Wednesday, March 25, 2026

 बीहड़ों की धूल, बंदूकों की गूंज और आत्मसमर्पण की आहट

और अब, उसी इतिहास को सलाम करने की तैयारी…

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

27 मार्च 2026

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चम्बल।

नाम लेते ही दिल धक से रह जाता था।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं के बीच पसरे वे बीहड़ किसी भूगोल की साधारण रचना नहीं। वे धरती के फटे हुए सीने जैसे थे, गहरे, टेढ़े मेढ़े, रहस्यमयी। सूरज की रोशनी भी वहाँ सीधी नहीं उतरती थी, जैसे डरती हो कि कहीं लौट न पाए। धूल ऐसी उड़ती थी मानो हर कण में एक अधूरी कहानी अटकी हो। कहीं खामोशी इतनी गाढ़ी कि कानों में गूंजने लगे, तो कहीं अचानक किसी अज्ञात दिशा से आती आवाज दिल की धड़कन बढ़ा दे।

1960 और 70 का दशक। यह वह समय था जब चम्बल सिर्फ एक नदी नहीं, वह एक मनःस्थिति थी।

सड़कें वहाँ जाकर खत्म हो जाती थीं। कानून कागजों में रह जाता था। शासन की पहुँच बीहड़ों की गहराई में खो जाती थी।

बीहड़ों की धरती पर चलना आसान नहीं था। पांव रखते ही मिट्टी खिसक जाती। एक मोड़ के बाद क्या है, कोई नहीं जानता। कांटेदार झाड़ियां, गहरी खाइयां, सांपों की सरसराहट, और ऊपर आसमान में मंडराते गिद्ध। यह प्रकृति का ऐसा दुर्ग था, जिसे इंसान ने नहीं बनाया, पर जिसने इंसान को अपने हिसाब से ढाल लिया।

इन्हीं बीहड़ों में जन्म लेते थे बागी।

डकैत कह देना आसान है, पर कहानी उससे कहीं ज्यादा जटिल थी। कोई किसान था जिसे जमींदार ने कुचल दिया। कोई युवा था जिसे पुलिस की ज्यादती ने विद्रोही बना दिया। कोई ऐसा था जिसे न्याय नहीं मिला, और उसने बंदूक उठा ली।

बीहड़ों में कानून की किताब नहीं चलती थी। चलती थी बंदूक की नली और बदले की आग।

लेकिन हर कहानी में सिर्फ अंधेरा नहीं होता। कहीं न कहीं रोशनी भी जन्म लेती है।

और चम्बल में वह रोशनी लेकर आए कई गांधीवादी, सर्वोदय के नेता, आचार्य विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण, आदि। दुबला पतला शरीर। शांत चेहरा। न कोई हथियार, न कोई डर। बस एक विश्वास कि इंसान बदल सकता है। यह विश्वास लेकर वे बीहड़ों में उतरे। जहाँ पुलिस जाने से कतराती थी, वहाँ वे नंगे पांव चले। इस आंदोलन को नई ताकत मिली, और लोग जुड़े।

कहानी किसी फिल्म की तरह लगती है, लेकिन यह हकीकत थी। डकैतों ने संदेश भेजा। वे आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, लेकिन अपमान नहीं सहेंगे।

और फिर वह दिन आया जब बीहड़ों ने एक अनोखा दृश्य देखा। मंच सजा। भीड़ जुटी। पुलिस भी थी, प्रशासन भी। और फिर एक एक करके बागी सामने आए।

हाथों में बंदूक थी, लेकिन सिर झुका हुआ। उन्होंने हथियार जमीन पर रख दिए। उस दिन गोली नहीं चली। तालियां बजीं। यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं था। यह एक युग का अंत था और दूसरे युग की शुरुआत।

इस पूरी कहानी ने सिनेमा को भी गहराई से प्रभावित किया। उस दौर की जिस देश में गंगा बहती है, गंगा जमुना, मुझे जीने दो, हीरोज डकैतों के दिल बदल देते दिखते हैं। आ अब लौट चलें ! सुनील दत्त की मुझे जीने दो  बीहड़ों की सच्चाई को बिना किसी परदे के दिखाती है।

और वर्षों बाद पान सिंह तोमर यह याद दिलाती है कि हर डकैत के पीछे एक टूटा हुआ इंसान होता है। सिनेमा ने चम्बल को सिर्फ रोमांच नहीं बनाया। उसने उसे समझने की कोशिश की।

1970 के दशक में, एक युवा पत्रकार के रूप में, मैंने चम्बल को करीब से देखा। बीहड़ों में चलते हुए ऐसा लगता था जैसे समय थम गया हो। हर मोड़ पर एक कहानी थी। किसी का नाम इतिहास में दर्ज हुआ, किसी का नहीं।लेकिन दर्द सबका एक जैसा था।

मैंने उस समय लिखा था कि भारत ने चम्बल में सिर्फ डकैतों को नहीं हराया, उसने अपने ही भटके हुए लोगों को वापस पाया। वह लेख विदेशों में भी प्रकाशित हुआ और यह अनुभव आज भी मन में ताजा है। सैकड़ों खूंखार बागियों ने जब मुरैना में आत्म समर्पण किया तो लगा ये किसी और दुनिया की कहानी थी। लेकिन नहीं, वह यहीं हुआ था, हमारी ही धरती पर।

और अब, उसी इतिहास को याद करने का समय फिर आया है। जौरा स्थित गांधी आश्रम में बागी समर्पण दिवस की 55वीं वर्षगांठ पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित होने जा रही है। यह आयोजन सिर्फ औपचारिक कार्यक्रम नहीं है। यह स्मृति का उत्सव है। यह उस क्षण को फिर से जीने का प्रयास है जब बंदूकें झुकी थीं और इंसानियत उठ खड़ी हुई थी। इस संगोष्ठी में देश भर के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक और पत्रकार भाग लेंगे। अहिंसा, सामाजिक बदलाव और गांधीवाद के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होगी। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह होगी, जब उन बागियों को सम्मानित किया जाएगा जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में लौटने का साहस दिखाया। फिर संवाद का सिलसिला चलेगा। विचारों का आदान प्रदान होगा। पुराने अनुभवों को नई पीढ़ी के सामने रखा जाएगा।

यह भी याद किया जाएगा कि कैसे एक समय में चम्बल के बीहड़ देश के लिए चुनौती थे, और कैसे गांधीवादी प्रयासों ने उन्हें परिवर्तन की प्रयोगशाला बना दिया।

आज जब समाज फिर से तनाव और विभाजन के दौर से गुजर रहा है, तब चम्बल की यह कहानी और भी प्रासंगिक हो जाती है।

यह हमें सिखाती है कि कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका समाधान न हो सके।

जरूरत होती है विश्वास की, संवाद की, और धैर्य की।

चम्बल आज भी है। बीहड़ आज भी हैं। लेकिन अब वहाँ डर की नहीं, इतिहास की गूंज सुनाई देती है। जब हवा उन खाइयों से गुजरती है, तो लगता है जैसे वह कोई पुरानी कहानी सुना रही हो। एक ऐसी कहानी जिसमें बंदूकें थीं, खून था, लेकिन अंत में जीत इंसानियत की हुई।

और जब जौरा में फिर से बागी समर्पण दिवस मनाया जाएगा, तो वह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं होगा। वह उस विश्वास का पुनर्जन्म होगा जिसने कभी बीहड़ों में शांति बो दी थी।

चम्बल की धूल अब भी उड़ती है। लेकिन अब उसमें डर नहीं, इतिहास की खुशबू है।


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Reference:

The 1977 article by **Brij Khandelwal** (under the byline "By Brij Khandelwal Gemini") appears on **page 8** of the *New Nation* (Singapore) issue dated **16 January 1977**.

### Available Excerpt (from digitized archives)

The publicly indexed opening text reads:

> "FOUR years or so ago If you travelled in a train or a bus through the Chambal valley region in Central India you might have found a notorious dacoit disguised as a superintendent of police sitting beside"

It continues from there, describing travel experiences in the Chambal valley during the early 1970s, when the area was still notorious for bandit (dacoit) activity. The piece is framed as a travelogue highlighting the risks and atmosphere of the region at that time.

 Changing Media? The Truth of the News: Journalism's Real Test in an Era of Noise

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By Brij Khandalwal  

March 26, 2026

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What exactly is news? Is it merely what just happened, or is it something that shakes us to our core and forces us to confront reality?

In today’s world, every pocket has become a newsroom. Every hand holds a smartphone, and every screen flashes with “breaking news.” We are drowning in an endless flood of information, surrounded by a cacophony of voices. Yet, amid this overwhelming noise, the truth often gets buried or distorted.

The digital revolution has democratized news like never before. Anyone with a phone can now report, comment, or analyze events in real time. But this very democratization has also made news more suspect. When everyone claims to be a reporter or analyst, the critical question arises: who is actually investigating?

This is where traditional journalism must prove its enduring value. Journalism is not a casual pursuit or a form of light entertainment. It is a rigorous discipline ,  one that demands gathering facts, rigorously testing them, verifying sources, and then presenting those facts clearly, accurately, and promptly to the public.

The great masters of the craft understood this deeply. Joseph Pulitzer famously described news as “what compels people to talk.” His contemporary, John Bogart, captured its essence more colorfully: “If a dog bites a man, it’s not news; but if a man bites a dog, it is news.” The message is clear :  news must be new, unusual, and possess the power to surprise or shock.

Yet journalism cannot be reduced to mere sensationalism. Grabbing attention is easy; building understanding is hard. The true purpose of journalism lies in transforming raw information into meaningful knowledge. It provides essential context, explains causes and consequences, and helps readers make sense of a complex world.

News generally falls into two broad categories. The first type delivers immediate impact :  major government decisions, economic shocks, pandemics, wars, or natural disasters. These stories alert and awaken us. The second type delves deeper: it explores the stories behind the headlines, examining long-term consequences and how distant events will ultimately affect our homes, jobs, families, and daily lives. These stories compel us to think.

One without the other remains incomplete. The best journalism seamlessly combines both ;  delivering urgency while fostering reflection.

At its foundation, strong journalism stands on four essential pillars:

First: Accuracy. 

This is the backbone of the profession. A single wrong name, incorrect figure, or unverified claim can shatter years of carefully built credibility in an instant. In an age of artificial intelligence, deepfakes, and rapidly spreading misinformation, accuracy is no longer just a professional virtue ,  it is a moral responsibility.

Second: Timeliness.

News has an extremely short shelf life. Today’s headline becomes tomorrow’s history. Information that arrives too late ceases to be news and turns into belated analysis or commentary.

Third: Relevance.

News must connect with people’s lives. An event happening in a distant country only becomes meaningful when its ripple effects touch our pockets, our safety, or our future. Relevance turns abstract information into something personal and actionable.

Fourth: Novelty. 

There must be an element of freshness ;  that “man bites dog” surprise factor that stops a scrolling reader in their tracks. Without novelty, even important stories risk being ignored.

Modern reader behavior has further reshaped journalistic presentation. Most people no longer read newspapers cover to cover. They scroll quickly, scanning headlines and snippets, deciding within seconds whether to stop or move on. This has forced news organizations to adapt: shorter formats, sharper headlines, clearer and more direct language, and visually engaging presentations that respect the limited time of busy lives.

Yet, an interesting paradox remains. While global events dominate headlines, people often connect most deeply with stories close to home ;  a broken road in the neighborhood, issues at the local school, the opening or closing of a familiar shop, or the tale of a local hero. These “hyper-local” stories touch hearts because they reflect our everyday reality. In truth, every big national or global story eventually becomes local. Policies framed in distant capitals ultimately play out in our kitchens and communities. Global debates on climate change matter only when rising floods threaten our cities or extreme heat scorches our streets.

The media industry today faces another harsh reality: intense commercial pressure. Many readers openly demand more entertainment and less serious news. In the digital economy, success is increasingly measured by clicks, views, shares, and engagement metrics. Yet trust ;  the most valuable currency of journalism, can only be earned through consistent, truthful reporting.

The finest journalism achieves a delicate balance. It delivers hard facts while telling compelling human stories. It simplifies complex issues without sacrificing depth or nuance. A good report is never just a dry collection of data or statistics; it is a narrative about people ,  their struggles, their hopes, their aspirations, and their resilience.

A journalist, at heart, serves as the eyes, ears, and sometimes the conscience of society. They venture where ordinary citizens cannot go. They ask uncomfortable questions when others remain silent. They peel away layers of secrecy and spin to reveal uncomfortable truths. Their role extends far beyond merely informing the public. It includes holding power accountable ,  whether that power resides in government, corporations, influential individuals, or institutions.

Today, journalism faces unprecedented challenges. Print circulation continues to decline. Digital algorithms increasingly dictate what audiences see and read. The shadow of fake news, propaganda, and coordinated disinformation grows darker. Economic uncertainties and declining ad revenues have forced newsrooms to shrink.

Despite these pressures, the core principles of journalism remain unchanged and non-negotiable: accuracy, timeliness, relevance, novelty, and above all, unwavering commitment to the public interest.

The mediums will continue to evolve ,  from printed paper to glowing screens, from text to voice, and from voice to immersive video and interactive formats. Technology will keep transforming how news is gathered and delivered. Yet the fundamental purpose of journalism endures. Human beings will always hunger to know what is happening, to understand why it matters, and to make informed decisions about their lives and societies.

As long as human curiosity survives, quality journalism will remain not just relevant, but more essential than ever before. In an age of noise, the clear, truthful voice of responsible journalism becomes the most valuable guide we have.

 बदलता मीडिया?

खबर का सच: शोर के दौर में पत्रकारिता की असली परीक्षा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 मार्च 2026

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खबर क्या है? जो अभी हुआ? या जो हमें भीतर तक हिला दे?

आज हर जेब में न्यूज़रूम है। हर हाथ में मोबाइल। हर स्क्रीन पर ब्रेकिंग।

सूचनाओं की बाढ़ है। आवाज़ों का शोर है। लेकिन सच? वह अक्सर इस कोलाहल में दब जाता है।

डिजिटल दुनिया ने खबरों को लोकतांत्रिक बनाया है, पर साथ ही उन्हें संदिग्ध भी। अब हर कोई रिपोर्टर है। हर कोई विश्लेषक।

पर जांच कौन कर रहा है?

यही वह जगह है जहां पत्रकारिता अपनी असली पहचान साबित करती है। पत्रकारिता कोई हल्की कला नहीं। यह अनुशासन है। तथ्य जुटाना। उन्हें परखना। और फिर जनता के सामने साफ, सटीक और समय पर रखना।

पुराने उस्तादों ने यह रास्ता बहुत पहले तय कर दिया था। जोसेफ पुलित्जर ने कहा; खबर वही जो लोगों को बात करने पर मजबूर कर दे।

जॉन बोगार्ट ने इसे और चुटीले अंदाज़ में समझाया: “कुत्ता आदमी को काटे तो खबर नहीं, आदमी कुत्ते को काटे तो खबर है।”

मतलब साफ है, खबर में नया होना चाहिए, अनोखा होना चाहिए, चौंकाने की ताकत होनी चाहिए।

लेकिन क्या पत्रकारिता सिर्फ सनसनी है? क्या हर खबर का मकसद सिर्फ ध्यान खींचना है? नहीं।

पत्रकारिता का असली काम है: समझ बनाना। तथ्य को संदर्भ देना। सूचना को ज्ञान में बदलना।

खबर मोटे तौर पर, दो तरह की होती है। एक, जो तुरंत असर डालती है, सरकारी फैसले, आर्थिक झटके, महामारी, युद्ध, आपदा।

दूसरी, जो इन घटनाओं के पीछे की कहानी बताती है, इनका असर आपके घर, आपकी नौकरी, आपकी जिंदगी पर क्या होगा।

पहली खबर आपको जगाती है।

दूसरी आपको सोचने पर मजबूर करती है।

एक बिना दूसरी अधूरी है।

अच्छी पत्रकारिता चार मजबूत खंभों पर टिकी होती है।

पहला: सटीकता।

यह इसकी रीढ़ है।

एक छोटी गलती, एक गलत आंकड़ा, एक गलत नाम: और वर्षों का भरोसा पल भर में टूट जाता है।

आज के दौर में, जहां एआई, डीपफेक और फर्जी खबरें तेजी से फैलती हैं, सटीकता सिर्फ गुण नहीं, जिम्मेदारी है।

दूसरा: समय।

खबर की उम्र बहुत छोटी होती है।

आज की हेडलाइन, कल का इतिहास।

जो देर से पहुंचा, वह खबर नहीं, विश्लेषण बन जाता है।

तीसरा: प्रासंगिकता। खबर वही जो आपकी जिंदगी से जुड़ती है।

दूर देश की कोई घटना भी तभी मायने रखती है जब उसका असर आपकी जेब, आपकी सुरक्षा या आपके भविष्य पर दिखे।

चौथा: नवीनता।

कुछ ऐसा जो पहले न सुना हो, न देखा हो।

वही “आदमी ने कुत्ते को काटा” वाला तत्व, जो पाठक को रोकता है।

अब जरा पाठक की आदतों पर नजर डालिए।

वह पूरा अखबार नहीं पढ़ता। वह स्क्रॉल करता है, झांकता है, चुनता है।

कुछ सेकंड में फैसला करता है; रुकना है या आगे बढ़ना है।

इसलिए पत्रकारिता का रूप भी बदल रहा है। छोटी खबरें, तीखी सुर्खियाँ, साफ भाषा। ऐसी प्रस्तुति, जो व्यस्त जीवन में भी जगह बना सके।

लेकिन एक दिलचस्प सच है; 

लोग बड़ी खबरों से ज्यादा अपने आसपास की खबरों से जुड़ते हैं।

मोहल्ले की सड़क टूटी है। पास के स्कूल में क्या हुआ। किसी दुकान का खुलना या बंद होना। या कोई स्थानीय हीरो। यही खबरें दिल को छूती हैं। क्योंकि यही हमारी रोजमर्रा की दुनिया है। असल में हर बड़ी खबर भी अंततः लोकल ही होती है।

नीतियां राजधानी में बनती हैं, असर घर-घर में दिखता है। जलवायु परिवर्तन पर बहस वैश्विक है, लेकिन बाढ़ आपके शहर में आती है, गर्मी आपकी त्वचा झुलसाती है।

मीडिया के सामने एक और सच है—व्यापार का दबाव।

पाठक कहते हैं: मनोरंजन ज्यादा चाहिए, खबर कम।

क्लिक, व्यू और शेयर अब सफलता के नए पैमाने हैं।

पर भरोसा? वह सिर्फ सच्ची खबर से बनता है।

अच्छी पत्रकारिता इस संतुलन को साधती है। तथ्य भी देती है, कहानी भी सुनाती है। जटिल विषयों को सरल बनाती है, बिना उनकी गहराई खोए। एक रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं होती।

वह इंसानों की कहानी होती है; उनकी तकलीफ, उनकी उम्मीद, उनका संघर्ष।

पत्रकार कौन है? समाज की आंख।

समाज का कान। और कभी-कभी उसकी अंतरात्मा।

वह वहां जाता है, जहां आम आदमी नहीं पहुंच सकता। वह सवाल पूछता है, जहां चुप्पी है। वह सच निकालता है, जहां परतें चढ़ी होती हैं।

उसका काम सिर्फ सूचना देना नहीं।

जवाबदेही तय करना है। सत्ता को आईना दिखाना है, चाहे वह सरकार हो, कॉरपोरेट हो या कोई प्रभावशाली समूह।

आज पत्रकारिता कई मोर्चों पर जूझ रही है। प्रिंट सिमट रहा है। डिजिटल एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं कि आप क्या देखेंगे। फेक न्यूज का साया गहरा हो रहा है।

फिर भी, इसके मूल सिद्धांत अडिग हैं। सटीकता। समय। प्रासंगिकता।नवीनता। और सबसे ऊपर, जनहित।

माध्यम बदलते रहेंगे। कागज से स्क्रीन, स्क्रीन से आवाज, आवाज से वीडियो।

पर पत्रकारिता का मकसद नहीं बदलेगा। इंसान हमेशा जानना चाहेगा। समझना चाहेगा। और सही फैसले लेना चाहेगा।

जब तक यह जिज्ञासा जिंदा है; पत्रकारिता भी जिंदा रहेगी। और शायद, पहले से कहीं ज्यादा जरूरी।

Tuesday, March 24, 2026

 एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने उठाए गंभीर सवाल 

आगरा के भूले-बिसरे स्मारक दम तोड़ रहे हैं। जवाबदेह कौन?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मार्च 2026

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जब इतिहास चुपचाप मरता है; ईंट दर ईंट, मेहराब दर मेहराब, और उसके रखवाले आँखें मूँद लेते हैं, तो क्या होता है? 

