Tuesday, March 10, 2026

 दुश्मन कैसे बढ़ाएँ, दोस्त कैसे खोएँ ,  ट्रंप से सीखिए

क्या ईरान बनेगा ट्रम्प का वाटरलू?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 मार्च 2026

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क्या ईरान डोनाल्ड ट्रंप का वाटरलू बनेगा?

तारीख़ गवाह है कि इतिहास को ऐसे लम्हे बहुत पसंद आते हैं।

एक फैसला। एक जुआ। एक जंग।

और अचानक जो अजेय लगता था, वह भी कमजोर नज़र आने लगता है।

28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नाटकीय सैन्य कार्रवाई का हुक्म दिया: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी। सब कुछ बहुत तेज़ हुआ। खामोशी से। लेकिन धमाकेदार अंदाज़ में।

अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त फौजी कार्रवाई ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। मिसाइलें कमांड सेंटरों को चीरती हुई गुज़रीं। हवाई हमलों ने बेस और इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह किया। फिर सबसे बड़ा झटका आया। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई इन हमलों में मारे गए।

पूरा मध्य-पूर्व सांस रोके खड़ा था।

वॉशिंगटन में जश्न। तेहरान में गुस्सा और आग। देखते देखते जंग दूसरे हफ्ते में दाखिल हो गई।

व्हाइट हाउस ने इसे मजबूत लीडरशिप बताया। एक बहादुर कदम। ज़रूरी कार्रवाई। सरकार का दावा था कि इससे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कुचल जाएगा। शायद हुकूमत भी बदल जाए।

खुद ट्रम्प का लहजा भरोसे से भरा था। “ताकत के ज़रिए अमन,” उन्होंने कहा। उनका कहना था कि यह टकराव “बहुत जल्दी खत्म” हो सकता है।

लेकिन जंगें अक्सर राष्ट्रपति की टाइमलाइन नहीं मानतीं। खासतौर पर मध्य-पूर्व में।

बिना तालियों की जंग

अगर ट्रम्प को लगा था कि अमेरिका में जबरदस्त देशभक्ति की लहर उठेगी, तो ऐसा नहीं हुआ। माहौल कुछ और है। बेचैनी। शक।और  घबराहट।

सर्वे इस कहानी को साफ बताते हैं।

CNN/SSRS के सर्वे में

59% अमेरिकियों ने हमलों को गलत बताया। सिर्फ 41% ने समर्थन किया।

NPR/PBS/Marist के पोल में

56% लोग फौजी कार्रवाई के खिलाफ हैं। 44% इसके हक में।

Reuters/Ipsos का आंकड़ा और सख्त है। सिर्फ 27% लोग हमलों का समर्थन कर रहे हैं।

यह जोश नहीं है। यह हिचक है।

हमलों के बाद ट्रम्प की कुल लोकप्रियता भी गिरकर 40–45% के बीच आ गई है। इसे जबरदस्त समर्थन नहीं कहा जा सकता।

अमेरिका साफ-साफ बंटा हुआ है।

रिपब्लिकन पार्टी के करीब 84% लोग इस कार्रवाई के साथ हैं।

डेमोक्रेट्स में 86% लोग इसके खिलाफ हैं।

इंडिपेंडेंट मतदाता भी ज्यादातर विरोध में हैं।

कई सर्वे में 55–59% लोग जंग को बढ़ाने के खिलाफ दिखते हैं।

यह एकता नहीं है। यह गहरी ध्रुवीकरण की तस्वीर है। और बिना राष्ट्रीय एकता की जंग अक्सर सियासी दलदल बन जाती है।

झंडे के पीछे भीड़ नहीं

पहले की जंगों में जनता तुरंत साथ खड़ी हो जाती थी। 11 सितंबर के हमलों के बाद अफगानिस्तान युद्ध को 92% समर्थन मिला था। इराक युद्ध से पहले करीब 72% लोग समर्थन में थे।

आज?

मुश्किल से आधा देश साथ है। कई जगह इससे भी कम। न कोई राष्ट्रीय उबाल। न देशभक्ति की लहर। बस चिंता।

अमेरिकियों को पिछली मध्य-पूर्व की जंगें याद हैं। और उनका अंजाम भी।

एक और सवाल व्हाइट हाउस का पीछा कर रहा है। आख़िर असली प्लान क्या है?

