Friday, March 6, 2026

 महिला दिवस किसके लिए?

सास भी कभी बहू थी… या बहू भी कभी सास बनेगी?

टूटती हदें: जब सास-बहू का झगड़ा जानलेवा हो जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 मार्च 2026

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अगर पुरानी फिल्मों वाली ललिता पवार टाइप सास आज की मॉडर्न बहू से टकरा जाए, तो मंजर कैसा होगा?

और अगर टीवी सीरियल “वसुधा” की सास-बहू की लड़ाई असल जिंदगी में उतर आए, तो घर की कहानी कुछ और ही होगी।

बरसों से सास-बहू का रिश्ता टीवी सीरियलों, बॉलीवुड फिल्मों और डिनर टेबल की गपशप का पसंदीदा विषय रहा है। आम तौर पर इसे हल्के-फुल्के मज़ाक या ड्रामे के तौर पर दिखाया जाता है: चालाक सास और बेचारी, सताई हुई बहू।

लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जो खबरें आई हैं, वे इस मज़ाकिया तस्वीर को बिल्कुल झुठला देती हैं।

अब यह रिश्ता सिर्फ तानों, शिकायतों और चुप्पी भरे झगड़ों तक सीमित नहीं रहा। कई जगह यह टकराव हिंसा और कत्ल तक पहुँच गया है।

महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक, संयुक्त परिवार की जो चमकदार तस्वीर दिखाई जाती थी, उसके पीछे छिपे तनाव अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात है इन मामलों की बर्बरता।

अब यह सिर्फ दहेज उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसाने तक सीमित नहीं रहा। कई मामलों में सीधे-सीधे हत्या हो रही है।

जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के ठाणे में 60 साल की एक सास पर आरोप लगा कि उसने अपनी बहू का गला घोंट कर उसे मार डाला। वजह कोई मामूली घरेलू झगड़ा नहीं था। असल लड़ाई सरकारी नौकरी के फायदे और मुआवज़े को लेकर थी।

सास को लगता था कि बेटे की मौत के बाद यह हक उसका है।

लेकिन कानून के मुताबिक वह रकम बेटे की विधवा पत्नी को मिलनी थी।

यानी दुख, आर्थिक डर और असुरक्षा ने मिलकर गुस्से को कातिलाना शक्ल दे दी।

ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं।

2016 में मुंबई के पास मुंब्रा में एक सास ने अपनी बहू और उसकी माँ की गला रेत कर हत्या कर दी। वजह सिर्फ इतनी थी कि उसका बेटा अपनी बीवी को ज्यादा तवज्जो देता था।

यह सास-बहू संघर्ष का सबसे पुराना और बुनियादी रूप है; बेटे या शौहर पर भावनात्मक कब्ज़े की जंग।

2019 में वसई में एक सास ने बहू को चाकू मार दिया। बाद में वह खुद खून से सने हाथों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंच गई।

इससे साफ है कि घरेलू सत्ता की लड़ाई में कभी-कभी होश-ओ-हवास भी गायब हो जाते हैं।

ये घटनाएँ किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं हैं।

यह एक तरह से पूरे हिंदुस्तान की कहानी बनती जा रही है।

2025 में झारखंड में 60 साल की अनीता देवी को अपनी बहू को जहर देने के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा हुई।

उत्तर प्रदेश में वजहें और भी दिलचस्प हैं।

2023 में अमरोहा में एक सास ने अपनी बहू को गोली मार दी। वजह बताई गई; उसका “मॉडर्न लाइफस्टाइल” और घर के कामों में दिलचस्पी न लेना।

यह दरअसल दो पीढ़ियों की टक्कर है। एक तरफ पारंपरिक सोच वाली सास, जिसे आज्ञाकारी गृहिणी चाहिए।

दूसरी तरफ नई पीढ़ी की औरत, जो अपने करियर, आज़ादी और जिंदगी के फैसले खुद करना चाहती है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।

हर बार सास ही हमलावर नहीं होती।

अब कई मामलों में बहू भी पलटवार कर रही है: और वह भी बेहद खतरनाक तरीके से।

2025 में दिल्ली में एक गर्भवती महिला ने अपनी सास को चाकू मारकर हत्या कर दी। फिर लूट का नाटक रचा और सबूत मिटाने के लिए लाश को आग लगा दी।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में भी बहू ने घरेलू सामान और जिम्मेदारियों को लेकर हुए झगड़े में अपनी बुजुर्ग सास पर तेज हथियार से हमला किया।

झांसी में जमीन के झगड़े और कथित अवैध रिश्तों के शक ने बहू को अपनी सास को जहर देने तक पहुंचा दिया।

इन घटनाओं से एक बात साफ हो जाती है।

“बेचारी बहू” और “जालिम सास” वाला पुराना स्टीरियोटाइप अब टूट रहा है।

असलियत कहीं ज्यादा जटिल और जहरीली है।

शायद सबसे सिहराने वाला मामला 2026 की शुरुआत में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची से सामने आया।

यहां एक सास, मैरी, और उसकी बेटी एमिली ने मिलकर 25 साल की नंदिनी को कथित अवैध संबंधों के शक में बहला-फुसला कर मार डाला। बाद में उसकी लाश नदी किनारे फेंक दी गई।

यह घटना दिखाती है कि कई बार परिवार के लोग मिलकर “बाहरी” बहू के खिलाफ साजिश रच लेते हैं।

तो आखिर इन खौफनाक घटनाओं की जड़ क्या है?

असल वजह भारतीय परिवार की कुछ पुरानी कमजोरियां हैं।

संयुक्त परिवार, जो कभी सहारा और सुरक्षा का सिस्टम माना जाता था, अब कई बार प्रेशर कुकर बन जाता है।

सास, जो अक्सर विधवा होती है या जिसने पूरी जिंदगी परिवार के लिए कुर्बान कर दी, अपनी पहचान और सुरक्षा बेटे से जोड़ कर देखती है।

ऐसे में बहू का घर में आना उसे अपने रुतबे और जगह के लिए खतरा लगता है।

उधर बहू को हर वक्त की दखलअंदाजी और नियंत्रण घुटन जैसा महसूस होता है। पैसे, निजी जगह, बच्चों की परवरिश, हर मुद्दा ताकत की लड़ाई बन जाता है।

और जब बातचीत बंद हो जाए, और बेटा या पति चुप तमाशबीन बना रहे, तो छोटे-छोटे झगड़े कभी-कभी खूनी हादसों में बदल जाते हैं।

ये घटनाएँ एक कड़वी चेतावनी हैं।

सास-बहू का रिश्ता अब सिर्फ टीवी सीरियल का मसाला या पारिवारिक ड्रामा नहीं रहा।

यह मानसिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और पितृसत्तात्मक सोच का ऐसा संगम बनता जा रहा है जो कई घरों को क्राइम सीन में बदल रहा है।

अगर परिवारों ने समय रहते इज्ज़त, दूरी और समझदारी के नए उसूल नहीं अपनाए, तो ऐसे सुर्खियां शायद और आम होती जाएंगी।

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