दुनिया ताजमहल की शाश्वत चमक से मोहित जरूर होती है। लेकिन थोड़ा हटकर देखिए, थोड़ा अंदर जाइए। चमक छूट जाती है, क्रूर सच सामने आता है।  

यहाँ इतिहास नहीं चमकता, यह बिखरता है। टूटे गुंबद, झाड़ियों में दबे आंगन, धुंधली पड़ती भित्तिचित्र आखिरी साँसें गिन रहे हैं। यह आगरा का दूसरा चेहरा है, अनदेखा, अनकहा, अनसुना।

इस हफ्ते इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आखिरकार सख्त रुख अपनाया। उत्तर प्रदेश के आगरा, झांसी, वृंदावन, लखनऊ, हस्तिनापुर समेत कई शहरों में बिखरती विरासत पर स्वतः संज्ञान लिया और केंद्र व राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर आठ हफ्तों में जवाब माँगा।  

जो लोग इन गलियों से रोज गुजरते हैं, उनके लिए यह खबर नहीं, हकीकत है।  

आगरा किले और फतेहपुर सीकरी की भव्यता के पार एक खामोश कब्रिस्तान फैला है, स्मारकों का। सैकड़ों स्मारक भूले हुए, बेसहारा। न सुरक्षा, न सूचना पट्ट, न कोई संरक्षण योजना।  

विरासत संरक्षक डॉ. मुकुल पांड्या कहते हैं, “दारा शिकोह की खोई लाइब्रेरी हो या फतेहपुर सीकरी की मिटती शैल चित्रकला, बेगम समरू का बगीचा, सुल्तान परवेज का मकबरा, ताल फिरोज खान, चीनी का रौजा, हम्माम अलीवर्दी खान (छिप्पीतौला), जसवंत सिंह की छतरी, चौबुर्जी, बादशाही बाग (समुगरह), फतेहाबाद, यह महज उपेक्षा नहीं, यह इतिहास का दाह संस्कार है।”

एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने तस्वीर और साफ कर दी। उत्तर प्रदेश में 5400 से अधिक धरोहरें दर्ज हैं, लेकिन सुरक्षित सिर्फ 421. बाकी? भगवान भरोसे। अतिक्रमण बढ़ रहे हैं, बुलडोजर मंडरा रहे हैं, समय चुपचाप अपना काम कर रहा है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का आगरा सर्किल 265 संरक्षित स्मारकों की देखभाल करता है। आंकड़ा सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन हकीकत यह कि एक भी स्मारक पर पूरी तरह हेरिटेज बायलॉज लागू नहीं हैं। पंद्रह साल बीत गए, फाइलें घूमती रहीं, स्मारक गिरते रहे।  

सबसे चौंकाने वाली बात; सितंबर 2023 से अप्रैल 2025 तक एक भी नया अतिक्रमण दर्ज नहीं किया गया। क्या सचमुच कोई उल्लंघन नहीं हो रहा, या देखने वाला कोई नहीं? जमीन पर तस्वीर साफ है; अवैध निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं, संरक्षित क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, प्रशासन सोया हुआ है। यह लापरवाही नहीं, जिम्मेदारी से पलायन है।

कानून कहता है; संरक्षण करो। व्यवस्था कहती है; टालो, भूलो, छोड़ दो।  

उधर प्रकृति भी हमला बोल रही है। यमुना का प्रदूषण नींव खा रहा है, भूजल दीवारों को खोखला कर रहा है, बाढ़ इतिहास को चाट रही है। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान अदृश्य है।  

वृंदावन के प्राचीन मंदिर, पुरानी आगरा की हवेलियाँ, यमुना किनारे के घाट, सौ साल पुरानी कारवांसरायें, जिनमें कभी रेशम मार्ग के व्यापारी ठहरते थे, सभी सूची से बाहर हैं। वृंदावन में अकेले 48 प्राचीन घाट और कुंड संरक्षण की पुकार कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। यमुना किनारे की पूरी विरासत अतिक्रमण में दब गई, समय में खो गई, नजर और नीति से बाहर हो गई।

अब अदालत ने संस्कृति मंत्रालय, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण और राज्य सरकार से जवाब माँगा है। माँगें स्पष्ट हैं: पूरी धरोहर की सूची बनाओ, हर स्मारक के लिए बायलॉज तैयार करो, सख्ती से अमल करो, अलग स्टाफ नियुक्त करो और हेरिटेज बोर्ड गठित करो।  

ये कदम सुनने में साधारण लगते हैं, लेकिन वास्तव में बेहद जरूरी हैं। क्योंकि यह सिर्फ पत्थरों की बात नहीं; यह पहचान की, स्मृति की और शहर की आत्मा की बात है।

आगरा हर साल 80 लाख से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन ज्यादातर सिर्फ ताजमहल तक सीमित रहते हैं। कोई शहर एक पोस्टकार्ड पर नहीं जी सकता। राजस्थान देखिए, यूरोप देखिए, विरासत वहाँ रोजगार बनती है, पहचान बनती है, अर्थव्यवस्था बनती है। हम उसे सड़ने दे रहे हैं।  

हर गिरता गुंबद एक कहानी मिटाता है। हर अतिक्रमित आंगन एक याद चुरा लेता है। आगरा सिर्फ ताजमहल नहीं है। यह वह गुमनाम मकबरा भी है, टूटा दरवाजा भी है, उजड़ा बाग भी है। इन्हें खो दिया तो शहर की रूह खो जाएगी।

अदालत ने चेतावनी दे दी है। घंटी बज चुकी है। अब सवाल है: क्या कोई जागेगा?  

क्योंकि अब इतिहास सदियों में नहीं मर रहा। वह मौसमों में खत्म हो रहा है, हमारे सामने, हमारे देखते-देखते।

 ज़िंदगी की साँसों पर टिकी नदियाँ: सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम, बिखरी बेपरवाही खत्म करो

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 मार्च 2026

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क्या हमारी नदियाँ अब सिर्फ नक्शों में बचेंगी? या फिर हम उन्हें सच में “राष्ट्रीय संपत्ति” मानकर बचाने की जद्दोजहद करेंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि भारत की नदियाँ “राष्ट्रीय संपत्ति” हैं। यह कोई मामूली बयान नहीं था। यह एक जोरदार चेतावनी थी। एक अलार्म। मगर अफसोस, यह अलार्म भी हमारी सियासी और प्रशासनिक बेपरवाही की दीवारों से टकराकर खामोश हो गया।

सच तो यह है कि जो बात अदालत ने कही, वह हर आम आदमी पहले से जानता है: हमारी नदियाँ अब जीवनदायिनी नहीं, गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं।

हिमालय की गोद से निकलने वाली पवित्र धाराएँ हों या दक्षिण के मैदानों में बहती नदियाँ, हर जगह एक ही कहानी है। जहरीले औद्योगिक कचरे का हमला। शहरों की सीवेज का सैलाब। और ऊपर से हुकूमतों की नाकामी।

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर यमुना नदी पर फोकस किया। दिल्ली, नोएडा और गाज़ियाबाद से निकलने वाला बिना ट्रीट हुआ कचरा सीधे यमुना में गिर रहा है। यह एक तरह का “गंदगी का फेडरलिज़्म” है, जहाँ हर राज्य और हर एजेंसी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ती है, और नदी धीरे-धीरे मरती जाती है।


आज की यमुना नदी नहीं, एक जिंदा इल्ज़ाम है, हमारी शहरी प्लानिंग पर, हमारी नीयत पर, हमारी नाकामी पर।

दिल्ली में यमुना के पानी में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 92,000 तक पहुँच चुका है, जो तय सीमा से करीब 40 गुना ज्यादा है। यह साफ इशारा है कि नदी में कच्चा सीवेज बेहिसाब बहाया जा रहा है।

बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी BOD 70 mg/L तक पहुँच गई है, जबकि 3 mg/L से ऊपर जलीय जीवन खत्म होने लगता है। यानी यमुना अब एक बहती हुई कब्रगाह बन चुकी है, जहाँ पानी है, मगर जिंदगी नहीं।

ब्रज क्षेत्र, मथुरा और वृंदावन, जहाँ कभी कृष्ण की श्यामल सखी बहती थी, अब काले, गाढ़े कीचड़ में बदल चुकी है। हवा में मीथेन की सड़ी बदबू है। श्रद्धा भी जैसे शर्मिंदा हो गई हो।

आगरा में ताजमहल खड़ा है, खामोश, मगर सब कुछ देखता हुआ। कभी यमुना उसकी खूबसूरती को दोगुना करती थी। आज वही नदी उसकी बदहाली का आईना बन गई है।

हजारों करोड़ रुपये यमुना एक्शन प्लान पर खर्च हुए। मगर नतीजा? सिफर। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या पुराने और बेअसर। सिर्फ दिल्ली से रोज़ करीब 28 मिलियन गैलन गंदा पानी बिना साफ हुए यमुना में बहा दिया जाता है।

यमुना की बदहाली दरअसल पूरे देश का आईना है।

गंगा, जिसे मां कहा जाता है, आज भी झाग और गंदगी से जूझ रही है। “नमामि गंगे” जैसे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी ज़मीन पर बिखरे हुए नजर आते हैं। वाराणसी के घाटों पर झाग तैरता है, और यह झाग सिर्फ पानी में नहीं, हमारी नीतियों में भी है।

दक्षिण भारत में गोदावरी और कृष्णा नदियाँ औद्योगिक कचरे से जूझ रही हैं। कई जगह “डेड ज़ोन” बन चुके हैं, जहाँ पानी है, मगर जीवन नहीं।

कावेरी नदी, जो कभी सभ्यताओं की जननी थी, आज बेंगलुरु के सीवेज का बोझ ढो रही है।

मसला साफ है, जिम्मेदारी बंटी हुई है, मगर समस्या साझा है।

प्रदूषण सरहदें नहीं देखता। गाज़ियाबाद की गंदगी आगरा के खेतों तक पहुँचती है। हरियाणा का औद्योगिक कचरा दिल्ली के भूजल को जहरीला करता है।

फिर भी हमारी सरकारें अपने-अपने दायरे में सिमटी रहती हैं, जैसे नदी नहीं, कोई सियासी इलाका हो।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम

सुप्रीम कोर्ट ने इस बिखरी हुई व्यवस्था पर सीधा वार किया है। अदालत ने कहा कि जब बहुत सारी एजेंसियाँ होती हैं, तो जवाबदेही खो जाती है।

कोर्ट ने CPCB को निर्देश दिया है कि हर जिम्मेदार संस्था की पहचान करे। हरियाणा सरकार से भी रिपोर्ट मांगी गई है। मकसद साफ है, अब कोई बच नहीं पाएगा।

संदेश बिल्कुल साफ है:

नदियाँ साझा धरोहर हैं। अगर एक राज्य अपनी गंदगी नहीं रोकता, तो वह दूसरे राज्य के खिलाफ पर्यावरणी जुल्म करता है।

अब “तू-तू, मैं-मैं” का वक्त खत्म होना चाहिए। आगे रास्ता क्या है?

अगर नदियों को सच में बचाना है, तो इरादे मजबूत करने होंगे।

सबसे पहले, 2030 तक यह सुनिश्चित करना होगा कि एक बूंद भी बिना ट्रीट हुआ कचरा नदी में न जाए। इसके लिए आधुनिक और पारदर्शी सिस्टम चाहिए, जहाँ हर डिस्चार्ज पर नजर हो।

एक मजबूत नेशनल रिवर अथॉरिटी बनानी होगी, जिसके पास सख्त कानूनी ताकत हो। जो अफसर काम न करें, उन पर भारी जुर्माना लगे, चाहे वह कमिश्नर हों या मुख्यमंत्री।

नदियों के किनारों को अतिक्रमण से बचाना होगा। नदी को सांस लेने के लिए उसका फ्लडप्लेन चाहिए। मगर आज वहां या तो झुग्गियाँ हैं या आलीशान इमारतें। यह सिलसिला रोकना होगा।

सालों से जमी गाद को हटाने के लिए बड़े स्तर पर ड्रेजिंग अभियान चलाना होगा, ताकि नदी का प्राकृतिक बहाव वापस आ सके।

आखिरी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने रास्ता दिखा दिया है। अब गेंद सरकारों के पाले में है।

“राष्ट्रीय संपत्ति” का दर्जा सिर्फ एक कागज़ी एलान नहीं होना चाहिए। यह एक वादा होना चाहिए, भविष्य से, आने वाली पीढ़ियों से।

अगर हम अब भी नहीं चेते, तो हम सिर्फ अपनी विरासत नहीं खोएंगे, हम अपनी जिंदगी की बुनियाद खो देंगे।

यमुना की खामोश चीख सिर्फ एक नदी की नहीं, पूरे देश की आवाज़ है।

अब वक्त आ गया है, बहानों को दफन करने का, और नदियों को ज़िंदा करने का।


Monday, March 23, 2026

 आज मौसम बड़ा बेईमान है!

जब कुदरत बदल ले मिज़ाज, तो कैसे पढ़ें आसमान की ज़ुबान?

