बीहड़ों की धूल, बंदूकों की गूंज और आत्मसमर्पण की आहट
और अब, उसी इतिहास को सलाम करने की तैयारी…
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बृज खंडेलवाल द्वारा
27 मार्च 2026
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चम्बल।
नाम लेते ही दिल धक से रह जाता था।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं के बीच पसरे वे बीहड़ किसी भूगोल की साधारण रचना नहीं। वे धरती के फटे हुए सीने जैसे थे, गहरे, टेढ़े मेढ़े, रहस्यमयी। सूरज की रोशनी भी वहाँ सीधी नहीं उतरती थी, जैसे डरती हो कि कहीं लौट न पाए। धूल ऐसी उड़ती थी मानो हर कण में एक अधूरी कहानी अटकी हो। कहीं खामोशी इतनी गाढ़ी कि कानों में गूंजने लगे, तो कहीं अचानक किसी अज्ञात दिशा से आती आवाज दिल की धड़कन बढ़ा दे।
1960 और 70 का दशक। यह वह समय था जब चम्बल सिर्फ एक नदी नहीं, वह एक मनःस्थिति थी।
सड़कें वहाँ जाकर खत्म हो जाती थीं। कानून कागजों में रह जाता था। शासन की पहुँच बीहड़ों की गहराई में खो जाती थी।
बीहड़ों की धरती पर चलना आसान नहीं था। पांव रखते ही मिट्टी खिसक जाती। एक मोड़ के बाद क्या है, कोई नहीं जानता। कांटेदार झाड़ियां, गहरी खाइयां, सांपों की सरसराहट, और ऊपर आसमान में मंडराते गिद्ध। यह प्रकृति का ऐसा दुर्ग था, जिसे इंसान ने नहीं बनाया, पर जिसने इंसान को अपने हिसाब से ढाल लिया।
इन्हीं बीहड़ों में जन्म लेते थे बागी।
डकैत कह देना आसान है, पर कहानी उससे कहीं ज्यादा जटिल थी। कोई किसान था जिसे जमींदार ने कुचल दिया। कोई युवा था जिसे पुलिस की ज्यादती ने विद्रोही बना दिया। कोई ऐसा था जिसे न्याय नहीं मिला, और उसने बंदूक उठा ली।
बीहड़ों में कानून की किताब नहीं चलती थी। चलती थी बंदूक की नली और बदले की आग।
लेकिन हर कहानी में सिर्फ अंधेरा नहीं होता। कहीं न कहीं रोशनी भी जन्म लेती है।
और चम्बल में वह रोशनी लेकर आए कई गांधीवादी, सर्वोदय के नेता, आचार्य विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण, आदि। दुबला पतला शरीर। शांत चेहरा। न कोई हथियार, न कोई डर। बस एक विश्वास कि इंसान बदल सकता है। यह विश्वास लेकर वे बीहड़ों में उतरे। जहाँ पुलिस जाने से कतराती थी, वहाँ वे नंगे पांव चले। इस आंदोलन को नई ताकत मिली, और लोग जुड़े।
कहानी किसी फिल्म की तरह लगती है, लेकिन यह हकीकत थी। डकैतों ने संदेश भेजा। वे आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, लेकिन अपमान नहीं सहेंगे।
और फिर वह दिन आया जब बीहड़ों ने एक अनोखा दृश्य देखा। मंच सजा। भीड़ जुटी। पुलिस भी थी, प्रशासन भी। और फिर एक एक करके बागी सामने आए।
हाथों में बंदूक थी, लेकिन सिर झुका हुआ। उन्होंने हथियार जमीन पर रख दिए। उस दिन गोली नहीं चली। तालियां बजीं। यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं था। यह एक युग का अंत था और दूसरे युग की शुरुआत।
इस पूरी कहानी ने सिनेमा को भी गहराई से प्रभावित किया। उस दौर की जिस देश में गंगा बहती है, गंगा जमुना, मुझे जीने दो, हीरोज डकैतों के दिल बदल देते दिखते हैं। आ अब लौट चलें ! सुनील दत्त की मुझे जीने दो बीहड़ों की सच्चाई को बिना किसी परदे के दिखाती है।
और वर्षों बाद पान सिंह तोमर यह याद दिलाती है कि हर डकैत के पीछे एक टूटा हुआ इंसान होता है। सिनेमा ने चम्बल को सिर्फ रोमांच नहीं बनाया। उसने उसे समझने की कोशिश की।
1970 के दशक में, एक युवा पत्रकार के रूप में, मैंने चम्बल को करीब से देखा। बीहड़ों में चलते हुए ऐसा लगता था जैसे समय थम गया हो। हर मोड़ पर एक कहानी थी। किसी का नाम इतिहास में दर्ज हुआ, किसी का नहीं।लेकिन दर्द सबका एक जैसा था।
