शादी का नया रंगमंच: पहले बस में बारात, अब कारों की कतार
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प्यार का परचम या पैकेज की परेड?
लव मैरिज बनाम मैरिज ऑफ कन्वीनियंस
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बृज खंडेलवाल की हल्की-फुल्की पड़ताल
16 मार्च 2026
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कभी मोहब्बत बगावत हुआ करती थी। घर से लड़ाई। समाज से टकराव।फिल्मी अंदाज़ में ; “प्यार किया तो डरना क्या!”
लड़का-लड़की भाग कर शादी कर लेते थे। कोर्ट में दो गवाह। या आर्य समाज मंदिर में सात फेरे।
ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस दिल की जिद।
मां-बाप सालों तक रूठे रहते। मोहल्ले में कानाफूसी चलती रहती।
पर इश्क में एक आग होती थी। एक दीवानगी।
अब तस्वीर बदल गई है।
ऑफिस में साथ काम। कॉफी डेट। वीकेंड ट्रिप। इंस्टाग्राम स्टोरी।
धीरे-धीरे इश्क भी “पैकेज” बन गया।
दोनों की अच्छी तनख्वाह। स्मार्ट लाइफस्टाइल।
जाति-भाषा की दीवारें भी कहीं-कहीं ढहती नजर आती हैं।
देखने में लगता है , मोहब्बत ने समाज को मात दे दी।
पर असली ट्विस्ट शादी के दिन आता है।
फिर वही पुरानी पटकथा।
बैंड-बाजा। डेस्टिनेशन वेडिंग।
डांस, दारू, डीजे, ड्रोन कैमरा।
दहेज नहीं तो “गिफ्ट्स” सही।
लेन-देन नहीं तो “कस्टम” सही।
गहने-जेवर, दिखावा, रस्मों की लंबी फेहरिस्त।
जो कभी समाज से बगावत करते थे,
आज वही समाज के सबसे आज्ञाकारी छात्र बन जाते हैं।
मोहब्बत की क्रांति…शादी के मंडप में परंपरा के सामने घुटने टेक देती है।
कहने को लव मैरिज। असल में “मैरिज ऑफ कन्वीनियंस”।
पहले परिवार हुक्म देता था, बच्चे मानते थे। अब बच्चे फैसला करते हैं, परिवार ताली बजाता है।
फर्क बस इतना है : पहले इश्क में आग थी। आज इश्क में इवेंट मैनेजमेंट है।
और मोहब्बत…कभी-कभी बस एक खूबसूरत बहाना लगती है।
भारत में शादी कभी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं रही।
यह पूरा मेला हुआ करती थी। गाँव का। मोहल्ले का। रिश्तों का।
आज भी मेला है। लेकिन रंग बदल गए हैं। ढोल वही है, बस उसकी तान बदल गई है।
पुरानी शादी और आज की शादी में सचमुच जमीन-आसमान का फर्क है।
जैसा बुजुर्ग कहते थे ; “समय बड़ा बलवान।” समय के साथ शादियों ने भी अपना रंग बदल लिया।
पहले बारात निकलती थी तो एक बस ही काफी होती थी। बस क्या , चलता-फिरता घर। सीटों पर लोग। गैलरी में लोग। कभी-कभी तो छत पर भी लोग।
बुजुर्ग मज़ाक में कहते , “अरे भाई, जितने लोग बस में आ जाएँ, उतने ही सच्चे रिश्तेदार!”
