Tuesday, March 24, 2026

 ज़िंदगी की साँसों पर टिकी नदियाँ: सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम, बिखरी बेपरवाही खत्म करो

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 मार्च 2026

__________________________

क्या हमारी नदियाँ अब सिर्फ नक्शों में बचेंगी? या फिर हम उन्हें सच में “राष्ट्रीय संपत्ति” मानकर बचाने की जद्दोजहद करेंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि भारत की नदियाँ “राष्ट्रीय संपत्ति” हैं। यह कोई मामूली बयान नहीं था। यह एक जोरदार चेतावनी थी। एक अलार्म। मगर अफसोस, यह अलार्म भी हमारी सियासी और प्रशासनिक बेपरवाही की दीवारों से टकराकर खामोश हो गया।

सच तो यह है कि जो बात अदालत ने कही, वह हर आम आदमी पहले से जानता है: हमारी नदियाँ अब जीवनदायिनी नहीं, गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं।

हिमालय की गोद से निकलने वाली पवित्र धाराएँ हों या दक्षिण के मैदानों में बहती नदियाँ, हर जगह एक ही कहानी है। जहरीले औद्योगिक कचरे का हमला। शहरों की सीवेज का सैलाब। और ऊपर से हुकूमतों की नाकामी।

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर यमुना नदी पर फोकस किया। दिल्ली, नोएडा और गाज़ियाबाद से निकलने वाला बिना ट्रीट हुआ कचरा सीधे यमुना में गिर रहा है। यह एक तरह का “गंदगी का फेडरलिज़्म” है, जहाँ हर राज्य और हर एजेंसी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ती है, और नदी धीरे-धीरे मरती जाती है।


आज की यमुना नदी नहीं, एक जिंदा इल्ज़ाम है, हमारी शहरी प्लानिंग पर, हमारी नीयत पर, हमारी नाकामी पर।

दिल्ली में यमुना के पानी में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 92,000 तक पहुँच चुका है, जो तय सीमा से करीब 40 गुना ज्यादा है। यह साफ इशारा है कि नदी में कच्चा सीवेज बेहिसाब बहाया जा रहा है।

बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी BOD 70 mg/L तक पहुँच गई है, जबकि 3 mg/L से ऊपर जलीय जीवन खत्म होने लगता है। यानी यमुना अब एक बहती हुई कब्रगाह बन चुकी है, जहाँ पानी है, मगर जिंदगी नहीं।

ब्रज क्षेत्र, मथुरा और वृंदावन, जहाँ कभी कृष्ण की श्यामल सखी बहती थी, अब काले, गाढ़े कीचड़ में बदल चुकी है। हवा में मीथेन की सड़ी बदबू है। श्रद्धा भी जैसे शर्मिंदा हो गई हो।

आगरा में ताजमहल खड़ा है, खामोश, मगर सब कुछ देखता हुआ। कभी यमुना उसकी खूबसूरती को दोगुना करती थी। आज वही नदी उसकी बदहाली का आईना बन गई है।

हजारों करोड़ रुपये यमुना एक्शन प्लान पर खर्च हुए। मगर नतीजा? सिफर। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या पुराने और बेअसर। सिर्फ दिल्ली से रोज़ करीब 28 मिलियन गैलन गंदा पानी बिना साफ हुए यमुना में बहा दिया जाता है।

यमुना की बदहाली दरअसल पूरे देश का आईना है।

गंगा, जिसे मां कहा जाता है, आज भी झाग और गंदगी से जूझ रही है। “नमामि गंगे” जैसे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी ज़मीन पर बिखरे हुए नजर आते हैं। वाराणसी के घाटों पर झाग तैरता है, और यह झाग सिर्फ पानी में नहीं, हमारी नीतियों में भी है।

दक्षिण भारत में गोदावरी और कृष्णा नदियाँ औद्योगिक कचरे से जूझ रही हैं। कई जगह “डेड ज़ोन” बन चुके हैं, जहाँ पानी है, मगर जीवन नहीं।

कावेरी नदी, जो कभी सभ्यताओं की जननी थी, आज बेंगलुरु के सीवेज का बोझ ढो रही है।

मसला साफ है, जिम्मेदारी बंटी हुई है, मगर समस्या साझा है।

प्रदूषण सरहदें नहीं देखता। गाज़ियाबाद की गंदगी आगरा के खेतों तक पहुँचती है। हरियाणा का औद्योगिक कचरा दिल्ली के भूजल को जहरीला करता है।

फिर भी हमारी सरकारें अपने-अपने दायरे में सिमटी रहती हैं, जैसे नदी नहीं, कोई सियासी इलाका हो।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम

सुप्रीम कोर्ट ने इस बिखरी हुई व्यवस्था पर सीधा वार किया है। अदालत ने कहा कि जब बहुत सारी एजेंसियाँ होती हैं, तो जवाबदेही खो जाती है।

कोर्ट ने CPCB को निर्देश दिया है कि हर जिम्मेदार संस्था की पहचान करे। हरियाणा सरकार से भी रिपोर्ट मांगी गई है। मकसद साफ है, अब कोई बच नहीं पाएगा।

संदेश बिल्कुल साफ है:

नदियाँ साझा धरोहर हैं। अगर एक राज्य अपनी गंदगी नहीं रोकता, तो वह दूसरे राज्य के खिलाफ पर्यावरणी जुल्म करता है।

अब “तू-तू, मैं-मैं” का वक्त खत्म होना चाहिए। आगे रास्ता क्या है?

अगर नदियों को सच में बचाना है, तो इरादे मजबूत करने होंगे।

सबसे पहले, 2030 तक यह सुनिश्चित करना होगा कि एक बूंद भी बिना ट्रीट हुआ कचरा नदी में न जाए। इसके लिए आधुनिक और पारदर्शी सिस्टम चाहिए, जहाँ हर डिस्चार्ज पर नजर हो।

एक मजबूत नेशनल रिवर अथॉरिटी बनानी होगी, जिसके पास सख्त कानूनी ताकत हो। जो अफसर काम न करें, उन पर भारी जुर्माना लगे, चाहे वह कमिश्नर हों या मुख्यमंत्री।

नदियों के किनारों को अतिक्रमण से बचाना होगा। नदी को सांस लेने के लिए उसका फ्लडप्लेन चाहिए। मगर आज वहां या तो झुग्गियाँ हैं या आलीशान इमारतें। यह सिलसिला रोकना होगा।

सालों से जमी गाद को हटाने के लिए बड़े स्तर पर ड्रेजिंग अभियान चलाना होगा, ताकि नदी का प्राकृतिक बहाव वापस आ सके।

आखिरी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने रास्ता दिखा दिया है। अब गेंद सरकारों के पाले में है।

“राष्ट्रीय संपत्ति” का दर्जा सिर्फ एक कागज़ी एलान नहीं होना चाहिए। यह एक वादा होना चाहिए, भविष्य से, आने वाली पीढ़ियों से।

अगर हम अब भी नहीं चेते, तो हम सिर्फ अपनी विरासत नहीं खोएंगे, हम अपनी जिंदगी की बुनियाद खो देंगे।

यमुना की खामोश चीख सिर्फ एक नदी की नहीं, पूरे देश की आवाज़ है।

अब वक्त आ गया है, बहानों को दफन करने का, और नदियों को ज़िंदा करने का।


No comments:

Post a Comment