मोदी मॉडल की नई कसौटी: 4 मई बताएगा रफ्तार या रुकावट?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
21 मार्च 2026
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भारत बदल चुका है। चेहरा भी, चाल भी, चरित्र भी। सत्ता की भाषा बदली, शासन का व्याकरण बदला। पर असली सवाल अब सामने खड़ा है, क्या यह बदलाव की आंधी आगे भी चलेगी, या अब इसकी सांस फूलने लगी है? 4 मई को पांच राज्यों के नतीजे इस पहेली का जवाब लिखेंगे।
2014 के बाद भारतीय राजनीति ने जैसे करवट नहीं, पूरा पलटा खाया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में समझौतों की खिचड़ी राजनीति को किनारे कर एक केंद्रीकृत, निर्णायक और आक्रामक शासन मॉडल उभरा। गठबंधन की बेड़ियां टूटीं। फैसलों की रफ्तार बढ़ी। “जो कहा, वो किया” का नया मंत्र चला। 2019 में दूसरा पूर्ण बहुमत आया, तो यह साफ हो गया कि अब एक दल भी पूरे देश की गाड़ी खींच सकता है।
अनुच्छेद 370 का अंत। राम मंदिर का निर्माण। ये सिर्फ फैसले नहीं थे, ये भावनाओं की धड़कन थे। राष्ट्रवाद और विकास का ऐसा संगम बना, जिसने जनता के दिल में सीधी जगह बनाई। राजनीति अब सिर्फ नीतियों की नहीं, प्रतीकों की भी हो गई।
लेकिन असली खेल कहीं और खेला गया: तकनीक के मैदान में। आधार, मोबाइल और बैंक खाते की तिकड़ी ने सरकारी योजनाओं को सीधे जनता के दरवाजे तक पहुंचा दिया। बिचौलियों की दुकानें बंद होने लगीं। गैस कनेक्शन, घर, नकद सहायता—सरकार अब फाइलों में नहीं, लोगों के जीवन में दिखने लगी। एक नया ‘लाभार्थी वर्ग’ पैदा हुआ, जो दिल्ली को दूर की सरकार नहीं, अपनी सरकार मानने लगा।
अर्थव्यवस्था में भी बड़े प्रयोग हुए। जीएसटी ने कर प्रणाली को एक धागे में पिरोया। दिवाला कानून ने पारदर्शिता की खिड़की खोली। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की जिद ने दर्द जरूर दिया, लेकिन दिशा साफ रही; नियम, नियंत्रण और एकरूपता।
फिर आया 2024। जनादेश ने पहली बार ब्रेक लगाया। बहुमत की रफ्तार धीमी हुई। गठबंधन की जरूरत लौट आई। ‘मोदी 3.0’ में ताकत तो है, लेकिन पूरी आजादी नहीं। जैसे तेज दौड़ती कार को अब मोड़ों पर सावधानी से चलना पड़ रहा हो।
लेकिन सरकार ने गियर बदल लिया। रफ्तार कम नहीं होने दी। 2026 तक चार लेबर कोड लागू करने की तैयारी। न्यूक्लियर सेक्टर में निजी निवेश के दरवाजे खोलने की चर्चा। बीमा में 100% एफडीआई की पहल। टैक्स को सरल बनाने की कोशिश। संदेश साफ है; गठबंधन है, लेकिन सुधारों पर ब्रेक नहीं लगेगा।
फिर भी राह आसान नहीं। सियासत का पारा चढ़ रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग की तलवार लटक रही है। संस्थाओं पर ‘कब्जे’ के आरोप गूंज रहे हैं। जातीय जनगणना की मांग ने नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष अब सिर्फ सवाल नहीं पूछ रहा, सीधे टकराव के मूड में है।
भाजपा का हिंदू सामाजिक गठजोड़ भी चुनौती के दौर में है। समाज की परतें खिसक रही हैं। नई आकांक्षाएं जन्म ले रही हैं। उधर पश्चिम एशिया की अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर सकती है, जिसका असर भारत पर भी पड़ेगा।
अब नजरें टिकी हैं 4 मई पर। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी; ये सिर्फ राज्य नहीं, राजनीतिक प्रयोगशालाएं हैं। असम में हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदुत्व और विकास का फॉर्मूला फिलहाल मजबूत दिखता है। लेकिन दक्षिण भारत अलग मिजाज रखता है। वहां क्षेत्रीय पहचानें गहरी जड़ें जमाए बैठी हैं। भाजपा की राष्ट्रीय अपील को सीटों में बदलना आसान नहीं।
बंगाल में तो जैसे सीधी भिड़ंत है; तृणमूल की जमीनी पकड़ बनाम भाजपा का बढ़ता संगठन। यहां लड़ाई सिर्फ वोट की नहीं, नैरेटिव की है। कौन कहानी गढ़ेगा, कौन जनता को अपने शब्दों में बांधेगा; यही असली जंग है।
इन नतीजों की गूंज दिल्ली तक जाएगी। अगर दक्षिण में प्रदर्शन कमजोर रहा, तो 2026 का परिसीमन मुद्दा बारूद बन सकता है। दक्षिणी राज्य पहले ही जनसंख्या नियंत्रण के कारण प्रतिनिधित्व घटने के डर से बेचैन हैं। उत्तर और दक्षिण के बीच खाई और चौड़ी हो सकती है।
साथ ही, उत्तराधिकार का सवाल भी धीरे-धीरे सिर उठा रहा है। मोदी के बाद कौन? अगर नतीजे उम्मीद से कम रहे, तो क्षेत्रीय नेताओं के पंख लग सकते हैं। गठबंधन सहयोगी: जैसे टीडीपी, जेडीयू, अपनी शर्तों पर ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ थोप सकते हैं। इससे सुधारों की रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है।
तो क्या मोदी युग ढलान पर है? शायद नहीं। लेकिन यह जरूर है कि यह अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। इसने भारतीय राज्य को दृश्यमान बनाया, प्रभावी बनाया, वैचारिक धार दी। अब चुनौती है; इस केंद्रीकृत ताकत को एक बहुध्रुवीय भारत में कैसे संतुलित किया जाए।
गति भी चाहिए, सहमति भी। रफ्तार भी जरूरी, रिश्ते भी।
4 मई सिर्फ तारीख नहीं है। यह एक संकेत है। यह बताएगा कि मोदी लहर अब भी समंदर की ज्वार है, या किनारों में सिमटती धारा बन रही है। देश की राजनीति की दिशा और दशा, दोनों इसी मोड़ पर टिके हैं।
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