बदलते दौर में मौसम पूर्वानुमान की बढ़ती अहमियत

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 मार्च 2026

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अब मौसम भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा। सचमुच आसमान ने अपनी ज़ुबान बदल ली है।

आज विश्व मौसम दिवस है। बात सीधी है, मगर असर गहरा। मौसम अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमने बचपन में जाना था। कभी हल्की-फुल्की बारिश होती थी, अब वही आफ़त बनकर टूट पड़ती है। कभी गर्मी बस तपिश देती थी, आज वही जानलेवा लू बन जाती है।

हाल के दिनों को ही देख लीजिए। अचानक बदले मौसम ने खेतों में खड़ी फसलों को चौपट कर दिया। पहाड़ों में बेमौसम बर्फबारी जारी है। होली के तुरंत बाद तापमान ने ऐसी छलांग लगाई कि लोगों की सांसें अटक गईं। मौसम अब सिर्फ़ बदलता नहीं, चौंकाता है, डराता है, और कई बार तबाही का मंजर भी दिखा देता है।

कभी हमारा रिश्ता मौसम से सीधा था। पुरखों ने आसमान पढ़ना सीखा था। घाघ और भड्डरी जैसे लोक-ज्ञानी, बिना किसी मशीन के, सिर्फ़ प्रकृति के संकेतों से मौसम का हाल बता देते थे। उनकी कहावतें आज भी गांवों में गूंजती हैं: 

“शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय… बिन बरसे ना जाए।”

“दिन में गर्मी, रात में ओस… कहें घाघ, बरखा सौ कोस।”

ये सिर्फ़ शब्द नहीं थे, सदियों का अनुभव था। हवा का रुख, बादलों की चाल, पक्षियों का व्यवहार, सब कुछ संकेत देता था। किसान इन्हीं इशारों पर भरोसा करके बीज बोता था, मवेशी खरीदता-बेचता था, और अपनी रोज़ी-रोटी का फैसला करता था।

फिर आया विज्ञान का दौर। मौसम विभाग बना। सैटेलाइट आसमान पर नजर रखने लगे। रडार ने बादलों की चाल पकड़ ली। ज़मीनी स्टेशन डेटा जुटाने लगे। और फिर आने लगा पूर्वानुमान; कल बारिश होगी या धूप निकलेगी।

इस एक जानकारी पर कितनी ज़िंदगियां टिकी होती हैं! किसान की फसल, पायलट की उड़ान, मछुआरे की नाव, सरकार की तैयारी, सब कुछ मौसम की एक सही भविष्यवाणी पर निर्भर करता है। एक सटीक पूर्वानुमान कई जिंदगियां बचा सकता है।

लेकिन अब कहानी बदल चुकी है।

जलवायु परिवर्तन ने मौसम की पूरी किताब ही उलट दी है। बारिश का कोई ठिकाना नहीं। सूखा लंबा खिंचता है। तूफान पहले से ज्यादा ताक़तवर हो गए हैं। भारत में ही देख लीजिए, पहाड़ों में अचानक बाढ़, मैदानों में झुलसाती गर्मी, शहरों में जलभराव का कहर।

पुराना डेटा अब हर बार काम नहीं आता। मौसम अब सीधी लकीर नहीं, उलझी हुई पहेली बन गया है। ऐसे में मौसम वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है। उनका काम अब सिर्फ़ “कल का मौसम” बताना नहीं रह गया है।

अब वे आने वाले हफ्तों, महीनों का अनुमान लगाते हैं। किसान को सलाह दी जाती है: कब बोना है, कब काटना है। जल प्रबंधन की रणनीतियां बनती हैं। आपदा प्रबंधन टीमें पहले से अलर्ट हो जाती हैं। यानी अब मौसम पूर्वानुमान सिर्फ़ सूचना नहीं, तैयारी का आधार बन चुका है।

तकनीक ने इस काम को और तेज़ और सटीक बनाया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग ने पूर्वानुमान को नई आंखें दी हैं। अब चेतावनी सिर्फ़ इतनी नहीं होती कि “भारी बारिश होगी”, बल्कि यह भी बताया जाता है कि “इस इलाके में बाढ़ का खतरा है।” हीटवेव की स्थिति में बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए खास सलाह जारी की जाती है।

यह सिर्फ़ विज्ञान नहीं, ज़िंदगी बचाने का काम है।

इन सबके पीछे होते हैं मौसम वैज्ञानिक; खामोशी से काम करते हुए, दिन-रात आंकड़ों में डूबे हुए। उनकी मेहनत दिखती नहीं, लेकिन उसका असर हर जगह महसूस होता है। अब तो छोटे-छोटे इलाकों के लिए भी सटीक भविष्यवाणी संभव हो रही है।

दिलचस्प बात यह है कि अब आम लोग भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन रहे हैं। मोबाइल से भेजी गई स्थानीय जानकारी भी सिस्टम का हिस्सा बनती है। मौसम की दुनिया अब ज्यादा जुड़ी हुई, ज्यादा साझा हो गई है।

लेकिन एक सच्चाई और है; मौसम किसी सरहद को नहीं मानता। एक देश में उठा तूफान दूसरे देश में तबाही ला सकता है। इसलिए वैश्विक सहयोग जरूरी है। देशों के बीच डेटा साझा करना, तकनीक बांटना, और कमजोर देशों की मदद करना आज की जरूरत बन चुका है।

फिर भी, एक सवाल हमसे भी है।

क्या हम इन चेतावनियों को गंभीरता से लेते हैं? हम क्रिकेट का स्कोर हर मिनट देखते हैं, लेकिन मौसम की चेतावनी को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यही लापरवाही कई बार भारी पड़ती है।

आज का पैग़ाम साफ़ है।

मौसम अब सिर्फ़ खबर नहीं रहा। यह हमारी ज़िंदगी और मौत के बीच खिंची एक नाज़ुक लकीर बन चुका है। इसे समझना, इसे सुनना, और इस पर अमल करना; अब हमारी मजबूरी नहीं, हमारी ज़िम्मेदारी है।

Sunday, March 22, 2026

 डॉ लोहिया जयंती पर

कांग्रेस-मुक्त भारत का पहला खाका: लोहिया की बेचैन विरासत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 मार्च 2026

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कांग्रेस-मुक्त भारत, यह नारा किसका है?

आज के राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। पर इसकी पहली आहट बहुत पहले सुनाई दी थी।

एक बाग़ी दिमाग में। एक बेचैन आत्मा में। डॉ. राम मनोहर लोहिया के भीतर।

23 मार्च। जयंती। सिर्फ फूल चढ़ाने का दिन नहीं। थोड़ी असहज सच्चाइयों से टकराने का दिन भी।

लोहिया, कद काठी छोटी, मगर असर विराट।

1934। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। साथ में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव। कांग्रेस के भीतर समाजवाद का बीज बोया गया। लोहिया विदेश विभाग के सचिव बने। फिर 1942,  भारत छोड़ो आंदोलन। भूमिगत जीवन। कांग्रेस रेडियो की आवाज़।दबाने की हर कोशिश नाकाम।

आज़ादी आई। पर लोहिया संतुष्ट नहीं हुए। नेहरू का मॉडल उन्हें अधूरा लगा। मिश्रित अर्थव्यवस्था। केंद्रीकृत योजना। उन्हें यह “ऊपर से विकास” दिखा, जनता से दूर, सत्ता के करीब।उन्होंने राह बदली।

1955, सोशलिस्ट पार्टी। फिर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी। अपना मंच। अपनी लड़ाई। संसद में पहुंचे तो आंकड़ों को हथियार बनाया। “तीन आने रोज।” गरीबी की रेखा का नंगा सच देश के सामने रख दिया।

सड़क पर उतरे तो मुद्दे और तेज हो गए; जाति के खिलाफ। अंग्रेज़ी के प्रभुत्व के खिलाफ। किसान के शोषण के खिलाफ।

फिर आया 1967,  एक नारा नहीं, एक रणनीति। “गैर-कांग्रेसवाद।” आज की भाषा में कहें तो, यही था “कांग्रेस-मुक्त भारत” का पहला ब्लूप्रिंट।

लोहिया ने विपक्ष को जोड़ा। कांग्रेस की दीवारों में दरार डाली। कई राज्यों में सत्ता बदली। गठबंधन राजनीति ने यहीं जन्म लिया।

यहीं एक असहज सवाल खड़ा होता है। आज जो “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा गूंजता है; क्या उसके पहले शिल्पकार को याद किया जाता है?

क्या सत्ता को अपने वैचारिक पूर्वजों के प्रति आभार नहीं जताना चाहिए?

पर कहानी सीधी रेखा नहीं है। लोहिया जितने तेज थे, उतने असहज भी। कटु आलोचना। बिना फिल्टर की भाषा। नतीजा, अपने ही खेमे में दरारें। दोस्त विरोधी बनते गए।आंदोलन बड़ा हुआ, संगठन छोटा रह गया।

अब उनके दिमाग की ओर चलते हैं।

बर्लिन विश्वविद्यालय। नमक कर पर पीएचडी। मार्क्स को पढ़ा, पर आंख मूंदकर नहीं अपनाया। वर्ग-संघर्ष की कठोरता ठुकराई। सोवियत मॉडल पर सवाल उठाए। उन्होंने गढ़ा: “नया समाजवाद।” न पूंजीवाद। न साम्यवाद। दोनों से “समान दूरी।” उनका समाजवाद किताबों का नहीं, ज़रूरतों का था।

उत्पादन, ज़रूरत के हिसाब से। केंद्र में: मनुष्य। मशीन नहीं। और फिर; सप्त क्रांति। एक साथ कई मोर्चे।आर्थिक असमानता के खिलाफ।जाति के खिलाफ। लिंग भेद के खिलाफ। रंगभेद के खिलाफ। विदेशी वर्चस्व के खिलाफ।

यह विचार नहीं; एक बहु-आयामी संघर्ष था। “चौखंबा राज्य।” गांव, जिला, प्रांत, केंद्र। सत्ता का विकेंद्रीकरण। दिल्ली की पकड़ ढीली करने का सपना। नेहरू की केंद्रीकृत सोच के ठीक उलट।

पर असली ट्विस्ट यहां है। लोहिया गांधी के उत्तराधिकारी थे; पर कॉपी-पेस्ट नहीं।

एक अपग्रेडेड संस्करण। अहिंसा ली।सत्याग्रह लिया। ग्राम स्वराज लिया।पर उसमें समाजवाद का बारूद भरा।

गांधी नैतिक सुधार की बात करते थे।लोहिया ने कहा, संरचना बदलो। “रोटी और बेटी।” एक साथ खाना।एक साथ शादी। जाति पर सीधा प्रहार।

यह नारा नहीं था; सामाजिक विस्फोट का फार्मूला था। उन्होंने गांधीवाद को रीब्रांड किया। आंदोलन को हथियार बनाया। न शुद्ध आदर्शवाद। न विदेशी विचारधारा।

एक देसी मिश्रण, जो जमीन से जुड़ा था, और झकझोरने वाला भी। लेकिन हर विरासत की तरह, यह भी धुंधली और विवादित हो गई, लोहिया के अनेकों शिष्यों,  उत्तराधिकारियों की करतूतों की वजह से। राज नारायण, मधु लिमए, जॉर्ज फर्नांडिस, कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, नीतीश, मंडल, मुलायम सिंह यादव, बड़ी लिस्ट है!!

कुछ नीतियों पर सवाल भी उठे। विकेंद्रीकरण; कहीं विखंडन का डर।अंग्रेज़ी विरोध; मध्यम वर्ग की दूरी।टूटती पार्टियां; कमजोर राजनीतिक असर। तीखे व्यक्तिगत हमले; बड़ी सोच पर परदा।

फिर भी एक तस्वीर याद रखिए।

1967। गरीबी में जीवन। सादगी में मौत। न सत्ता का लोभ। न संपत्ति का मोह।

आज जब असमानता फिर सिर उठा रही है। जब नवउदारवाद का शोर है।जब विकास की चमक के पीछे असंतुलन छिपा है ;  तब लोहिया फिर याद आते हैं।

उनका “नया समाजवाद”; एक तरह का सशस्त्र गांधीवाद। जहां स्वराज सिर्फ आज़ादी नहीं, बराबरी भी है।

लोहिया संत नहीं थे। पर चिंगारी जरूर थे। एक विद्रोही गांधीवादी, जिसने सत्ता को ललकारा। समाज को आईना दिखाया। और आज भी उनकी आवाज़ गूंजती है;  “जब सड़क खामोश है, सदन आवारा हो जाती है।”

जाति पर उनका प्रहार आज भी उतना ही सटीक है; “जाति अवसर को सीमित करती है… और अवसर क्षमता को।”

और स्त्री पर उनकी कल्पना; सीता नहीं, द्रौपदी। आज्ञाकारिता नहीं, बुद्धि और साहस।

यही लोहिया थे: असुविधाजनक, असहज, लेकिन जरूरी।

सवाल अब भी हवा में तैर रहा है? क्या हम लोहिया को सिर्फ याद कर रहे हैं, या सच में उन्हें समझ भी रहे हैं?

Saturday, March 21, 2026

 सभ्यता का सबसे बड़ा गुनाह: इंसानियत का जनाज़ा उठाकर भी दुनिया चुप क्यों? दुनिया के सभी मुल्क अब चुप्पी तोड़ें!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 मार्च 2026

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अरे, खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा गुनाह बन जाती है। और आज वही घड़ी है। सभ्य दुनिया की इस चुप्पी में कोई समझ नहीं, कोई नैतिकता नहीं; सिर्फ एक ठंडी साजिश नज़र आती है। एक सवाल है जो रातों को जागता रखता है। एक बेचैनी है जो गले में फँस गई है। एक इंतज़ार है जो अब और नहीं सहा जा सकता।

पश्चिम एशिया जल नहीं रहा; धधक रहा है। इज़राइल और ईरान आमने-सामने। अमेरिका की सीधी दखल। मिसाइलें आसमान को चीर रही हैं। ड्रोन मौत की बारिश कर रहे हैं। तेल के कुओं के आसपास बारूद की तेज़ गंध फैल रही है। समुद्र जहरीला हो रहा है, हवा में जहर घुल रहा है। पर्यावरण का कत्ल हो रहा है, इंसानों का तो पहले ही।

दुनिया इस आग से थक चुकी है। हर देश, हर इंसान एक ही सवाल चिल्ला रहा है: “कौन बुझाएगा ये आग?” लेकिन जवाब में सन्नाटा। कोई नाम नहीं उभरता। रूस और चीन बोलेंगे या ट्रंप की हुंकार से काँप गए हैं? क्या वैश्विक शक्ति का खेल इतना छोटा हो गया है कि बड़े-बड़े देश भी डरकर पीछे हट जाते हैं?

भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है। हम घी नहीं डाल रहे, न ही चुप्पी साधे बैठे हैं। जबकि रूस और चीन ईरान को सामरिक मदद दे रहे हैं, सैटेलाइट इंटेलिजेंस, ड्रोन टेक्नोलॉजी, हथियारों की सप्लाई। 

लेकिन भारत ने हमेशा संतुलन बनाए रखा। मुद्दा ये नहीं कि कौन गलत है, किसने पहला वार किया। असली चिंता ये है कि जिन देशों का इस विवाद से कोई सीधा लेना-देना नहीं, वे क्यों बेवजह युद्ध के शिकार बन रहे हैं? क्यों उनके नागरिक, उनकी अर्थव्यवस्था, उनका भविष्य बिना वजह जल रहा है?

मोदी काल में भारत ने इस इलाके में जो संतुलन साधा, वो कोई संयोग नहीं था। इज़राइल के साथ गहरी, भरोसेमंद दोस्ती। सऊदी अरब, यूएई, कतर के साथ आर्थिक रिश्तों की मजबूत डोर। ईरान के साथ बातचीत का दरवाज़ा हमेशा खुला। ये भारत की नई पहचान है; रणनीतिक स्वायत्तता। न किसी खेमे में, न किसी के खिलाफ। सिर्फ अपने हितों पर, अपनी शर्तों पर।

लेकिन कूटनीति सिर्फ रिश्ते बाँधने का खेल नहीं है। असली परीक्षा तब आती है जब दोस्त आपस में लड़ रहे हों। तब कौन बीच में खड़ा होता है? कौन हाथ बढ़ाता है? आज भारत ठीक उसी चौराहे पर खड़ा है। 

“विश्वगुरु” कहलाने वाला भारत, ग्लोबल साउथ का चेहरा बनने का दावा करने वाला भारत: क्या सिर्फ तमाशा देखेगा? लीडरशिप का मतलब GDP के आंकड़े नहीं, रैंकिंग नहीं, तालियाँ नहीं। लीडरशिप का मतलब आग के बीच कूदना है। हाथ बढ़ाना है। रास्ता दिखाना है।

पश्चिम एशिया हमारी दूर की खबर नहीं; हमारा घर का मामला है। करीब 90 लाख भारतीय वहाँ पसीना बहा रहे हैं। उनकी मेहनत से हमारी अर्थव्यवस्था की नब्ज़ धड़कती है। हमारा तेल, गैस, ऊर्जा उसी इलाके से आती है। हमारे व्यापार, बंदरगाह, समुद्री सुरक्षा, सब उससे जुड़े हैं। वहाँ एक चिंगारी यहाँ तूफान बन जाती है। लेकिन भारत की असली ताकत उसके हित नहीं, उसकी साख है। दुनिया हमें एक ऐसे देश के रूप में देखती है जो दबाव नहीं बनाता, आदेश नहीं देता, सिर्फ सम्मान के साथ संवाद करता है। आज यही निष्पक्षता हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।

तो सवाल उठता है, अगर भारत नहीं, तो कौन? 

भारत को अब आगे आना होगा। समाधान थोपने नहीं, संवाद शुरू कराने के लिए। बैक-चैनल डिप्लोमेसी, ट्रस्ट बिल्डिंग, छोटे-छोटे कदम। इतिहास कभी-कभी बड़े फैसलों से नहीं, एक फोन कॉल से, एक अपील से, एक मंच से बदल जाता है। भारत वो मंच बन सकता है, एक सेतु, जहाँ दुश्मन भी बैठकर बात कर सकें। 

कुछ लोग कहेंगे, “ये बहुत उलझा हुआ मसला है।” बिल्कुल सही। लेकिन यही तो वजह है कि भारत जैसी संतुलित, निष्पक्ष आवाज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। इतिहास तमाशबीनों को कभी याद नहीं रखता। इतिहास उनको याद रखता है जिन्होंने वक्त आने पर खड़े होने का साहस दिखाया।

भारत हमेशा कहता आया है: वसुधैव कुटुंबकम। पूरी दुनिया एक परिवार है। तो बताइए, जब परिवार में आग लगी हो तो मुखिया चुप कैसे रह सकता है? 

दुनिया युद्ध से थक चुकी है। उसे चाहिए संयम, संवाद और समझदारी। ये तीनों भारत दे सकता है। हालात बेहद नाज़ुक हैं। ईरान-इज़राइल-अमेरिका टकराव चौथे हफ्ते में घुस चुका है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। हमारे लोग वहाँ फँसे हैं। हर मिनट की देरी जोखिम बढ़ा रही है। वक्त दरवाज़ा पीट रहा है, जोर से, लगातार। 

फिर कहाँ गुम हो गए हार्वर्ड-कैम्ब्रिज के बुद्धिजीवी? कहाँ हैं नोबेल शांति पुरस्कार विजेता? क्यों चुप हैं दुनिया के थिंक टैंक? क्यों नहीं उठ रही गांधीवादी मुखौटे वाली आवाज़ें? अगर आज महात्मा गांधी होते तो क्या स्टैंड लेते? क्या वे भी चुप्पी साध लेते या अहिंसा और संवाद का झंडा उठाते? 

जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, क्या ये सभी देश अब सिर्फ बुजदिल हो गए हैं? या आर्थिक स्वार्थ, आराम और संपन्नता ने उनके आदर्शवाद को ज़िंदा दफन कर दिया है? 

सभ्य दुनिया के पास अब कोई बहाना नहीं बचा। हमारी साख, हमारी ताकत, हमारी नैतिकता, सब इस वक्त की परीक्षा दे रही है। अगर हम चुप रहे तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। 

वक्त आ गया है। भारत को लीडरशिप दिखानी होगी। संवाद का मंच बनाना होगा। इंसानियत को बचाना होगा। क्योंकि अगर हम नहीं तो फिर कौन? 

 क्यों नारे, स्लोगन्स बनते हैं जन आंदोलन के हथियार? 

