भारत का शोर उत्सव:
जब हर जश्न लाउडस्पीकर बन जाता है!
_________________________
बृज खंडेलवाल द्वारा
7 मार्च 2026
_________________________
भारत में एक चीज़ बहुत तेजी से विलुप्त हो रही है, खामोशी।
जैसे जंगलों से बाघ गायब होते हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा।
यह देश त्योहारों का है, रस्मों का है, जुलूसों का है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ है, अखंड और असीम शोर।
शादी हो तो ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्मांड नाचने बुलाया गया हो। घोड़ी पर बैठा दूल्हा, पीछे डीजे का ट्रक।बॉलीवुड के रीमिक्स 100 डेसिबल पर चीखते हुए। दूल्हे से ज्यादा थके हुए घोड़े के कान।
अजीब विडंबना है।
शादी प्यार का उत्सव है, लेकिन संगीत ऐसा कि दिल नहीं, कान फट जाएं।
और अगर आप सोचते हैं कि शोर सिर्फ खुशी का हिस्सा है, तो श्मशान घाट का चक्कर लगा लीजिए। अब तो उठावनी से भी शांति गायब हो चुकी है, प्रवचन बाज आ चुके हैं। वहाँ भी लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे।
मृत्यु, जो कभी शांत, गंभीर और चिंतन का क्षण हुआ करती थी, अब एम्पलीफायर पर विदाई बन गई है।
भजन भी ऐसे बजते हैं जैसे स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने के लिए भगवान को जगाना पड़ रहा हो।
भारत का त्योहार कैलेंडर किसी ध्वनि विस्फोट का टाइम टेबल जैसा है।होली आती है, ढोल, डीजे, चीखती भीड़। घिसे पिटे फिल्मी गाने।
कई तरह की चतुर्थी, जयंती, भंडारे, रात्रि जागरण, जयकारे, मूर्ति विसर्जन, बेचारे मच्छर भी बिलबिला जाते हैं! सड़कों पर जुलूस, ढोल-ताशे और सबवूफर। पूजा होती है, कोलकाता की गलियाँ थरथराती हैं।दीवाली पर आसमान पटाखों से नहीं, डेसिबल से भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर त्योहार एक प्रतियोगिता हो रही है! कौन ज्यादा शोर मचा सकता है।
कागज पर नियम मौजूद हैं। 2000 के Noise Pollution Rules साफ कहते हैं कि रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की सीमा है। अस्पतालों और स्कूलों के पास तो इससे भी कम। लेकिन कागज की दुनिया और भारतीय सड़कों की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है।
दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक का औसत शोर 80 डेसिबल के आसपास रहता है। पीक आवर में यह 100 तक पहुंच जाता है। यानी हम रोज़ाना लगभग जेट इंजन की आवाज़ में जी रहे हैं। कोई प्रेशर हॉर्न बजाता है, कोई साइलेंसर निकलकर पूरी कॉलोनी के कई चक्कर लगाता है!
सवाल उठता है, हम इतने शोर-प्रिय क्यों हैं? इतिहास कुछ संकेत देता है।
प्राचीन भारत में युद्ध और विजय के समय शंख और नगाड़े बजते थे। ध्वनि को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
मान्यता थी कि तेज आवाज़ बुरी आत्माओं को दूर भगाती है और देवताओं का ध्यान आकर्षित करती है।
लेकिन आज का शोर आध्यात्मिक कम और सामाजिक प्रदर्शन ज्यादा है।
राजनीति ने इसे और बढ़ाया।
चुनावी रैलियाँ, माइक, स्पीकर, नारे, गाड़ियों के काफिले।
ऐसा लगता है लोकतंत्र की ताकत वोट में नहीं, लाउडस्पीकर में है।
धार्मिक मंच भी पीछे नहीं हैं।
हर उपदेशक के हाथ में माइक्रोफोन।
ज्ञान कम, वॉल्यूम ज्यादा।
टीवी डिबेट्स से लेकर मंदिर प्रवचन तक; एक ही नियम है: जो सबसे जोर से बोलेगा, वही जीतेगा।
फिर आया तकनीक का चमत्कार या आविष्कार, लाउडस्पीकर देव।
1920 के दशक में यह उपकरण थिएटर और सभाओं में स्पष्ट आवाज़ के लिए बना था। लेकिन भारत में यह सांस्कृतिक विस्फोटक साबित हुआ है। आजकल एक ही जगह पर सौ सौ decks लगाए जाते हैं, कोई चैन से न जीए।
आज हर मंदिर, हर मस्जिद, हर जुलूस, हर सभा, सबके पास अपनी ध्वनि सेना है। जहाँ पहले घंटी बजती थी, अब बास स्पीकर गूंजते हैं।
कभी-कभी लगता है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता भक्ति से नहीं, वॉट्स से होकर जाता है।
दुनिया के सबसे शोर भरे शहरों की सूची में भारतीय शहर नियमित रूप से जगह बनाते हैं।
लगातार शोर का असर गंभीर है; हाई ब्लड प्रेशर, नींद की कमी, मानसिक तनाव, सुनने की क्षमता का ह्रास।
हर साल हजारों लोग समय से पहले बहरे हो जाते हैं; कारण कोई वायरस नहीं, डेसिबल।
लेकिन शोर का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं। हिमालय की शांत घाटियाँ भी अब सुरक्षित नहीं रहीं।
त्योहारों और पर्यटन के मौसम में 90 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है।
पक्षी घोंसले छोड़ देते हैं।
जानवर जंगलों में भाग जाते हैं।
प्रकृति, जिसे हमने ध्यान और योग की भूमि कहा था, अब लाउडस्पीकर के बीच ध्यान करने की कोशिश कर रही है।
विडंबना देखिए।
ऋषियों की भूमि में योग शिविर भी माइक्रोफोन पर चलते हैं। कोचिंग क्लासेज भी ! प्राणायाम की गहरी सांसें भी स्पीकर से गूंजती हैं।
खामोशी, जो आध्यात्मिक अनुभव की आत्मा है, अब एलिट शौक समझी जाती है। सच्चाई शायद थोड़ी असहज है।
यह शोर हमारी सांस्कृतिक ऊर्जा जितना ही हमारी सामूहिक बेचैनी का संकेत भी है। एक ऐसा समाज जहाँ हर कोई सुना जाना चाहता है। जहाँ ध्यान पाने का सबसे आसान तरीका है, आवाज़ बढ़ा देना।
इसलिए हर मंच पर माइक है।
हर जुलूस में स्पीकर।
हर गली में डीजे।
लेकिन सवाल अभी भी वही है?
क्या भगवान सचमुच इतने दूर हैं कि उन्हें सुनाने के लिए हमें 100 डेसिबल चाहिए?
या हम अपनी ही खालीपन को आवाज़ से भरने की कोशिश कर रहे हैं?
भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, उसकी संस्कृति है, उसका उत्सव है।
लेकिन उत्सव का मतलब कोलाहल नहीं होना चाहिए।
कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान शोर नहीं, संयम होती है।
शायद समय आ गया है कि हम जश्न मनाना सीखें: बिना पड़ोसी के कान फाड़े। माइक थोड़ा कम।
ढोल थोड़ा धीमा। और शायद, बस शायद, भारत फिर से खामोशी की संगीत सुन सके।
No comments:
Post a Comment