Friday, March 13, 2026


बुढ़ऊ शेर की दहाड़: क्या संयुक्त राष्ट्र सिर्फ एक टूटता सपना है?


· बृज खंडेलवाल

· 14 मार्च 2026


दूसरे विश्व युद्ध की राख से एक महान सपने ने जन्म लिया था। 1945 में, जब दुनिया थक हार चुकी थी, शहर खंडहर में तब्दील हो चुके थे, और करोड़ों लोग मौत के मुंह में समा चुके थे, तब मानवता ने प्रण किया: अब ऐसा कभी नहीं होगा। इसी संकल्प से संयुक्त राष्ट्र (UN) का उदय हुआ। सपना साफ था - शक्तिशाली देश मिलकर काम करेंगे, झगड़े बातचीत से सुलझेंगे, और उपनिवेशों से मुक्त हुए नए देशों को भी एक मंच मिलेगा जहां ताकत नहीं, इंसाफ की बात होगी।


आज, अस्सी साल बाद, वह सपना बुरी तरह चरमरा गया है। संयुक्त राष्ट्र अक्सर एक मूक दर्शक की तरह नजर आता है। दुनिया के कोने-कोने में युद्ध धधक रहे हैं, आतंकवाद फैल रहा है, और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने एक बार फिर दुनिया को दो खेमों में बांटने की कोशिश की है। जिस संस्था को शांति का संवाहक बनना था, वह आज लाचार और बेबस दिखती है। बैठकें होती हैं, भाषण दिए जाते हैं, प्रस्ताव पारित होते हैं, लेकिन अमन कायम नहीं हो पाता।


इस विफलता की सबसे बड़ी वजह है संयुक्त राष्ट्र की अपनी ही बनाई व्यवस्था में छिपा एक जहर - वीटो पावर। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) इस अधिकार से लैस हैं। सिर्फ एक 'नहीं' से वे दुनिया की बहुमत की आवाज को दबा सकते हैं। 1946 से अब तक लगभग 300 बार इस वीटो का इस्तेमाल हो चुका है। जहां भी किसी बड़ी ताकत का रणनीतिक हित जुड़ा होता है, वहां संयुक्त राष्ट्र बहस का अखाड़ा बनकर रह जाता है और फैसले गायब हो जाते हैं।


इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण हाल में पारित सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2817 है। 11 मार्च 2026 को ईरान के हमलों की निंदा करने वाला यह प्रस्ताव 134 देशों के समर्थन से पारित हुआ। लेकिन आलोचकों ने तुरंत सवाल उठाया कि इस प्रस्ताव में उस घटना का जिक्र तक नहीं था जो इस टकराव की असली वजह थी - 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरानी ठिकानों पर किए गए हमले। फिर वही कहानी: आधी सच्चाई, चुनिंदा गुस्सा, और संयुक्त राष्ट्र की साख पर एक और धब्बा।


अमेरिका ने कई बार साफ किया है कि जहां उसके राष्ट्रीय हित दांव पर हों, वहां अंतरराष्ट्रीय सहमति की उसे परवाह नहीं। 2003 में इराक पर हमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना ही किया गया। गाजा युद्ध के दौरान भी यही हुआ। अक्टूबर 2023 से सितंबर 2025 के बीच अमेरिका ने कम से कम छह युद्धविराम प्रस्तावों पर वीटो लगा दिया, जबकि महासभा में 153 देशों ने मानवीय संघर्षविराम की मांग की थी। लेकिन जिम्मेदारी सिर्फ अमेरिका की नहीं। रूस ने सीरिया पर रासायनिक हमलों की जांच के प्रस्तावों को बार-बार वीटो किया। 2022 में उसने यूक्रेन पर हमले के बाद अपनी ही निंदा वाले प्रस्ताव को वीटो कर दिया। हमलावर भी वही और फैसला करने वाला भी वही।


इतिहास इस बेबसी की दर्दनाक गवाही देता है। रवांडा 1994: सिर्फ सौ दिनों में आठ लाख लोग मारे गए, और सुरक्षा परिषद ने शांति सेना को बढ़ाने के बजाय और घटा दिया। स्रेब्रेनित्सा 1995: संयुक्त राष्ट्र के 'सुरक्षित क्षेत्र' में आठ हजार बोस्नियाई मुसलमानों का नरसंहार हुआ, और डच शांति सैनिक बेबस देखते रहे। सीरिया में रासायनिक हमले हुए, शहर भूखे मरे, लेकिन हर बार वीटो की दीवार इंसाफ के रास्ते में रोड़ा बनी रही।


छोटे और मध्यम देशों के लिए यह एक गहरी निराशा है। वे जिस संस्था को अपना सुरक्षा कवच समझते थे, वह आज बड़ी ताकतों की राजनीतिक बाजीगरी का अखाड़ा बनकर रह गई है। सामूहिक सुरक्षा का सपना चुनिंदा न्याय में तब्दील हो गया है।


यह सच है कि संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह बेकार नहीं है। यूनिसेफ, विश्व खाद्य कार्यक्रम, WHO जैसी उसकी एजेंसियां आज भी करोड़ों लोगों की जान बचा रही हैं, उन्हें राहत पहुंचा रही हैं। लेकिन जिस मूल उद्देश्य के लिए उसे बनाया गया था - युद्ध रोकना और शांति कायम करना - उसमें वह बुरी तरह विफल रहा है।


यही इसकी सबसे बड़ी त्रासदी है। एक संस्था की नाकामी भर नहीं, बल्कि एक सपने का धीरे-धीरे मर जाना। आज जब दुनिया फिर से शीत युद्ध जैसे ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है, नए-नए संघर्ष पनप रहे हैं, और हाइब्रिड युद्धों ने हालात को और जटिल बना दिया है, संयुक्त राष्ट्र एक थके-हारे बूढ़े चौकीदार की तरह खड़ा है। वह गरजता है - प्रस्तावों में, बयानों में, बैठकों में - लेकिन जब असली कार्रवाई की बारी आती है, खासकर किसी बड़ी ताकत के खिलाफ, तो उसकी दहाड़ फुसफुसाहट में बदल जाती है।


अब सवाल यह है: क्या संयुक्त राष्ट्र खुद को बदल पाएगा? क्या सुरक्षा परिषद में सुधार होगा? क्या वीटो की ताकत पर लगाम लगेगी? अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह संस्था एक खूबसूरत निशानी बनकर रह जाएगी - एक नेक इरादे की, जिसे दुनिया ने मिलकर देखा तो था, लेकिन पूरा कभी नहीं कर सकी। बुढ़ऊ शेर अब शायद सिर्फ दहाड़ता ही रह जाए।

No comments:

Post a Comment