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क्या शब्द भी आग बन सकते हैं? एक नारा… और भीड़ बन जाए तूफान!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 मार्च 2026

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फुल पेज एडवरटाइजमेंट याद नहीं रहता, सिर्फ पंच लाइन ही जेहन में रह जाती है, जैसे:  ये दिल मांगे मोर, क्या जूते भी सांस लेते हैं, डर के आगे जीत है, ठंडा मतलब कोक।

क्या तीन शब्द सचमुच इतिहास बदल सकते हैं? क्या एक छोटी-सी पंक्ति लाखों लोगों को एक साथ खड़ा कर सकती है? क्या आवाज़, जब नारा बनती है, तो सत्ता के सिंहासन तक डोल जाते हैं? जवाब साफ है : हाँ। स्लोगन या नारा केवल शब्द नहीं होता, वह चेतना का विस्फोट होता है।

नारा लेखन की कला, दरअसल, संक्षेप में विस्तार भरने की कला है। कम शब्द, बड़ा असर। जो बात लंबा भाषण नहीं कह पाता, वह एक नारा कह देता है। सफल जननेता और जनसंचारक इस राज को समझते हैं। वे जानते हैं कि भीड़ किताबें नहीं पढ़ती, नारे दोहराती है। छोटा, सटीक, लयबद्ध, और भीतर से उबाल मारता हुआ, यही है असरदार नारे की पहचान।

महात्मा गांधी का “करो या मरो”, तीन शब्द, लेकिन पूरे देश को जगा देने वाला आह्वान। सुभाष चंद्र बोस का “जय हिंद”, एक सलाम, जो राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गया। “इंकलाब जिंदाबाद”: क्रांति की गूंज, जिसने युवाओं के खून में आग भर दी। बाल गंगाधर तिलक का “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”, एक अधिकार की पुकार, जिसने गुलामी के ताले तोड़ने की हिम्मत दी। डॉ राम मनोहर लोहिया के जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, हिमालय बचाओ, दाम बांधो, सामाजिक और सांस्कृतिक जंजीरों को चुनौती देते  नारे हैं।

यही नारे की असली ताकत है। वह विचार को सरल बनाता है। दर्शन को जनभाषा में ढाल देता है। किताबों की जटिलता को सड़क की सादगी में बदल देता है।

आजादी के बाद भी नारे समाज को दिशा देते रहे। “हम दो, हमारे दो”, सिर्फ एक सरकारी संदेश नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत। दीवारों पर लिखे गए नारे, गांव-गांव, शहर-शहर फैलते गए। वे पोस्टरों से उतरकर लोगों की सोच में बस गए। दीवारें किताब बनीं, और राहगीर पाठक।

दुनिया के इतिहास में भी नारे ने कई बार निर्णायक भूमिका निभाई है। Martin Luther King Jr. का “I Have a Dream”, एक सपना, जिसने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ पूरी दुनिया को झकझोर दिया। “Make Love, Not War”, युद्ध के खिलाफ शांति का गीत बना। “Black Lives Matter”, तीन शब्द, लेकिन सदियों के अन्याय को उजागर कर देने वाली पुकार।

“We Shall Overcome”, आशा का स्वर, जिसने संघर्षरत लोगों को हिम्मत दी। French Revolution का “Liberty, Equality, Fraternity”, आज भी लोकतंत्र की आत्मा बना हुआ है।

आधुनिक समय में भी नारे उतने ही प्रासंगिक हैं। “We Are the 99%” ने आर्थिक असमानता को स्पष्ट रूप से सामने रखा। “No Justice, No Peace”, अन्याय के खिलाफ चेतावनी। “There Is No Planet B”, पर्यावरण संकट का सटीक और तीखा संदेश। “Silence = Death”, चुप्पी के खतरे को उजागर करता हुआ नारा।

तो आखिर एक नारा प्रभावशाली कैसे बनता है?

पहला, सरलता। नारा तुरंत समझ में आना चाहिए।

दूसरा, लय और तुक। जो कानों में गूंजे और याद रह जाए।

तीसरा, भावनात्मक जुड़ाव। दिल को छुए बिना दिमाग पर असर नहीं होता।

चौथा, सार्वभौमिकता। हर व्यक्ति को लगे कि यह उसकी बात है।

और सबसे महत्वपूर्ण, समय, टाइमिंग।  सही नारा वही है जो सही समय पर जन्म ले।

आज के डिजिटल युग में, जब सूचनाओं की बाढ़ है, नारे की ताकत और बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर एक लाइन ट्रेंड बन जाती है, आंदोलन खड़ा कर देती है। हैशटैग भी आधुनिक नारे ही हैं, छोटे, तेज, और वायरल होने वाले।

लेकिन इस शक्ति के साथ खतरा भी जुड़ा है। नारा सच्चाई को सरल बना सकता है, लेकिन उसे तोड़-मरोड़ भी सकता है। वह प्रेरित कर सकता है, लेकिन भटका भी सकता है। इसलिए नारा लेखन केवल कला नहीं, एक जिम्मेदारी है। शब्दों में आग हो, पर वह सच की आग हो, भ्रम की नहीं।

अंततः, नारे की असली ताकत उसकी जनता में बसने की क्षमता है। जब लोग उसे अपना लेते हैं, उसे दोहराते हैं, उसे जीते हैं, तभी वह अमर होता है। वह रैलियों से निकलकर रोजमर्रा की भाषा में घुल जाता है। दीवारों से उतरकर दिलों में बस जाता है।

अच्छा नारा लिखा नहीं जाता: वह जन्म लेता है, समय की कोख से।

और जब सही शब्द सही क्षण से मिलते हैं, तो वे केवल आवाज़ नहीं बनते, वे आंदोलन बन जाते हैं, इतिहास रचते हैं। इंकलाब जिंदाबाद!!

Friday, March 20, 2026

 कैसा विकास! जब पीने के लिए शुद्ध पानी भी उपलब्ध न हो

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पानी का हक: सांस जितना जरूरी, अब कानून में भी दर्ज हो!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मार्च 2026

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विश्व जल दिवस है, 22 मार्च 2026 को। इस बार का मुद्दा है जल और लैंगिक समानता, Water and Gender। 

मतलब साफ है, पानी की कमी सबसे ज्यादा औरतों और लड़कियों पर भारी पड़ती है। 

दुनिया भर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर। 

लेकिन भारत में यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं, यह रोज की जंग है। एक दिन भाषण, फोटो, पोस्टर, और फिर वही खामोशी। अब वक्त आ गया है कि हम चुप न रहें। सवाल सीधा है, पानी भीख है या हक?

हवा पर कोई मीटर नहीं, कोई टैक्स नहीं, कोई ताला नहीं। क्योंकि बिना हवा के जीवन खत्म। पानी भी तो उतना ही जरूरी है। बिना पानी के जीवन नहीं चलता। फिर क्यों पानी को बाजार में बेचा जा रहा है? बोतल में बंद, दाम लगाकर। जो अमीर है, वह खरीद लेता है। जो गरीब है, वह गंदा पानी पीकर बीमार पड़ता है, मौत के मुंह में जाता है। यह इंसानियत के खिलाफ है। पानी सार्वजनिक संपत्ति है, जन-धन है। इसे मुनाफे की चीज नहीं बनाया जा सकता।

सच कड़वा है। भारत में 18 प्रतिशत दुनिया की आबादी है, लेकिन सिर्फ 4 प्रतिशत मीठा पानी हमारे पास। करीब 60 करोड़ लोग उच्च से अत्यधिक जल-तनाव में जी रहे हैं। भूजल तेजी से खत्म हो रहा है। 

हम दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाले देश हैं। पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता गिरकर 1400 घन मीटर के आसपास पहुंच गई है, जो जल-तनाव की सीमा से नीचे है। नदियां नाले बन चुकी हैं। हैंडपंप जहर उगलते हैं। शहरों में टैंकर माफिया राज करता है। 

दिल्ली हो या लखनऊ, आगरा हो या मुरादाबाद, कहानी एक जैसी है। 40 प्रतिशत पानी पाइपलाइनों में लीक हो जाता है। मौसम बेकाबू, बेमौसम बारिश, झुलसाती गर्मी, कमजोर मानसून। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा। यह अर्थव्यवस्था का संकट है, स्वास्थ्य का विस्फोट है, सामाजिक अस्थिरता का संकेत है।

सबसे ज्यादा चोट किसे लगती है? गरीब को, औरत को, बच्चे को, हाशिए पर खड़े समाज को। गांवों में औरतें आज भी मटके सिर पर रखकर मीलों चलती हैं। समय गंवाती हैं, स्वास्थ्य गंवाती हैं, स्कूल जाने वाली लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। गंदा पानी दस्त, हैजा, टाइफाइड लाता है। हर साल लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जिन्हें एक गिलास साफ पानी रोक सकता था। यह त्रासदी नहीं, अपराध है। और यह अपराध रोका जा सकता है।

अब एक उम्मीद की किरण है, जल जीवन मिशन। 2019 में शुरू हुआ था। टैप तो लग गए, लेकिन फंक्शनल? नियमित पानी? साफ पानी? कई जगहों पर अभी कमी है। भूजल गिर रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है। मिशन 2028 तक बढ़ा दिया गया है, बजट भी बढ़ा है। लेकिन अब जरूरत है कि सिर्फ कनेक्शन नहीं, असली जल सुरक्षा हो, हर बूंद का हिसाब, हर घर में नियमित, साफ पानी।

समाधान भावना में नहीं, डेटा और तकनीक में है। कल्पना कीजिए, हर पाइप पर स्मार्ट मीटर। रियल-टाइम डैशबोर्ड बताए कि कहां पानी खत्म होने वाला है। एआई अवैध बोरवेल पकड़े। एल्गोरिदम तय करे कि किसे कितना पानी मिले, ताकि कोई प्यासा न रहे। सिंगापुर ने करके दिखाया, केप टाउन ने घबराहट को प्रबंधन में बदला। हम क्यों नहीं? 

लेकिन असली लड़ाई शासन की है। बांध-नहर की पुरानी राजनीति बंद हो। मांग को काबू करना होगा। पानी की असली कीमत तय करनी होगी, कड़वी लेकिन जरूरी। प्रदूषण पर सख्त सजा। स्थानीय निकायों को डेटा, अधिकार, संसाधन दो। समुदाय को ताकत दो।

वरना क्या होगा? अमीर टैंकर मंगाएंगे। गरीब कतार में खड़े रहेंगे। बीमारियां फैलेंगी। उद्योग ठप होंगे। समाज दरक जाएगा। समय भाग रहा है। सलाहें मरहम हैं, जख्म गहरा है। 60 करोड़ लोग इंतजार नहीं कर सकते।

पानी अब दया नहीं, अधिकार है। सांस जितना जरूरी हक। विश्व जल दिवस सिर्फ याद दिलाने का नहीं, फैसला लेने का दिन है। सरकारें मजबूत नीतियां बनाएं। बजट लगे। जवाबदेही तय हो। हर घर तक साफ पानी पहुंचे। जल स्रोत सुरक्षित हों। वितरण बराबरी से हो। औरतों की आवाज सुनी जाए, उनकी अगुवाई हो।

यह कोई योजना नहीं, यह अधिकार है। इसे कानून में, नीति में, जमीन पर सच बनाओ। वरना अगली बार नल नहीं सूखेंगे, पूरी व्यवस्था सूख जाएगी। पानी का हक बनाओ कानून। अब वक्त है। कल बहुत देर हो जाएगी।

Thursday, March 19, 2026

 प्यासा भारत, सूखती नदियां:  ‘डे ज़ीरो’ अब कहानी नहीं, दस्तक है

(विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2026 पर एक कड़वे सच की डोज)

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

19 मार्च 2026

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नल खुलता है। पानी गिरता है। हम चैन की सांस लेते हैं।

लेकिन ज़मीन के नीचे? सन्नाटा है। सूखी दरारें हैं। और एक डर है, जो धीरे-धीरे हमारे भविष्य को खा रहा है।

क्या हम सचमुच पानी के देश में रहते हैं? या बस एक भ्रम में जी रहे हैं? नदियों को पूजते हैं, और प्रदूषण से दम घोंटते हैं!

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22 मार्च विश्व जल दिवस पर भाषण होंगे। सेमिनार होंगे। संकल्प लिए जाएंगे। पर सच यह है कि भारत पानी के संकट की दहलीज़ पर खड़ा है। और यह कोई दूर का खतरा नहीं। यह आज का सच है। अभी का।

एक तस्वीर देखिए।

जल जीवन मिशन की सफलता का जश्न मना रहे हैं। 2019 में जहाँ सिर्फ़ 17% ग्रामीण घरों में नल था, आज 81% से ज़्यादा घरों तक पाइप से पानी पहुँच चुका है। लगभग 15.8 करोड़ परिवार। यह उपलब्धि छोटी नहीं है। यह सरकार की इच्छाशक्ति और क्षमता का प्रमाण है।

लेकिन दूसरी तस्वीर?

शहर प्यासे हैं। खेत सूख रहे हैं। और ‘डे ज़ीरो’, जब नलों में पानी आना बंद हो जाए, अब कोई दूर देश की कहानी नहीं रही। बेंगलुरु। चेन्नई। दिल्ली। हैदराबाद। चेतावनी हैं।

नीति आयोग साफ़ कहता है: 2030 तक पानी की मांग, उपलब्धता से आगे निकल जाएगी। 82 करोड़ लोग संकट में होंगे। 2050 तक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर 1,140 क्यूबिक मीटर रह जाएगी।

यह ‘एब्सोल्यूट स्कैरसिटी’ की सीमा है। और इसका असर? अर्थव्यवस्था पर 6% तक की चोट।

शहर क्या कर रहे हैं? भाग-दौड़। तात्कालिक इलाज। कहीं पाइपलाइन, कहीं टैंकर, कहीं समुद्र के पानी को मीठा बनाने की योजनाएँ।

लेकिन असली कहानी ज़मीन के नीचे लिखी जा रही है।

भूजल: हमारा सबसे बड़ा, सबसे चुप साथी, सबसे ज़्यादा शोषित है। जल शक्ति मंत्रालय की 2025 की रिपोर्ट कहती है कि ओवर-एक्सप्लॉइटेड यूनिट्स 17% से घटकर 10.8% हो गईं।

सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन आधी सच्चाई, पूरी झूठ के बराबर होती है। देश के 730 क्षेत्र अब भी ‘रेड ज़ोन’ में हैं। भारत हर साल 247 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल निकाल रहा है। सुरक्षित सीमा? उससे बहुत कम। कुल दोहन 60% से ऊपर।

कुछ राज्य तो सीमाएँ तोड़ चुके हैं।पंजाब 156% पानी खींच रहा है।राजस्थान 147%। हरियाणा, कर्नाटक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कहानी एक ही है।

यह वैसा ही है जैसे कोई बैंक से अपनी जमा पूंजी ही निकालता जाए। ना ब्याज, ना संतुलन। बस खाली खाता।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं: अगर एक्वीफर ‘टिपिंग पॉइंट’ पार कर गया, तो वापसी लगभग नामुमकिन होगी।

ऊपर से मौसम का खेल। जलवायु परिवर्तन ने आग में घी डाल दिया है।तापमान बढ़ रहा है। पानी तेजी से उड़ रहा है। मानसून अब भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बाढ़। कभी सूखा। रीचार्ज की लय टूट चुकी है।

और शहर?

उन्होंने अपने ‘स्पंज’ खुद नष्ट कर दिए। तालाब। झीलें। वेटलैंड्स। कभी ये शहरों की सांस थे।

बेंगलुरु ने 1973 से 2016 के बीच 79% जल निकाय खो दिए। पंजाब ने अपने आधे जल स्रोत गंवा दिए।कंक्रीट और खेती के नाम पर। ये जलाशय सिर्फ़ सुंदरता नहीं थे।ये भूजल को रिचार्ज करते थे। बाढ़ रोकते थे। पानी साफ़ करते थे। शहर को ठंडा रखते थे।

हमने उन्हें मिटा दिया।

और अब टैंकरों के पीछे भाग रहे हैं।

मार्च 2026 है। गर्मी अभी शुरू भी नहीं हुई। फिर भी 166 बड़े जलाशयों में सिर्फ़ 56.7% पानी बचा है। दक्षिण और मध्य भारत में कई डैम आधे से भी कम भरे हैं।

मतलब साफ़ है। गर्मी आते ही संकट गहराएगा। किसान परेशान होंगे। फसलें झुलसेंगी। फैक्ट्रियाँ उत्पादन घटाएँगी। और शहरों में पानी के लिए लाइनें लगेंगी।

पानी का संकट सिर्फ़ प्यास नहीं लाता। यह भूख भी लाता है।

भारत दुनिया की 18% आबादी को खिलाता है। लेकिन उसके पास सिर्फ़ 4% जल संसाधन हैं। यह संतुलन पहले ही नाजुक था।

अब टूटने के कगार पर है। अनुमान डराने लगे हैं। तापमान बढ़ने से गेहूं उत्पादन 50% तक गिर सकता है।चावल 40% तक।

सोचिए। पानी नहीं, तो सिंचाई नहीं।

सिंचाई नहीं, तो अनाज नहीं। और अनाज नहीं, तो महंगाई, भूख, कुपोषण। स्वास्थ्य का संकट अलग।

भारत का लगभग 70% भूजल प्रदूषित है: आर्सेनिक, फ्लोराइड और बैक्टीरिया से।

डायरिया, हैजा, टाइफॉइड; हर साल लाखों लोग बीमार पड़ते हैं। हजारों जानें जाती हैं। यानी जो पानी है, वह भी सुरक्षित नहीं।

तो रास्ता क्या है?

