम का इंतजार करता था। आज पर्यटक कुछ सेकंड में दर्जनों तस्वीरें खींच लेते हैं।

फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है: लाखों तस्वीरों के बाद भी ताज पुराना क्यों नहीं पड़ता?

शायद इसलिए कि ताज सिर्फ पत्थर का स्मारक नहीं, एहसास का स्मारक है। हर आंख उसे अलग ढंग से देखती है और हर फोटोग्राफर उसमें कोई नया कोण खोज लेता है।

राजा दीन दयाल के भारी कैमरे से लेकर आज के स्मार्टफोन तक तकनीक ने लंबा सफर तय किया है। कैमरा छोटा होता गया, तस्वीर ज्यादा साफ होती गई, शूटिंग आसान होती गई। मगर ताज के सामने खड़ी हैरत आज भी वैसी ही है।

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताज का पैगाम साफ है; कैमरा छोटा हो सकता है, मगर नजर बड़ी होनी चाहिए।

 राखी के धागे में देशभक्ति का रंग, बाजार में ‘स्वदेशी’ की धूम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 अगस्त 2026

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ढोलक की थाप, रंग-बिरंगी राखियां और मिठाइयों की खुशबू से बाजार गुलजार हैं। दुकानों पर बहनें राखियां चुन रही हैं, बच्चे उत्साह में हैं और भाई भी इस बार कलाई पर सिर्फ प्यार नहीं, देशभक्ति का धागा बांधने को तैयार हैं।

28 अगस्त को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन से पहले देशभर के बाजारों में स्वदेशी राखियों की मांग तेजी से बढ़ी है। इस बार राखी का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते के साथ आत्मनिर्भर भारत के संदेश का भी वाहक बनता दिख रहा है।

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के मुताबिक, इस साल राखी से जुड़े कारोबार का अनुमान करीब 25 हजार करोड़ रुपये है। पिछले साल यह आंकड़ा करीब 17 हजार करोड़ रुपये था। मिठाई, कपड़े, उपहार और पैकेजिंग को जोड़ दें तो त्योहार का कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से ऊपर जाने की उम्मीद है।

राखी में ‘विकसित भारत’ का संदेश

बाजार में पारंपरिक राखियों के साथ कई थीम आधारित राखियां भी खूब पसंद की जा रही हैं। इनमें ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘भारत गौरव’, ‘ब्रह्मोस’, ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र’ और ‘अमृत काल’ जैसी राखियां शामिल हैं।

‘नारी वंदन’, ‘लखपति दीदी’ और ‘नमामि गंगे’ जैसी राखियां भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। बच्चों और युवाओं में खास तौर पर ब्रह्मोस, राष्ट्र रक्षा सूत्र और विकसित भारत वाली राखियों को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है।

CAIT के महासचिव और चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल के मुताबिक, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ और आत्मनिर्भर भारत की सोच ने ग्राहकों का भरोसा बढ़ाया है। उनके अनुसार, स्वदेशी राखी अब सिर्फ एक सामान नहीं, बल्कि देश के प्रति गर्व का प्रतीक बन रही है।

CAIT के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया का कहना है कि इन राखियों के जरिए बहनें केवल कलाई पर पवित्र धागा नहीं बांध रहीं। वे राष्ट्र निर्माण, महिला सशक्तीकरण, स्वदेशी आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश भी दे रही हैं।

राखी में भारत की कारीगरी

इस बार राखियों का बाजार सिर्फ देशभक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें भारत की विविध लोक कला और कारीगरी भी खूब नजर आ रही है।

नागपुर की खादी राखियां, जयपुर की सांगानेरी कला, पुणे की बीज राखियां और असम की चाय-पत्ती से बनी राखियां ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं। कोलकाता की जूट, मुंबई की रेशम, बिहार की मधुबनी कला और बेंगलुरु की फूलों वाली राखियां भी खूब बिक रही हैं।

