विदेश नीति कोई सियासी खिलौना नहीं
राष्ट्रीय हित को दलीय शोर-शराबे से ऊपर उठना होगा
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बृज खंडेलवाल द्वारा
9 मार्च, 2026
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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में एक बुनियादी सच्चाई को दोहराया है: भारत की तक़दीर उसकी अपनी अंदरूनी ताक़त से तय होगी, दूसरों की मेहरबानी या गलतियों से नहीं। आज की बदलती दुनिया में, उन्होंने एक आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर दिया है, एक ऐसा भारत जो हिंद महासागर को सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक ज़रूरी हिस्सा मानता है। कोच्चि में ईरानी जहाज़ का रुकना भी इसी नीति का हिस्सा था, जिसे सरकार ने क्षेत्रीय उथल-पुथल के बीच एक 'मानवीय कदम' बताया।
लेकिन, घरेलू राजनीति की तस्वीर कुछ अलग है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS देना को डुबोए जाने पर सरकार की "खामोशी" पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे भारत के बैक यार्ड, में लगी आग करार दिया और पूछा कि क्या हमने अपनी रणनीतिक संप्रभुता गिरवी रख दी है? उन्होंने तेल की सप्लाई और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई।
रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों में संजीदगी और संयम की ज़रूरत होती है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ राजनीतिक दलों को रोज़ाना की तू-तू मैं-मैं से ऊपर उठकर एक सुर में बोलना चाहिए। दुनिया किसी देश को सिर्फ उसकी सेना या जीडीपी से नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक बातचीत के तेवरों (standard/level) से आंकती है।
अफ़सोस की बात है कि यह अनुशासन भारत की घरेलू बहस से गायब होता जा रहा है। विदेश नीति कोई टीवी की चिल्लाने वाली बहस नहीं है; यह एक बारीक महारत है जहाँ हर शब्द का अपना कूटनीतिक वज़न होता है। जब अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को केवल राजनीतिक अंक बटोरने का ज़रिया बनाया जाता है, तो इससे दुनिया भर में गलत संदेश जाता है।
आज़ादी के बाद से भारत ने 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) की एक मज़बूत परंपरा निभाई है। नेहरू और इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी तक, एक ही उसूल कायम रहा है: भारत हर शक्ति के साथ जुड़ेगा, लेकिन किसी का ताबेदार follower नहीं बनेगा। आज जब दुनिया महाशक्तियों की आपसी खींचतान और ऊर्जा संकट से गुज़र रही है, नई दिल्ली एक मुश्किल संतुलन बना रही है। हम वाशिंगटन से रिश्ते गहरे कर रहे हैं, मॉस्को के साथ पुरानी दोस्ती निभा रहे हैं और 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बन रहे हैं।
लोकतंत्र में बहस ज़रूरी है, लेकिन जब अंदरूनी झगड़े विदेशी मंचों पर दिखने लगते हैं, तो देश की छवि को खामियाजा भुगतना पड़ता है। 2020 के चीन सीमा विवाद का उदाहरण लीजिए। लद्दाख में ज़मीन खोने के आरोपों और सरकार के जवाबों के बीच जो शोर मचता है, उसका फायदा उठाकर चीन हमारी अंदरूनी एकता में कमी होने का दावा कर सकता है।
इसी तरह, 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन सिंदूर) भी राजनीति की भेंट चढ़ गई। विपक्ष ने इसे विदेशी नीति की नाकामी बताया, जबकि सरकार ने इसे सेना का मनोबल गिराने वाला बयान कहा। सच जो भी हो, संकट के समय 'बंटा हुआ घर' दिखना देश के हित में नहीं होता।
चाहे विदेशी दौरों पर विवादित नेताओं से मिलना हो या रूस से तेल खरीदने का मामला, हर चीज़ को सियासी चश्मे से देखना हमारी साख को कमज़ोर करता है।
भारत की ऐतिहासिक सफलताएं हमेशा आम सहमति पर आधारित रही हैं। शीत युद्ध के दौरान भी हमारे नेताओं ने दुनिया के सामने भारत के रुख को कमज़ोर नहीं होने दिया।
आज चुनौतियां और भी बड़ी हैं। दुनिया के समीकरण पल-पल बदल रहे हैं। ऐसे में भारत की स्थिरता और स्पष्टता ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।
सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का हक है, लेकिन विदेशी मंच पर यह आलोचना रचनात्मक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।
हमारे राजनयिक और सैनिक बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की मेजों तक। जब हमारी घरेलू राजनीति अलग-अलग संकेत देती है, तो उनका काम और भी मुश्किल हो जाता है।
विदेश नीति कोई 'स्प्रिंट' (100 मीटर की तेज़ दौड़) नहीं, बल्कि एक 'मैराथन' (लंबी दौड़) है। सरकारें आएंगी और जाएंगी, लेकिन राष्ट्र का हित शाश्वत, परमानेंट है। भारत की राजनीतिक जमात को यह याद रखना होगा कि जब देश दुनिया से मुखातिब हो, तो उसकी आवाज़ में गरिमा, स्पष्टता और एकता होनी चाहिए।
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