क्या बारिश हमें बचा सकती है? हाँ, अगर हम उसे नारे नहीं, नीति बनाएं।

रेनवॉटर हार्वेस्टिंग। रूफटॉप सिस्टम।रीचार्ज पिट्स। पुराने कुएं, बावड़ियाँ, तालाबों का पुनर्जीवन।

चेन्नई ने रास्ता दिखाया है। कानून बना। लागू हुआ। असर भी दिखा।अब ज़रूरत है इसे हर शहर में लागू करने की। हर नई बिल्डिंग में अनिवार्य।पुरानी इमारतों में रेट्रोफिटिंग।

साथ ही झीलों और वेटलैंड्स की रक्षा। भूजल दोहन पर सख्त नियंत्रण।यह आसान नहीं है।

लेकिन नामुमकिन भी नहीं। तस्वीर साफ़ है। भूजल घट रहा है। जलाशय दबाव में हैं। झीलें गायब हैं। मौसम अनिश्चित है। और खाद्य सुरक्षा खतरे में। चेतावनियाँ नई नहीं हैं।

रिपोर्ट्स सालों से आ रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है, अब समय कम बचा है।

तो सवाल सीधा है।

क्या हमारे पास इच्छाशक्ति है?

सरकारों को प्राथमिकताएँ बदलनी होंगी। शहरों को ज़मीन के नीचे झांकना होगा। कानून बनाना नहीं, लागू करना होगा।

और हम? हमें पानी को ‘अनलिमिटेड’ समझना बंद करना होगा। नल में बहता पानी, अनंत नहीं है।

जल जीवन मिशन ने दिखाया,  इरादा हो तो बदलाव संभव है।

अब समय है एक शहरी जल क्रांति का। वरना ‘डे ज़ीरो’ कोई हेडलाइन नहीं रहेगा। यह हमारी दिनचर्या बन जाएगा। पानी सिर्फ़ संसाधन नहीं है।यह सभ्यता की नब्ज़ है।

इसे बचाइए। इसे बहने दीजिए। वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी

नदियाँ कहाँ गईं?

और हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा

 मोदी मॉडल की नई कसौटी: 4 मई बताएगा रफ्तार या रुकावट?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 मार्च 2026

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भारत बदल चुका है। चेहरा भी, चाल भी, चरित्र भी। सत्ता की भाषा बदली, शासन का व्याकरण बदला। पर असली सवाल अब सामने खड़ा है, क्या यह बदलाव की आंधी आगे भी चलेगी, या अब इसकी सांस फूलने लगी है? 4 मई को पांच राज्यों के नतीजे इस पहेली का जवाब लिखेंगे।

2014 के बाद भारतीय राजनीति ने जैसे करवट नहीं, पूरा पलटा खाया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में समझौतों की खिचड़ी राजनीति को किनारे कर एक केंद्रीकृत, निर्णायक और आक्रामक शासन मॉडल उभरा। गठबंधन की बेड़ियां टूटीं। फैसलों की रफ्तार बढ़ी। “जो कहा, वो किया” का नया मंत्र चला। 2019 में दूसरा पूर्ण बहुमत आया, तो यह साफ हो गया कि अब एक दल भी पूरे देश की गाड़ी खींच सकता है।

अनुच्छेद 370 का अंत। राम मंदिर का निर्माण। ये सिर्फ फैसले नहीं थे, ये भावनाओं की धड़कन थे। राष्ट्रवाद और विकास का ऐसा संगम बना, जिसने जनता के दिल में सीधी जगह बनाई। राजनीति अब सिर्फ नीतियों की नहीं, प्रतीकों की भी हो गई।

लेकिन असली खेल कहीं और खेला गया: तकनीक के मैदान में। आधार, मोबाइल और बैंक खाते की तिकड़ी ने सरकारी योजनाओं को सीधे जनता के दरवाजे तक पहुंचा दिया। बिचौलियों की दुकानें बंद होने लगीं। गैस कनेक्शन, घर, नकद सहायता—सरकार अब फाइलों में नहीं, लोगों के जीवन में दिखने लगी। एक नया ‘लाभार्थी वर्ग’ पैदा हुआ, जो दिल्ली को दूर की सरकार नहीं, अपनी सरकार मानने लगा।

अर्थव्यवस्था में भी बड़े प्रयोग हुए। जीएसटी ने कर प्रणाली को एक धागे में पिरोया। दिवाला कानून ने पारदर्शिता की खिड़की खोली। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की जिद ने दर्द जरूर दिया, लेकिन दिशा साफ रही; नियम, नियंत्रण और एकरूपता।

फिर आया 2024। जनादेश ने पहली बार ब्रेक लगाया। बहुमत की रफ्तार धीमी हुई। गठबंधन की जरूरत लौट आई। ‘मोदी 3.0’ में ताकत तो है, लेकिन पूरी आजादी नहीं। जैसे तेज दौड़ती कार को अब मोड़ों पर सावधानी से चलना पड़ रहा हो।

लेकिन सरकार ने गियर बदल लिया। रफ्तार कम नहीं होने दी। 2026 तक चार लेबर कोड लागू करने की तैयारी। न्यूक्लियर सेक्टर में निजी निवेश के दरवाजे खोलने की चर्चा। बीमा में 100% एफडीआई की पहल। टैक्स को सरल बनाने की कोशिश। संदेश साफ है; गठबंधन है, लेकिन सुधारों पर ब्रेक नहीं लगेगा।

फिर भी राह आसान नहीं। सियासत का पारा चढ़ रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग की तलवार लटक रही है। संस्थाओं पर ‘कब्जे’ के आरोप गूंज रहे हैं। जातीय जनगणना की मांग ने नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष अब सिर्फ सवाल नहीं पूछ रहा, सीधे टकराव के मूड में है।

भाजपा का हिंदू सामाजिक गठजोड़ भी चुनौती के दौर में है। समाज की परतें खिसक रही हैं। नई आकांक्षाएं जन्म ले रही हैं। उधर पश्चिम एशिया की अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर सकती है, जिसका असर भारत पर भी पड़ेगा।

अब नजरें टिकी हैं 4 मई पर। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी; ये सिर्फ राज्य नहीं, राजनीतिक प्रयोगशालाएं हैं। असम में हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदुत्व और विकास का फॉर्मूला फिलहाल मजबूत दिखता है। लेकिन दक्षिण भारत अलग मिजाज रखता है। वहां क्षेत्रीय पहचानें गहरी जड़ें जमाए बैठी हैं। भाजपा की राष्ट्रीय अपील को सीटों में बदलना आसान नहीं।

बंगाल में तो जैसे सीधी भिड़ंत है; तृणमूल की जमीनी पकड़ बनाम भाजपा का बढ़ता संगठन। यहां लड़ाई सिर्फ वोट की नहीं, नैरेटिव की है। कौन कहानी गढ़ेगा, कौन जनता को अपने शब्दों में बांधेगा; यही असली जंग है।

इन नतीजों की गूंज दिल्ली तक जाएगी। अगर दक्षिण में प्रदर्शन कमजोर रहा, तो 2026 का परिसीमन मुद्दा बारूद बन सकता है। दक्षिणी राज्य पहले ही जनसंख्या नियंत्रण के कारण प्रतिनिधित्व घटने के डर से बेचैन हैं। उत्तर और दक्षिण के बीच खाई और चौड़ी हो सकती है।

साथ ही, उत्तराधिकार का सवाल भी धीरे-धीरे सिर उठा रहा है। मोदी के बाद कौन? अगर नतीजे उम्मीद से कम रहे, तो क्षेत्रीय नेताओं के पंख लग सकते हैं। गठबंधन सहयोगी: जैसे टीडीपी, जेडीयू, अपनी शर्तों पर ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ थोप सकते हैं। इससे सुधारों की रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है।

तो क्या मोदी युग ढलान पर है? शायद नहीं। लेकिन यह जरूर है कि यह अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। इसने भारतीय राज्य को दृश्यमान बनाया, प्रभावी बनाया, वैचारिक धार दी। अब चुनौती है; इस केंद्रीकृत ताकत को एक बहुध्रुवीय भारत में कैसे संतुलित किया जाए।

गति भी चाहिए, सहमति भी। रफ्तार भी जरूरी, रिश्ते भी।

4 मई सिर्फ तारीख नहीं है। यह एक संकेत है। यह बताएगा कि मोदी लहर अब भी समंदर की ज्वार है, या किनारों में सिमटती धारा बन रही है। देश की राजनीति की दिशा और दशा, दोनों इसी मोड़ पर टिके हैं।

Tuesday, March 17, 2026

 जिंदगी की टूटे न लड़ी

प्यार करले घड़ी दो घड़ी

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ज़हिलों की जिद्द से मची है तबाही!

हारी हुई जंग या जिंदगी की जीत?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

18 मार्च 2026

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ईरान कितने दिन टिकेगा?

पंद्रह दिन? एक महीना? या लंबी, थकी हुई सांसों में खिंचता हुआ सालों का सिलसिला? जैसे हरीश राणा।

सवाल सीधा है। जवाब उलझा हुआ।क्योंकि मुल्क ताश के पत्ते नहीं होते।हवा चली और ढह गए, इतनी सस्ती नहीं होती सभ्यताएं।

मिट्टी में सदियों का इतिहास गड़ा होता है। रगों में जिद दौड़ती है। दिल में डर भी पलता है। और सबसे ऊपर, इंसान होते हैं। वही, जो हर बार कुचले जाते हैं।

तोपें गरजती हैं। स्टूडियो दहाड़ते हैं।नक्शों पर तीर चलते हैं। एंकरों की आवाज़ में बारूद घुला होता है।

पर असली कहानी?

वह अस्पताल के बाहर रोती माँ लिखती है। वह मलबे में दबा बच्चा चीखकर सुनाता है।

हम पूछते हैं: ईरान क्यों लड़ रहा है?

सुरक्षा? सत्ता? या सिर्फ इसलिए कि अब पीछे हटना “हार” कहलाएगा?

सच कड़वा है। जंग तर्क से कम, अहंकार से ज्यादा चलती है।

दूसरी तरफ देखिए।

अमेरिका। इजराइल। ताकत। तकनीक। रणनीति। एक चलता हुआ बुलडोज़र, जिसे दुनिया “सुपरपावर” कहती है। नैतिकता जीरो।

कहना आसान है: “कुचल देंगे।” लेकिन इतिहास हल्की मुस्कान देता है। अफगानिस्तान याद है? इराक याद है?

आंकड़े झूठ नहीं बोलते।

2001 से 2023 तक, अफगानिस्तान, इराक और 9/11 के बाद के युद्धों में 9 लाख 40 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। इनमें 4 लाख 32 हजार आम नागरिक। अप्रत्यक्ष मौतें? 36 से 38 लाख। कुल मिलाकर: 45 से 47 लाख जिंदगियां राख।

20 साल। 2.3 ट्रिलियन डॉलर।

और नतीजा? शांति अब भी लापता है। ताकत जमीन जीत लेती है। दिल नहीं जीत पाती।

फिर हम गुस्से में पूछते हैं; नेता क्या कर रहे हैं? किसके लिए लोग मर रहे हैं?

वालोडीमयर जिलेन्स्की हो या डोनाल्ड ट्रंप: नाम बदलते हैं, कहानी वही रहती है।

कुर्सी पर बैठा इंसान फैसला करता है।

जमीन पर खड़ा इंसान कीमत चुकाता है।

सीधी बात। कोई नेता। कोई विचारधारा। किसी आम आदमी की जान से बड़ी नहीं हो सकती। हिटलर हो या स्टालिन! 

पर हम मानते नहीं। हम कहते हैं; “इज्जत का सवाल है।” “झुकेंगे नहीं।” “मर जाएंगे, पर हार नहीं मानेंगे।”

ठीक है। लड़िए। पर याद रखिए;  गोली इज्जत नहीं देखती। वह सिर्फ जिस्म चीरती है। इतिहास खून से लिखा गया है।

कलिंगा वार के बाद अशोक को ज्ञान मिला। पर क्या हर बार पहले खून की नदी बहेगी, तब ही बुद्धि जागेगी?

यह कैसी अक्ल है? पहले घर जलाओ, फिर बुझाने की किताब पढ़ो।

दुनिया का सबसे बड़ा झूठ क्या है? “यह आखिरी जंग होगी।” नहीं होती।हर जंग, अगली जंग को जन्म देती है।बीच में क्या होता है? बचपन टूटता है।घर उजड़ते हैं। भविष्य राख बन जाता है।

तो रास्ता क्या है?

समझौता। बातचीत। थोड़ा झुकना।

कड़वा है। पर जंग से कम कड़वा।

यहीं याद आते हैं महात्मा गांधी।

न हथियार। न सेना। फिर भी साम्राज्य झुका दिया। सत्याग्रह से। नैतिक ताकत से। उनकी चेतावनी आज भी गूंजती है : “आँख के बदले आँख, पूरी दुनिया को अंधा कर देगी।”

फिर मार्टिन लूथर किंग जूनियर।उन्होंने कहा: युद्ध समस्या का हल नहीं, उसका विस्तार है।

और नेल्सन मंडेला। 27 साल जेल में रहे। बाहर आए, तो बदला नहीं, मेल-मिलाप चुना। कहा, नफरत राष्ट्र तोड़ती है, माफी राष्ट्र बनाती है।

यही असली बहादुरी है। बंदूक उठाना आसान है। हाथ बढ़ाना मुश्किल। क्या हासिल किया भारत के नक्सलियों ने?

सच साफ है: जिंदगी बची रहे, तो सब फिर खड़ा हो सकता है। देश भी। इज्जत भी। विचार भी।

पर कब्र से कोई राष्ट्र नहीं उठता।कड़वा सच सुनिए; जंग बहादुरी नहीं होती। अक्सर बेबसी की आखिरी चीख होती है।

और जिंदगी? वह सिर्फ एक बार मिलती है।

“जिंदगी न मिले दोबारा”, यह फिल्मी लाइन नहीं, चेतावनी है। फिर भी हम वही गलती दोहराते हैं।

स्कूलों पर बम गिरते हैं। अस्पताल जलते हैं। इंसानियत दम तोड़ती है।न इधर वाले पूरी तरह सही। न उधर वाले। बीच में सिर्फ ताकत और दौलत का खेल।

कहां हैं दुनिया के ivory tower के ज्ञानी? कहां हैं शांति के दूत? क्यों नहीं उठती आवाज? नोबेल शांति पुरस्कार… सिर्फ एक तमगा रह गया है क्या?

और सच्चाई? मूर्ख नेतृत्व। पत्थर युग की सोच। 21वीं सदी में भी वही खून-खराबा। यूक्रेन हो या ईरान, मरता आम आदमी है। उजड़ता उसका घर है। जलता उसका भविष्य है।

आखिर हासिल क्या?

अगर हर समस्या का हल युद्ध है: तो फिर यह विकास कैसा? यह सभ्यता कैसी?

इतिहास बार-बार फुसफुसाता है, जिद नहीं, समझदारी जीतती है।

अब फैसला हमारे सामने है। जंग की जिद? या जिंदगी की जीत?

Monday, March 16, 2026

 टूटते स्कूल, उड़ते सपने: क्या ऐसे बनेगा भारत विश्व गुरु ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

17 मार्च 2026

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कल्पना कीजिए एक सरकारी स्कूल की कक्षा की।

ब्लैकबोर्ड आधा टूटा हुआ है। चॉक की धूल हवा में तैर रही है। छत से प्लास्टर झर रहा है। बच्चे फटी किताबों पर झुके बैठे हैं। 

और इसी देश में हम बड़े गर्व से घोषणा करते हैं, भारत विश्व गुरु बनने जा रहा है।

सवाल सीधा है। क्या टूटे ब्लैकबोर्ड पर करोड़ों बच्चों के सपने लिखे जा सकते हैं?

भारत का शिक्षा तंत्र किसी सजे-संवरे बगीचे जैसा नहीं दिखता। यह तो एक पैबंद लगी रजाई है। कहीं रेशम का टुकड़ा, कहीं टाट का। कहीं चमकदार निजी स्कूल, कहीं जर्जर सरकारी इमारतें।

देश में आज लगभग 72 शिक्षा बोर्ड हैं। हर बोर्ड अपनी ढपली, अपना राग बजा रहा है।

CBSE करीब 27,000 स्कूलों का नेटवर्क लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की दौड़ के लिए ग्राउंड  तैयार करता है। ICSE अपनी अभिजात पहचान में सिमटा रहता है। राज्य बोर्ड स्थानीय भाषा, इतिहास और राजनीति के रंग में रंगे होते हैं।

उधर NIOS उन बच्चों के लिए रास्ता खोलता है जो पारंपरिक स्कूल व्यवस्था से बाहर हो गए। और फिर आते हैं IB और Cambridge जैसे अंतरराष्ट्रीय बोर्ड। यहाँ पढ़ने वाले बच्चे सीधे वैश्विक विश्वविद्यालयों की ओर उड़ान भरते हैं।

नतीजा यह है कि भारतीय शिक्षा की गाड़ी कई दिशाओं में खिंच रही है।

कोई बोर्ड बच्चों को JEE और NEET की दौड़ में धकेलता है। कोई क्षेत्रीय इतिहास की मोटी किताबों में उलझा देता है।

हर साल यह अराजकता का मेला लगता है। और उसके बीच लाखों बच्चे रास्ता खोजते रहते हैं।

अब जरा स्कूलों के भीतर झांकिए।

एक तरफ महानगरों के चमचमाते निजी स्कूल हैं। काँच की दीवारें। एसी कमरे। स्मार्ट बोर्ड। रोबोटिक्स लैब। दस साल के बच्चे कोडिंग सीख रहे हैं। वे सिलिकॉन वैली और ऑक्सफोर्ड के सपने देखते हैं।

दूसरी तरफ सरकारी स्कूल हैं।

बरसात आते ही छत टपकने लगती है। फर्श कीचड़ से भर जाता है। कई जगह शौचालय तक नहीं।

डिजिटल इंडिया की चर्चा खूब होती है। लेकिन कई गांवों में इंटरनेट का नाम सुनते ही बच्चे ऐसे देखते हैं जैसे किसी ने परियों की कहानी सुना दी हो।

यहीं से असली तस्वीर सामने आती है।

ASER, यानी Annual Status of Education Report, भारत की स्कूली शिक्षा का सबसे ईमानदार आईना है। इसे हर साल शिक्षा संस्था प्रथम जारी करती है। इसके सर्वेक्षक गांव-गांव जाकर बच्चों की पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता की जांच करते हैं।

रिपोर्ट बार-बार चेतावनी देती है कि बड़ी कक्षाओं तक पहुँचने के बाद भी लाखों बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते। साधारण घटाव जैसे गणित में भी अटक जाते हैं।