कई सर्वे बताते हैं कि अमेरिकियों को लगता है कि साफ योजना ही नहीं है।

क्या यह सीमित हमला है? क्या यह सरकार बदलने की कोशिश है? या फिर एक और अंतहीन जंग की शुरुआत?

वॉशिंगटन अभी तक भरोसे से जवाब नहीं दे पाया है। और अनिश्चितता डर को जन्म देती है।

एक और मसला संवैधानिक है। कांग्रेस ने इस हमले को मंजूरी नहीं दी थी। यह बात अहम है।

सर्वे बताते हैं कि 59% अमेरिकी मानते हैं कि फौजी कार्रवाई के लिए कांग्रेस की अनुमति जरूरी होनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि व्हाइट हाउस ने अकेले फैसला लिया।

हर जंग का एक अंधेरा पहलू होता है।

अब नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आ रही हैं। एक अमेरिकी हमले में ईरान के शहर मिनाब में एक लड़कियों का स्कूल भी निशाने पर आ गया, ऐसा बताया जा रहा है।

विदेशों में नाराज़गी बढ़ी है। और अमेरिका में भी असहज सवाल उठ रहे हैं। युद्ध कक्षों में लक्ष्य और नक्शे होते हैं। जमीन पर इंसान होते हैं।

सबसे दिलचस्प असर ट्रम्प के अपने समर्थक खेमे में दिख रहा है। कुछ प्रमुख कंज़र्वेटिव आवाज़ें भी बेचैन हैं।

टीवी होस्ट Tucker Carlson ने गहरे फौजी दखल से सावधान रहने की बात कही है। उन्हें डर है कि यह एक और अंतहीन जंग बन सकती है।

यहाँ तक कि Laura Ingraham ने भी प्रशासन से नागरिक मौतों पर ज्यादा ईमानदार जवाब मांगा है। दरारें छोटी हैं। लेकिन दिख रही हैं।

अमेरिकी राजधानी में सियासी जंग तेज़ है। रिपब्लिकन इसे जरूरी कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि ईरान परमाणु खतरा बन चुका था।

डेमोक्रेट्स की राय बिल्कुल अलग है।

वे इसे “चुनी हुई जंग” कहते हैं। एक खतरनाक बढ़ोतरी। बिना साफ वजह के शुरू हुआ संघर्ष। बहस तेज़ है।कड़वी है। और बहुत जानी-पहचानी भी। अमेरिका यह बहस पहले भी देख चुका है।

वॉशिंगटन से बाहर भी माहौल उबल रहा है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस आग की तरह फैल रही है।

समर्थकों का कहना है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने कोई और रास्ता छोड़ा ही नहीं था।

विरोधियों का कहना है कि देश फिर से इराक वाली गलती दोहरा रहा है।

सच शायद हमेशा की तरह गोलियों और बमों के बीच कहीं दबा पड़ा है।

रणनीति से परे एक गहरा सवाल खड़ा है। जंग की कीमत क्या होती है? हर मिसाइल के साथ नतीजे आते हैं।अमेरिकी सैनिक खतरे में पड़ते हैं।ईरानी नागरिक तबाही झेलते हैं।पूरा इलाका अस्थिर हो जाता है। बमबारी शायद ही कभी नफरत खत्म करती है। अक्सर वह अगली जंग के बीज बो देती है। इतिहास इस बात का बेरहम गवाह है।

ट्रम्प के लिए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी एक बड़ा जुआ है। अगर ईरान जल्दी ढह गया, तो वह इसे ऐतिहासिक जीत बताएंगे। लेकिन अगर जंग लंबी खिंची, तो सियासी कीमत बहुत भारी हो सकती है। जंगों ने पहले भी राष्ट्रपतियों की कुर्सी हिलाई है। और इराक और अफगानिस्तान की परछाइयाँ अभी भी अमेरिका की यादों में जिंदा हैं।

इसलिए सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है। धीरे-धीरे। बेचैनी के साथ। क्या यह ट्रम्प की सबसे बड़ी जीत बनेगी? या वही पल जिसे इतिहास उनका वाटरलू कहेगा?

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