Tuesday, March 24, 2026

 एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने उठाए गंभीर सवाल 

आगरा के भूले-बिसरे स्मारक दम तोड़ रहे हैं। जवाबदेह कौन?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मार्च 2026

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जब इतिहास चुपचाप मरता है; ईंट दर ईंट, मेहराब दर मेहराब, और उसके रखवाले आँखें मूँद लेते हैं, तो क्या होता है? 

दुनिया ताजमहल की शाश्वत चमक से मोहित जरूर होती है। लेकिन थोड़ा हटकर देखिए, थोड़ा अंदर जाइए। चमक छूट जाती है, क्रूर सच सामने आता है।  

यहाँ इतिहास नहीं चमकता, यह बिखरता है। टूटे गुंबद, झाड़ियों में दबे आंगन, धुंधली पड़ती भित्तिचित्र आखिरी साँसें गिन रहे हैं। यह आगरा का दूसरा चेहरा है, अनदेखा, अनकहा, अनसुना।

इस हफ्ते इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आखिरकार सख्त रुख अपनाया। उत्तर प्रदेश के आगरा, झांसी, वृंदावन, लखनऊ, हस्तिनापुर समेत कई शहरों में बिखरती विरासत पर स्वतः संज्ञान लिया और केंद्र व राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर आठ हफ्तों में जवाब माँगा।  

जो लोग इन गलियों से रोज गुजरते हैं, उनके लिए यह खबर नहीं, हकीकत है।  

आगरा किले और फतेहपुर सीकरी की भव्यता के पार एक खामोश कब्रिस्तान फैला है, स्मारकों का। सैकड़ों स्मारक भूले हुए, बेसहारा। न सुरक्षा, न सूचना पट्ट, न कोई संरक्षण योजना।  

विरासत संरक्षक डॉ. मुकुल पांड्या कहते हैं, “दारा शिकोह की खोई लाइब्रेरी हो या फतेहपुर सीकरी की मिटती शैल चित्रकला, बेगम समरू का बगीचा, सुल्तान परवेज का मकबरा, ताल फिरोज खान, चीनी का रौजा, हम्माम अलीवर्दी खान (छिप्पीतौला), जसवंत सिंह की छतरी, चौबुर्जी, बादशाही बाग (समुगरह), फतेहाबाद, यह महज उपेक्षा नहीं, यह इतिहास का दाह संस्कार है।”

एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने तस्वीर और साफ कर दी। उत्तर प्रदेश में 5400 से अधिक धरोहरें दर्ज हैं, लेकिन सुरक्षित सिर्फ 421. बाकी? भगवान भरोसे। अतिक्रमण बढ़ रहे हैं, बुलडोजर मंडरा रहे हैं, समय चुपचाप अपना काम कर रहा है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का आगरा सर्किल 265 संरक्षित स्मारकों की देखभाल करता है। आंकड़ा सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन हकीकत यह कि एक भी स्मारक पर पूरी तरह हेरिटेज बायलॉज लागू नहीं हैं। पंद्रह साल बीत गए, फाइलें घूमती रहीं, स्मारक गिरते रहे।  

सबसे चौंकाने वाली बात; सितंबर 2023 से अप्रैल 2025 तक एक भी नया अतिक्रमण दर्ज नहीं किया गया। क्या सचमुच कोई उल्लंघन नहीं हो रहा, या देखने वाला कोई नहीं? जमीन पर तस्वीर साफ है; अवैध निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं, संरक्षित क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, प्रशासन सोया हुआ है। यह लापरवाही नहीं, जिम्मेदारी से पलायन है।

कानून कहता है; संरक्षण करो। व्यवस्था कहती है; टालो, भूलो, छोड़ दो।  

उधर प्रकृति भी हमला बोल रही है। यमुना का प्रदूषण नींव खा रहा है, भूजल दीवारों को खोखला कर रहा है, बाढ़ इतिहास को चाट रही है। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान अदृश्य है।  

वृंदावन के प्राचीन मंदिर, पुरानी आगरा की हवेलियाँ, यमुना किनारे के घाट, सौ साल पुरानी कारवांसरायें, जिनमें कभी रेशम मार्ग के व्यापारी ठहरते थे, सभी सूची से बाहर हैं। वृंदावन में अकेले 48 प्राचीन घाट और कुंड संरक्षण की पुकार कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। यमुना किनारे की पूरी विरासत अतिक्रमण में दब गई, समय में खो गई, नजर और नीति से बाहर हो गई।

अब अदालत ने संस्कृति मंत्रालय, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण और राज्य सरकार से जवाब माँगा है। माँगें स्पष्ट हैं: पूरी धरोहर की सूची बनाओ, हर स्मारक के लिए बायलॉज तैयार करो, सख्ती से अमल करो, अलग स्टाफ नियुक्त करो और हेरिटेज बोर्ड गठित करो।  

ये कदम सुनने में साधारण लगते हैं, लेकिन वास्तव में बेहद जरूरी हैं। क्योंकि यह सिर्फ पत्थरों की बात नहीं; यह पहचान की, स्मृति की और शहर की आत्मा की बात है।

आगरा हर साल 80 लाख से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन ज्यादातर सिर्फ ताजमहल तक सीमित रहते हैं। कोई शहर एक पोस्टकार्ड पर नहीं जी सकता। राजस्थान देखिए, यूरोप देखिए, विरासत वहाँ रोजगार बनती है, पहचान बनती है, अर्थव्यवस्था बनती है। हम उसे सड़ने दे रहे हैं।  

हर गिरता गुंबद एक कहानी मिटाता है। हर अतिक्रमित आंगन एक याद चुरा लेता है। आगरा सिर्फ ताजमहल नहीं है। यह वह गुमनाम मकबरा भी है, टूटा दरवाजा भी है, उजड़ा बाग भी है। इन्हें खो दिया तो शहर की रूह खो जाएगी।

अदालत ने चेतावनी दे दी है। घंटी बज चुकी है। अब सवाल है: क्या कोई जागेगा?  

क्योंकि अब इतिहास सदियों में नहीं मर रहा। वह मौसमों में खत्म हो रहा है, हमारे सामने, हमारे देखते-देखते।

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