यानी स्कूल में साल गुजरते हैं, पर सीखने की बुनियाद कमजोर रहती है।

यहीं से असमानता की असली कहानी शुरू होती है।

अमीर परिवारों के बच्चे अंतरराष्ट्रीय बोर्डों से पढ़कर विदेशों की उड़ान भरते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे अक्सर बीच रास्ते में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।

जन्म ही किस्मत तय कर देता है।

हम अंतरिक्ष मिशनों और डिजिटल तकनीक पर अरबों रुपये खर्च करते हैं। लेकिन हजारों स्कूलों में आज भी शिक्षक नहीं हैं। कई कक्षाएँ खाली गूंजती रहती हैं।

भाषा और क्षेत्रीय राजनीति ने भी शिक्षा को अखाड़ा बना दिया है।

इस बीच रटने की संस्कृति ने रचनात्मकता का गला घोंट दिया है।

बचपन से बच्चों को सिखाया जाता है, याद करो। परीक्षा में उगल दो। फिर भूल जाओ।

ज्ञान का दीपक जलाने के बजाय शिक्षा कई बार टूटे कंगनों की तरह बिखर जाती है।

एक और बड़ी समस्या है, माइग्रेशन।

मान लीजिए किसी परिवार की नौकरी दूसरे राज्य में लग गई। अब बच्चे को नया बोर्ड, नई किताबें, नई परीक्षा प्रणाली झेलनी पड़ती है। माता-पिता दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, इक्विवेलेंस सर्टिफिकेट के लिए।

प्रतियोगी परीक्षाओं में भी असमानता दिखती है। JEE और NEET की तैयारी में CBSE के छात्रों को अक्सर बढ़त मिलती है। दूसरे बोर्डों के बच्चे कई बार खुद को पीछे पाते हैं।

विडंबना यहीं खत्म नहीं होती।

एक ओर देश भर में हजारों मदरसे धार्मिक शिक्षा देते हैं। आस्था का संसार फल-फूल रहा है। लेकिन कई जगह विज्ञान और गणित पीछे रह जाते हैं।

दूसरी ओर मिशनरी स्कूल आधुनिक शिक्षा देते हैं। मगर वे भी राजनीतिक बहसों के घेरे में आ जाते हैं।

इन सबके बीच नई शिक्षा नीति 2020 आई। उम्मीदों का नया सूरज लेकर।

पाँच प्लस तीन प्लस तीन प्लस चार का नया ढांचा। PARAKH नाम की राष्ट्रीय मूल्यांकन प्रणाली। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का सपना।

लेकिन नीति बनाना आसान है, जमीन पर उतारना मुश्किल।

पाँच साल गुजर चुके हैं। कई राज्य अभी भी पुराने ढांचे में ही अटके हुए हैं। स्वायत्तता और राजनीति के कारण बदलाव की रफ्तार धीमी है।

आंकड़े भी देश की कहानी कहते हैं।

केरल में साक्षरता लगभग 90 प्रतिशत से ऊपर चमकती है। बिहार अभी भी आधी दूरी पर हांफता दिखाई देता है।

निजी स्कूलों में अंग्रेजी और विज्ञान की पकड़ मजबूत है। सरकारी स्कूलों में कई बच्चे अभी भी बुनियादी पढ़ाई से जूझ रहे हैं।

हम गगनचुंबी इमारतों का सपना देख रहे हैं। लेकिन नींव रेत की है। कहीं लड़कियाँ पानी भरने के लिए स्कूल छोड़ देती हैं। कहीं लड़के मवेशी चराने लगते हैं।

और उसी देश के शहरों में दस साल के बच्चे मोबाइल ऐप बना रहे हैं। फासला गंगा जितना चौड़ा हो चुका है।

हमारा शिक्षा तंत्र कई बार किसी जर्जर रेलगाड़ी जैसा लगता है। डिब्बे अलग-अलग पटरी पर खिंच रहे हैं। कोई इंजन एक दिशा में नहीं। यात्रियों के सपने स्टेशन पर ही गिर जाते हैं।

यह वही देश है जो दुनिया को बड़े-बड़े सीईओ देता है। और उसी समय लाखों बच्चे बुनियादी पढ़ाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

टूटती दीवारें हमारे सपनों का मजाक उड़ा रही हैं। बहत्तर बोर्ड भविष्य को टुकड़ों में बांट रहे हैं। असमानता नई खाइयाँ बना रही है।

आधे-अधूरे उपाय अब काम नहीं करेंगे।

स्कूलों को मजबूत करना होगा। शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण देना होगा। शिक्षा प्रणाली को सरल और न्यायपूर्ण बनाना होगा।

वरना आने वाली पीढ़ियाँ एक दिन पूछेंगी: भारत ने चाँद तक रॉकेट भेज दिए, लेकिन क्या वह अपने बच्चों को एक मजबूत स्कूल भी दे पाया?

Sunday, March 15, 2026

शादी का नया रंगमंच: पहले बस में बारात, अब कारों की कतार

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प्यार का परचम या पैकेज की परेड?

लव मैरिज बनाम मैरिज ऑफ कन्वीनियंस

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बृज खंडेलवाल की हल्की-फुल्की पड़ताल

16 मार्च 2026

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कभी मोहब्बत बगावत हुआ करती थी। घर से लड़ाई। समाज से टकराव।फिल्मी अंदाज़ में ;  “प्यार किया तो डरना क्या!”

लड़का-लड़की भाग कर शादी कर लेते थे। कोर्ट में दो गवाह। या आर्य समाज मंदिर में सात फेरे।

ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस दिल की जिद।

मां-बाप सालों तक रूठे रहते। मोहल्ले में कानाफूसी चलती रहती।

पर इश्क में एक आग होती थी। एक दीवानगी।

अब तस्वीर बदल गई है।

ऑफिस में साथ काम। कॉफी डेट। वीकेंड ट्रिप। इंस्टाग्राम स्टोरी।

धीरे-धीरे इश्क भी “पैकेज” बन गया।

दोनों की अच्छी तनख्वाह। स्मार्ट लाइफस्टाइल।

जाति-भाषा की दीवारें भी कहीं-कहीं ढहती नजर आती हैं।

देखने में लगता है , मोहब्बत ने समाज को मात दे दी।

पर असली ट्विस्ट शादी के दिन आता है।

फिर वही पुरानी पटकथा।

बैंड-बाजा। डेस्टिनेशन वेडिंग।

डांस, दारू, डीजे, ड्रोन कैमरा।

दहेज नहीं तो “गिफ्ट्स” सही।

लेन-देन नहीं तो “कस्टम” सही।

गहने-जेवर, दिखावा, रस्मों की लंबी फेहरिस्त।

जो कभी समाज से बगावत करते थे,

आज वही समाज के सबसे आज्ञाकारी छात्र बन जाते हैं।

मोहब्बत की क्रांति…शादी के मंडप में परंपरा के सामने घुटने टेक देती है।

कहने को लव मैरिज। असल में   “मैरिज ऑफ कन्वीनियंस”।

पहले परिवार हुक्म देता था, बच्चे मानते थे। अब बच्चे फैसला करते हैं, परिवार ताली बजाता है।

फर्क बस इतना है : पहले इश्क में आग थी। आज इश्क में इवेंट मैनेजमेंट है।

और मोहब्बत…कभी-कभी बस एक खूबसूरत बहाना लगती है।

भारत में शादी कभी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं रही।

यह पूरा मेला हुआ करती थी। गाँव का। मोहल्ले का। रिश्तों का।

आज भी मेला है। लेकिन रंग बदल गए हैं। ढोल वही है, बस उसकी तान बदल गई है।

पुरानी शादी और आज की शादी में सचमुच जमीन-आसमान का फर्क है।

जैसा बुजुर्ग कहते थे ; “समय बड़ा बलवान।” समय के साथ शादियों ने भी अपना रंग बदल लिया।

पहले बारात निकलती थी तो एक बस ही काफी होती थी। बस क्या , चलता-फिरता घर। सीटों पर लोग। गैलरी में लोग। कभी-कभी तो छत पर भी लोग।

बुजुर्ग मज़ाक में कहते , “अरे भाई, जितने लोग बस में आ जाएँ, उतने ही सच्चे रिश्तेदार!”

रास्ते भर नाश्ता चलता। अंताक्षरी के दौर। कभी फूफाजी रूठ जाते। कभी पंडितजी देर से पहुँचते।

दूल्हे के लिए अलग से एक छोटी कार होती थी। वही सबसे बड़ी शान। बाकी पूरी बस रिश्तेदारी और दोस्ती का प्रतीक लगती थी। जैसे कोई फिल्मी गीत बज रहा हो ; “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे…”

बारात धर्मशाला या बगीची में रुकती थी। पूरा कुटुंब आवभगत में लग जाता। गीत गाए जाते। गालियाँ भी बजतीं : वही देसी रस्म वाली।

कहीं ताश की बाज़ी। कहीं भांग-ठंडाई का दौर। और फिर उन किस्सों को सालों तक सुनाया जाता।

अब तस्वीर उलट गई है।

बस का जमाना गया। अब कारों की कतार लगती है। एक ही रंग की गाड़ियाँ। दूल्हे की कार सबसे चमकीली। कहीं-कहीं तो हेलीकॉप्टर एंट्री भी। फोटोग्राफरों का अलग उत्साह। हर पल कैद होना चाहिए।

जैसे शादी नहीं, लाइव फिल्म की शूटिंग हो रही हो।

सजावट का भी नया खेल है।

पहले गाड़ियों पर खर्च कम होता था।

अब हालत यह है कि गाड़ी से ज्यादा खर्च उसकी सजावट पर हो जाता है।

फूल, लाइट, रिबन, थीम।

ऐसा लगता है जैसे कार नहीं,

चलती-फिरती फूलों की दुकान हो।

किसी ने सही कहा है ; “आजकल शादी रिश्तों से कम, इवेंट मैनेजमेंट से ज्यादा चलती है।”

पहले जमाना सीधा था। दूल्हा दुल्हन को पहली बार सुहागरात को ही देखता था। फिल्मी अंदाज़ में ; “पर्दा है पर्दा…” अब कहानी बदल गई है। पहले मुलाकात। फिर डेट। फिर प्री-वेडिंग शूट। पहाड़ों पर फोटो। झील के किनारे वीडियो। ड्रोन कैमरा ऊपर उड़ रहा है। और बैकग्राउंड में गाना बज रहा है ; “तुम ही हो…”

लाखों रुपये तस्वीरों और वीडियो पर खर्च। कभी-कभी लोग मजाक में कहते हैं : “शादी बाद में होती है, फिल्म पहले बन जाती है।”

पहले शादी में बैंड बाजा होता था।लाल यूनिफॉर्म वाले बैंड वाले। ट्रम्पेट, ढोल, नगाड़ा। और वही अमर गीत : “आज मेरे यार की शादी है…” या “बहारों फूल बरसाओ…”

बुजुर्ग, बच्चे, सब नाचते थे। किसी को स्टेप नहीं आते थे। फिर भी दिल से नाचते थे।

आज डीजे का जमाना है। लाइट, स्मोक, डांस फ्लोर। डीजे शायद सस्ता हो। लेकिन उसके लिए जो डीजे ज़ोन बनता है, वह अक्सर जेब ढीली कर देता है।

खाने का भी रंग बदल गया है।पहले टेंट सादा होता था।चार बाँस, एक कपड़ा। हलवाई  एक। मेनू छोटा। पूरी। आलू की सब्जी। रायता।जलेबी। लड्डू, बर्फी,  और लोग उँगलियाँ चाटते हुए कहते: “वाह! मजा आ गया।”

आज शादी में खाने की पूरी प्रदर्शनी लगती है। चाइनीज काउंटर। इटालियन काउंटर। लाइव पिज्जा।चाट की दस किस्में। पचास अचार।चालीस तरह के पापड़। कभी-कभी मेहमान प्लेट लेकर घूमते रहते हैं।समझ ही नहीं आता : खाएँ क्या और छोड़ें क्या।

इतने बदलावों के बाद भी एक सवाल बचता है। क्या शादियाँ सच में ज्यादा खुशहाल हुई हैं? या बस ज्यादा महँगी हो गई हैं? पुराने लोग अक्सर कहते हैं : “पहले शादी में प्यार ज्यादा था, दिखावा कम।”

आज दिखावा ज्यादा है। पैसा पानी की तरह बहता है। कभी-कभी तो ऐसा भी सुनने को मिलता है कि शादी के खर्च से बाप की कमर टूट जाती है।और ऊपर से समाज का दबाव अलग।

फिल्मी अंदाज़ में कोई कह दे ; “आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है…” पर असली सवाल यह है ;  क्या दिल में सुकून भी है?

आखिर में, समय बदलता है।रीति-रिवाज भी बदलते हैं। पर एक चीज़ नहीं बदलनी चाहिए  रिश्तों की सादगी और सच्चाई।

क्योंकि शादी का असली अर्थ है, दो दिलों का मिलन। बाकी सब तो बस

लाइट, कैमरा और एक्शन है।

इसलिए शादी कैसी भी हो , बस इतनी हो कि खुशियाँ रहें, कर्ज नहीं।

Saturday, March 14, 2026

 


कब थमेगी पश्चिम एशिया की जंग?

और युद्ध के बाद कैसा दिखेगा नया मिडिल ईस्ट?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 मार्च 2026

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भरी गर्मी में लगी ये आग कब बुझेगी? जंग कब खत्म होगी? तबाही के मंजर पूछ रहे हैं विश्व युद्ध शुरू हुआ है या खत्म? 


पश्चिम एशिया धधक रहा है। 28 फरवरी 2026 से आग लगी हुई है।अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर बड़ा हमला किया। नाम दिया ऑपरेशन एपिक फ्यूरी। और पहले ही दिन भूचाल आ गया। जब ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए।कई बड़े कमांडर खत्म। सैन्य ठिकाने तबाह।


लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।

ईरान ने जवाब दिया। मिसाइलें चलीं।ड्रोन उड़े। निशाना बने : इज़राइल, अमेरिकी ठिकाने और खाड़ी के देश।


पूरा इलाका दहशत में आ गया। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब होर्मुज़ की खाड़ी बंद हो गई। दुनिया के तेल का बड़ा रास्ता वहीं से गुजरता है। तेल की सप्लाई अचानक गिर गई। कीमतें उछल गईं।


आज 15 मार्च है। दो हफ्ते बीत चुके हैं। लेकिन जंग थमी नहीं। कोई आसार भी नहीं दिख रहे हैं।


कौन जीतेगा?


युद्ध में जीत हमेशा साफ नहीं होती।


अमेरिका और इज़राइल कह रहे हैं; ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता 90–95 प्रतिशत खत्म।


ईरान कह रहा है ; लड़ाई अभी जारी है। नया नेतृत्व सामने आ चुका है।मोजतबा खामेनेई ने साफ कहा है : “मुकाबला जारी रहेगा।”


सच्चाई शायद बीच में कहीं है। ईरान की सेना कमजोर हुई है। लेकिन उसके प्रॉक्सी नेटवर्क अभी जिंदा हैं।हिज़्बुल्लाह। हूती। इराक़ की मिलिशिया। ये छोटे-छोटे कांटे हैं। जो बड़ी ताकतों को भी चुभते रहते हैं।इसलिए शायद कोई “पूरी जीत” नहीं होगी। बस ईरान को बहुत कमजोर कर दिया जाएगा।


ईरान का न्यूक्लियर सपना

इस जंग का एक बड़ा मुद्दा था ; ईरान का परमाणु कार्यक्रम। लेकिन सच यह है कि वो पहले ही काफी पीछे जा चुका था। 2025 में भी कई बड़े प्लांट नष्ट हो चुके थे। नतांज़। फोर्डो। अब नए हमलों ने उसे और पीछे धकेल दिया है।


अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ कह रही हैं, अभी जल्दी बम बनने की कोई संभावना नहीं दिखती। यानी परमाणु खतरा फिलहाल लगभग खत्म।


अमेरिका की साख पर सवाल

इस युद्ध ने अमेरिका की ताकत भी दिखाई। और उसकी मुश्किल भी।उसने दिखाया ; जरूरत पड़े तो वो बड़ा हमला कर सकता है।


लेकिन खाड़ी के देशों में एक नई बेचैनी है। वो पूछ रहे हैं ; क्या अमेरिकी सुरक्षा ही हमें खतरे में डाल रही है?


यूरोप में भी सवाल उठे हैं। कई लोग इसे गैर-कानूनी हमला कह रहे हैं।


जंग के बाद चार रास्ते

भविष्य अभी धुंधला है। लेकिन चार तस्वीरें दिखाई देती हैं।


पहली तस्वीर

ईरान का शासन गिर जाए। नई सरकार आए। न्यूक्लियर साइट्स अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण में चली जाएं।तेल फिर बहने लगे।

दूसरी तस्वीर

ईरान का शासन बच जाए। लेकिन बहुत कमजोर। छिटपुट हमले जारी रहें। तेल महंगा बना रहे।

तीसरी तस्वीर

जंग और फैल जाए। तुर्की। इराक़।लेबनान। अगर चीन और रूस खुलकर कूद पड़े , तो दुनिया आर्थिक संकट में जा सकती है।

चौथी तस्वीर

सब थक जाएं। फिर बातचीत शुरू हो। एक नया समझौता बने। कुछ वैसा जैसा कभी JCPOA था।

JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action)

2015 का एक अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौता था। इसमें ईरान ने अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी, और बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने का वादा किया गया था।


खाड़ी के देश क्या करेंगे?

