जिंदगी की टूटे न लड़ी
प्यार करले घड़ी दो घड़ी
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ज़हिलों की जिद्द से मची है तबाही!
हारी हुई जंग या जिंदगी की जीत?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
18 मार्च 2026
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ईरान कितने दिन टिकेगा?
पंद्रह दिन? एक महीना? या लंबी, थकी हुई सांसों में खिंचता हुआ सालों का सिलसिला? जैसे हरीश राणा।
सवाल सीधा है। जवाब उलझा हुआ।क्योंकि मुल्क ताश के पत्ते नहीं होते।हवा चली और ढह गए, इतनी सस्ती नहीं होती सभ्यताएं।
मिट्टी में सदियों का इतिहास गड़ा होता है। रगों में जिद दौड़ती है। दिल में डर भी पलता है। और सबसे ऊपर, इंसान होते हैं। वही, जो हर बार कुचले जाते हैं।
तोपें गरजती हैं। स्टूडियो दहाड़ते हैं।नक्शों पर तीर चलते हैं। एंकरों की आवाज़ में बारूद घुला होता है।
पर असली कहानी?
वह अस्पताल के बाहर रोती माँ लिखती है। वह मलबे में दबा बच्चा चीखकर सुनाता है।
हम पूछते हैं: ईरान क्यों लड़ रहा है?
सुरक्षा? सत्ता? या सिर्फ इसलिए कि अब पीछे हटना “हार” कहलाएगा?
सच कड़वा है। जंग तर्क से कम, अहंकार से ज्यादा चलती है।
दूसरी तरफ देखिए।
अमेरिका। इजराइल। ताकत। तकनीक। रणनीति। एक चलता हुआ बुलडोज़र, जिसे दुनिया “सुपरपावर” कहती है। नैतिकता जीरो।
कहना आसान है: “कुचल देंगे।” लेकिन इतिहास हल्की मुस्कान देता है। अफगानिस्तान याद है? इराक याद है?
आंकड़े झूठ नहीं बोलते।
2001 से 2023 तक, अफगानिस्तान, इराक और 9/11 के बाद के युद्धों में 9 लाख 40 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। इनमें 4 लाख 32 हजार आम नागरिक। अप्रत्यक्ष मौतें? 36 से 38 लाख। कुल मिलाकर: 45 से 47 लाख जिंदगियां राख।
20 साल। 2.3 ट्रिलियन डॉलर।
और नतीजा? शांति अब भी लापता है। ताकत जमीन जीत लेती है। दिल नहीं जीत पाती।
फिर हम गुस्से में पूछते हैं; नेता क्या कर रहे हैं? किसके लिए लोग मर रहे हैं?
वालोडीमयर जिलेन्स्की हो या डोनाल्ड ट्रंप: नाम बदलते हैं, कहानी वही रहती है।
कुर्सी पर बैठा इंसान फैसला करता है।
जमीन पर खड़ा इंसान कीमत चुकाता है।
सीधी बात। कोई नेता। कोई विचारधारा। किसी आम आदमी की जान से बड़ी नहीं हो सकती। हिटलर हो या स्टालिन!
पर हम मानते नहीं। हम कहते हैं; “इज्जत का सवाल है।” “झुकेंगे नहीं।” “मर जाएंगे, पर हार नहीं मानेंगे।”
ठीक है। लड़िए। पर याद रखिए; गोली इज्जत नहीं देखती। वह सिर्फ जिस्म चीरती है। इतिहास खून से लिखा गया है।
कलिंगा वार के बाद अशोक को ज्ञान मिला। पर क्या हर बार पहले खून की नदी बहेगी, तब ही बुद्धि जागेगी?
यह कैसी अक्ल है? पहले घर जलाओ, फिर बुझाने की किताब पढ़ो।
दुनिया का सबसे बड़ा झूठ क्या है? “यह आखिरी जंग होगी।” नहीं होती।हर जंग, अगली जंग को जन्म देती है।बीच में क्या होता है? बचपन टूटता है।घर उजड़ते हैं। भविष्य राख बन जाता है।
तो रास्ता क्या है?
समझौता। बातचीत। थोड़ा झुकना।
कड़वा है। पर जंग से कम कड़वा।
यहीं याद आते हैं महात्मा गांधी।
न हथियार। न सेना। फिर भी साम्राज्य झुका दिया। सत्याग्रह से। नैतिक ताकत से। उनकी चेतावनी आज भी गूंजती है : “आँख के बदले आँख, पूरी दुनिया को अंधा कर देगी।”
फिर मार्टिन लूथर किंग जूनियर।उन्होंने कहा: युद्ध समस्या का हल नहीं, उसका विस्तार है।
और नेल्सन मंडेला। 27 साल जेल में रहे। बाहर आए, तो बदला नहीं, मेल-मिलाप चुना। कहा, नफरत राष्ट्र तोड़ती है, माफी राष्ट्र बनाती है।
यही असली बहादुरी है। बंदूक उठाना आसान है। हाथ बढ़ाना मुश्किल। क्या हासिल किया भारत के नक्सलियों ने?
सच साफ है: जिंदगी बची रहे, तो सब फिर खड़ा हो सकता है। देश भी। इज्जत भी। विचार भी।
पर कब्र से कोई राष्ट्र नहीं उठता।कड़वा सच सुनिए; जंग बहादुरी नहीं होती। अक्सर बेबसी की आखिरी चीख होती है।
और जिंदगी? वह सिर्फ एक बार मिलती है।
“जिंदगी न मिले दोबारा”, यह फिल्मी लाइन नहीं, चेतावनी है। फिर भी हम वही गलती दोहराते हैं।
स्कूलों पर बम गिरते हैं। अस्पताल जलते हैं। इंसानियत दम तोड़ती है।न इधर वाले पूरी तरह सही। न उधर वाले। बीच में सिर्फ ताकत और दौलत का खेल।
कहां हैं दुनिया के ivory tower के ज्ञानी? कहां हैं शांति के दूत? क्यों नहीं उठती आवाज? नोबेल शांति पुरस्कार… सिर्फ एक तमगा रह गया है क्या?
और सच्चाई? मूर्ख नेतृत्व। पत्थर युग की सोच। 21वीं सदी में भी वही खून-खराबा। यूक्रेन हो या ईरान, मरता आम आदमी है। उजड़ता उसका घर है। जलता उसका भविष्य है।
आखिर हासिल क्या?
अगर हर समस्या का हल युद्ध है: तो फिर यह विकास कैसा? यह सभ्यता कैसी?
इतिहास बार-बार फुसफुसाता है, जिद नहीं, समझदारी जीतती है।
अब फैसला हमारे सामने है। जंग की जिद? या जिंदगी की जीत?
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