सिर्फ दौलत से सभ्यताएं नहीं बनतीं!
पेट्रोडॉलर का अभिशाप: जब तेल बन गया शक्ति, युद्ध और वैचारिक नफरत का स्रोत
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बृज खंडेलवाल द्वारा
6 मार्च 2026
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इतिहास कभी-कभी एक छोटे से वाल्व से ही पूरी दिशा बदल लेता है। मध्य पूर्व में वह वाल्व था—तेल।
१९७३ के तेल संकट ने दुनिया को झकझोर दिया। अरब देशों ने तेल पर प्रतिबंध (एम्बार्गो) लगा दिया, जिससे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ डगमगा गईं और खाड़ी के रेगिस्तानों में डॉलर की बाढ़ आने लगी; पेट्रोडॉलर की बाढ़।
१९७० के दशक से पहले खाड़ी के अधिकांश समाज सादगी भरे थे। ऊँटों की सवारी, व्यापार, मछली पकड़ना और धार्मिक यात्राएँ ही उनकी आजीविका के मुख्य साधन थे। तेल तो था, लेकिन उससे होने वाली आय सीमित थी। फिर १९७३ का संकट आया और सब कुछ बदल गया।
तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गईं। खाड़ी देशों में धन का सैलाब आ गया। उदाहरण के लिए, सऊदी अरब की वार्षिक तेल आय १९७० के शुरुआती वर्षों में कुछ अरब डॉलर थी, जो कुछ ही वर्षों में २० अरब डॉलर से अधिक हो गई। देश की जीडीपी १९७३ में लगभग १५ अरब डॉलर से बढ़कर १९८१ तक करीब १८४ अरब डॉलर पहुँच गई। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था, बल्कि एक आर्थिक जैकपॉट।
दुनिया में तेल का व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। इसलिए तेल खरीदने वाले देशों को पहले डॉलर जमा करने पड़ते थे। खाड़ी देशों के पास डॉलर के विशाल भंडार जमा हो गए। ये डॉलर फिर पश्चिमी बैंकों, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स और सबसे लाभदायक सौदों, खासकर हथियारों की खरीद, में वापस लौटने लगे।
अर्थशास्त्री इसे विनम्रता से पेट्रोडॉलर चक्र कहते हैं, लेकिन हर चक्र की अपनी कीमत होती है।
तेल की दौलत से मालामाल खाड़ी के शासक दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदार बन गए। फाइटर जेट, मिसाइलें, टैंक, निगरानी प्रणालियाँ, जो भी पैसा खरीद सकता था, खरीदा गया। विडंबना यह कि छोटी आबादी वाले ये देश हथियारों के विशाल भंडार जमा करने लगे।
हाल के आंकड़ों के अनुसार, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देश वैश्विक हथियार आयात का लगभग २० प्रतिशत हिस्सा लेते हैं (२०२०-२४ के दौरान)। सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देश लंबे समय तक शीर्ष हथियार आयातकों में शामिल रहे।
लेकिन हथियार अक्सर अपना लक्ष्य खुद ढूंढ लेते हैं। मध्य पूर्व धीरे-धीरे लंबे संघर्षों का अखाड़ा बन गया; ईरान-इराक युद्ध, खाड़ी युद्ध, इराक युद्ध, कुवैत संकट, अफगानिस्तान, सीरिया का गृहयुद्ध और यमन का जारी संघर्ष। कई मामलों में पेट्रोडॉलर ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दोनों पक्षों को मजबूत किया।
तेल के पैसे से हथियार खरीदे गए।
हथियारों ने युद्ध भड़काए।
युद्धों ने तेल बाजार को अस्थिर किया।
तेल महंगा हुआ।
और फिर वही धन हथियारों में बह गया।
यह एक दर्दनाक चक्र था: तेल → हथियार → युद्ध → तेल।
जब यह क्षेत्र प्रॉक्सी युद्धों की आग में जल रहा था, उसी समय रेगिस्तान में चमक-दमक का एक नया नजारा उभर रहा था। दुबई जैसे शहर अरबपतियों के खेल का मैदान बन गए। रेत के टीले अब चमचमाते मॉल, कृत्रिम द्वीप और प्राइवेट जेटों से भरे हवाई अड्डों में बदल गए। बुर्ज खलीफा इस दौर का सबसे बड़ा प्रतीक है, यह सिर्फ इंजीनियरिंग का कमाल नहीं, बल्कि पेट्रो-दौलत का स्मारक है।