मैंने उस समय लिखा था कि भारत ने चम्बल में सिर्फ डकैतों को नहीं हराया, उसने अपने ही भटके हुए लोगों को वापस पाया। वह लेख विदेशों में भी प्रकाशित हुआ और यह अनुभव आज भी मन में ताजा है। सैकड़ों खूंखार बागियों ने जब मुरैना में आत्म समर्पण किया तो लगा ये किसी और दुनिया की कहानी थी। लेकिन नहीं, वह यहीं हुआ था, हमारी ही धरती पर।
और अब, उसी इतिहास को याद करने का समय फिर आया है। जौरा स्थित गांधी आश्रम में बागी समर्पण दिवस की 55वीं वर्षगांठ पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित होने जा रही है। यह आयोजन सिर्फ औपचारिक कार्यक्रम नहीं है। यह स्मृति का उत्सव है। यह उस क्षण को फिर से जीने का प्रयास है जब बंदूकें झुकी थीं और इंसानियत उठ खड़ी हुई थी। इस संगोष्ठी में देश भर के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक और पत्रकार भाग लेंगे। अहिंसा, सामाजिक बदलाव और गांधीवाद के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होगी। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह होगी, जब उन बागियों को सम्मानित किया जाएगा जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में लौटने का साहस दिखाया। फिर संवाद का सिलसिला चलेगा। विचारों का आदान प्रदान होगा। पुराने अनुभवों को नई पीढ़ी के सामने रखा जाएगा।
यह भी याद किया जाएगा कि कैसे एक समय में चम्बल के बीहड़ देश के लिए चुनौती थे, और कैसे गांधीवादी प्रयासों ने उन्हें परिवर्तन की प्रयोगशाला बना दिया।
आज जब समाज फिर से तनाव और विभाजन के दौर से गुजर रहा है, तब चम्बल की यह कहानी और भी प्रासंगिक हो जाती है।
यह हमें सिखाती है कि कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका समाधान न हो सके।
जरूरत होती है विश्वास की, संवाद की, और धैर्य की।
चम्बल आज भी है। बीहड़ आज भी हैं। लेकिन अब वहाँ डर की नहीं, इतिहास की गूंज सुनाई देती है। जब हवा उन खाइयों से गुजरती है, तो लगता है जैसे वह कोई पुरानी कहानी सुना रही हो। एक ऐसी कहानी जिसमें बंदूकें थीं, खून था, लेकिन अंत में जीत इंसानियत की हुई।
और जब जौरा में फिर से बागी समर्पण दिवस मनाया जाएगा, तो वह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं होगा। वह उस विश्वास का पुनर्जन्म होगा जिसने कभी बीहड़ों में शांति बो दी थी।
चम्बल की धूल अब भी उड़ती है। लेकिन अब उसमें डर नहीं, इतिहास की खुशबू है।
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Reference:
The 1977 article by **Brij Khandelwal** (under the byline "By Brij Khandelwal Gemini") appears on **page 8** of the *New Nation* (Singapore) issue dated **16 January 1977**.
### Available Excerpt (from digitized archives)
The publicly indexed opening text reads:
> "FOUR years or so ago If you travelled in a train or a bus through the Chambal valley region in Central India you might have found a notorious dacoit disguised as a superintendent of police sitting beside"
It continues from there, describing travel experiences in the Chambal valley during the early 1970s, when the area was still notorious for bandit (dacoit) activity. The piece is framed as a travelogue highlighting the risks and atmosphere of the region at that time.