इस जंग ने एक भ्रम तोड़ दिया है। “अमेरिका हमेशा बचाएगा।” अब खाड़ी के देश नई सोच में हैं। UAE।सऊदी अरब। कतर। अब वे कई दिशाओं में रिश्ते बनाएंगे।

फ्रांस से हथियार। चीन से टेक्नोलॉजी। भारत से व्यापार। यानी एक मल्टी-पोलर सुरक्षा मॉडल।


डॉलर और तेल की कहानी

अभी संकट के समय डॉलर मजबूत हुआ है। लोग सुरक्षित मुद्रा ढूंढते हैं।

लेकिन अगर तेल का संकट लंबा चला तो नई कहानी शुरू हो सकती है।

BRICS देश पहले ही विकल्प ढूंढ रहे हैं। चीन। रूस। भारत।

अगर तेल का व्यापार डॉलर से बाहर गया , तो पेट्रोडॉलर व्यवस्था हिल सकती है।


भारत और चीन की मुश्किल

इस जंग का सबसे बड़ा आर्थिक झटका एशिया को लगेगा।

भारत और चीन दोनों आधे से ज्यादा तेल खाड़ी से लेते हैं। कीमतें बढ़ीं तो असर पड़ेगा।

भारत क्या कर रहा है? रूस से सस्ता तेल। रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल।सोलर और कोयले पर जोर।

चीन भी यही कर रहा है। रूस और अफ्रीका से तेल ले रहा है। ऊर्जा बचत बढ़ा रहा है। ग्रोथ थोड़ी धीमी होगी।लेकिन दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं।संभाल लेंगी।


संयुक्त राष्ट्र कहाँ है?

एक सवाल और उठता है। संयुक्त राष्ट्र कहाँ है? सच यह है कि उसका दखल तभी होगा जब मानवीय तबाही बहुत बढ़ जाए। लाखों शरणार्थी। भुखमरी।बड़े पैमाने पर विनाश।

लेकिन तब भी एक समस्या रहेगी।अमेरिका का वीटो। और दुनिया फिर कहेगी ; UN एक बेबस संस्था बन गया है।


भविष्य की जंग बदल रही है

इस युद्ध ने एक और सच दिखाया।जंग का तरीका बदल गया है। हजारों सस्ते ड्रोन। सैकड़ों मिसाइलें। महंगे एयर डिफेंस सिस्टम भी भर जाते हैं।

फाइटर जेट अब बिना इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा के नहीं उड़ते। जमीन पर सेना छोटे-छोटे समूहों में चलती है। टैंक बनाम टैंक की लड़ाई का दौर खत्म हो रहा है।

अब असली युद्ध है ; ड्रोन। साइबर।स्टैंड-ऑफ मिसाइल।


अंत में

इस जंग में सबसे बड़ी कीमत कौन दे रहा है? आम लोग। लाखों बेगुनाह। घर उजड़ गए। शहर खामोश हो गए।

लेकिन इतिहास अक्सर ऐसे ही मोड़ों पर बदलता है। शायद यह जंग भी दुनिया को एक सबक दे।

कोई एक ताकत पूरी दुनिया को नियंत्रित नहीं कर सकती।

नए रिश्ते बनेंगे। नई रणनीतियाँ बनेंगी। और शायद ऊर्जा की दुनिया भी बदल जाएगी। पश्चिम एशिया की यह जंग सिर्फ एक युद्ध नहीं। यह बदलती हुई दुनिया का ऐलान है।

Friday, March 13, 2026


बुढ़ऊ शेर की दहाड़: क्या संयुक्त राष्ट्र सिर्फ एक टूटता सपना है?


· बृज खंडेलवाल

· 14 मार्च 2026


दूसरे विश्व युद्ध की राख से एक महान सपने ने जन्म लिया था। 1945 में, जब दुनिया थक हार चुकी थी, शहर खंडहर में तब्दील हो चुके थे, और करोड़ों लोग मौत के मुंह में समा चुके थे, तब मानवता ने प्रण किया: अब ऐसा कभी नहीं होगा। इसी संकल्प से संयुक्त राष्ट्र (UN) का उदय हुआ। सपना साफ था - शक्तिशाली देश मिलकर काम करेंगे, झगड़े बातचीत से सुलझेंगे, और उपनिवेशों से मुक्त हुए नए देशों को भी एक मंच मिलेगा जहां ताकत नहीं, इंसाफ की बात होगी।


आज, अस्सी साल बाद, वह सपना बुरी तरह चरमरा गया है। संयुक्त राष्ट्र अक्सर एक मूक दर्शक की तरह नजर आता है। दुनिया के कोने-कोने में युद्ध धधक रहे हैं, आतंकवाद फैल रहा है, और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने एक बार फिर दुनिया को दो खेमों में बांटने की कोशिश की है। जिस संस्था को शांति का संवाहक बनना था, वह आज लाचार और बेबस दिखती है। बैठकें होती हैं, भाषण दिए जाते हैं, प्रस्ताव पारित होते हैं, लेकिन अमन कायम नहीं हो पाता।


इस विफलता की सबसे बड़ी वजह है संयुक्त राष्ट्र की अपनी ही बनाई व्यवस्था में छिपा एक जहर - वीटो पावर। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) इस अधिकार से लैस हैं। सिर्फ एक 'नहीं' से वे दुनिया की बहुमत की आवाज को दबा सकते हैं। 1946 से अब तक लगभग 300 बार इस वीटो का इस्तेमाल हो चुका है। जहां भी किसी बड़ी ताकत का रणनीतिक हित जुड़ा होता है, वहां संयुक्त राष्ट्र बहस का अखाड़ा बनकर रह जाता है और फैसले गायब हो जाते हैं।


इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण हाल में पारित सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2817 है। 11 मार्च 2026 को ईरान के हमलों की निंदा करने वाला यह प्रस्ताव 134 देशों के समर्थन से पारित हुआ। लेकिन आलोचकों ने तुरंत सवाल उठाया कि इस प्रस्ताव में उस घटना का जिक्र तक नहीं था जो इस टकराव की असली वजह थी - 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरानी ठिकानों पर किए गए हमले। फिर वही कहानी: आधी सच्चाई, चुनिंदा गुस्सा, और संयुक्त राष्ट्र की साख पर एक और धब्बा।


अमेरिका ने कई बार साफ किया है कि जहां उसके राष्ट्रीय हित दांव पर हों, वहां अंतरराष्ट्रीय सहमति की उसे परवाह नहीं। 2003 में इराक पर हमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना ही किया गया। गाजा युद्ध के दौरान भी यही हुआ। अक्टूबर 2023 से सितंबर 2025 के बीच अमेरिका ने कम से कम छह युद्धविराम प्रस्तावों पर वीटो लगा दिया, जबकि महासभा में 153 देशों ने मानवीय संघर्षविराम की मांग की थी। लेकिन जिम्मेदारी सिर्फ अमेरिका की नहीं। रूस ने सीरिया पर रासायनिक हमलों की जांच के प्रस्तावों को बार-बार वीटो किया। 2022 में उसने यूक्रेन पर हमले के बाद अपनी ही निंदा वाले प्रस्ताव को वीटो कर दिया। हमलावर भी वही और फैसला करने वाला भी वही।


इतिहास इस बेबसी की दर्दनाक गवाही देता है। रवांडा 1994: सिर्फ सौ दिनों में आठ लाख लोग मारे गए, और सुरक्षा परिषद ने शांति सेना को बढ़ाने के बजाय और घटा दिया। स्रेब्रेनित्सा 1995: संयुक्त राष्ट्र के 'सुरक्षित क्षेत्र' में आठ हजार बोस्नियाई मुसलमानों का नरसंहार हुआ, और डच शांति सैनिक बेबस देखते रहे। सीरिया में रासायनिक हमले हुए, शहर भूखे मरे, लेकिन हर बार वीटो की दीवार इंसाफ के रास्ते में रोड़ा बनी रही।


छोटे और मध्यम देशों के लिए यह एक गहरी निराशा है। वे जिस संस्था को अपना सुरक्षा कवच समझते थे, वह आज बड़ी ताकतों की राजनीतिक बाजीगरी का अखाड़ा बनकर रह गई है। सामूहिक सुरक्षा का सपना चुनिंदा न्याय में तब्दील हो गया है।


यह सच है कि संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह बेकार नहीं है। यूनिसेफ, विश्व खाद्य कार्यक्रम, WHO जैसी उसकी एजेंसियां आज भी करोड़ों लोगों की जान बचा रही हैं, उन्हें राहत पहुंचा रही हैं। लेकिन जिस मूल उद्देश्य के लिए उसे बनाया गया था - युद्ध रोकना और शांति कायम करना - उसमें वह बुरी तरह विफल रहा है।


यही इसकी सबसे बड़ी त्रासदी है। एक संस्था की नाकामी भर नहीं, बल्कि एक सपने का धीरे-धीरे मर जाना। आज जब दुनिया फिर से शीत युद्ध जैसे ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है, नए-नए संघर्ष पनप रहे हैं, और हाइब्रिड युद्धों ने हालात को और जटिल बना दिया है, संयुक्त राष्ट्र एक थके-हारे बूढ़े चौकीदार की तरह खड़ा है। वह गरजता है - प्रस्तावों में, बयानों में, बैठकों में - लेकिन जब असली कार्रवाई की बारी आती है, खासकर किसी बड़ी ताकत के खिलाफ, तो उसकी दहाड़ फुसफुसाहट में बदल जाती है।


अब सवाल यह है: क्या संयुक्त राष्ट्र खुद को बदल पाएगा? क्या सुरक्षा परिषद में सुधार होगा? क्या वीटो की ताकत पर लगाम लगेगी? अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह संस्था एक खूबसूरत निशानी बनकर रह जाएगी - एक नेक इरादे की, जिसे दुनिया ने मिलकर देखा तो था, लेकिन पूरा कभी नहीं कर सकी। बुढ़ऊ शेर अब शायद सिर्फ दहाड़ता ही रह जाए।

Thursday, March 12, 2026

 धुंध में खड़ी दिल्ली  

जयशंकर की कूटनीति: मुस्कान नरम, संदेश गरम  

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

13 मार्च 2026  

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दिल्ली आज भी धुंध की चादर ओढ़े खड़ी है; ठीक वैसे ही जैसे वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भारत की विदेश नीति। 


दुनिया बेचैन है, सवाल पूछ रही है: भारत आखिर किसके साथ है? वॉशिंगटन के साथ? मॉस्को के साथ? तेहरान के साथ? या फिर किसी के साथ भी नहीं?


दिल्ली चुप है। और यही चुप्पी सबसे स्पष्ट और शक्तिशाली जवाब है।


आज की दुनिया अजीब मोड़ पर है। दोस्ती-दुश्मनी मौसम की तरह बदल रही है। हर देश नया ब्लॉक बना रहा है, नई धुरियाँ खड़ी कर रहा है। लेकिन भारत ने एक अलग, स्वतंत्र रास्ता चुना है। इसका नारा सरल है: 

रणनीतिक स्वायत्तता; लेकिन रास्ता जटिल और सूक्ष्म।


इस रास्ते के मुख्य शिल्पकार हैं विदेश मंत्री एस. जयशंकर। उनकी कूटनीति में शोर-शराबा नहीं, ढोल-नगाड़े नहीं बजते। घोषणाएँ कम, लेकिन चालें गहरी और दूरगामी। उनकी रणनीति के कुछ प्रमुख शब्द हैं: रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीय संबंध, सोची-समझी अस्पष्टता, जानबूझकर चुप्पी, और दिल्ली की खास शैली: 

"नॉनचलेंस,"  यानी बेपरवाही भरा उदासीन रवैया। दुनिया चीखती-चिल्लाती है, दिल्ली बस कंधे उचकाती है।


कुछ साल पहले जयशंकर ने एक वाक्य कहा था, शांत स्वर में, लेकिन उसकी गूंज दूर तक गई: “यूरोप की मुसीबतें दुनिया की मुसीबतें नहीं हैं।” इस एक पंक्ति ने कई राजधानियों में हलचल मचा दी। संदेश साफ था; भारत अब किसी का जूनियर पार्टनर नहीं रहा। न किसी के नैतिक उपदेश सुनने को तैयार, न दबाव में आने को।


अब पश्चिम एशिया में नया संकट मंडरा रहा है। अमेरिका और इज़राइल एक तरफ, ईरान दूसरी तरफ। फरवरी 2026 के अंत से शुरू हुआ यह दौर अब और तीव्र हो चुका है; हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर तनाव, ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा। दुनिया के रणनीतिकार नक्शे पर लकीरें खींच रहे हैं, टीवी पर बहसें चल रही हैं। सवाल वही पुराना: भारत किसके साथ?


जवाब है: रणनीतिक अस्पष्टता। यह कोई दुर्बलता या अनिर्णय नहीं, बल्कि कूटनीति की परिपक्व कला है।


तस्वीर देखिए:  

एक तरफ अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक रिश्ते: टेक्सास में अरबों डॉलर की परियोजनाएँ, इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक सहयोग, राजनीतिक गर्मजोशी।  


दूसरी तरफ ईरान के साथ व्यावहारिक बातचीत: तेल आपूर्ति, हॉर्मुज़ से जहाज़ों का सुरक्षित गुजरना, ऊर्जा सुरक्षा की गणना। 10 मार्च 2026 को जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से विस्तृत बातचीत की।  


तीसरी तरफ रूस: पुराना, भरोसेमंद साथी। सस्ता रूसी तेल खरीदा गया, रक्षा सौदे मजबूत। 11-12 मार्च को लावरोव से बातचीत हुई।  


और चीन? सीमा पर तनाव, सैनिक आमने-सामने, लेकिन व्यापार का रास्ता बंद नहीं। बातचीत जारी।


यह है भारत की नीति का व्यावहारिक चेहरा: समान दूरी, बिना किसी के प्रति पूरी निष्ठा या पूरी दुश्मनी। कार्ड जेब में रखे हैं, मेज़ पर नहीं दिखाए जाते। पुराना सिद्धांत फिर जीवित हो उठा है: स्थायी दोस्त नहीं होते, स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं।


नैतिकता की बातें मंचों पर अच्छी लगती हैं, लेकिन युद्धों का इतिहास कुछ और बताता है: जंग अंत में कोई नहीं जीतता, सिर्फ बर्बादी, मलबा, नफरत और लंबी असुरक्षा छोड़ जाता है। इसलिए दिल्ली सतर्क है।


9 मार्च 2026 को संसद में जयशंकर ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर बयान दिया: शांति, संवाद, कूटनीति, अवरोधन, संयम और नागरिकों की सुरक्षा की वकालत की। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताई।


देश के भीतर विपक्ष सवाल उठाता है; राहुल गांधी बार-बार कहते हैं, “साफ स्टैंड लेना चाहिए।” लेकिन विदेश नीति टीवी डिबेट नहीं है। असली खेल बंद कमरों में होता है: खुफिया रिपोर्ट्स, बैक-चैनल बातचीत, गुप्त समझौते। जो दिखता नहीं, वही निर्णायक होता है।


जयशंकर इस खेल के माहिर हैं। मुस्कुराते हैं, धीरे बोलते हैं, लेकिन संदेश कड़ा होता है। रायसीना डायलॉग 2026 में उन्होंने कहा: भारत का उदय भारत तय करेगा, अपनी ताकत से, दूसरों की गलतियों से नहीं। बहुध्रुवीयता अब स्थायी है। कोई एक शक्ति सब कुछ नहीं तय कर सकती।


भारत ने अपने हित सुरक्षित रखे हैं; ऊर्जा आपूर्ति जारी, व्यापार बढ़ रहा, विदेश में भारतीय सुरक्षित, कोई बड़ा प्रतिबंध नहीं, कोई गंभीर संकट नहीं। यह संतुलन आसान नहीं; इसके लिए निरंतर सतर्कता चाहिए।


विश्लेषक अब भारत को "स्विंग पावर" कहने लगे हैं; किसी धुरी में बंधा नहीं, लेकिन हर धुरी को प्रभावित करने की क्षमता।


यही है नई भारतीय कूटनीति, नारे कम, गणित ज्यादा। भावनाएँ कम, हित ज्यादा।  


दुनिया ब्लॉक बना रही है, भारत रास्ते बना रहा है।  


धुंध में खड़ी दिल्ली साफ संदेश दे रही है: स्वतंत्र, व्यावहारिक और निर्भीक। भारत अपना रास्ता खुद बनाएगा, अपनी शर्तों पर।  


Wednesday, March 11, 2026

 कैसे कैसे लोग?

श्रेय लेने का उतावलापन:  सेल्फ़ी युग में सेवा कम, पोस्ट ज़्यादा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 मार्च 2026

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सेवा का काम शोर नहीं, असर होना चाहिए ।

लेकिन आज के समय में असर से पहले पोस्ट आ जाती है।

गौर से देखें, समाजसेवा भी कुछ-कुछ क्रिकेट मैच जैसी हो गई है। सबकी नज़र स्कोरबोर्ड पर है;  किसने सबसे पहले ट्वीट किया। किसने फेसबुक पर “ब्रेकिंग” डाली। किसने फोटो के साथ लिखा ;  “मेरे प्रयासों से…”

मुद्दा क्या था, यह बाद में याद आता है। पहले याद आता है :  पोस्ट किसकी वायरल हुई।

आजकल सेवा कम, सेल्फ़ी ज़्यादा होती है।

किसी ने गड्ढे की शिकायत की। गड्ढा भरने से पहले पाँच पोस्ट आ गईं : “देखिए, मेरे प्रयास से नगर निगम हरकत में।”

नगर निगम बेचारा सोचता रह जाता है,  गड्ढा हमने भरा, श्रेय किसी और ने भर लिया।

एक्टिविस्ट हैं या डिजिटल इन्फ्लुएंसर?

एक ज़माना था जब समाजसेवक चुपचाप काम करते थे। लोग बाद में बताते थे :  “अरे, यह काम फलाँ व्यक्ति ने करवाया था।”

अब दौर उल्टा है। पहले घोषणा होती है। फिर पोस्ट होती है। फिर टैगिंग होती है। फिर हैशटैग चलता है।

काम कब होता है ? 

यह कभी-कभी प्रशासन को भी बाद में पता चलता है।

अब एक्टिविस्ट और इन्फ्लुएंसर में फर्क करना मुश्किल हो गया है।

फर्क बस इतना है कि इन्फ्लुएंसर साबुन बेचता है और एक्टिविस्ट श्रेय बेचता है।

RTI: सूचना का अधिकार या श्रेय का अधिकार?

RTI एक शानदार औज़ार है। लोकतंत्र का एक्स-रे मशीन। सवाल पूछो, तो सरकार को जवाब देना पड़ता है।फाइलें खुलती हैं। सच बाहर आता है।

लेकिन हमारे यहाँ RTI का एक नया संस्करण भी आ गया है : 

RTI = “Recognition Through Internet.”