आदिवासी कारीगरों की बांस से बनी राखियों और कानपुर की मोती राखियों की भी मांग बढ़ी है। इन राखियों ने छोटे कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों के लिए कमाई के नए दरवाजे खोले हैं।

CAIT के राष्ट्रीय चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने व्यापारियों और ग्राहकों से त्योहारों में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील की है। उनका संदेश है—‘स्वदेशी अपनाएं, भारत मजबूत बनाएं।’

चीनी राखियां बाजार से बाहर

पिछले कुछ वर्षों में जिस बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी, वह अब बाजार में साफ दिखाई दे रही है। चीनी राखियों की मांग लगभग खत्म हो चुकी है और दुकानों पर भारतीय राखियों ने उनकी जगह ले ली है।

CAIT अब देश के अलग-अलग शहरों में विशेष स्वदेशी मेले लगाने की तैयारी कर रहा है। इन मेलों में महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों को अपने हाथ से बनाए उत्पाद बेचने का मौका मिलेगा।

इस बदलाव का सीधा फायदा छोटे कारोबारियों और कुटीर उद्योगों को मिल रहा है। राखी का छोटा-सा धागा अब रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गया है।

वृंदावन की विधवाओं की खास राखियां

इस साल एक भावुक पहल ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। वृंदावन की विधवाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 1,100 से अधिक विशेष राखियां तैयार की हैं।

इन राखियों में सिर्फ धागा नहीं, बल्कि अपनापन, उम्मीद और सामाजिक जुड़ाव का संदेश भी है। यह परंपरा कई वर्षों से स्नेह और एकजुटता की मिसाल बनी हुई है।

राखी भेजने के लिए डाक विभाग ने भी बड़े शहरों में विशेष काउंटर लगाए हैं, ताकि दूर रहने वाले भाइयों तक समय पर राखियां पहुंच सकें।

रक्षाबंधन अभी एक सप्ताह से अधिक दूर है, लेकिन बाजारों में त्योहार का रंग चढ़ चुका है। इस बार राखी की कलाई पर प्यार के साथ स्वदेशी, कारीगरी, रोजगार और राष्ट्र गौरव का धागा भी बंधता नजर आ रहा है।

कहने को राखी कुछ इंच का धागा है, लेकिन इस बार उसका संदेश काफी लंबा है—अपना खरीदिए, स्थानीय को बढ़ाइए और भारत को आत्मनिर्भर बनाइए।

Monday, August 17, 2026

 


नई पीढ़ी को भा रही है धर्म की राह:

पहले बुढ़ापे में होती थी तीर्थ यात्रा, और अब, चाहे जब! 


नव _पुरातन वाद का उत्थान?

“The Resurgence of Neo-Traditionalism”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अगस्त 2026

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सुबह की ठंडी हवा में घंटियों की आवाज गूंजती है। दूर तक युवाओं के जत्थे दिखाई देते हैं। किसी के कंधे पर कांवर है, कोई नंगे पांव परिक्रमा कर रहा है, तो कोई दोस्तों के साथ भजन गाते हुए पहाड़ चढ़ रहा है। मोबाइल जेब में है, सेल्फी भी चल रही है और भगवान का नाम भी।

यही भारत की नई तीर्थयात्रा है।

धर्म अब केवल बुजुर्गों की चिंता नहीं रहा। आज का युवा मंदिर जा रहा है, परिक्रमा कर रहा है, कांवर उठा रहा है और कठिन यात्राओं में शामिल हो रहा है। मगर उसकी यात्रा का मकसद केवल पूजा नहीं है। इसमें आध्यात्मिक सुकून, सांस्कृतिक पहचान, दोस्ती, रोमांच और घूमने-फिरने का आनंद भी शामिल है।

यानी आस्था और पर्यटन का नया मेल सामने आ रहा है। बीयर के साथ भांग भी!