रास्ते भर नाश्ता चलता। अंताक्षरी के दौर। कभी फूफाजी रूठ जाते। कभी पंडितजी देर से पहुँचते।
दूल्हे के लिए अलग से एक छोटी कार होती थी। वही सबसे बड़ी शान। बाकी पूरी बस रिश्तेदारी और दोस्ती का प्रतीक लगती थी। जैसे कोई फिल्मी गीत बज रहा हो ; “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे…”
बारात धर्मशाला या बगीची में रुकती थी। पूरा कुटुंब आवभगत में लग जाता। गीत गाए जाते। गालियाँ भी बजतीं : वही देसी रस्म वाली।
कहीं ताश की बाज़ी। कहीं भांग-ठंडाई का दौर। और फिर उन किस्सों को सालों तक सुनाया जाता।
अब तस्वीर उलट गई है।
बस का जमाना गया। अब कारों की कतार लगती है। एक ही रंग की गाड़ियाँ। दूल्हे की कार सबसे चमकीली। कहीं-कहीं तो हेलीकॉप्टर एंट्री भी। फोटोग्राफरों का अलग उत्साह। हर पल कैद होना चाहिए।
जैसे शादी नहीं, लाइव फिल्म की शूटिंग हो रही हो।
सजावट का भी नया खेल है।
पहले गाड़ियों पर खर्च कम होता था।
अब हालत यह है कि गाड़ी से ज्यादा खर्च उसकी सजावट पर हो जाता है।
फूल, लाइट, रिबन, थीम।
ऐसा लगता है जैसे कार नहीं,
चलती-फिरती फूलों की दुकान हो।
किसी ने सही कहा है ; “आजकल शादी रिश्तों से कम, इवेंट मैनेजमेंट से ज्यादा चलती है।”
पहले जमाना सीधा था। दूल्हा दुल्हन को पहली बार सुहागरात को ही देखता था। फिल्मी अंदाज़ में ; “पर्दा है पर्दा…” अब कहानी बदल गई है। पहले मुलाकात। फिर डेट। फिर प्री-वेडिंग शूट। पहाड़ों पर फोटो। झील के किनारे वीडियो। ड्रोन कैमरा ऊपर उड़ रहा है। और बैकग्राउंड में गाना बज रहा है ; “तुम ही हो…”
लाखों रुपये तस्वीरों और वीडियो पर खर्च। कभी-कभी लोग मजाक में कहते हैं : “शादी बाद में होती है, फिल्म पहले बन जाती है।”
पहले शादी में बैंड बाजा होता था।लाल यूनिफॉर्म वाले बैंड वाले। ट्रम्पेट, ढोल, नगाड़ा। और वही अमर गीत : “आज मेरे यार की शादी है…” या “बहारों फूल बरसाओ…”
बुजुर्ग, बच्चे, सब नाचते थे। किसी को स्टेप नहीं आते थे। फिर भी दिल से नाचते थे।
आज डीजे का जमाना है। लाइट, स्मोक, डांस फ्लोर। डीजे शायद सस्ता हो। लेकिन उसके लिए जो डीजे ज़ोन बनता है, वह अक्सर जेब ढीली कर देता है।
खाने का भी रंग बदल गया है।पहले टेंट सादा होता था।चार बाँस, एक कपड़ा। हलवाई एक। मेनू छोटा। पूरी। आलू की सब्जी। रायता।जलेबी। लड्डू, बर्फी, और लोग उँगलियाँ चाटते हुए कहते: “वाह! मजा आ गया।”
आज शादी में खाने की पूरी प्रदर्शनी लगती है। चाइनीज काउंटर। इटालियन काउंटर। लाइव पिज्जा।चाट की दस किस्में। पचास अचार।चालीस तरह के पापड़। कभी-कभी मेहमान प्लेट लेकर घूमते रहते हैं।समझ ही नहीं आता : खाएँ क्या और छोड़ें क्या।
इतने बदलावों के बाद भी एक सवाल बचता है। क्या शादियाँ सच में ज्यादा खुशहाल हुई हैं? या बस ज्यादा महँगी हो गई हैं? पुराने लोग अक्सर कहते हैं : “पहले शादी में प्यार ज्यादा था, दिखावा कम।”
आज दिखावा ज्यादा है। पैसा पानी की तरह बहता है। कभी-कभी तो ऐसा भी सुनने को मिलता है कि शादी के खर्च से बाप की कमर टूट जाती है।और ऊपर से समाज का दबाव अलग।
फिल्मी अंदाज़ में कोई कह दे ; “आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है…” पर असली सवाल यह है ; क्या दिल में सुकून भी है?
आखिर में, समय बदलता है।रीति-रिवाज भी बदलते हैं। पर एक चीज़ नहीं बदलनी चाहिए रिश्तों की सादगी और सच्चाई।
क्योंकि शादी का असली अर्थ है, दो दिलों का मिलन। बाकी सब तो बस
लाइट, कैमरा और एक्शन है।
इसलिए शादी कैसी भी हो , बस इतनी हो कि खुशियाँ रहें, कर्ज नहीं।
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