लेकिन इस चमक के पीछे कड़वी हकीकत भी थी। इन गगनचुंबी इमारतों को बनाने वाले हजारों प्रवासी मजदूर तंग शिविरों में रहते थे, जबकि महल और विलासिता बढ़ती जा रही थी। खाड़ी देशों में मानव विकास के कई संकेतक अच्छे हैं, लेकिन धन का वितरण बेहद असमान है, ज्यादातर संपत्ति शाही परिवारों और सत्ता संरचनाओं में केंद्रित है।
तेल ने समृद्धि तो दी, लेकिन न्याय अपने आप नहीं आया।
इससे भी अधिक चिंताजनक था वैचारिक प्रभाव। १९७० के दशक से अरबों पेट्रोडॉलर एशिया, अफ्रीका और यूरोप में धार्मिक संस्थानों में बहने लगे। कई जगहों पर इस्लाम की सख्त और कट्टर व्याख्याएँ फैलीं। धर्म, जो कभी आध्यात्मिक सहारा था, धीरे-धीरे भू-राजनीतिक हथियार बन गया। अल-कायदा जैसे चरमपंथी संगठनों को वैचारिक आधार मिला।
दूसरी ओर, ईरान ने भी अपने तेल राजस्व का उपयोग हिज्बुल्लाह, हमास जैसे समूहों को समर्थन देने में किया। इस तरह पेट्रोडॉलर आर्थिक मुद्रा से वैचारिक मुद्रा में बदल गया।
सबसे बड़ी विडंबना बौद्धिक और वैज्ञानिक विकास की है। इतनी अपार दौलत के बावजूद तेल-समृद्ध देशों का वैश्विक वैज्ञानिक शोध में योगदान बहुत कम है। पेटेंट और नोबेल पुरस्कार दुर्लभ हैं।
इसकी तुलना उन देशों से करें जिनके पास तेल नहीं था, लेकिन शिक्षा में निवेश किया, जैसे दक्षिण कोरिया और जापान। आज उनकी प्रयोगशालाएँ हजारों आविष्कार कर रही हैं।
खाड़ी में तेल ने इमारतें तेजी से खड़ी कीं, लेकिन विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय उसी गति से नहीं बने। ऊँटों की दौड़ को भरपूर फंडिंग मिली, लेकिन वैज्ञानिक ढांचा खड़ा करना चुनौतीपूर्ण रहा। दौलत ने स्थानीय प्रतिभा विकसित करने के बजाय विदेशी विशेषज्ञ खरीदना आसान बना दिया।
आर्थिक समृद्धि राजनीतिक खुलापन भी नहीं ला सकी। कई खाड़ी राजतंत्र आज भी दुनिया के सबसे कम राजनीतिक स्वतंत्र समाजों में गिने जाते हैं। प्रेस की आजादी सीमित है और असहमति को बर्दाश्त नहीं किया जाता।
महिलाओं के अधिकारों में सुधार आया है, सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग और सार्वजनिक जीवन में अधिक भागीदारी मिली, लेकिन संरचनात्मक असमानताएँ बनी हुई हैं।
यह विरोधाभास है: दुनिया के सबसे अमीर देश, लेकिन राजनीतिक रूप से सबसे कम बहुलतावादी।
तेल की दौलत ने एक नाजुक सामाजिक समझौता बनाया, सरकारें उदार सब्सिडी और खर्च देती हैं, बदले में राजनीतिक भागीदारी सीमित रहती है।
अर्थशास्त्री इसे रिसोर्स कर्स (संसाधन अभिशाप) कहते हैं। प्राकृतिक संसाधनों से अचानक आसान धन आने पर सरकारें संस्थानों, नवाचार और जवाबदेही को अनदेखा कर देती हैं। मध्य पूर्व का पेट्रोडॉलर दौर इसका जीता-जागता उदाहरण है।
अब वही देश इस जाल से निकलने की कोशिश कर रहे हैं जो इस बात का संकेत हैं कि तेल का युग हमेशा नहीं रहेगा। ये देश खुद को विविधीकृत अर्थव्यवस्था में ढालने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
पिछले पचास वर्षों में पेट्रोडॉलर ने चमकदार शहर बनाए, हथियारों के भंडार खड़े किए और भू-राजनीतिक प्रभाव पैदा किया। लेकिन उसी ने युद्धों को हवा दी, चरमपंथ को फंड किया और सुधारों को टाला।
तेल ने रेगिस्तान को दौलत का साम्राज्य बना दिया। मगर सिर्फ दौलत से सभ्यताएँ नहीं बनतीं।
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