चारधाम, अमरनाथ, वैष्णो देवी, करौली माता यात्रा, श्री बांके बिहारी, नाथद्वारा दर्शन, सबरीमाला, वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा में युवाओं की मौजूदगी अब आम बात है। सावन में गंगा जल लेकर शिव मंदिरों की ओर बढ़ते कांवरियों के जत्थों में बड़ी संख्या युवा चेहरों की होती है। लड़कियां भी शामिल हो रहीं हैं। मैसूर, ऋषिकेश के योग केंद्रों में गोरे विदेशियों के साथ भारतीय युवजन भी आस्था और नव_पुरातन संस्कृति में डुबकी लगा रहे हैं! 

इसे केवल धार्मिक उत्साह कहकर नजरअंदाज करना आसान होगा। मगर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है।

धर्म की ओर क्यों लौट रहा है युवा?

आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो खूब दी हैं, लेकिन सुकून कम कर दिया है। नौकरी का दबाव, प्रतियोगिता, सोशल मीडिया की लगातार हलचल, रिश्तों में दूरी और अकेलापन युवा मन को थका रहे हैं।

ऐसे में मंदिर, आश्रम और तीर्थस्थल एक अलग दुनिया देते हैं। कुछ दिन मोबाइल और दफ्तर से दूरी, सुबह जल्दी उठना, पैदल चलना, भजन सुनना और हजारों लोगों के साथ समय बिताना मन को राहत देता है।

धर्म का यह नया आकर्षण युवाओं की पहचान से भी जुड़ रहा है। अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कृति को करीब से देखने की इच्छा बढ़ी है। सोशल मीडिया ने भी इसे हवा दी है। यात्रा की तस्वीरें, रील और वीडियो दूसरे युवाओं को भी इन रास्तों पर खींच रहे हैं।

एक तरह से धार्मिक यात्रा अब आस्था के साथ अनुभव की यात्रा बन रही है।

तीर्थ या थेरेपी?

लंबी पैदल यात्रा शरीर को सक्रिय रखती है। नियमित दिनचर्या मन को कुछ अनुशासन देती है। सामूहिक भजन और प्रार्थना अकेलेपन को कम कर सकते हैं।

गोवर्धन की 21 किलोमीटर परिक्रमा हो या सबरीमाला की कठिन चढ़ाई, शरीर पसीना बहाता है और मन एक लक्ष्य पर टिकता है। यात्रा पूरी होने के बाद मिलने वाला संतोष कई यात्रियों के लिए खास अनुभव बन जाता है।

कुंभ, माघ मेला और बड़े धार्मिक आयोजनों में भी सामूहिक स्नान, ध्यान, हवन, उपवास और भजन जैसी गतिविधियां लोगों को एक साझा माहौल देती हैं। कई लोगों को ऐसी यात्राओं के बाद मन हल्का और अधिक शांत महसूस होता है।

इसीलिए ‘पिलग्रिमेज थेरेपी’ की बात होने लगी है। हालांकि इसे किसी बीमारी का इलाज मानना सही नहीं होगा। मानसिक बीमारी होने पर डॉक्टर की सलाह और उपचार जरूरी है। लेकिन तनाव और रोजमर्रा की मानसिक थकान से राहत के लिए आध्यात्मिक वातावरण मददगार हो सकता है।


युवाओं की बढ़ती धार्मिक भागीदारी भारतीय समाज में एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। धर्म अब निजी पूजा तक सीमित नहीं है। वह पहचान, सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक उत्सव का हिस्सा बन रहा है।

कांवर यात्रा इसका बड़ा उदाहरण है। हजारों युवा एक साथ चलते हैं। रास्ते में संगीत है, नारे हैं, भोजन और सेवा शिविर हैं। दोस्ती है और सामूहिक जोश भी है।

इसी तरह वृंदावन और गोवर्धन में युवा भक्ति के साथ यात्रा का आनंद लेते हैं। मंदिर दर्शन के बाद बाजार, स्थानीय भोजन, संगीत और सांस्कृतिक स्थलों का अनुभव भी यात्रा का हिस्सा बन जाता है।