यानी सूचना बाद में, पहचान पहले।

RTI लगाई नहीं कि पोस्ट तैयार : 

“मेरी RTI से बड़ा खुलासा!” खुलासा क्या हुआ, यह तो बाद में पढ़ा जाएगा।

पहले यह देख लिया जाए कि पोस्ट पर कितने लाइक आए। कभी-कभी लगता है

RTI फाइल कम, प्रेस रिलीज़ ज़्यादा हो गई है। मुद्दा पीछे, चेहरा आगे, आजकल हर आंदोलन में दो मोर्चे होते हैं।

एक असली मोर्चा ; जहाँ समस्या है।दूसरा सोशल मीडिया मोर्चा ;  जहाँ फोटो है।

पहले लोग वृक्ष बचाते थे।

अब लोग किनारे खड़े होकर

सेल्फ़ी बचाते हैं।

किसी ने  सफाई अभियान में झाड़ू उठाई।

अगले ही पल फोटो पोस्ट ;  “ शहर सफाई के लिए मेरी लड़ाई।” शहर  बेचारा मन में सोचता होगा : 

“भाई, झाड़ू चलाओ या कैमरा?”

श्रेय की राजनीति

हमारे समाज में श्रेय भी राजनीति जैसा हो गया है। सबको चाहिए। और तुरंत चाहिए। कुछ विशेषज्ञ छपास रोग को दोष देते हैं। 

अगर कहीं कोई अच्छा काम हो जाए

तो पाँच लोग तुरंत प्रकट हो जाते हैं ,

“यह मेरे प्रयासों से हुआ।”

छठा व्यक्ति थोड़ा विनम्र होता है। वह लिखता है ; “मेरे छोटे से प्रयास का परिणाम।”

छोटा प्रयास इतना छोटा होता है कि कभी-कभी दिखता ही नहीं। लेकिन पोस्ट बहुत बड़ी होती है।

सेवा या व्यक्तिगत ब्रांडिंग?

सोशल मीडिया ने एक नई चीज़ पैदा की है :  “पर्सनल ब्रांड एक्टिविज़्म।”

यहाँ उद्देश्य समस्या हल करना नहीं, प्रोफ़ाइल चमकाना होता है। जैसे ही कोई मुद्दा ट्रेंड करता है, कुछ लोग तुरंत पहुँच जाते हैं।

एक फोटो। एक लंबा पोस्ट। दो-चार टैग। और अंत में लिखा ;  “संघर्ष जारी रहेगा।”

संघर्ष कहाँ जारी है ;  यह पता नहीं।

लेकिन पोस्ट जरूर जारी रहते हैं।

सच थोड़ा सादा होता है। सच यह है कि समाज का कोई भी काम एक व्यक्ति से नहीं होता। कई लोग मेहनत करते हैं। कुछ सामने दिखते हैं। कई लोग पर्दे के पीछे रह जाते हैं।

लेकिन आजकल पर्दे के पीछे रहना। किसी को पसंद नहीं। शायद बदबू आती है।

हर किसी को लगता है, इतिहास उसी से शुरू होता है। मर्यादा आजकल थोड़ा पुराना फ़ैशन लगती है।

संयम का मतलब है : काम होने दो,

फिर बोलो। लेकिन सोशल मीडिया का नियम है , पहले बोलो, फिर काम होने का इंतज़ार करो।

असली संतोष कहाँ है?

सच पूछिए तो सेवा का असली सुख, लाइक और शेयर में नहीं होता। वह उस दिन होता है, जब समस्या सच में हल हो जाती है।

ताली की आवाज़ दो सेकंड रहती है।परिवर्तन की गूँज वर्षों तक। लेकिन यह बात समझने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए।

और धैर्य…

सोशल मीडिया की दुनिया में, सबसे दुर्लभ संसाधन है।

Tuesday, March 10, 2026

 दुश्मन कैसे बढ़ाएँ, दोस्त कैसे खोएँ ,  ट्रंप से सीखिए

क्या ईरान बनेगा ट्रम्प का वाटरलू?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 मार्च 2026

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क्या ईरान डोनाल्ड ट्रंप का वाटरलू बनेगा?

तारीख़ गवाह है कि इतिहास को ऐसे लम्हे बहुत पसंद आते हैं।

एक फैसला। एक जुआ। एक जंग।

और अचानक जो अजेय लगता था, वह भी कमजोर नज़र आने लगता है।

28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नाटकीय सैन्य कार्रवाई का हुक्म दिया: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी। सब कुछ बहुत तेज़ हुआ। खामोशी से। लेकिन धमाकेदार अंदाज़ में।

अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त फौजी कार्रवाई ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। मिसाइलें कमांड सेंटरों को चीरती हुई गुज़रीं। हवाई हमलों ने बेस और इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह किया। फिर सबसे बड़ा झटका आया। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई इन हमलों में मारे गए।

पूरा मध्य-पूर्व सांस रोके खड़ा था।

वॉशिंगटन में जश्न। तेहरान में गुस्सा और आग। देखते देखते जंग दूसरे हफ्ते में दाखिल हो गई।

व्हाइट हाउस ने इसे मजबूत लीडरशिप बताया। एक बहादुर कदम। ज़रूरी कार्रवाई। सरकार का दावा था कि इससे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कुचल जाएगा। शायद हुकूमत भी बदल जाए।

खुद ट्रम्प का लहजा भरोसे से भरा था। “ताकत के ज़रिए अमन,” उन्होंने कहा। उनका कहना था कि यह टकराव “बहुत जल्दी खत्म” हो सकता है।

लेकिन जंगें अक्सर राष्ट्रपति की टाइमलाइन नहीं मानतीं। खासतौर पर मध्य-पूर्व में।

बिना तालियों की जंग

अगर ट्रम्प को लगा था कि अमेरिका में जबरदस्त देशभक्ति की लहर उठेगी, तो ऐसा नहीं हुआ। माहौल कुछ और है। बेचैनी। शक।और  घबराहट।

सर्वे इस कहानी को साफ बताते हैं।

CNN/SSRS के सर्वे में

59% अमेरिकियों ने हमलों को गलत बताया। सिर्फ 41% ने समर्थन किया।

NPR/PBS/Marist के पोल में

56% लोग फौजी कार्रवाई के खिलाफ हैं। 44% इसके हक में।

Reuters/Ipsos का आंकड़ा और सख्त है। सिर्फ 27% लोग हमलों का समर्थन कर रहे हैं।

यह जोश नहीं है। यह हिचक है।

हमलों के बाद ट्रम्प की कुल लोकप्रियता भी गिरकर 40–45% के बीच आ गई है। इसे जबरदस्त समर्थन नहीं कहा जा सकता।

अमेरिका साफ-साफ बंटा हुआ है।

रिपब्लिकन पार्टी के करीब 84% लोग इस कार्रवाई के साथ हैं।

डेमोक्रेट्स में 86% लोग इसके खिलाफ हैं।

इंडिपेंडेंट मतदाता भी ज्यादातर विरोध में हैं।

कई सर्वे में 55–59% लोग जंग को बढ़ाने के खिलाफ दिखते हैं।

यह एकता नहीं है। यह गहरी ध्रुवीकरण की तस्वीर है। और बिना राष्ट्रीय एकता की जंग अक्सर सियासी दलदल बन जाती है।

झंडे के पीछे भीड़ नहीं

पहले की जंगों में जनता तुरंत साथ खड़ी हो जाती थी। 11 सितंबर के हमलों के बाद अफगानिस्तान युद्ध को 92% समर्थन मिला था। इराक युद्ध से पहले करीब 72% लोग समर्थन में थे।

आज?

मुश्किल से आधा देश साथ है। कई जगह इससे भी कम। न कोई राष्ट्रीय उबाल। न देशभक्ति की लहर। बस चिंता।

अमेरिकियों को पिछली मध्य-पूर्व की जंगें याद हैं। और उनका अंजाम भी।

एक और सवाल व्हाइट हाउस का पीछा कर रहा है। आख़िर असली प्लान क्या है?

कई सर्वे बताते हैं कि अमेरिकियों को लगता है कि साफ योजना ही नहीं है।

क्या यह सीमित हमला है? क्या यह सरकार बदलने की कोशिश है? या फिर एक और अंतहीन जंग की शुरुआत?

वॉशिंगटन अभी तक भरोसे से जवाब नहीं दे पाया है। और अनिश्चितता डर को जन्म देती है।

एक और मसला संवैधानिक है। कांग्रेस ने इस हमले को मंजूरी नहीं दी थी। यह बात अहम है।

सर्वे बताते हैं कि 59% अमेरिकी मानते हैं कि फौजी कार्रवाई के लिए कांग्रेस की अनुमति जरूरी होनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि व्हाइट हाउस ने अकेले फैसला लिया।

हर जंग का एक अंधेरा पहलू होता है।

अब नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आ रही हैं। एक अमेरिकी हमले में ईरान के शहर मिनाब में एक लड़कियों का स्कूल भी निशाने पर आ गया, ऐसा बताया जा रहा है।

विदेशों में नाराज़गी बढ़ी है। और अमेरिका में भी असहज सवाल उठ रहे हैं। युद्ध कक्षों में लक्ष्य और नक्शे होते हैं। जमीन पर इंसान होते हैं।

सबसे दिलचस्प असर ट्रम्प के अपने समर्थक खेमे में दिख रहा है। कुछ प्रमुख कंज़र्वेटिव आवाज़ें भी बेचैन हैं।

टीवी होस्ट Tucker Carlson ने गहरे फौजी दखल से सावधान रहने की बात कही है। उन्हें डर है कि यह एक और अंतहीन जंग बन सकती है।

यहाँ तक कि Laura Ingraham ने भी प्रशासन से नागरिक मौतों पर ज्यादा ईमानदार जवाब मांगा है। दरारें छोटी हैं। लेकिन दिख रही हैं।

अमेरिकी राजधानी में सियासी जंग तेज़ है। रिपब्लिकन इसे जरूरी कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि ईरान परमाणु खतरा बन चुका था।

डेमोक्रेट्स की राय बिल्कुल अलग है।

वे इसे “चुनी हुई जंग” कहते हैं। एक खतरनाक बढ़ोतरी। बिना साफ वजह के शुरू हुआ संघर्ष। बहस तेज़ है।कड़वी है। और बहुत जानी-पहचानी भी। अमेरिका यह बहस पहले भी देख चुका है।

वॉशिंगटन से बाहर भी माहौल उबल रहा है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस आग की तरह फैल रही है।

समर्थकों का कहना है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने कोई और रास्ता छोड़ा ही नहीं था।

विरोधियों का कहना है कि देश फिर से इराक वाली गलती दोहरा रहा है।

सच शायद हमेशा की तरह गोलियों और बमों के बीच कहीं दबा पड़ा है।

रणनीति से परे एक गहरा सवाल खड़ा है। जंग की कीमत क्या होती है? हर मिसाइल के साथ नतीजे आते हैं।अमेरिकी सैनिक खतरे में पड़ते हैं।ईरानी नागरिक तबाही झेलते हैं।पूरा इलाका अस्थिर हो जाता है। बमबारी शायद ही कभी नफरत खत्म करती है। अक्सर वह अगली जंग के बीज बो देती है। इतिहास इस बात का बेरहम गवाह है।

ट्रम्प के लिए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी एक बड़ा जुआ है। अगर ईरान जल्दी ढह गया, तो वह इसे ऐतिहासिक जीत बताएंगे। लेकिन अगर जंग लंबी खिंची, तो सियासी कीमत बहुत भारी हो सकती है। जंगों ने पहले भी राष्ट्रपतियों की कुर्सी हिलाई है। और इराक और अफगानिस्तान की परछाइयाँ अभी भी अमेरिका की यादों में जिंदा हैं।

इसलिए सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है। धीरे-धीरे। बेचैनी के साथ। क्या यह ट्रम्प की सबसे बड़ी जीत बनेगी? या वही पल जिसे इतिहास उनका वाटरलू कहेगा?

Monday, March 9, 2026

 When Krishna Dances: Dr. Jyoti Khandelwal Decodes the Sacred Rhythm of Braj

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By Brij Khandelwal

10 March 2026

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Some lands are geographical.

Braj is emotional.

It breathes devotion. It sings poetry. It dances memory.

Spread across dusty village lanes, ancient temples, forest groves and the quiet banks of the Yamuna, Braj is not merely a region on the map. It is a living theatre of Krishna’s divine play.

For centuries poets have sung him. Painters have painted him. Devotees have adored him. And dancers across generations have tried to capture the impossible: the rhythm of Krishna himself.

But here is the curious thing.

While Krishna’s stories flood India’s music, theatre and dance traditions, the deeper connection between Braj’s culture, Krishna’s philosophy and the grammar of dance remained surprisingly underexplored in academic scholarship.

Until now.

Dr. Jyoti Khandelwal has stepped into that gap with a remarkable and pioneering doctoral study. Her research examines how Krishna’s leelas, the playful, profound episodes of his life, flow into the dance traditions of Braj and beyond. Classical. Folk. Sacred. Social.

In her work, dance stops being mere performance. It becomes philosophy in motion.

The journey begins at the beginning.

Dr. Khandelwal traces the origins of dance itself. Not as entertainment. Not as spectacle. But as one of humanity’s earliest languages.

Long before written texts, people moved their bodies to express awe, devotion, fear and celebration. Ritual gestures became symbolic movements. Rhythm became prayer.

From these early impulses emerged the refined traditions of Indian classical dance. Each codified. Each disciplined. Each deeply philosophical.

Forms like Bharatanatyam, Kathak, Manipuri and Kuchipudi developed their own languages of expression, gestures, rhythms, storytelling techniques.

But these forms did not grow in isolation. They drew nourishment from mythology, devotion and cultural landscapes.

And few mythological figures have inspired dancers as deeply as Krishna.

Here Dr. Khandelwal brings the spotlight back to Braj, the cradle of Krishna lore.

Braj is not just sacred geography. It is narrative geography.

Every hill whispers a story. Every ghat remembers a miracle. Every dusty path echoes a flute note.

Vrindavan. Govardhan. Gokul. Barsana. The Yamuna’s quiet banks.

These are not merely pilgrimage sites. They are stages where Krishna’s divine drama unfolded, at least in the collective imagination of millions.

Dr. Khandelwal’s research shows how these places are continuously kept alive through dance, music and festivals. Culture here is not archived. It is performed.

Take the Yamuna.

In Braj tradition she is not simply a river. She is Krishna’s companion. Witness. Confidante.

She watched the butter thief grow up. She heard the flute at midnight. She reflected the moonlit Rasleela.

Small wonder then that Yamuna flows endlessly through Braj’s artistic imagination. Songs celebrate her. Dances evoke her. Devotion surrounds her.

One of the most fascinating sections of Dr. Khandelwal’s study explores Krishna’s philosophy through dance narratives.

Krishna is not a solemn philosopher seated under a tree.

He is a laughing child stealing butter.

A mischievous boy teasing the gopis.

A flute player hypnotising the forests.

A protector lifting a mountain.

Yet beneath this playfulness lies profound wisdom.

Through dance, performers translate these stories into visual poetry. A raised eyebrow becomes mischief. A circular movement becomes the Ras dance. A rhythmic stamp becomes cosmic joy.

Dance, in this framework, becomes philosophy made visible.

Themes emerge naturally.

Divine love.

Harmony between nature and humanity.

The celebration of life through rhythm and movement.

Spiritual insight hidden within everyday experiences.

And then comes perhaps the most refreshing part of Dr. Khandelwal’s research.

She steps beyond the classical stage. Into the villages.

While classical dance forms have attracted plenty of scholarly attention, Braj’s folk traditions have often remained under the academic radar.

That changes here.

Village squares. Temple courtyards. Festival nights.

These are Braj’s real theatres.

Here folk dances, dramatic enactments and Rasleela performances retell Krishna’s adventures in earthy dialects and spontaneous humour.

The butter thief lives again.

The gopis complain again.

The mountain rises again.

These performances are not mere entertainment. They are moral storytelling for the community.

Courage. Devotion. Humility. Compassion. Harmony with nature.

Each leela carries a quiet lesson.

Music, naturally, sits at the heart of this universe.

After all, Krishna himself is the eternal flute player.

The flute is not just an instrument. It is a metaphor.

Harmony. Attraction. Inner awakening.

Dr. Khandelwal’s research beautifully explores how Braj’s lyrical traditions, poetry, songs, rhythmic cycles, intertwine with dance to create a complete aesthetic experience.

Poetry provides emotion.

Rhythm provides structure.

Movement provides expression.

Together they produce devotion in motion.

Historically, many scholars have examined the cosmic dance of Shiva; the powerful Tandava symbolising creation and destruction.

Dr. Jyoti Khandelwal offers a different lens.

Krishna’s dance is softer. Playful. Human.

It celebrates love, community, laughter and participation.

Shiva’s dance shakes the universe.

Krishna’s dance invites the village.

That shift in perspective makes her research both refreshing and significant.

She interprets Krishna’s leelas not as distant mythology but as messages for ordinary life.

Govardhan lifting becomes a lesson in ecological balance.

Krishna’s affection for cows reflects compassion toward animals.

His playful equality with villagers hints at social harmony.

And the flute?

A reminder that inner peace is the sweetest music.

Through dance and storytelling these messages travel easily, from stage to street, from temple courtyard to village fair.

Dr. Khandelwal argues that dance traditions are not merely artistic displays. They are vessels of cultural memory.

They preserve values. They transmit philosophy. They bind communities.

The completion of this research marks an important academic milestone.

For perhaps the first time, a scholar from Agra has systematically explored the deep interplay between Braj’s culture, Krishna’s philosophy and the expressive language of dance.

By weaving together classical theory, folk traditions, geography, music and spirituality, Dr. Jyoti Khandelwal has created a study that bridges academia and living culture.

In Braj, dance is never just movement.

It is devotion in rhythm.

Poetry in gesture.

Philosophy in motion.

And as Dr. Khandelwal’s research beautifully reveals, when Krishna dances, an entire civilisation moves with him.