इंस्टा रील बनाने की धुन ने भी इस ट्रेंड को लोकप्रिय बनाया है। सोशल मीडिया पर धर्म, आस्था से जुड़े विडियोज की बाढ़ आ गई है। हर त्यौहार एक महा सेलिब्रेशन, अक्रॉस इंडिया बन चुका है।


तीर्थयात्रा अब बड़ा कारोबार भी है। होटल, धर्मशालाएं, टैक्सी, बसें, फूल, प्रसाद, पूजा सामग्री, स्थानीय भोजन और हस्तशिल्प से हजारों लोगों की रोजी जुड़ी है।

तिरुमला तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी, काशी, वृंदावन और अयोध्या जैसे केंद्रों ने आसपास की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी है। बड़े धार्मिक आयोजनों में रेलवे, परिवहन, होटल और छोटे दुकानदारों को भी फायदा मिलता है।

डिजिटल दुनिया ने इसे और आसान बना दिया है। ऑनलाइन दर्शन, डिजिटल दान, पूजा बुकिंग और धार्मिक ऐप युवाओं को सुविधा दे रहे हैं।

सरकार भी धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। PRASAD जैसी योजनाओं का उद्देश्य तीर्थस्थलों की सुविधाएं और बुनियादी ढांचा बेहतर करना है।

लेकिन विकास का मतलब केवल चमकदार गलियां और बड़े कॉरिडोर नहीं होना चाहिए। साफ पानी, स्वच्छ शौचालय, सस्ता ठहराव, सुरक्षित रास्ते और कचरा प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।


बढ़ती धर्मयात्राओं का एक दूसरा पहलू भी है। जब आस्था पर्यटन और बाजार से जुड़ती है, तो खतरा रहता है कि श्रद्धा कहीं केवल कारोबार न बन जाए।

युवाओं को धार्मिक यात्रा में जगह मिलना अच्छी बात है। लेकिन धर्म के नाम पर नफरत, दिखावा और अंधविश्वास बढ़ना चिंता की बात होगी।

तीर्थ का मतलब केवल भीड़ बढ़ाना नहीं है। इसका मतलब मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है।

युवा अगर मंदिर जा रहा है, तो उसे करुणा, सहिष्णुता और सेवा भी सीखनी चाहिए। अगर वह परिक्रमा कर रहा है, तो रास्ते में पड़े कूड़े को देखकर आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। अगर वह नदी में स्नान कर रहा है, तो उसी नदी को गंदा करने से भी बचना चाहिए।

यही असली धार्मिकता होगी।

मंदिर तक जाने वाला रास्ता भीतर भी जाता है

भारत में तीर्थयात्रा का पुराना रास्ता फिर जवान हो रहा है। कांवर उठाते कंधे, पहाड़ चढ़ते कदम और परिक्रमा करते युवा इसके गवाह हैं।

आज का युवा शायद मोक्ष की तलाश में नहीं निकला है। वह सुकून खोज रहा है। वह अपनी जड़ों को समझना चाहता है। दोस्तों के साथ यात्रा करना चाहता है। कुछ दिन जिंदगी की भागदौड़ से दूर रहना चाहता है।

और हां, वह घूमना भी चाहता है।

इसलिए नई तीर्थयात्रा में धर्म भी है, पर्यटन भी; आस्था भी है और आनंद भी; शरीर की मेहनत भी है और मन की तलाश भी।

सवाल यह नहीं कि युवा धर्म की ओर क्यों लौट रहा है। बड़ा सवाल यह है कि धर्म उसे किस दिशा में ले जा रहा है।

अगर यह यात्रा उसे अधिक संवेदनशील, स्वस्थ, अनुशासित और सहिष्णु बनाती है, तो शायद तीर्थ सचमुच एक तरह की देसी थेरेपी बन सकता है।

पुरानी कहावत है: चलते रहो, रास्ता खुद रास्ता दिखाएगा।

शायद भारत के ये प्राचीन तीर्थमार्ग आज के युवा को यही रास्ता दिखा रहे हैं; भगवान तक पहुंचने का ही नहीं, बल्कि खुद तक लौटने का भी।